Monday, September 6, 2021

बसंतीपुर के खिलाड़ी

 बसंतीपुर के तीन खिलाडी,दो को कभी कोई मौका नहीं मिला पदक का,तीसरे के पदकों का सफर शुरू

पलाश विश्वास


भारत विभाजन की त्रासदी में हमारे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने वजूद के लिए संघर्ष करते रहे हैं।सात दशक बीत चुके हैं। हम अभी इस महात्रासदी से उबरे नहीं है।


 ग्रीक त्रासदी हो या शेक्सपीयर लिखित त्रासदी या महाकाव्यों के आख्यान- सारी त्रासदियों का आखिर अंत होता है।


 जल प्रलय के बाद भी बची रहती है पृथ्वी और प्रकृति। लेकिन भारत विभाजन की यह त्रासदी हो या यूद्धस्थल बने देशो में मनुष्यता के नक्शे की आधी आबादी, राजनीतिक विस्थापन और पलायन की त्रासदी का कोई अंत नहीं होता।


बांग्लादेश की जनसंख्या 13 करोड़ है और पश्चिम बंगाल की जनसंख्या 11 करोड़। पश्चिम बंगाल में ये 11 करोड़ लोग सारे के सारे बांग्लाभाषी नहीं हैं। जिनमें बड़ी संख्या में गैर बांग्ला भाषी लोग हैं तो बंगाली आबादी का आधा हिस्सा पूर्वी बंगाल के विस्थापितों की है। 


इन विस्थापितों में आधे ऐसे हैं सात दशकों में जिनका कभी पुनर्वास नहीं हुआ।


बाकी भारतवर्ष के 22 राज्यों में और राजधानियों की मेहनतकश शूद्र अतिशूद्र बंगाली विस्थापितों की संख्या कम से कम 11 करोड़ के हैं। 


बांग्लादेश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजनीति और अर्थब्यवस्था के कारण सिर्फ पड़ोसी भारत में नहीं, यूरोप, अमेरिका, एशिया ,आस्ट्रेलिया और अफ्रीका तक में विस्थापित हैं।


भारतवर्ष में रोज़गार और आजीविका के लिए हर गांव कस्बे से लोगों का विस्थापन और पलायन होता है। गांव,किसान और खेती की तबाही,जल जंगल,जमीन और आजीविका से बेदखली की वजह से यह सिलसिला अंधाधुंध शहरीकरण और बाजारीकरण से तेज़ हॉट जा रहा है। उत्तरराखण्ड के गांवों में घरों के खंडहर यही बताये हैं।


 विकास के नाम बेदखल हुई जनसंख्या भारत विभाजन के शिकार लोगों से ज्यादा हैं।


 आंतरिक उपनिवेश के ये बलि प्रदत्त मनुष्य हैं। चाहे हिमालय हो,या आदिवासी भूगोल जड़ जमीन से उखड़े लोगों की त्रासदी पश्चिम एशिया,अरब और अफगानिस्तान की त्रासदियों से छोटी नहीं है। 


इलियड, महाभारत, ग्रीक त्रासदी और शेक्सपीयर के लिखे त्रासदी नाटकों की त्रासदियों से कहीं बड़ी है यह अंतहीन त्रासदी।


इसी अंतहीन त्रासदी के शिकार लोगों का गांव है बसंतीपुर। जो 1951 में यहां उत्तराखण्ड की तराई के घने जंगल को आबाद करने वाले लोगों ने अपने नेता पुलिनबाबू की पत्नी और मेरी मां बसन्ती देवी के नाम पर बसाया।


 हमारे लोगों को  बचपन और युवावस्था में खेलने कूदने और लिखने पड़ने के वे मौके दशकों तक नहीं मिले,जो बाकी शरणार्थियों,विस्थापितों, वनवासियों को नहीं मिलते। गरीबी,बेरोज़गारी में सात दशक बीते।


भारत विभाजन के बाद विभिन्न आंदोलनों के साथी बसंतीपुर गांव को बसाने वाले लोग हैं।जिनका यह साझा परिवार है। जिसके प्रेजिडेंट थे मांदार बाबू। चौथी पीढ़ी तक यह परिवार खेलों के प्रति समर्पित है। मांदार बाबू का सामाजिक योगदान बहुत बड़ा है,जिसपर हम सिलसिलेवार ढंग से चर्चा करते रहेंगे।


टनकपुर से लेकर कोटद्वार हरिद्वार तक हिमालय की तलहटी का विशाल यह अरण्य प्रदेश ब्रिटिश हुकूमत ने गोरखों को हराकर जीता था और जो दस्तावेजों में वन विभाग और तेजस्व विभाग का होंने के बावजूद आज भी ब्रिटिश राजपरिवार की सम्पत्ति है। 


लालकुआं और हल्द्वानी से लेकर पन्तनगर तक फैले 50 वर्गकिमी इलाके के बिन्दुखत्ता को भारत सरकार या उसका राजस्व विभाग या वनविभाग इसीलिये बेदखल कर सकते। 


बेदखली का मुकदमा निर्णायक तौर पर सरकार हार चुकी है। इस जमीन पर सरकार दावा नहीं कर सकती।


ब्रिटिश क्राउन यानी खाम की व्यवस्था रही है तराई में 1952 तक,जो भारत सरकार के अधीन थी भी नहीं।


 तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस तराई पट्टी पर भारत सरकार के निर्णायक कब्जे के लिए भारत विभाजन के शिकार पंजाबी, सिख और बंगाली शरणार्थियों को बसाकर इस जंगल को आबाद करके ब्रिटिश क्राउन की खाम बंदोबस्त का अंत कर दिया। इसीके मुताबिक कालोनाइजेशन योजना बनी।


तब नेहरू सोवियत संघ के सहकारी कम्मुन की व्यवस्था से प्रभावित थे। कालोनाइजेशन की योजना उसी सहकारी मॉडल पर बनी। 


जमीन लीज पर दी गई और उसके बंदोबस्त का जिम्मा हर कालोनी की सहकारी लैंड सेटलमेंट सोसाइटी को दी गयी। यह ग्राम सभा बनने के पहले की व्यवस्था थी,जब गांव की यह जमीन खारिज दाखिल करने का अधिकार भी गांव की इस सहकारी समिति को दे दिया गया।पंचायती व्यवस्था लागू होने पर इस व्यवस्था का अंत हो गया।


हर गांव में इस समिति का एक प्रेजिडेंट होता था।एक कैशियर और एक सेक्रेटरी। लिखा पढ़ी के लिए इलाके के गांवों का एक साझा सरकारी सचिव भी होता था।


मांदार मण्डल आजीवन इसी समिति की वजह से बसंतीपुर के प्रेजिडेंट रहे। उसीतरह जैसे अतुल शील सेक्रेटरी और शिशुवर मण्डल कैशियर।


मांदार मण्डल फुटबॉल और वालीबॉल के अद्भुत खिलाड़ी थे। दिनेशपुर के 36 बंगाली गांवों के अलावा 50-60 के दशक में तराई भाबर के लगभग सभी गांवों में कबड्डी,वालीबॉल और फुटबॉल की बेहतरीन टीमें हुआ करती थी। 


शहरों और स्कूल कालेज में हॉकी मुख्य खेल था। बैडमिंटन भी प्रचलित था। क्रिकेट का चलन इंग्लैंड की टीम के कप्तान टोनी लुइस के भारत दौरे से 70 के दशक में शुरू हुआ और कप्ताल लॉयड की टीम के 1975 के दौरे के बाद क्रिकेट ने एथेलेटिक्स से लेकर हॉकी फुटबॉल वालीबॉल समेत सारे खेलों को चलन से बाहर कर दिया।


उत्तर प्रदेश की टीमों में तराई भाबर का प्रतिनिधित्व मुश्किल था। नैनीताल के जैसे कुछ जगह के खिलाड़ी जरूर नेशनल टीम के हिस्सा बने। जैसे जब हम जीआईसी नैनीताल के छात्र थे,तब  वहां से सैय्यद अली ओलंपिक हॉकी टीम में थे। 


आम मेहनतकश ग्रामीणों के लिए कोई मौका नहीं था। लेकिन तराई भाबर के गांवों में तब हर खेल के टूर्नामेंट होते थे।तब छात्र और युवा इसतरह नशे,पब्जी और सट्टेबाजी, फ्लर्टिंग के शिकंजे में नहीं थे। खूब खेलते थे।पढ़ने लिखने की संस्कृति के अलावा सांस्कृतिक गतिविधियां और खेलकूद प्रतियोगिताएं तराई भाबर के गांवों की कथा में जरूर शामिल थी।


बसंतीपुर की जात्रा पार्टी हो या बसंतीपुर की नेताजी जयंती,पूरे उत्तराखण्ड में इनकी धूम थी। 


सांस्कृतिक गतिविधियों में बसन्तीपुर की खास पहचान थी।इस आलेख की अनेक तस्वीरे बसंतीपुर जात्रा पार्टी और नेताजी जयंती की हैं।इन गतिविधियों को 90 के दशक तक मांदार बाबू के सुपुत्र कृष्ण पद मण्डल और नित्यानंद मण्डल के नेतृत्व में बसन्तीपुर के युवाओं ने बखूबी जारी रखा। तब कृष्ण ग्राम सभा के सभापति थे।


हमारे खास दोस्त, बचपन के साथी कृष्ण बेहद फुर्तीले,हर खेल के जबरदस्त खिलाड़ी थे कृष्ण,हमारे बचपन के साथी,जिसे कभी कोई मंच या मौका पदक जीतने के लिए नहीं मिला।


 वह जब तक जीवित रहा,देश में जहां भी होता था,हर बार लौटकर दिन में कहीं भी रहे,रात में हम उसके घर में उसके साथ होते थे। हम कोलकाता में थे,तभी असमय उसका निधन हो गया।


देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला 1928 में जयपाल सिंह मुंडा ने जीता था। लेकिन तराई भाबर के लिए पहली बार देश को पदक दिया बंगाली विस्थापितों का बेटे मनोज सरकार ने टोक्यो के पैरा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर।यह उपलब्धि बहुत खास है।













तराई भाबर में शुरू से हमारे लोगों में प्रतिभाओं की कमी नहीं थी।लेकिन उन्हें पदक जीतने का कोई मौका नहीं मिला। सात दशक बाद यह सिलसिला शुरू हुआ। आगे नमेँ ढेरों पदकों की उम्मीद है।


मसलन कृष्ण का बेटा प्रियांशु उत्तराखण्ड से नेशनल एतजेलिटिक्स में पदक जीतने लगा है। वह देहरादून के महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कालेज का छात्र है। लक्ष्मी मण्डल और प्रदीप मण्डल का यह बेटा एथेलिटिक्स में देश के लिए जरूर पदक जीतेगा, इस शुभकामना के साथ आज यही तक। उनका छोटा बेटा अंशुमान भी एथलीट है।


मांदार बाबू,पुलिनबाबू, अतुल शील,शिशुवर मण्डल और बसंतीपुर के पुरखों की कथा जारी रहेगी।

Friday, August 20, 2021

प्रसंग- नेताजी को श्रद्धांजलि। पलाश विश्वास

 प्रसंग -नेताजी को श्रद्धांजलि



अफसोस यह है कि हमारा ज्ञान सूचनाओं पर आधारित है। सूचनाएं सही गलत हो,इससे फर्क नहीं पड़ता किसीको। परीक्षा प्रणाली ज्ञान के बदले सूचना की जांच करता है। 


इसलिए नए लोग शार्ट कट से सूचना जुटाकर ज्यादा से ज्यादा अंक जुटाने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।


सूचनाओं की जांच का विवेक ज्ञान और गहन अध्ययन

 से बनता है,जिसका कोई शार्ट कट नहीं होता।


शिक्षा का मतलब सीखना,जेनन,समझना,गहन चिंतन मंथन और निष्कर्ष का विवेक होता है। इसके बिना डिग्री और सर्टिफिकेट, शत प्रतिशत अंक से कुछ नहीं बनता।


गूगल डिक्शनरी है और विश्वकोष। कौन फीड करता है।इससे कोई मतलब नहीं। 


कुंजी में रेडीमेड जवाब है। सिलेबस और विषय की जानकारी के बिना,पाठ्य पुस्तकों के दर्शन किये बिना यह ऑन लाइन शिक्षा और सूचना तंत्र का करिश्मा है कि जिस नेताजी को स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक माना जाता है, उनके बारे में अंग्रेजों का फैलाया भरम भी हम बेहिचक अंतिम सत्य मानकर चल रहे हैं। 


सत्य क्या है,उसकी किसी को कोई परवाह नहीं है।


इसी कारण मरने से पहले मृत्यु का शोक इतना वायरल है।


मरने से पहले हम मरे हुए लोग हैं।

Thursday, August 19, 2021

लोधा शबर जनजाति की चुनी कोटाल को क्यों आत्महत्या करनी पड़ी?

 चुनी कोटाल, महाश्वेता देवी और आदिवासी

पलाश विश्वास



शबर जनजाति पर म्हाश्वेतादि ने अपनी पत्रिका बर्तिका के जरिये सिलसिलेवार काम किया था। यह सामग्री बांग्ला में है।पहले बर्तिका के सारे अंक हमारे पास होते थे।अब एक भी नहीं है।


 बर्तिका के जरिये आदिवासी समाज के लिए उन्होंने व्यापक काम किया है,जो उनके कथा साहित्य से कम महान नहीं है।


आज कोलकाता के मशहूर बांग्ला अख़बार में खेड़िया शबर जनजाति की विश्विद्यालय की दहलीज तक पहुंची स्त्री रमणिता के बारे में खबर छपी है।


गौरतलब है कि इससे बरसों पहले लोधा शबर जनजाति की एक स्त्री विश्विद्यालय से शोध कर रही थी।जिनका नाम था चुनी कोटाल।


विश्विद्यालय में लोधा शबर जनजाति  कोटासे होने की वजह से उनका दमन उत्पीड़न इतना ज्यादा हुआ कि चुनी कोटाल को आत्महत्या करनी पड़ी। 


हम सभी,खासतौर पर महाश्वेता देवी , विवहलित हो हए थे।आंदोलन भी चला।


लेकिन दमन और उत्पीड़न का सिलसिला रुका नहीं है। आरक्षण तो नाम मात्र का है।कितने आदिवासी समूहों को आरक्षण का फायदा हुआ?


आदिवासियों के लिए विश्विद्यालय आज भी वर्जित क्षेत्र है। आज भी विभिन्न विश्विद्यालयोन में ऐसे दमन उत्पीड़न की शिकायतें मिलती हैं।


दिलोदिमाग लहूलुहान हो जाता है और हम कुछ कर नहीं पाते। ऐसी कहानियां जरूर आम जनता को जानना चाहिए।


आरक्षण की राजनीति और राजनेताओं को छोड़ दें तो आरक्षण से दलितों,आदिवादियों,अल्पसंख्यकों और स्त्रियों का कितना उत्थान हुआ और क्यों नहीं हुआ 70 साल बाद भी,चुनी कोटाल की कथा उसका जवाब है।


 आगे सरकारी क्षेत्र के निजीकरण और उत्पादन प्रणाली, अर्थव्यबस्था कारपोरेट हवाले होने के बाद ओबीसी कोटे का वोटबैंक सधने के अलावा क्या बनेगा,इस पर ओबीसी समुदायों को सोचना होगा कि ओबीसी कोटे के भी कहीं दलित और आदिवासी आरक्षण जैसा हश्र तो नहीं होगा?


जनजातियों के बारे में हिंदी में ऐसे काम जो भी हुए,उसे आम जनता के सामने लाने की जिम्मेदारी हमारी है।


कृपया 6398418084 व्हाट्सअप नम्बर पर मुझसे संपर्क करें।


पलाश विश्वास

कार्यकारी संपादक ,प्रेरणा अंशु

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Website- prerna anshu.com

Monday, August 16, 2021

राजनीतिक आज़ादी नहीं है,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी नहीं,बाकी अग्निपथ।पलाश विश्वास

 इस अग्निपथ पर हमसफ़र मिलना मुश्किल


समीर भी, हमारी लड़ाई सामाजिक मोर्चे की है।लड़ाई जारी रहेगी।तुम्हारे मेरे होने न होने से कोई फर्क नही पड़ेगा


पलाश विश्वास





कल हमारे छोटे भाई और रिटायर पोस्ट मास्टर समीर चन्द्र राय हमसे मिलने दिनेशपुर में प्रेरणा अंशु के दफ्तर चले गए। रविवार के दिन मैं घर पर ही था। हाल में कोरोना काल के दौरान गम्भीर रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उसे जीवन में सबकुछ अनिश्चित लगता है।


इससे पहले जब वह आया था,रूपेश भी हमारे यहां था। उसदिन भी उसने लम्बी बातचीत छेड़ी थी। 


उसदिन उसने कहा था कि गांवों में स्त्री की कोई आज़ादी नहीं होती।हमें उन्हें आज़ाद करने के लिए हर गांव में कम से कम 5 युवाओं को तैयार करना चाहिए। 


हम सहमत थे।


उस दिन की बातचीत से वह संतुष्ट नहीं हुआ। उसके भीतर गज़ब की छटपटाहट है तुरन्त कुछ कर डालने की। आज हमारे बचपन के मित्र टेक्का भी आ गए थे। बाद में मुझसे सालभर का छोटा विवेक दास के घर भी गए।


बात लम्बी चली तो मैंने कहा कि मैं तो शुरू से पितृसत्ता के खिलाफ हूँ और इस पर लगातार लिखता रहा हूँ कि स्त्री को उसकी निष्ठा,समर्पण,दक्षता के मुताबिक हर क्षेत्र में नेतृत्व दिया जाना चाहिए। लेकिन पितृसत्ता तो स्त्रियो पर भी हावी है। इस पर हम प्रेरणा अंशु में सिलसिलेवार चर्चा भी कर रहे हैं। जाति उन्मूलन, आदिवासी,जल जंगल जमीन से लेकर सभी बुनियादी मसलों पर हम सम्वाद कर रहे हैं ज्वलन्त मसलों को उठा रहे हैं।


हमारे लिए सत्ता की राजनीति में शामिल सभी दल।एक बराबर है। विकल्प राजनीति तैयार नहीं हो सकी है। न इस देश में राजनैतिक आज़ादी है। 


सामाजिक सांस्कृतिक सक्रियता के लिये भी गुंजाइश बहुत कम है। 


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है।


स्त्री आज़ादी के नाम पर पितृसत्ता के लिए उपभोक्ता वस्तु बन रही है। क्रयक्षमता उसका लक्ष्य है और वह गांव और किसिन के पक्ष में नहीं ,बाजार के पक्ष में है या देह की स्वतंत्रता ही उसके लिए नारी मुक्ति है तो मेहनतकश तबके की,दलित आदिवासी और ग्रामीण स्त्रियों की आज़ादी,समता और न्याय का क्या होगा?


समीर अम्बेडकरवादी है।


 हमने कहा कि अम्बेडकरवादी जाति को मजबूत करने की राजनीति के जरिये सामाजिक न्याय चाहते हैं,यह कैसे सम्भव है?


साढ़े 6 हजार जातियों में सौ जातियों को भी न्याय और अवसर नहीं मिलता। 


संगठनों,संस्थाओं और आंदोलनों पर,भाषा, साहित्य, सँस्कृति,लोक पर भी जाति का वर्चस्व। 


फिर आपके पास पैसे न हो तो कोई आपकी सुनेगा नहीं।कोई मंच आपका नहीं है।


समीर हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढता था और उसका मंझला भाई सुखरंजन मेरे साथ। उनका बड़ा भाई विपुल मण्डल रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। जिनका हाल में निधन हुआ।


70 साल पुराना वह हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल बंद है। इलाके के तमाम प्राइमरी स्कूल रिलायंस को सौंपे जा रहे हैं। क्या यह कोई सामाजिक राजनीतिक मुद्दा है?


नौकरीपेशा लोगों के लिए समस्या यह है कि पूरी ज़िंदगी उनकी नौकरी बचाने की जुगत में बीत जाती है। चंदा देकर सामाजिक दायित्व पूरा कर लेते हैं। नौकरी जाने के डर से न बोलते हैं और न लिखते हैं।कोई स्टैंड नहीं लेते। लेकिन रिटायर होते ही वे किताबें लिखते हैं और समाज को, राजनीति को बदलने का बीड़ा उठा लेते हैं।


सामाजिक काम के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है। जैसे मेरे पिता पुलिनबाबू ने खोया। हासिल कुछ नहीं होता।


 राजनीति से कुर्सी मिलती है लेकिन सामाजिक सांस्कृतिक काम में हासिल कुछ नहीं होता। इसमें सिर्फ अपनी ज़िंदगी का निवेश करना होता है और उसका कोई रिटर्न कभी नहीं मिलता।


समाज या देश को झटपट बदल नहीं सकता कोई। यह लम्बी पैदल यात्रा की तरह है। ऊंचे शिखरों, मरुस्थल और समुंदर को पैदल पार करने का अग्निपथ है।


इस अग्निपथ पर साथी मिलना मुश्किल है।


जो हाल समाज का है, जो अधपढ अनपढ़ नशेड़ी गजेदी अंधभक्तों का देश हमने बना लिया, युवाओं को तैयार कैसे करेंगे।


मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर भी सार्वजनिक सम्वाद जरूरी है।


मेरे भाई,समीर, निराश मत होना।हम साथ हैं और हम लड़ेंगे। लेकिन यह लड़ाई सामाजिक मोर्चे की है और यह संस्थागत लड़ाई है,जिसे जारी रखना है।


तुम्हारे मेरे होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

Sunday, August 15, 2021

आदिवासी भूगोल में 1757 से ही अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई शुरू हो गयी थी,पलाशी युद्ध के ठीक बाद से।पलाश विश्वास

 आदिवासियों का इतिहास हमारा इतिहास है

पलाश विश्वास




1957 में पलाशी के युद्ध में लार्ड क्लाइव की जीत के अगले ही दिन से मेदिनीपुर के जंगल महल से आदिवासियों ने ईस्ट इंडिया के लहिलाफ़ जल जंगल जमीन के हक हकूक और आज़ादी की लड़ाई शुरू कर दी।


मेदिनीपुर में एक के बाद एक तीन0 अंग्रेज़ कलेक्टरों की आदिवासियों ने हत्या कर दी। इसे बंगाल और। छोटा नागपुर में भूमिज विद्रोह कहा जाता है। 


जल जंगल जमीन की लड़ाई में शामिल जनजातियों को अंग्रेजों ने स्वभाव से अपराधी जनजाति घोषित कर दिया। 


बंगाल, झारखण्ड, ओडिशा, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ में तब आदिवासी ही जंगल के राजा हुए करते थे। जहां आदिवासियों का अपना कानून चलता था।जिसके तहत धरती पर जो भी कुछ है,वह आदिवासी समाज का है।किसी की निजी या किसी हुकूमत की जायदाद नहीं।


 अंग्रेज़ी हुकूमत आफ़ीवासियों से जल जंगल जमीन छीनना चाहती थी।उनकी आजादी और उनकी सत्ता छीनना चाहती थी। 


समूचे आदिवासी भूगोल में इसके खिलाफ 1757 से ही विद्रोह शुरू हो गया।


अंग्रेज़ी सरकार आदिवासियों को अपराधी साबित करने पर तुली हुई थी, इसलिए इसे चोर चूहाड़ की तर्ज पर चुआड़ विद्रोह कहा गया और हम भद्र भारतीय भी इसे चुआड़ विद्रोह कहते रहे। 


जल जंगल जमीन की इस लड़ाई को आदिवासी भूमिज विद्रोह कहते हैं,जो सही है। 


इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए बिहार बंगाल में बाउल फकीर विडतोह हुए,जिसमे आदिवासियों की बड़ी भूमिका थी। लेकिन इसे सन्यासी विद्रोह कहा गया।


 तमाम किसान विद्रोह की अगुआई नील विद्रोह से अब तक आदिवासी ही करते रहे। शहीद होते रहे लेकिन हमलावर सत्ता के सामने कभी आत्म समर्पण नहीं किया।


 संथाल विद्रोह, मुंडा विद्रोह ,भील विद्रोह से पहले चुआड़ विद्रोह, बाउल विद्रोह और नील विद्रोह तक के समय पढ़े लिखे भद्र जन अंग्रेजों के साथ और आदिवासियों के खिलाफ थे।


संथाल विद्रोह, मुंडा विद्रोह,भील विद्रोह,गोंदवाना विद्रोह से लेकर आज तक जल जंगल जमीन की लड़ाई में किसिन विद्रोह की अगुआई आदिवासी करते रहे हैं शहादतें देते रहे हैं। जबकि गैर आदिवसी पढ़े लिखे लोग जमींदारी के पतन होने तक बीसवीं सदी की शुरुआत तक अंग्रेज़ी हुकूमत का साथ देते रहे हैं।


मुंडा, संथाल और भील विद्रोह की चर्चा होती रही है। लेकिन चुआड़ विद्रोह,बाउल फकीर सन्यासी विद्रोह और नील विद्रोह में आफ़ीवासियों की आज़ादी की लड़ाई हमारे इतिहास में दर्ज नहीं है।


यह काम हमारा है।


प्रेरणा अंशु के सितम्बर अंक से आदिवासियों पर हमारा फोकस जारी रहेगा। किसिन आंदोलनों में आदिवादियों की नेतृत्वकारी भूमिका और चुआड़, संथाल,तुतिमीर, भील,गोंडवाना विद्रोह से लेकर बाउल फ़कीर सन्यासी नील विद्रोह और 1857 की क्रांति के बारे में प्रामाणिक लेख आमंत्रित है।


आदिवासियों का इतिहास हमारा इतिहास है।

Mail-prernaanshu@gmail.com

Saturday, August 14, 2021

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से आदिम सभ्यता की गंध क्यों आ रही है? पलाश विश्वास

 लाल किले से राष्ट्र को सम्बोधन से आदिम युग की गंध क्यों आ रही है?

पलाश विश्वास



पहले और दूसरे खाड़ी युद्ध के बाद दुनिया सिरे से बदल गयी। भारतीय राजनय की असफलता और निष्क्रियता का सिलसिला शुरू हुआ और अब अफगानिस्तान से जब सारे समीकरण बदल रहे हैं,भारतीय राजनय फिर फेल है। 


मुक्त बाजार और अंधी राजनीति ने राजनय को फेल करके भारत की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता गहरे खतरे में डाल दिया। दुनिया फिर बदल रही है। हम आदिम युग में वापस लौट रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस पर टाइम मशीन का यह सफर मुबारक हो।


जनता को बेरोजगार करके,बाज़ारबमें मरने छोड़कर,चिकित्सा,शिक्षा समेत सारी बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं से वंचित कर, जल जंगल जमीन समता न्याय स्वयंत्रता,सम्प्रभुता और मानवाधिकार से बेदखल कर भीख पर जीने को मजबूर किया जा रहा है।


कमाई है नहीं,कमरतोड़ महंगाई,भीख पर कितने दिन जिएंगे?


लाल किले से राष्ट्र को सम्बोधन से आदिम सभ्यता की गंध क्यों आ रही है?

Wednesday, August 11, 2021

विभाजन की त्रासदी में कभी ननिहाल न देखने वालों की पीढ़ी के हमलोगों के ननिहाल ऐसे बने।पलाश विश्वास

 अभी अभी खबर मिली है कि रुद्रपुर ट्रांजिट कैम्प निवासी इलाके के पुराने नामी फुटबॉल खिलाड़ी, सामाजिक कार्यकर्ता और जनता इंटर कालेज,रुद्रपुर के अध्यापक  हरेन जी, हरेंद्र नाथ सरकार का निधन दिल का दौरा पड़ने से हो गया। 



उनसे हमारे परिवारिक सम्बन्ध रहे है।बचपन की अनेक यादें,खासकर फुटबॉल मैच जो बंगाली कालोनियों में खूब खेले जाए थे और अब नहीं खेली जाते,से जुड़ी अनेक यादें उनसे जुड़ी हुई हैं। 


कोलकाता से आने के बाद उनसे दुबारा मुलाकात नहीं हो सकी।


वे 78 साल के थे।

विनम्र श्रद्धांजलि। संस्कृति और खेलकूद से जुड़े अपने एक आत्मीय को। हमारे पास उनकी कोई तस्वीर नहीं है।

जिनके पास हो,वे कॉमेंट बॉक्स में लगा दें।


उनके भांजे  हरेकृष्ण मण्डल जी ने इस पोस्ट पर उनकी फोटो भेजते हुए लिखा है-

हरेंद्र नाथ सरकार हमारे मामा जी थे. आप जनता इंटर कॉलेज रुद्रपुर में अध्यापक रहे. नारायण दत्त तिवारी, इंदिरा हृदयेश दीदी जी के काफी सन्निकट रहे.

 अपने समय में कुमाऊं मंडल के फुटबॉल खेल के अध्यक्ष रहे. आप बहराइच के मूल निवासी थे. ट्रांजिट कैंप रूद्रपुर में आपका आवास है,आपका एक पुत्र रवि एवं पुत्री नीरू है.

आप गरीब मजलूम असहाय को मदद करने में तत्पर रहते थे.

तिलकराज बेहड़ आपके शिष्य रहे हैं. आपकी मृत्यु समाज की अपूरणीय क्षति है. ॐशांतिॐ.


धन्यवाद मण्डल जी।


हमारे पड़ोसी गांव चित्तरंजन पुर में फरीदपुर गोपाल गंज के ऑडाकांदी से विस्थापित एक बुजर्ग दम्पत्ति थे। मेरी ताई हेमलता को अपनी बेटी मानते थे। ताई जी और मेरी मां बसन्ती देवी का मायका पीछे छूट गया था। ताई जी का ओदाकांदी में तो मां का बरिपडा, बालेश्वर ओडिशा में। लेकिन दिनेशपुर और शक्तिफार्म इलाकों में हमारे दर्जनों ननिहाल हो गए।


चित्तरंजन पुर भी उनमें से एक ननिहाल था। उस नाना नानी के इकलौते बेटे का नाम था बाबूराम। जिनका घर में रात दिन आना जाना था।


उन्ही बाबूराम मामा की बहन से शादी हुई थी जनता इंटर कालेज के मास्साब हरेंद्र नाथ सरकार ने।


बुजुर्ग दम्पत्ति के निधन के बाद बाबूराम मामा ने जमीन बेच दी और में तब नैनिताल से सीधे देशाटन पर निकल गया था। 

1964 के दंगों के बाद गोपालगंज ओदाकांदी से रिश्ते में पीआर ठाकुट की बहन और ताईजी की मां प्रभावती देवी बसंतीपुर आ गयी तो ननिहालों से  रिश्तेदारी का सिलसिला टूट गया।

Tuesday, August 10, 2021

भीष्म साहनी का उपन्यास तमस, भारत विभाजन और मेरे पिताजी।पलाश विश्वास

 साहित्य में भारत विभाजन और भीष्म साहनी

पलाश विश्वास




भीष्म साहनी जी के लेखन के बारे में कुछ कहने लिखने की शायद जरूरत नहीं है। तमस भारत विभाजन की त्रासदी पर क्लासिक रचना है। आम लोगों की यह आपबीती पंजाबी के साहित्यकारों ने खूब दर्ज किया है। मंटो की कहानियां तो भीतर से मठ डालती हैं। 


बांग्ला में प्रफुल्ल रॉय के केया पातार नौको और कपिल कृष्ण ठाकुर के उजानतलार उपकथा को छोड़ दें तो विभाजन के वास्तविक शिकार लोगोंकी कोई आपबीती दर्ज नहीं हुई। 


अतीन बंदोपाध्याय के नील कंठो पाखीर खोजे पठनीय है।लेकिन यह कथा एक जमींदार परिवार का वृत्तांत है।


 सुनील गंगोपाध्याय के समूचे लेखन में हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति जितनी घृणा है,उससे कहीं ज्यादा दलितों और आदिवासियों के खिलाफ है।  उनके लिए विभाजपीडितों का मतलब है पूर्वी बंगाल के सवर्ण भद्रलोक। 


शंकर् का नजरिया भी कमोबेश यही रहा है।


सिर्फ फिल्मकार ऋत्विक घटक ने मेघे ढाका तारा, कोमलगान्धार और सुवर्णरेखा के जरिये विभाजन की त्रासदी को जिया है।


बंगाल और पंजाब के समूचे साहित्य, उर्दू में कुर्त उल इन हैदर, राही मासूम रज़ा के आधा गांव को ध्यान में रखते हुए भारत विभाजन की सबसे प्रामाणिक तस्वीर भीष्म जी ने ही रची है। 


मंटो बेहद प्रभावशाली हैं ,लेकिन उनके यहाँ इतना विराट कैनवास और इतने बारीक ब्यौरे नहीं है।


विभाजनपीडित परिवार से होने और पीढ़ी दर पीढ़ी उनकी लड़ाई में शामिल होने के कारण भीष्म जी की दूसरी रचनाओं के मुकाबले हमें तमस अपनी ही रचना लगती है,जो में लिख नहीं सका और लिख भी नहीं सकता।


तमस के हर पन्ने पर मुझे पुलिन बाबू का चेहरा नज़र आता है।


मेरे पिता पुलिनबाबू कैंसर से जूझ रहे थे। आखिरी कोशिश के तहत हम उन्हें लेकर एम्स दिल्ली ले गए। वहां पंकज बिष्ट जी आये। उन्होंने मुझसे कहा कि चलो,एक कार्यक्रम में जाना है। भीष्म जी होंगे।


पिताजी के साथ रह गए मंझले भाई पद्दोलोचन और रंगकर्मी सुबीर गॉस्वामी।


कार्यक्रम में हमारे प्रवेश करते ही मंच पर बैठे भीष्म साहनी जी उठ खड़े हो गए। बोले,पंकज जी नमस्ते।

पंकज दा और हम हतप्रभ रह गए।


अपने से युवा लोगों के प्रति यही अपनापा विष्णु प्रभाकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर, महाश्वेता देवी, विष्णु चन्द्र शर्मा,शैलेश मटियानी, महादेवी वर्मा, रघुवीर सहाय,भैरव प्रसाद गुप्त, कमलेश्वर,अमरकांत, राजेन्द्र यादव  जैसे पुराने साहित्यकारों में देखी और महसूस की है। लेकिन अफसोस किनाज के बड़े साहित्यकारों का न अपने समकालीन और न युवा रचनाकारों से ऐसी आत्मीयता नज़र आती है।


103 वे जन्मदिन पर भीष्म साहनी जी की स्मृति को नमन। वे हमारे हिस्से का भी लिख गए,इसके लिए आभार।

Saturday, August 7, 2021

हमारा जो हुआ,सो हुआ,जनसत्ता और पत्रकारिता का क्या हुआ?

 आज फिर कोलकाता से गुरुजी जयनारायण का फोन आया। कोलकाता जनसत्ता में सिर्फ मार्केटिंग विभाग है। दो इंजीनियर हैं। बिल्डिंग है,सम्पादकीय नहीं है।प्रेस लखनऊ चला गया।दिल्ली से पीडीएफ आता है।


कोलकाता महानगर ने हिंदी,बांग्ला,ओड़िया, उर्दू, गुरमुखी और उर्दू,किसी भी भाषा के अखबार में किसी की स्थायी नौकरी नहीं है।सभी पत्रकार संविदा पर है।


योग्य,प्रशिक्षित और पढ़े लिखे पत्रकारों में कोलकाता में दिहाड़ी मजदूरी तो क्या बीस रुपये का भी काम नहीं है।


जिंदगीभर किसी और पेशा या नौकरी की कोशिश न करके 5 दशक पत्रकारिता को मिशन मानकर सबकुछ दांव पर लगाकर सबकुछ हारने के बावजूद अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं रहा।


मीडिया में बचे हुए साथियों की इस दुर्गति और आदरणीय प्रभाष जोशी के अखबार जनसत्ता की इस दशा पर बहुत दुखी हूं।


ओम थानवी ने हमारी कभी सुनी नहीं। लेकिन उनके जमाने में भी यह हाल नहीं हुआ।


जाति, वर्ण और नस्ल देखकर सम्पादक चुनने की परंपरा ने जनसत्ता जैसी संस्था, नई दुनिया जैसे अखबार और पूरी हिंदी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर दिया।





कोलकाता में जिस तरीके से मुझे मेरी औकात में रखने की तिकड़में भिड़ाई गई और हार न मानते हुए प्रभाष जी से और बाकी सम्पादकों और मैनेजरों से लड़ते भिड़ते हुए हम जनपक्षधर पत्रकारिता का विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे, उसकी कथा कम रोमांचक और कम दुःखद नहीं है। हमने कभी किसीको बख्शा भी नहीं है।


इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली हो या हंस का पन्ना या कोलकाता,हम पिछले बीस साल से हिंदी समाज से अपनी गौरवशाली विरासत सहेजने की अपील करते रहे हैं। बांग्ला समाज से तो हम बहिस्कृत थे ही। वहां का कूलित वर्चस्व तो निरंकुश है ही।


बदलाव की उम्मीद तो फिर भी गाय पट्टी से ही थी क्योंकि यहां सामाजिक ताकतें और लोक अभी ज़िंदा है।बस,यही पूंजी है,जिसके भरोसे न सिर्फ ज़िंदा हूँ, हाशिये पर होबे के बावजूद सक्रिया हूँ।


पत्रकारिता के मिशन और साहित्य का क्या हुआ,कहने की जरूरत नहीं है,लेकिन हमारा मिशन जारी है

ओलंपिक सोना और जयपाल सिंह मुंडा।पलाश विश्वास

 ओलंपिक सोना और जयपाल सिंह मुंडा

पलाश विश्वास

जयपाल सिंह मुंडा 1928 men ओलंपिक का पहला स्वर्ण जीतने वाली भारतीय टीम के कप्तान थे। वे ics भी थे और संविधान सभा के एकमात्र मुखर आदिवासी सदस्य भी।


उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का अभीतक सही मूल्यांकन नहीं हुआ।जसिंता,यह काम भी हमें ही करना है।कोई दूसरा हमारा मूल्यांकन कभी नहीं करेगा।हमें उनके मूल्यांकन का मोहताज भी नहीं होना चाहिए।


निजी तौर पर जाति वर्ण नस्ल वर्चस्व के मातबरों से में जीवन के किसी भी क्षेत्र में न्याय की उम्मीद नहीं करता।


छल प्रपंच और दमन से बहुसंख्यक आबादी के प्रतिनिधत्व और अवसर खत्म करने वालों के कारण ही हम 138 करोड़ भारतवासी आजादी के सत्तर साल बाद किसी एक अदद स्वर्णपदक का जश्न मनाकर करोड़ो प्रतिभाओं के साथ हुए अन्याय को सिरे से नज़रंदाज़ करते हैं।


हमारे बच्चे भूख और कुपोषण के शिकार होते हैं।

हमारे बच्चे बिना चिकित्सा के बेमौत मारे जाते हैं।

घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए स्कूल नही जा पाते।

जो स्कूल जाते भी हैं,उनके लिए समान शिक्षा और समान अवसर नहीं है।


बच्चों को न खेलने की आज़ादी है और न उन्हें खेलने का अवसर मिलता है।


फिरभी हम पदकों की गिनती करते हुए तिरंगा लहराते हैं। इस व्यवस्था को बदलने की नहीं सोचते।


70 साल तो क्या 700 साल भी हम इसीतरह वंचना के जख्म पर मलहम लगाते रहेंगे छिटपुट कामयाबी पर।



Friday, August 6, 2021

क्यों खतरे में है उत्तराखण्ड की अस्मिता? पलाश विश्वास

 हल्द्वानी सम्वाद के संदर्भ में

क्यों खतरे में हैं उत्तराखण्ड की अस्मिता?


पलाश विश्वास


बैठक के लिए आप सभी को शुभकामनाएं। हम लोग प्रेरणा अंशु के छपने की प्रक्रिया में फंसे हुए हैं,इसलिए आ नहीं सके।कृपया अन्यथा ने ले।हमें कल तक पत्रिका छाप देनी है।


बेहद जरूरी मुद्दे पर आपने यह पहल की है,इसका स्वागत है।


पिछले 21 साल में हम लोग सिर्फ भावनाओं में फंसे हुए हैं और व्यवहारिक राजनीति से कोसों दूर है।




राजनीतिक मसलों को भी भावात्मक ढंग से सुलझा लेने की कोशिश में गहरे विभाजन और अलगाव के शिकार हैं,जबकि इस कठिन दौर में निरंकुश कारपोरेट फासीवादी सत्ता के लिए मेहनतकश आवाम को एकजुट करने की सबसे ज्यादा जरूरत है।


उत्तराखण्ड के बुनियादी मसलों , जल जमीन जंगल जलवायु और पर्यावरण के मुद्दों पर एकताबद्ध राजनीतिक लड़ाई की जगह अस्मिता की राजनीति को पहाड़ी गैर पहाड़ी मुद्दे तक सीमित कर दिया गया है।


 जबकि अस्मिता का मतलब भाषा,संस्कृति और पहचान को बनाये रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनता की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है।


बार बार भूमि माफिया की सरकारें बनाकर हम जनता को जल जंगल जमीन से बेदखल करने वाली ताकतों की जाने अनजाने मदद कर रहे हैं।


वैकल्पिक राजनीति चुनाव से पहले विशुद्ध चुनावी समीकरण बनाने के खेल से आगे नहीं बढ़ता। 


बाकी चार साल हम अपनी अपनी खिचड़ी अलग पकाते हुए सत्ता से ज्यादा से ज्यादा अपना हिस्सा बटोरने की कोशिश करते हैं। 


न्यूनतम कार्यक्रम के साथ जनता के बीच लगातार काम किये बिना हम कौन सी राजनीति कर रहे हैं?


हम मानते हैं कि उत्तराखण्ड में बदलाव की राजनीति में पहाड़ का जितना मजत्व है,उससे कम महत्व तराई और भाबर का नहीं है।


पहाड़ और तराई भाबर को अलग करने वाली किसी भी राजनीति के हम खिलाफ हैं और ऐसे किसी भी राजनीतिक बिमर्ष में हम शामिल नहीं हो सकते।


हम नही आ सके, अगर जरूरी लगा तो मित्रों तक हमारी बात जरूर पहुंचा दें।


सन्दर्भ-

 Prabhat Dhyani: *संगोष्ठी/ आमंत्रण* 

            *ख़तरे में है उत्तराखंडी अस्मिता?*

प्रिय साथी/ महोदय, 

उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों,  ज़मीनों की निर्मम लूट, राज्य की अवधारणा एवं अस्मिता से हो रहे खिलवाड़ से आज राज्य का नागरिक समाज चिंतित व आक्रोशित है। 

जिस आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अस्मिता के लिए राज्य आंदोलन लड़ा गया था उसके सभी मोर्चों पर हम कमज़ोर हुए हैं। 

सरकार के विकास के दावों के बावजूद उत्तराखंड  विस्थापन, बेरोज़गारी,  शिक्षा, स्वास्थ्य की बदहाली से जूझ रहा है। 

जनता के इस आक्रोश से बचने के लिए राजनीतिक दल लूटखसोट की नीतियां बदलने के बदले चुनाव से पहले मुख्यमंत्रियों का चेहरा बदलने से इस आक्रोश को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। 

इन महत्वपूर्ण सवालों पर गहन विचार हेतु उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी एवम राजनैतिक,सामाजिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों द्वारा  7 अगस्त 2021 शनिवार को प्रातः 11 बजे से *ट्रिपल जे बिल्डिंग सभागार, छोटी मुखानी, निकट एसबीआई बैंक हल्द्वानी* में एक संगोष्ठी आयोजित होने जा रही है ।जिसमें हल्द्वानी के अलावा अन्य क्षेत्रों से भी सक्रिय सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता भागीदारी करेंगे। 

स्थान:ट्रिपल जे बिल्डिंग सभागार, 

छोटी मुखानी, 

निकट SBI हल्द्वानी ।

दिनांक 7 अगस्त 2021 शनिवार ,प्रातः 11 बजे से।

निवेदक-उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी एवम राजनैतिक,सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधिगण।

सम्पर्क -पी सी तिवारी केंद्रीय अध्यक्ष  उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी 9412092159

प्रभात ध्यानी 9837758770, 9368555136

अमीनुर्रहमान राज्य आंदोलनकारी  72488 44902

तरुण जोशी सामजिक कार्यकर्ता    919412438714

भोपाल सिंह धपोला +91 70558 78080

विनोद जोशी

9837390155

[07/08, 11:33 am] Palash Biswas: पलाश विश्वास

Thursday, August 5, 2021

संविधान में समता और न्याय का लक्ष्य सबसे बड़ा ढोंग और ओलंपिक पदक? पलाश विश्वास

 ओलंपिक तमगे पर जश्न मनाए या घृणा और नफरत की संस्कृति पर शोक?

पलाश विश्वास


इससे बड़ी शर्मिंदगी क्या होगी? कदम कदम पर इस तरह का बर्ताव होता है अछूतों के साथ। उनमें सभी वन्दना कटारिया नहीं होते और न उनका कोई नोटिस लेता है। इससे पहले जैसे वन्दना का भी नोटिस नहीं लिया गया।जाति जब तक रहेगी,अस्पृश्यता तब तक रहेगी।इसी गंदगी में जीते हुए हम सफेदपोश बने रहेंगे।


इसी भेदभाव की वजह से ओलंपिक में एक सोने के लिए तरसते 138 करोड़ करोड़ लोग दो चार चांदी कांसे के तमगों को लेकर जश्न मनाते हैं। 


मनुष्यता ही नहीं बची हो तो दस बीस पचास सोने से भी क्या आता जाता है?


समान अवसर से हर क्षेत्र में जब देश की बहुसंख्य आबादी वंचित है। ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। न चिकित्सा है और न शिक्षा,न भोजन। 


बचपन भट्टियों में भूनकर खा जस्ते हैं हम। बच्चों के लिए न खेल के मैदान हैं और न खेलने की आज़ादी।


हम ओलंपिक के चांदी और कांसे पर जश्न मनाए या इस घृणा,हिंसा और दमन पर,जाति के अभिशाप पर शोक मनाएं?


संविधान में समता और न्याय का लक्ष्य इस गणतंत्र का सबसे बड़ा पाखंड है।




Wednesday, August 4, 2021

नोबेल के लिए कोलकाता जाना जरूरी,वीरेन द ने कहा था

 आज वीरेनदा की जन्मतिथि है। वक्त कितनी तेजी से बदला है। अभी तो साथ काम कर रहे थे। बातें हो रही थीं। इतना वक्त निकल गया। सबकुछ याद भी नहीं है।


उनकी स्मृति को नमन। वे नहीं होते तो कोलकाता कभी नहीं जाते। कहते थे,जब चाहोगे लौट आओगे।जाना जरूरी है। 


कहते थे कि कोलकाता बड़ा बसंतीपुर है। ठीक से देख लो वरना नोबेल पुरस्कार मिस हो जाएगा।


 यह नोबेल पाने का उनका नुस्खा था।


 हमें कोई पुरस्कार कभी नहीं चाहिए था। लेकिन उनकी तरह छोटीनसे छोटी चीज देखने की भरसक कोशिश की है। लेकिन उनकी तरह लिख नहीं सका।लिख भी नहीं सकते।अपनी तरह लिख पाया।


वीरेनदा के साथ तस्वीरें भी थीं ।सहेज कर नहीं रख सके।


वीरेनदा के रहते हुए कोलकाता नहीं छोड़ सका।उन्हें अब कभी पता नहीं होगा कि फिर में वह हूं, जहां से चला था। बसंतीपुर। 


हमारी नई टीम के बारे में भी उन्हें न बता सका और न प्रेरणा अंशु में उनकी ताज़ा कविता लगा सका।


आज तुमसे फिर बात करने की जरूरत है वीरेनदा!

काश! तुम जवाब दे पाते। उसी तरह खुलकर हंसते।


प्रेरणा अंशु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।


हक हकूक की जानकारी सबसे जरूरी।पलाश विश्वास

 नगालैंड,मिजोरम,अरुणाचल मेघालय और हिमाचल के बाद प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध तीन और छोटे राज्य बने उत्तराखण्ड,झारखण्ड और छत्तीसगढ़।एक साथ।जनाकांक्षा,आंदोलन,जल जंगल और पर्यवर्क कि लड़ाई और अस्मिता के सवाल पर ये राज्य बने। जो अब भृष्टाचार,रिश्वत कमीशनखोरी और लोटखसोत के सबसे बड़े केंद्र बन गए है।जहां सरकार किसी की भी बने,जनल जल जंगल जमीन,जलवायु और पर्यावरण न्याय,समता और सामाजिक न्याय,कानून के राज और मानवाधिकार से वंचित है। यहां सत्ता भूमि माफिया,कारपोरेट दलालों और जनविरोधी तत्वों की बनती है जो भावनाओं की हिंसा और घृणा की राजनीति पर टिकी है।


 जहां ज्वलन्त मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती और तंत्र के स्तम्भ बन गए हैं आंदोलनकारी जो अब आंदोल


न को कैश करने में लगे हैं।निरन्तर जड़ों में सामाजिक, सांस्कृतिक सक्रियता से ही इन तीनों राज्यों और बाकी देश में वैकल्पिक जन राजनीति ,अर्थव्यवस्था,पर्यावरण और जलवायु का निर्माण हो सकता है।


इसके लिए जनता को हक़ हकूक की जानकारी और कानून की समझ होनी चाहिए। इसके लिए युवा वकीलों की जनप्रतिबद्ध भूमिका समय की मांग है।


जलवायु न्याय पर इस सम्वाद के आयोजन और हमें भी शामिल करने के लिए इन्ही युवा अधिवक्ताओं का आभार।सम्वाद से ही नया रास्ता बनेगा। हम पीड़ितों के सवाल लेकर आपके दरवाजा जरूर खटखटाएंगे।आपको अपना पक्ष तय करना होगा।


आंदोलन प्रोजेक्ट तक सीमित न रहे।

Tuesday, August 3, 2021

हॉकी और नैनीताल, डीएसबी और हम। पलाश विश्वास

 नैनीताल में ट्रेडर्स कप हॉकी में देश की चुनिंदा टीमें भाग लेती थीं।इस प्रतियोगिता में डीएसबी की टीम का प्रदर्शन हमारे लिए गर्व का विषय रहा है।सैय्यद अली तो हमारे सामने ही ओलंपिक खिलाड़ी बने।तब नैनिताल हाकी का गढ़ था।रेडियो पर हम लोग हर मैच की कमेंट्री सुनने के लिए चाय और पैन की दुकानों पर भीड़ लगते थे।


उन दिनों नीताल में मूसलाधार बारिश भी हुआ करती थी। मैदान में छाता लेकर बैठना जरूरी था।अपनी डीएसबी या किसी पसंदीदा टीम की जीत की खुशी में हमने न जाने कितने छाते खोए। शायद उतने ही जितने मिड लेक लाइब्रेरी में कैटलॉग ढूंढकर जरूरी किताब पा लेने की खुशी में जितने छाते खोए,उतने ही। अफसोस, नैनिताल की चमक दमक बढ़ने के बावजूद खेलने और पढ़ने की संस्कृति गायब हो गयी।


तब हम क्रिकेट के दीवाने नहीं थे।यह सत्तर के दशक की बात है।इससे पहले की समृतियाँ तो और भी सुनहली है। हमारा हथियार तब हॉकी स्टिक हुआ करता था।हम लोग दांत और सत्तर के दशक में कबड्डी के अलावा सिर्फ हॉकी खेलते थे। और अब?


शायद ओलंपिक में फिर हॉकी के मैदान पर हमारी टीमों के तिरंगा फहराने से धूमिल हो गयी समृतियाँ कि चमक लौटे?


क्या नशा,सट्टा, सत्ता और पब्जी को मात देकर क्रिकेट के बाजार को शिकस्त देकर हॉकी फिर राष्ट्रीय खेल बनेगा? उसमें नैनिताल की गौरवशाली भूमिका होगी?


याद दिलाने के लिए राजीव दाज्यू का आभार।


कल अल्मोड़ा से बसंतीपुर लौटने में रात हो गयी। दिन में जब कार्यक्रम चल रहा थ तो पवन राकेश का फोन आया।मेरे साथ खड़ी थी हाईकोर्ट की वकील  हमारे परममित्र पीसी तिवारी की बेटी स्निग्धा,जो मानवाधिकार कार्यकर्ता और अल्मोड़ा सम्वाद के आयोजकों में खास है।


राकेश बेहद भावुक हो गया था।बोला,अल्मोड़ा से घर लौटते वक्त नैनिताल होकर जाना। हमने कहा,नैनिताल पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी।कोई नहीं मिलेगा।हमें रात को ही घर लौटना है। प्रेरणा अंशु की तैयारी बीच में छोड़कर आये हैं। कल ही रूपेश को प्रेस जाना है।


हमने कहा,नैनिताल अलग से आएंगे। स्निग्धा से भी राकेश की बात हुई।वह राकेश से मिलती रहती है।


स्निग्धा से कहा,नैनिताल के युवा छात्रों से बात हो सकती है? डीएसबी का माहौल सम्वाद का है?


स्निग्धा जवाब नहीं दे सकी।


क्या सत्तर के दशक में देशभर से आनेवाले लेखकों,कवियों,पत्रकारों,रंगकर्मियों,फ़िल्मी कलाकारों के सामने ऐसी संवादहीनता का संकट था? 


क्या हम डीएसबी के छात्र तब देश दुनिया से कटे हुए थे या सिर्फ कैरियर की चिंता करते थे?


घर लौटकर अल्मोड़ा में 3 कार्यक्रमों में गए। हरिद्वार और बागेश्री भी हो आये। हल्द्वानी आना जाना लगा रहता है। हल्द्वानी और भुवाली के बेहद जंफिक नैनिताल हमारे लिए इतना दूर क्यों हो गया है।


ठीक है कि गिर्दा नहीं हैं। ठीक है कि शेखर पाठक, उमा भट्ट और बटरोही अक्सर नैनीताल में नहीं मिलते।ठीक है कि सखा दाज्यू सख्त बीमात हैं और राजीव लोचन साह बीमार हैं तो ज़हूर और इदरीश लगभग अकेले हैं।


एक डीएसबी का माहौल बदल जाने से कितना अजनबी हो गया अपना नैनीताल! कितना पराया! कितना बेरौनक! कितना बेनूर। हिमपात भी नहीं बुलाता।


https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10226083200487886&id=1273489865





Thursday, July 29, 2021

हम ओलंपिक पदक जीतेंगे,टॉप पर भी होंगे।बशर्ते

 न लिखने का वायरस और चन्दोला जी का जन्मदिन।जी रौ सौ बरीस

पलाश विश्वास



ये महाशय हमारे परम् मित्र कैलाश चन्दोला जी हैं और प्रेरणा अंशु के प्राचीनतम सदस्य हैं।मास्साब जब तक सम्पादकीय सम्भाल रहे थे,तब तक हर अंक में लिख रहे थे।लेकिन उनके बाद हम उनसे लिखा नहीं पा रहे।


महाशय अब फेसबुक पर अपना लिखा प्रकाशित कर देते हैं। हम आईटीआई परिसर में उनके क्वार्टर जाकर लिखने का तकादा करके चाय नाश्ता उड़ा आते थे।जनाब पर कोई असर नहीं हुआ। नगीना खान  को भी न लिखने की बीमारी लग गई है। वह भी फेसबुक पर लिख रही हैं।  चन्दोला जी तो चाय नाश्ते की बचत के लिए हल्द्वानी जाकर छुप जातक हैं। 


अच्छे दिन लहलहा रहे हैं।फिरभी?


मित्रों में यह बीमारी अब महामारी हो गयी है। मसलन एम एस के के विजय सिंह।हर अंक में वायदा करके नहीं लिखते। Subir Vandana Das  और  Manoj Ray,साथ में  Subeer Goswamin ..मनोज और सुबीर बेतरीन रंगकर्मी भी हैं। 


सुबीर वन्दना दास फेसबुक पर रोजाना सैकड़ों लाइक बटोरते हैं और प्रिंट के लिए न लिखने की कसम खाई है। मनोज तो कलम पकड़ने की तकलीफ भी नहीं उठाते। रंगकर्म की इतिश्री हो गई। सुबीर गोस्वा मी न रंगकर्म करते हैं और न लिखते हैं।फेसबुक पोस्ट भी नहीं करते।


न लिखने का इस फेसबुकिया वायरस का स्रोत हालांकि चीन नहीं है और न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पढ़ने लिखने की संस्कृति खत्म होने के लिए चीन को दोषी ठहराया है। 


फेसबुक से जो बचे हुए हैं,उनमें खासकर युवा और बच्चे पब्जी में निष्णात है। पब्जी अब राष्ट्रीय खेल है,हॉकी नहीं है। उनकी प्रतिभा इसमें खिलखिला रही है।


ओलंपिक में पदकों की कमी तभी पूरी होगी जब नशाखोरी, सट्टा, जुआ,रिश्वत, आपसी फूट, चमचागिरी, घृणा और हिंसा के साथ ही आलस्य और बहाने बाजीबमें अपनी प्रतिभा जाया करने पर भीबपडक मिलेंगे। 


तब शायद पदक तालिका में हम शीर्ष पर होंगे।


लगे रहो मुन्ना भाई का अनुसरण करते हुए कैलाश चन्दोला और अपनी प्रतिभा को ताक पर रखने वाले ऐसे मित्रों के घर पर गुलाब के साथ गोमूत्र और गोबर रखने की जरूरत है।


गोबर और गोमूत्र तो भारत में हारी, बीमारी और महामारी का रामवाण है।जरूर आजमाइए।


हालांकि चन्दोला जी ने लिखा है


अब कल 30 जुलाई ठैरा बल ये हर साल मल्लब साल में एक ही बार आने वाला हुआ बल।

हाँ कल का दिन मेरे लिये भौति महत्व का ठैरा क्योंकि कल ही के दिन मैने इस पावन धरा में पदार्पण किया लोगो को ज्ञान बाटने ,अपने ज्ञान का विस्तार करते हुए कल मुझे पचास वर्ष हो जाएंगे।

हाँ अपने पराक्रम से कल मैं दो जगह मित्रो के साथ रहूँगा स्थानीय मित्र अपनी अपनी सुविधा के अनुसार मुझसे समय मल्लब अपॉइंटमेंट ले सकते है दो जगहों में सुविधानुसार जगह का चुनाव कर ले।

हा फेसबुक के मित्र अभी से आशीर्वाद, शुभकामनाएं,बधाई संदेश प्रेषित कर सकते है।


बधाई जी। जय हो। जी रौ सौ बरीस।


इतनी लंबी शुभकामना सन्देश के बाद क्या कैलाश चन्दोला फिर लिखना शुरू करेंगे और बाकी लोग पढ़ना लिखना?


स्टारपोल पर आप खूब वोट दाल रहे हैं। इनबॉक्स में इस बारे में अपनी राय हां या ना में दर्ज करें।


दिनेशपुर के बाहर के साथी यहां अपने इलाके के अपनी प्रतिभा के साथ ऐसा ही सलूक करने वाले मित्रो के खिलाफ नामजद रपट दर्ज कर सकते हैं ताकि हमें यह मालूम हो सके कि दिनेशपुर से बाहर भी ऐसे मित्र हैं।


लाइक करें या न करें, वोट जरूर डालें।बहुत जल्द नए सुअरों,बंदरों और मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों की आमद के लिए आप वोट डालेंगे ही।थोडी प्रैक्टिस कर लेने में बुराई क्या है?

खिलता हुआ इंद्रधनुष।पलाश विश्वास

 खिलता हुआ इंद्रधनुष और भावनाओं की राजनीति


पलाश विश्वास









दफ्तर से बसन्ती पुर लौटते हुए हरिदासपुर से गांव के रास्ते पैदल चलते हुए हल्की बूंदाबांदी और सांझ की धूप में हिमालय की छनव में आसमान के एक छोर से दूसरे छोर तक अर्धचन्द्राकार इंद्रधनुष खिलते दिखा। 


मेरे मोबाइल से ज़ूम नहीं जो सकता।फिर भी सिर्फ दृष्टि के भरोसे नौसीखिए हाथों से खींची ये तस्वीरें। 


रास्ते में खेत का काम करके सुस्त रहे बचपन के मित्र,जबरदस्त किसान प्रभाष ढाली मिल गए।उसके साथ बिल बाडी का भाई बाबू।


 फटाक से फोटू खिंचवा ली। 


प्रभाष के पास गांव में पहले पहल कैमरा आया। तब हम डीएसबी में एमए के छात्र थे और नैनिताल समाचार निकला ही था। राजीव लोचन साह दाज्यू और गिर्दा ने कहा कि नैनीताल समाचार के लिए लिखो। 


तब तराई की खबरें नहीं छपती थी कहीं। हालांकि हाल में दिवंगत रुद्रपुर के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष और पिताजी के मित्र सुभाष चतुर्वेदी हिमालय की पुकार निकाला करते थे। हमारे अग्रज गोपाल विश्वास ने भी तराई टाइम्स निकाला था। लेकिन तराई पर खोजी पत्रकारिता करना जोखिम का काम था।


जगन्नाथ मिश्र जी की पत्रकारिता के चलते गदरपुर बाजार में सरेआम गोली मार दी गई थी। हालांकि 1979 के 13 अप्रैल को पन्तनगर गोलीकांड की रपट शेखर पाठक ,गिर्दा और मैंने नैनिताल समाचार और दिनमान के लिए कर दी थी। 


तभी नैनिताल से दिल्ली आकाशवाणी की रिकार्डिंग के वक्त जाते हुए रास्ते में बस से उतारकर गिर्दा को हमलावरों ने बुरी तरह पीटा था।


हकीकत का सामना पीड़ित पक्ष के लोग भी नहीं करते। भावनाएं भड़काकर उनकी आवाज़ बुलंद करने वालों के खिलाफ हमला करवाना तबभी दस्तूर था।


हमने कब तक सहती रहेगी तराई श्रृंखला लिखनी शुरू की तो दिनेशपुर और शक्तिफार्म में ही भयंकर विरोध झेलना पड़ा।राजनीति प्रबल थी हमारे खिलाफ। 


नैनीताल समाचार और मुझे धमकियां दी गईं।घेरकर मारने की कोशिशें भी होती रही। लेकिन हमने लिखना बन्द नहीं किया।


तब तराई के गांवों और जंगलों में मेरे साथ अपने कैमरे के साथ प्रभाष ढाली हुआ करते थे। उनके पिताजी रामेश्वर ढाली बसंतीपुर को बसाने वालों में थे। उसकी मां का उसके बचपन में ही सेप्टीसीमिया से निधन हो गया था।


आज बसन्ती पुर में उम्र हो जाने के बाद भी रात दिन जमीन पर डटे रहने वाले किसान का नाम प्रभाष ढाली है। मेरे भाई पद्दोलोचन, दोस्त नित्यानन्द मण्डल और गांव के दूसरे किसानों के साथ प्रभाष भी लगातार पन्तनगर कृषि विश्व विद्यालय के निर्देशन में आधुनिक खेती करते हैं। प्रभाष ऑर्गनिक खेती भी कर रहै हैं।


इंद्रधनुष के शिकार के प्रयास में फ्रेम में गांव और खेतों में घुसपैठ करते हुए शहर की झांकियां भी कैद हो गयी।लेकिन अफसोस पहाड़ कैद नहीं कर सका।


 हिमालय की उत्तुंग शिखर बहुत पास होते हुए भी हमसे दूर हैं। यह दूरी उतनी ही है,जितनी उत्तराखण्ड बनने के बाद पहाड़ी और गैर पहाड़ी जनता के बीच बनती जा रही है। अफसोस की भावनाओं की राजनीति अब बेलगाम है और दूरियां बढ़ती जा रही है।


मेरा नैनीताल अब लगता है कि अनजान किसी और आकाशगंगा में है।

Tuesday, July 27, 2021

वजूद से चस्पां

 शिवन्ना का भाई ननिहाल में मस्त।कभी हम भी ऐसे ही रहे होंगे। मेरी माँ बसन्ती देवी,ताई हेमलता,चाची उषा और बड़ी दीदी मीरा के पास जाहिर है कि तराई के घनघोर जंगल में मोबाइल फोन नहीं रहा होगा।






जब बाघ भालू से जिंदा बचने की लड़ाई हो तो फोटो का क्या मतलब? फिर ऐसे कपड़े?

 हम तो मिट्टी कीचड़ से लथपथ रहे होंगे जैसे पलाश के फूल। मेरे पिता पुलिनबाबू तब आंदोलनों की आग में दहक महक रहे थे।

यह तस्वीर साहब की मम्मी गायत्री ने खींची है।

मेरी ताई ज्यादा होशियार थी,नाम के साथ पूरे पर्यावरण की समूची तस्वीर हमारे वजूद के साथ चस्पां कर दी।

फिर दर्द होता है तो चीखना मजबूरी भी है।पलाश विश्वास

 फिर दर्द होता है तो चीखना मजबूरी भी है।

पलाश विश्वास



शायद जब तक जीता रहूंगा मेरी चीखें आपको तकलीफ देती रहेंगी,अफसोस।

जो बच्चे 30-35 साल की उम्र में हाथ पांव कटे लहूलुहान हो रहे हैं,उनमें से हरेक के चेहरे पर मैं अपना ही चेहरा नत्थी पाता हूं।

बत्रा साहेब की मेहरबानी है कि उन्होंने फासिज्म के प्रतिरोध में खड़े भारत के महान रचनाकारों को चिन्हित कर दिया।इन प्रतिबंधित रचनाकारों में कोई जीवित और सक्रिय रचनाकार नहीं है तो इससे साफ जाहिर है कि संघ परिवार के नजरिये से भी उनके हिंदुत्व के प्रतिरोध में कोई समकालीन रचनाकार नहीं है।

उन्हीं मृत रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के संघ परिवार के कार्यक्रम के बारे में समकालीन रचनाकारों की चुप्पी उनकी विचारधारा,उनकी प्रतिबद्धता और उनकी रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करती है।

जैसे इस वक्त सारे के सारे लोग नीतीश कुमार के खिलाफ बोल लिख रहे हैं।जैसे कि बिहार का राजनीतिक दंगल की देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा हो।

डोकलाम की युद्ध परिस्थितियां, प्राकृतिक आपदाएं,किसानों की आत्महत्या,व्यापक छंटनी और बेरोजगारी, दार्जिंलिंग में हिंसा, कश्मीर की समस्या, जीएसटी, आधार अनिवार्यता, नोटबंदी का असर , खुदरा कारोबार पर एकाधिकार वर्चस्व, शिक्षा और चिकित्सा पर एकाधिकार कंपनियों का वर्चस्व, बच्चों का अनिश्चित भविष्य, महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार,दलित उत्पीड़न की निरंतरता,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार संस्कृति जैसे मुद्दों पर कोई बहस की जैसे कोई गुंजाइश ही नहीं है।

गौरतलब है कि मुक्तिबोध पर अभी हिंदुत्व जिहादियों की कृपा नहीं हुई है।शायद उन्हें समझना हर किसी के बस में नहीं है,गोबरपंथियों के लिए तो वे अबूझ ही हैं।

पलाश विश्वास

सत्ता समीकरण और सत्ता संघर्ष मीडिया का रोजनामचा हो सकता है,लेकिन यह रोजनामचा ही समूचा विमर्श में तब्दील हो जाये,तो शायद संवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचती।आम जनता की दिनचर्या,उनकी तकलीफों,उनकी समस्याओं में किसी की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती तो सारे बुनियादी सवाल और मुद्दे जिन बुनियादी आर्थिक सवालों से जुड़े हैं,उनपर संवाद की स्थिति बनी नहीं है।

हमारे लिए मुद्दे कभी नीतीशकुमार हैं तो कभी लालू प्रसाद तो कभी अखिलेश यादव तो कभी मुलायसिंह यादव,तो कभी मायावती तो कभी ममता बनर्जी।हम उनकी सियासत के पक्ष विपक्ष में खड़े होकर फासिज्म के राजकाज का विरोध करते रहते हैं।

जैसे इस वक्त सारे के सारे लोग नीतीश कुमार के खिलाफ बोल लिख रहे हैं।जैसे कि बिहार का राजनीतिक दंगल की देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा हो।

डोकलाम की युद्ध परिस्थितियां, प्राकृतिक आपदाएं,किसानों की आत्महत्या,व्यापक छंटनी और बेरोजगारी, दार्जिंलिंग में हिंसा, कश्मीर की समस्या, जीएसटी, आधार अनिवार्यता, नोटबंदी का असर , खुदरा कारोबार पर एकाधिकार वर्चस्व, शिक्षा और चिकित्सा पर एकाधिकार कंपनियों का वर्चस्व, बच्चों का अनिश्चित भविष्य, महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार,दलित उत्पीड़न की निरंतरता,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार संस्कृति जैसे मुद्दों पर कोई बहस की जैसे कोई गुंजाइश ही नहीं है।

लोकतंत्र का मतलब यह है कि राजकाज में नागरिकों का प्रतिनिधित्व और नीति निर्माण प्रक्रिया में जनता की हिस्सेदारी।

सत्ता संघर्ष तक हमारी राजनीति सीमाबद्ध है और राजकाज,राजनय,नीति निर्माण,वित्तीय प्रबंधन,संसाधनों के उपयोग जैसे आम जनता के लिए जीवन मरण के प्रश्नों को संबोधित करने का कोई प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं हो रहा है।

सामाजिक यथार्थ से कटे होने की वजह से हम सबकुछ बाजार के नजरिये से देखने को अभ्यस्त हो गये हैं।

बाजार का विकास और विस्तार के लिए आर्थिक सुधारों के डिजिटल इंडिया को इसलिए सर्वदलीय समर्थन है और इसकी कीमत जिस बहुसंख्य जनगण को अपने जल जंगल जमीन रोजगार आजीविका नागरिक और मानवाधिकार खोकर चुकानी पड़ती है,उसकी परवाह न राजनीति को है और न साहित्य और संस्कृति को।

हम जब साहित्य और संस्कृति के इस भयंकर संकट को चिन्हित करके समकालीन संस्कृतिकर्म की प्रासंगिकता और प्रतिबद्धता पर सवाल उठाये,तो समकालीन रचनाकारों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई है।

बत्रा साहेब की मेहरबानी है कि उन्होंने फासिज्म के प्रतिरोध में खड़े भारत के महान रचनाकारों को चिन्हित कर दिया।

इन प्रतिबंधित रचनाकारों में कोई जीवित और सक्रिय रचनाकार नहीं है तो इससे साफ जाहिर है कि संघ परिवार के नजरिये से भी उनके हिंदुत्व के प्रतिरोध में कोई समकालीन रचनाकार नहीं है।

उन्हीं मृत रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के संघ परिवार के कार्यक्रम के बारे में समकालीन रचनाकारों की चुप्पी उनकी विचारधारा,उनकी प्रतिबद्धता और उनकी रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करती है।


गौरतलब है कि मुक्तिबोध पर अभी हिंदुत्व जिहादियों की कृपा नहीं हुई है।शायद उन्हें समझना हर किसी के बस में नहीं है,गोबरपंथियों के लिए तो वे अबूझ ही हैं।अगर कांटेट के लिहाज से देखें तो फासिजम के राजकाज के लिए सबसे खतरनाक मुक्तिबोध है,जो वर्गीय ध्रूवीकरण की बात अपनी कविताओं में कहते हैं और उनका अंधेरा फासिज्म का अखंड आतंकाकारी चेहरा है।शायद महामहिम बत्रा महोदय ने अभी मुक्तबोध को कायदे से पढ़ा नहीं है।

बत्रा साहेब की कृपा से जो प्रतिबंधित हैं,उनमें रवींद्र,गांधी,प्रेमचंद,पाश, गालिब को समझना भी गोबरपंथियों के लिए असंभव है।

जिन गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस के रामराज्य और मर्यादा पुरुषोत्तम को कैंद्रित यह मनुस्मृति सुनामी है,उन्हें भी वे कितना समझते होंगे,इसका भी अंदाजा लगाना मुश्किल है।

बंगाली दिनचर्या में रवींद्रनाथ की उपस्थिति अनिवार्य सी है,  जाति,  धर्म,  वर्ग, राष्ट्र, राजनीति के सारे अवरोधों के आर पार रवींद्र बांग्लाभाषियों के लिए सार्वभौम हैं,लेकिन बंगाली होने से ही लोग रवींद्र के जीवन दर्शन को समझते होंगे,ऐसी प्रत्याशा करना मुश्किल है।

कबीर दास और सूरदास लोक में रचे बसे भारत के सबसे बड़े सार्वजनीन कवि हैं,जिनके बिना भारतीयता की कल्पना असंभव है और देश के हर हिस्से में जिनका असर है। मध्यभारत में तो कबीर को गाने की वैसी ही संस्कृति है,जैसे बंगाल में रवींद्र नाथ को गाने की है और उसी मध्यभारत में हिंदुत्व के सबसे मजबूत गढ़ और आधार है।

निजी समस्याओं से उलझने के दौरान इन्हीं वजहों से लिखने पढ़ने के औचित्य पर मैंने कुछ सवाल खड़े किये थे,जाहिर है कि इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है। 

मैंने कई दिनों पहले लिखा,हालांकि हमारे लिखने से कुछ बदलने वाला नहीं है.प्रेमचंद.टैगोर,गालिब,पाश,गांधी जैसे लोगों पर पाबंदी के बाद जब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा तो हम जैसे लोगों के लिखने न लिखने से आप लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।अमेरिका से सावधान के बाद जब मैंने साहित्यिक गतिविधियां बंंद कर दी,जब 1970 से लगातार लिखते रहने के बावजूद अखबारों में लिखना बंद कर दिया है,तब सिर्फ सोशल मीडिया में लिखने न लिखने से किसी को कोई फ्रक नहीं पड़ेगा।

कलेजा जख्मी है।दिलोदिमाग लहूलुहान है।हालात संगीन है और फिजां जहरीली।ऐसे में जब हमारी समूची परंपरा और इतिहास पर रंगभेदी हमले का सिलसिला है और विचारधाराओं,प्रतिबद्धताओं के मोर्टे पर अटूट सन्नाटा है,तब ऐशे समय में अपनों को आवाज लगाने या यूं ही चीखते चले जाना का भी कोई मतलब नहीं है।

जिन वजहों से लिखता रहा हूं,वे वजहें तेजी से खत्म होती जा रही है।वजूद किरचों के मानिंद टूटकर बिखर गया है।जिंदगी जीना बंद नहीं करना चाहता फिलहाल,हालांकि अब सांसें लेना भी मुश्किल है।लेकिन इस दुस्समय में जब सबकुछ खत्म हो रहा है और इस देश में नपुंसक सन्नाटा की अवसरवादी राजनीति के अलावा कुछ भी बची नहीं है,तब शायद लिखते रहने का कोई औचित्य भी नहीं है।

मुश्किल यह कि आंखर पहचानते न पहचानते हिंदी जानने की वजह से अपने पिता भारत विभाजन के शिकार पूर्वी बंगाल और पश्चिम पाकिस्तान के विभाजनपीड़ितों के नैनीताल की तराई में नेता मेरे पिता की भारत भर में बिखरे शरणार्थियों के दिन प्रतिदिन की समस्याओं के बारे में रोज उनके पत्र व्यवहार औऱ आंदोलन के परचे लिखते रहने से मेरी जो लिखने पढ़ने की आदत बनी है और करीब पांच दशकों से जो लगातार लिख पढ़ रहा हूं,अब समाज और परिवार से कटा हुआ अपने घर और अपने पहाड़ से हजार मील दूर बैठे मेरे लिए जीने का कोई दूसरा बहाना नहीं है।

फिर दर्द होता है तो चीखना मजबूरी भी है।

शायद जब तक जीता रहूंगा,मेरी चीखें आपको तकलीफ देती रहेंगी,अफसोस।

अभी अखबारों और मीडिया में लाखों की छंटनी की खबरें आयी हैं।जिनके बच्चे सेटिल हैं,उन्हें अपने बच्चों पर गर्व होगा लेकिन उन्हें बाकी बच्चों की भी थोड़ी चिंता होती तो शायद हालात बदल जाते।

मेरे लिए  रोजगार अनिवार्य है क्योंकि मेरा इकलौता बेटा अभी बेरोजगार है।इसलिए जो बच्चे 30-35 साल की उम्र में हाथ पांव कटे लहूलुहान हो रहे हैं,उनमें से हरेक के चेहरे पर मैं अपना ही चेहरा नत्थी पाता हूं।

अभी सर्वे आ गया है कि नोटबंदी के बाद पंद्रह लाख लोग बेरोजगार हो गये हैं।जीएसटी का नतीजा अभी आया नहीं है।असंगठित क्षेत्र का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है और संगठित क्षेत्र में विनिवेश और निजीकरण के बाद ठेके पर नौकरियां हैं तो ठीक से पता लगना मुश्किल है कि कुल कितने लोगों की नौकरियां बैंकिंग, बीमा, निर्माण,  विनिर्माण, खुदरा बाजार,संचार,परिवहन जैसे क्षेत्रों में रोज खथ्म हो रही है।

मसलन रेलवे में सत्रह लाख कर्मचारी रेलवे के अभूतपूर्व विस्तार के बाद अब ग्यारह लाख हो गये हैं जिन्हें चार लाख तक घटाने का निजी उपक्रम रेलवे का आधुनिकीकरण है,भारत के आम लोग इस विकास के माडल से खुश हैं और इसके समर्थक भी हैं।

संकट कितना गहरा है,उसके लिए हम अपने आसपास का नजारा थोड़ा बयान कर रहे हैं।बंगाल में 56 हजार कल कारखाने बंद होने के सावल पर परिव्रतन की सरकार बनी।बंद कारखाने तो खुले ही नहीं है और विकास का पीपीपी माडल फारमूला लागू है।कपड़ा,जूट,इंजीनियरिंग,चाय उद्योग ठप है।कल कारखानों की जमीन पर तमाम तरहके हब हैं और तेजी से बाकी कलकारखाने बंद हो रहे हैं।

आसपास के उत्पादन इकाइयों में पचास पार को नौकरी से हटाया जा रहा हो।यूपी और उत्तराखंड में भी विकास इसी तर्ज पर होना है और बिहार का केसरिया सुशासन का अंजाम भी यही होना है।

सिर्फ आईटी नहीं,बाकी क्षेत्रों में भी डिजिटल इंडिया के सौजन्य से तकनीकी दक्षता और ऩई तकनीक के बहाने एनडीवी की तर्ज पर 30-40 आयुवर्ग के कर्मचारियों की व्यापक छंटनी हो रही है।

सोदपुर कोलकाता का सबसे तेजी से विकसित उपनगर और बाजार है,जो पहले उत्पादन इकाइयों का केद्र हुआ करता था।यहां रोजाना लाखों यात्री ट्रेनों से नौकरी या काराबोर या अध्ययन के लिए निकलते हैं।चार नंबर प्लैटफार्म के सारे टिकट काउंटर महीनेभर से बंद है।आरक्षण काफी दिनों से बंद रहने के बाद आज खुला दिखा।जबकि टिकट के लिए एकर नंबर प्लेटफार्म पर दो खिडकियां हैं।

सोदपुर स्टेशन के दो रेलवे बुकिंग क्लर्क की कैंसर से मौत हो गयी हैा,जिनकी जगह नियुक्ति नहीं हुई है।सात दूसरे कर्मचारियों का तबादला हो गया है और बचे खुचे लोगं से काम निकाला जा रहा है।

आम जनता को इससे कुछ लेना देना नहीं है।

आर्थिक सुधारों,नोटबंदी,जीएसटी,आधार के खिलाफ आम लोगों को कुछ नहीं सुनना है।उनमें से ज्यादातर बजरंगी है।

बजरंगी इसलिए हैं कि उनसे कोई संवाद नहीं हो रहा है।

बुनियादी सवालों और मुद्दों से न टकराने का यह नतीजा है,क्षत्रपों के दल बदल, अवसरवाद जो हो सो है,लेकिन जनता के हकहकूक के सिलसिले में सन्नाटा का यह अखंड बजरंगी समय है।

वीरेनदा ने कहा था,खूब लिखो बसंतीपुर पर

 फिल्मकार राजीव कुमार ने सूचना दी है




Rajkr: साहित्यकार बटरोही ने वीरेन के परिवार के साथ उनके स्मारक का लोकार्पण किया।

साहित्य अकादमी पुरस्कार ‌समादृत कवि वीरेन डंगवाल

 बरेली

धन्यवाद राजीव भाई। फोटो में बटरोही जी के अलावा सुधीर विद्यार्थी जी भी शायद नज़र आ रहै हैं दोनों को नमन।

वीरेन दा का असली स्मारक तो दोस्तों और पाठकों के दिलोदिमाग में बना बनाया है,जिसके लोकार्पण की शायद जरूरत भी नहीं है। न ही वीरेन दा साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने के बावजूद ऐसी औपचारिकता के कायल थे।

उनके अवसान के बाद परिवार के लोगों से मिलने का मौका नहीं बना।इसका अफसोस है।

वीरेनदा कहा करते थे कि बसंतीपुर पर खूब लिखो।

विडम्बना यह है कि मैं फिर बसंतीपुर में बस गया,लेकिन उनके जाने के बाद। वे नान भी न सके कि मैं घर लौट आया।

फिर बसंतीपुर के सिवाय मेरे पास लिखने को क्या है?

पलाश विश्वास

Let us live the rural hell!Palash Biswas

 Live in your urban heaven!Let us live in our hell in Indian villages! 


Palash Biswas



Urban people should not shift in the villages as they never considered rural people as human being. If circumstances drive them to their native places,they feel abandoned in the hell.


Where they lived once,even were born, they never longed for the forgotten land. Economy made them run for life and they got shelter in their roots only. But it is very hard to forget the glittering markets and th freedom of purchasing which they lost with the loss of job or position.


They tend to be habitual to maintain their so called class status. They always tried to live with the class and struggle to get the stairs to reach the upper class.


They never tried to go back to the roots but tried their best to get rid of the old memories of misery and poverty amit growing purchasing crowd leaving the society and community as well.


They were never happy as they always wept for more. They never knew happiness .They had been always sad for the missing things they could not afford.


Being quite unsocial,they might not adjust with the cruel realities in rural life.


It is better for them to succumb in their urban heaven. Let us live in the hell.

50 लाख साल बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि घृणा, हिंसा और पितृसत्ता? पलाश विश्वास

50 लाख साल की बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि हिंसा,घृणा और पितृसत्ता है?

पितृसत्ता रहेगी, नफरत और मार्केट की सियासत की शिकार स्त्री होगी, जाति के नाम सामूहिक बलात्कार होंगे,तो फूलनदेवी भी होगी

पलाश विश्वास





अन्याय और अत्याचार की दुःखद परिणति यही है। जाति हिंसा किसी महायद्ध से कम नहीं है। 


अंध जातिवाद से पीड़ित मनुष्यता का प्रत्युत्तर भी हिंसा है। यह होती रहेगी।इसका अंत नहीं,क्रमबद्ध है यह।


आजादी के बाद इस महादेश में धर्म,नस्ल, भाषा,क्षेत्र और जाति की अस्मिता से जितनी हिंसा हुई है,जितने निर्दोष लोग मारे गए, वैसा दोनों विश्वयुद्धों को मिलाकर भी नहीं हुआ।


वहां तो फिरभी फौजें एक दूसरे के खिलाफ लड़ रही थीं।


 11 वी सदी से लेकर 15 वीं सदी तक के धर्मयुद्धों और बीसवीं सदी के सांस्कृतिक युद्ध से भी भयानक परिदृश्य से हम गुज़र जाते हैं।इसी भारतवर्ष में। जब घर से निकलना भी मौत को दावत दी सकता है। घर में भी सामूहिक बलात्कार हो सकता है।


इसी  परिदृश्य में सामने आता है ,एक पीड़ित महिला का चेहरा जो जाति के नाम सामूहिक बलात्कार को जायज मानने वाली भीड़ से कुछेक को मौत के घाट उतारकर निजी बदला चुका देती है।


जाति जब तक रहेगी,गैर बराबरी, अन्याय,उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार की व्यवस्था जब तक स्त्री देह को उपनिवेश और युद्ध का मैदान बनाती रहेगी,फिर फिर फूलन देवी का जन्म होगा।


यह कानून व्यवस्था का मामला उतना नहीं है,जितना मनुष्यता और सभ्यता के विकास का मामला है।


 मनुष्यता कितनी आगे बढ़ी है?


 सभ्यता का कितना बिकास हुआ है? 


50 लाख साल बाद भी आदिम मनुष्यों की तरह स्त्री को आखेट का सामान माना जाता है?


50 लाख साल बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि घृणा और हिंसा की पितृसत्ता है?


हम इक्कीसवीं सदी में हैं।हम अखण्ड भारत के खंडित हिस्सों में हैं।अर्थ व्यवस्था बदल गयी है। स्थानीय रोजगार कदिन नहीं है। रोजगार के लिए विस्थापन अनिवार्य है।


हम अपने हिस्से का देश लेकर स्थानांतर नहीं हो सकते। दूसरे के हिस्से के देश में विस्थापन की वजह से ही विविधता बहुलता का यह लोकतंत्र है।


किसी भी नस्ल,जाति, धर्म,भाषा का विशुद्ध भूगोल नहीं है आज। न विशुद्ध रक्त की तरह स्वतंत्र सम्प्रभु अर्थव्यबस्था है।


अस्मिता की राजनीति से देश का बंटवारा हुआ, जिसके शिकार हम लोग उसकी यातना पीढ़ी दर पीढ़ी भुगत रहे हैं। आज भी कोई भी किसी को यह फरमान जारी कर देता है किसी शहंशाह की तरह,यह देश तुम्हारा नही है।यह जमीन तुम्हारी नहीं है।


 फिर जाति,धर्म,नस्ल,भाषा के नाम पर हिंसा और खून का सैलाब,फिर स्त्रियों से सामूहिक बलात्कार। 


देश के हर हिस्से का यह हाल है।


नफरत और हिंसा की सियासत निरंकुश है।

ऐसे में फूलन देवी के अवतार आते रहेंगे।


इस नफरत,हिंसा और स्त्री विरोधी पितृसत्ता से क्या हमें कभी मुक्ति मिलेगी?


क्या हम मुक्ति चहते हैं?

Saturday, July 24, 2021

We the fodder for tigers and the safe heaven turned into losing hell. By Palash Biswas

 We, the fodders for tigers and the safe heaven turned into losing Hell

Palash Biswas








Not only in 1978,the East Bengal dalit refugees were made fodders for tigers in Marichjhanpi island of Sundarvans in West Bengal, but the have been made fodders for tigers in jungles, hills and islands all over the country, almost in 23 states after partition of India.


It was not their fault that Inda was divided and they were ejected out of history, geography and homeland. 


It was rather the vengeance of the political hegemony which  drew the border line thanks to Redclif commission allied with interested parties who wanted to nullify the election of Babasaheb Dr. BR Ambedkar to the constituent assembly from East Bengal.


 The legacy of the freedom.fight for two hundred years by the peasantry of East Bengal and their political might had to be discarded. They have to be punished for thier freedom struggle to liberate Indian Peasantry.


Unprecedented hate,violence and riots ejected our people from East Bengal. They were put into congested transit camps where they were fed the ration left by British and American military who camped there during second world war. 


Ultadanga and  kashipur were the first refugee camps made in 1947 and later almost every part of West Bengal became refugee camps which were inflicted with pendamic cholera an amaal.pox just because of the rotten food years old, specifically in Ulta danga, Rajaghat and kashipur camps. 


Hundreds died daily in these camp without medical care. It was systematic massacre which continued until sixties up to Madhy Prdesh camps including the Mana camp and other camps around Raipur, now the capital of Chhattisgarh.


West Pakistan refugees were resettle within 1950 on war foot level with compensation and land not less than 10 acres just because entire Punjab stood with them to get rid from the Holocaust. 


 But the Bengali leadership had no sympathy with the refugees nor they ever supported the refugees nor rehabilitated. The refugees stranded in West Bengal face the worst even after seven decades of independence without home,without employment and livelihood. Facing intensive caste bias an persecution.


At least,we the people sent out of Bangla enjoyed the support and fraternity of the local communities ,adminstration and even politician across party line.


The East Bengal refugees who crossed the border in 1946 and onward, were dumped in dense forests in tribal areas, in hills and in the islands ie Andaman Nicobar.


 The East Bengal refugees were made fodders for the tigers as they had to survive in the dense forest until 1954 without any survival kit or support. These marshy lands also inflicted cholera and pox at large scale which stopped the inhabitation for thousand years and tribal people were living there. 


The politics was to pit the refugees against the tribal.people so they should succumb in infights.it ,however,did not happen as we have fraternal relationship with the tribal people countrywide. It was the project to break the tribal cscheduled areas using refugees as human shields.


Pdt Govind Ballabh Pant as the then chief minister of Uttar Pradesh was the man who  helped most the refugees to resettle the West and East Pakistan refugees in the dense forest in the Terai region of Uttar Pradesh specifically in Nainital and Pilibhit districts.


 Whereas Punjabi refugees were rehabilitated within 1950, the East Bengal refugees were stranded in the dense forest since 1949 to 1954,full five years.


In Pilibhit, Beharaich and Lakhimpur district they were settled in the core jungle area and forest land which remains with the forest department even today on lease with five acres of land on which they have no land ownership  right.


 The East Bengal dalit refugees settled in Mala Tiger Project in  Pilibhit district in Uttar Pradesh in fifties have been reduced to fodder for the tigers and they have to sacrifice themselves for the freedom on India ,ironically after full seven decades of independence.


In Nainital district ,the people stranded since 1948 were rehabilitated only after their movements in 1954 and 1956 led by Pulin Babu, Radha kant Roy and others and they got the most eight acres land in the forest which they had to cultivate fighting with the tigers,elephants,bears,buenas and poisonous snakes.


After partition ,our people considered India, a safe heaven which turned into losing hell.


My village Basantipur, named after my mother's name, had the people whose ancestors were the  fighters of the East Bengal peasant uprisings for two hundred years since the war of Plassy in 1757.


 Many of them crossed the border between 1947 to 1950. The were dumped in different camps in West Bengal including kashipur, ulta danga, ghusudi, Rajaghat and kaksha wherefrom they were shifted to Charbetiya camp in Odisha and from there they were sent to Nainital. 


Every family lost their dearest ones in camps and forest,not in the bloodshed during population transfer.


Every family was reduced to brothers, father and son, mother and son uncle and nephew,orphans and so on.They had to reorganize the family.


Phoolchand Mandal now 88 years old crossed Ichhamti river to land in Bashir har in 1946 being scared of the partition because of direct action in kolkata and the riots followed. 


They entered the kaashipurr camp  after 15 August 1947 and lost his grand father, grand mother,mother and a sister. He was only a child Ved below twelve years within 15 days. Only phool chand and his father Chetan Mandal survived.


Phoolchand  says,they were dumped in military barracks od second world order like animals and fed the ration left by British and US military. 


It is the same story of other refugee camp with some variants.


They were later sent to two camps in Vardhaman including  one in kanksha. Fron

kanksha his father Chetan Mandal,Chetan's aunt from native place in Khulna who joined them after the deaths were sent to Charbetia,near Cuttack. 


Within a year they were sent to Nainital. They came by train and the first tented camp in the jungle was kichcha Railway platform.


 They had to live in such tents in kanpur number one and Vijaynagar until the Basnti our,Uday nagar and Panchananpur refugee families sat on hunger strike in Rudrapur in 1954. They lived on jungle fruits, plants and roots for three years until Basantipur village came into being.


Settling in Basantipur ,the villagers arranged his marriage to a ten year girl,geeta,the daughter of Hazarilal  Gaine


Phool chand told that the refugees resettled in kanpur number one, Mohan our number one and Radhakantpur were stranded in Teri jungle since 1948.


My father Pulinbabu lived alike Gandhi with a dhoti only facing the winter of the hills and fought lifelong for the rehabilitation of the refugees. But his life was not enough to reserve the East Bengal refugees. He succumbed to cancer on 12 th June  in 2001. His sustained journey countrywide and across the border,his sacrifice were not enough and we are predestined to inequality and injustice.


The rehabilitation was delayed. The people crossing border in 1947 have not been rehabilitated as yet. 


Late in 1960 the Sanskaran project was launched in 1960. But most of the refugees faced the hell losing without any rehabilitation as yet.


Until 1960 they were resettled with five acres of land which was reduced to three to one acre only within 1971. 


Thereafter they were termed as illegal migrants with the citizenship amendment act 2003.