Monday, September 6, 2021

बसंतीपुर के खिलाड़ी

 बसंतीपुर के तीन खिलाडी,दो को कभी कोई मौका नहीं मिला पदक का,तीसरे के पदकों का सफर शुरू

पलाश विश्वास


भारत विभाजन की त्रासदी में हमारे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने वजूद के लिए संघर्ष करते रहे हैं।सात दशक बीत चुके हैं। हम अभी इस महात्रासदी से उबरे नहीं है।


 ग्रीक त्रासदी हो या शेक्सपीयर लिखित त्रासदी या महाकाव्यों के आख्यान- सारी त्रासदियों का आखिर अंत होता है।


 जल प्रलय के बाद भी बची रहती है पृथ्वी और प्रकृति। लेकिन भारत विभाजन की यह त्रासदी हो या यूद्धस्थल बने देशो में मनुष्यता के नक्शे की आधी आबादी, राजनीतिक विस्थापन और पलायन की त्रासदी का कोई अंत नहीं होता।


बांग्लादेश की जनसंख्या 13 करोड़ है और पश्चिम बंगाल की जनसंख्या 11 करोड़। पश्चिम बंगाल में ये 11 करोड़ लोग सारे के सारे बांग्लाभाषी नहीं हैं। जिनमें बड़ी संख्या में गैर बांग्ला भाषी लोग हैं तो बंगाली आबादी का आधा हिस्सा पूर्वी बंगाल के विस्थापितों की है। 


इन विस्थापितों में आधे ऐसे हैं सात दशकों में जिनका कभी पुनर्वास नहीं हुआ।


बाकी भारतवर्ष के 22 राज्यों में और राजधानियों की मेहनतकश शूद्र अतिशूद्र बंगाली विस्थापितों की संख्या कम से कम 11 करोड़ के हैं। 


बांग्लादेश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजनीति और अर्थब्यवस्था के कारण सिर्फ पड़ोसी भारत में नहीं, यूरोप, अमेरिका, एशिया ,आस्ट्रेलिया और अफ्रीका तक में विस्थापित हैं।


भारतवर्ष में रोज़गार और आजीविका के लिए हर गांव कस्बे से लोगों का विस्थापन और पलायन होता है। गांव,किसान और खेती की तबाही,जल जंगल,जमीन और आजीविका से बेदखली की वजह से यह सिलसिला अंधाधुंध शहरीकरण और बाजारीकरण से तेज़ हॉट जा रहा है। उत्तरराखण्ड के गांवों में घरों के खंडहर यही बताये हैं।


 विकास के नाम बेदखल हुई जनसंख्या भारत विभाजन के शिकार लोगों से ज्यादा हैं।


 आंतरिक उपनिवेश के ये बलि प्रदत्त मनुष्य हैं। चाहे हिमालय हो,या आदिवासी भूगोल जड़ जमीन से उखड़े लोगों की त्रासदी पश्चिम एशिया,अरब और अफगानिस्तान की त्रासदियों से छोटी नहीं है। 


इलियड, महाभारत, ग्रीक त्रासदी और शेक्सपीयर के लिखे त्रासदी नाटकों की त्रासदियों से कहीं बड़ी है यह अंतहीन त्रासदी।


इसी अंतहीन त्रासदी के शिकार लोगों का गांव है बसंतीपुर। जो 1951 में यहां उत्तराखण्ड की तराई के घने जंगल को आबाद करने वाले लोगों ने अपने नेता पुलिनबाबू की पत्नी और मेरी मां बसन्ती देवी के नाम पर बसाया।


 हमारे लोगों को  बचपन और युवावस्था में खेलने कूदने और लिखने पड़ने के वे मौके दशकों तक नहीं मिले,जो बाकी शरणार्थियों,विस्थापितों, वनवासियों को नहीं मिलते। गरीबी,बेरोज़गारी में सात दशक बीते।


भारत विभाजन के बाद विभिन्न आंदोलनों के साथी बसंतीपुर गांव को बसाने वाले लोग हैं।जिनका यह साझा परिवार है। जिसके प्रेजिडेंट थे मांदार बाबू। चौथी पीढ़ी तक यह परिवार खेलों के प्रति समर्पित है। मांदार बाबू का सामाजिक योगदान बहुत बड़ा है,जिसपर हम सिलसिलेवार ढंग से चर्चा करते रहेंगे।


टनकपुर से लेकर कोटद्वार हरिद्वार तक हिमालय की तलहटी का विशाल यह अरण्य प्रदेश ब्रिटिश हुकूमत ने गोरखों को हराकर जीता था और जो दस्तावेजों में वन विभाग और तेजस्व विभाग का होंने के बावजूद आज भी ब्रिटिश राजपरिवार की सम्पत्ति है। 


लालकुआं और हल्द्वानी से लेकर पन्तनगर तक फैले 50 वर्गकिमी इलाके के बिन्दुखत्ता को भारत सरकार या उसका राजस्व विभाग या वनविभाग इसीलिये बेदखल कर सकते। 


बेदखली का मुकदमा निर्णायक तौर पर सरकार हार चुकी है। इस जमीन पर सरकार दावा नहीं कर सकती।


ब्रिटिश क्राउन यानी खाम की व्यवस्था रही है तराई में 1952 तक,जो भारत सरकार के अधीन थी भी नहीं।


 तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस तराई पट्टी पर भारत सरकार के निर्णायक कब्जे के लिए भारत विभाजन के शिकार पंजाबी, सिख और बंगाली शरणार्थियों को बसाकर इस जंगल को आबाद करके ब्रिटिश क्राउन की खाम बंदोबस्त का अंत कर दिया। इसीके मुताबिक कालोनाइजेशन योजना बनी।


तब नेहरू सोवियत संघ के सहकारी कम्मुन की व्यवस्था से प्रभावित थे। कालोनाइजेशन की योजना उसी सहकारी मॉडल पर बनी। 


जमीन लीज पर दी गई और उसके बंदोबस्त का जिम्मा हर कालोनी की सहकारी लैंड सेटलमेंट सोसाइटी को दी गयी। यह ग्राम सभा बनने के पहले की व्यवस्था थी,जब गांव की यह जमीन खारिज दाखिल करने का अधिकार भी गांव की इस सहकारी समिति को दे दिया गया।पंचायती व्यवस्था लागू होने पर इस व्यवस्था का अंत हो गया।


हर गांव में इस समिति का एक प्रेजिडेंट होता था।एक कैशियर और एक सेक्रेटरी। लिखा पढ़ी के लिए इलाके के गांवों का एक साझा सरकारी सचिव भी होता था।


मांदार मण्डल आजीवन इसी समिति की वजह से बसंतीपुर के प्रेजिडेंट रहे। उसीतरह जैसे अतुल शील सेक्रेटरी और शिशुवर मण्डल कैशियर।


मांदार मण्डल फुटबॉल और वालीबॉल के अद्भुत खिलाड़ी थे। दिनेशपुर के 36 बंगाली गांवों के अलावा 50-60 के दशक में तराई भाबर के लगभग सभी गांवों में कबड्डी,वालीबॉल और फुटबॉल की बेहतरीन टीमें हुआ करती थी। 


शहरों और स्कूल कालेज में हॉकी मुख्य खेल था। बैडमिंटन भी प्रचलित था। क्रिकेट का चलन इंग्लैंड की टीम के कप्तान टोनी लुइस के भारत दौरे से 70 के दशक में शुरू हुआ और कप्ताल लॉयड की टीम के 1975 के दौरे के बाद क्रिकेट ने एथेलेटिक्स से लेकर हॉकी फुटबॉल वालीबॉल समेत सारे खेलों को चलन से बाहर कर दिया।


उत्तर प्रदेश की टीमों में तराई भाबर का प्रतिनिधित्व मुश्किल था। नैनीताल के जैसे कुछ जगह के खिलाड़ी जरूर नेशनल टीम के हिस्सा बने। जैसे जब हम जीआईसी नैनीताल के छात्र थे,तब  वहां से सैय्यद अली ओलंपिक हॉकी टीम में थे। 


आम मेहनतकश ग्रामीणों के लिए कोई मौका नहीं था। लेकिन तराई भाबर के गांवों में तब हर खेल के टूर्नामेंट होते थे।तब छात्र और युवा इसतरह नशे,पब्जी और सट्टेबाजी, फ्लर्टिंग के शिकंजे में नहीं थे। खूब खेलते थे।पढ़ने लिखने की संस्कृति के अलावा सांस्कृतिक गतिविधियां और खेलकूद प्रतियोगिताएं तराई भाबर के गांवों की कथा में जरूर शामिल थी।


बसंतीपुर की जात्रा पार्टी हो या बसंतीपुर की नेताजी जयंती,पूरे उत्तराखण्ड में इनकी धूम थी। 


सांस्कृतिक गतिविधियों में बसन्तीपुर की खास पहचान थी।इस आलेख की अनेक तस्वीरे बसंतीपुर जात्रा पार्टी और नेताजी जयंती की हैं।इन गतिविधियों को 90 के दशक तक मांदार बाबू के सुपुत्र कृष्ण पद मण्डल और नित्यानंद मण्डल के नेतृत्व में बसन्तीपुर के युवाओं ने बखूबी जारी रखा। तब कृष्ण ग्राम सभा के सभापति थे।


हमारे खास दोस्त, बचपन के साथी कृष्ण बेहद फुर्तीले,हर खेल के जबरदस्त खिलाड़ी थे कृष्ण,हमारे बचपन के साथी,जिसे कभी कोई मंच या मौका पदक जीतने के लिए नहीं मिला।


 वह जब तक जीवित रहा,देश में जहां भी होता था,हर बार लौटकर दिन में कहीं भी रहे,रात में हम उसके घर में उसके साथ होते थे। हम कोलकाता में थे,तभी असमय उसका निधन हो गया।


देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला 1928 में जयपाल सिंह मुंडा ने जीता था। लेकिन तराई भाबर के लिए पहली बार देश को पदक दिया बंगाली विस्थापितों का बेटे मनोज सरकार ने टोक्यो के पैरा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर।यह उपलब्धि बहुत खास है।













तराई भाबर में शुरू से हमारे लोगों में प्रतिभाओं की कमी नहीं थी।लेकिन उन्हें पदक जीतने का कोई मौका नहीं मिला। सात दशक बाद यह सिलसिला शुरू हुआ। आगे नमेँ ढेरों पदकों की उम्मीद है।


मसलन कृष्ण का बेटा प्रियांशु उत्तराखण्ड से नेशनल एतजेलिटिक्स में पदक जीतने लगा है। वह देहरादून के महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कालेज का छात्र है। लक्ष्मी मण्डल और प्रदीप मण्डल का यह बेटा एथेलिटिक्स में देश के लिए जरूर पदक जीतेगा, इस शुभकामना के साथ आज यही तक। उनका छोटा बेटा अंशुमान भी एथलीट है।


मांदार बाबू,पुलिनबाबू, अतुल शील,शिशुवर मण्डल और बसंतीपुर के पुरखों की कथा जारी रहेगी।

3 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया लेख। हमारें लोकल में खेल प्रतिभाओं की कोई कमीं नहीं है, कमीं है तो बस सुविधाओं और संसाधनों की।

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