Tuesday, June 29, 2021

चमगादडों को इलाज की जरूरत नहीं होती।और हमें? पलाश विश्वास

 चमगादड़ों को इलाज की जरूरत नहीं होती।

क्या हमें अस्पताल की जरूरत है?

पलाश विश्वास


दिनेशपुर में पुलिन कुमार विश्वास अस्पताल के अहाते के पेड़ों में दुनियाभर के चमगादड़ों का डेरा है।


कल प्रेरणा अंशु के दफ्तर गए थे।तो थोड़ा दिनेशपुर हाट की तरफ निकले मैं और उत्कर्ष। अचानक देखा कि एक पेड़ के नीचे बच्चों का जमावड़ा है कैनाल कालोनी परिसर में। जाकर देखा कि एक बड़ा सा चमगादड़ जमीन पर गिरा है।उसकी आंखें बड़ी बड़ी।बच्चे उसे उड़ाने की कोशिश कर रहे थे।लेकिन वह उड़ नहीं सका।


हम जब दिनेशपुर हाई स्कूल के छात्र थे,तब अस्पताल के अहाते में एक बड़ा इमली का पेड़ भी हुआ करता था , जिसके इर्द गिर्द जमा होकर हम बच्चे पत्थर फेंककर इमली तोड़ा करते थे।


बसन्तिपूए से दिनेशपुर के रास्ते में और जाफ़र पुर,रुद्रपुर,गदरपुर के रास्ते पर असंख्य जामुन, आम और  बहेड़ा के पेड़ हुआ करते थे। जगह जगह बेर की झाड़ियां भी हुआ करतीं थी। हमारे घर में ही सैकड़ों फलों के पेड़ थे। हर घर में यही हाल था।


तब जामुन जमीन पर बिखरा पड़ा कभी नहीं देखा। हमारे लिए ये फल और खेतों में मटर, चना, मूली, गाजर,शलजम, टमाटर,भुट्टा, जैसी चीजें हुआ करती थीं,जिन्हें जब चाहे तोड़कर या उखाड़कर खा सकते थे। चारों तरफ गन्ने के खेत थे। 


दिनेशपुर में साप्ताहिक हाट लगता था। मिठाई की दो तीन दुकानें थीं लेकिन मिठाई खरीदने के पैसे हमारे पास होते नहीं थे।


साइकिल से पन्तनगर, बाजपुर, गदरपुर, किच्छा, लालकुआं, बिलासपुर घूमने जरूर जाते थे। काशीपुर तक निकल जाते थे,लेकिन किताब और पत्रिकाएं खरीदने के अलावा कुछ खरीदते नहीं हैं।


बहरहाल हममें से हर कोई पेड़ पर चढ़ सकता था। तब गमवों में बिजली नहीं होती थी।दुपहरी हम इन्हीं पेड़ों में बिताते थे। गर्मी से बचने का आसान तरीका।  बस, सांप,मधुमक्खी और ततैया से सावधानी बरतनी होती थी। हममें से कोई कभी पेड़ से गिरा नहीं।


तब तराई में जंगल भी बहुत थे। कदम कदम पर जहरीले सांप थे। बाघ भी निकलता रहता था। घर कच्चे होते थे। सांप और जंगली जानवर अक्सर घर में घुस जाते थे।


यह रोज़मर्रे की ज़िंदगी थी। तब पढ़ाई से ज्यादा जरूरी खेती थी। खेती के काम से वक्त बचा तो पढ़ने की इजाजत मिलती थी। 


मान्यता थी कि किसानों के बच्चों को आखिर खेती ही करनी पड़ती है। खेती के काम में गलती होने पर या इस काम के दौरान पढ़ने बैठने पर जमकर पिटाई होती थी।


हम न पढ़ने के लिए नहीं,अक्सर पढ़ते रहने की वजह से ज्यादा पिटते थे। शौक की कोई गुंजाइश नहीं। 


आज बच्चों के पास सबकुछ हैं। लेकिन वे पेड़ और खुल्ला खेत,खुला आसमान और जंगल नही है।हर तरफ बाजार।खरीददारी में भी बच्चे आगे।


तराई की सड़कों पर जमीन अब भी खूब पकते हैं लेकिन पेड़ पर कोई चढ़ता नहीं है। पेड़ पर चढ़ना भी नहीं जानते बच्चे। सड़कें क्या,गांव में भी घर के अहाते में पके हुए जामुन बिछे होते हैं। कोई तोड़ता नहीं।बाजार से ही आता है जामुन। सब्जियां कच्ची खाने की बात तो छोड़िए,सलाद भी डर डर कर खाना पड़ता है।


जंगल नहीं हैं और न गन्ने की खेती पहले की तरह होती है। जानवर आबादी में नहीं दिखते।गांवों में गाय बैल भैंस गोबर बकरियों से लेकर मिट्टी और हरियाली भी गायब है। नदियों में मछलियां नहीं हैं।सांप भी नहीं दिखते। पेड़ों पर चिड़िया का बसेरा नहीं है।


बच्चे पेड़ों पर नहीं चढ़ते। फल चमगादड़ आकर खा जाते हैं। दिनेशपुर अस्पताल के पेड़ों में सिर्फ चमगादड़ों का ही डेरा है। वहीं से रात रात भर गांवों की उड़ान भरते हैं चमगादड़ और दिन में अस्पताल के पेड़ों में उल्टे लटके होते हैं।


चमगादड़ देख नहीं पाते।

क्या हम देख पाते हैं कि विकास की हमने कितनी कीमत चुकाई।


चमगादड़ को इलाज की जरूरत नहीं है। फिरभी अस्पताल में उनका डेरा।


क्या हमें इलाज की जरूरत नहीं हैं या हम भी चमगादड़ हैं?

Friday, June 25, 2021

हमसे ज्यादा ज़िंदा हैं नबारून दा- पलाश विश्वास

 नबारून दा आज भी अपनी रचनाओं में हमसे ज्यादा ज़िंदा है। समय और समाज के लिए गैर प्रासंगिक ज़िन्दगी कोई ज़िन्दगी नहीं होती।


मुक्त बाजार में शहरी क्रयशक्ति हीन अंडर क्लास वर्ग समाज में सबसे निचले तबके की ज़िन्दगी उन्हीं की भाषा,उन्हीं के तेवर में हर्बर्ट, फैंटाडू और कंगाल मलसात जैसे उपन्यासों में जीने वाले रचनाकार की मौत नहीं हो सकती।

 

वे प्रसिद्ध रंगकर्मी और इप्टा के स्तम्भ बिजन भट्टाचार्य व विश्वप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के पुत्र थे। उनके नाना मनीष घटक जबरदस्त गद्य लेखक थे और मामा ऋत्विक घटक विसज्व प्रसिद्ध फिल्मकार। 


परिवार में जीवन के हर क्षेत्र में दिग्गज चमकते दमकते चेहरों के बीच वे अद्वितीय थे।


मेरी नज़र में वे अखतरूज़ज़्मआन इलियास और मंटो के साथ तीसरी दुनिया के सबसे ताकतवर कथाकार थे।


महाश्वेता देवी का मशहूर उपन्यास हजार चुरासीर मां नबारून दा और उनके दोस्तों की ही कहानी है।


महाश्वेता देवी के साथ भाषा बन्धन के संपादकीय में उनके साथ काम करते हुए हमें भाषा, साहित्य, संस्कृति ,समाज और सभ्यता, अस्पृश्यता, अन्याय, उत्पीड़न और असमता, अन्याय के बारे में देखने समझने की दृष्टि मिली।


महाश्वेता देवी कहती थी, नबारून बहुत खड़ूस लेखक है। एक मात्रा तक फालतू नही लिखता। 


बहुत सटीक और ठोस लिखते थे नबारून।


महाश्वेता यह भी कहती थी,बहुत बारीकी से हर चीज को उसके समूचे ब्यौरे,सारे आयाम के साथ नबारून देखते थे। मसलन मच्छर कब घर में घुसते हैं। उनके आने जाने का समय, काटने की तैयारी इत्यादि।


नबारून दा का एक उपन्यास है- ऑटो। ऑटो रिक्शा चलानेवालों की ज़िंदगी पर। ऋत्विक घटक की फ़िल्म यान्त्रिक जिन्होंने देखी है,उन्हें यह उपन्यास इस फ़िल्म की तुलना में पढ़ना मजेदार लगेगा।


 शब्दों और बोली पर इतनी जबरदस्त पकड़ हमने किसी और में देखी नहीं है।


उनके सारे कथा पात्र ठोस और ज़िंदा हैं उनकी तरह।


हम आपकी तरह नहीं हैं। न हम आपकी तरह कभी सपने में भी लिख सकते हैं। शब्दों और बोलीं पर हमारी पकड़ ढीली है। फिरभी हमारे वजूद में आप कहीं न कहीं शामिल हैं नबारून दा।

नहीं रहे उपेनबाबू जगदीशपुर के

 नहीं रहे उपेनबाबू। तराई बसानेवालों की पीढ़ी में थे वे।


बहुत दुःखद समाचार है। उपेनबाबू नहीं रहे। दिनेशपुर इलाके के ही गांव जगदीशपुर को बसाने वाले थे उपेनबाबू।पिताजी पुलिन बाबू के साथी थे। उनकी बेटी अंजलि आरती यानी Anjali Mandal यानी बिजली ने खबर दी है कि 22 जुलाई को उनका निधन हो गया। अंजलि विवाह के बाद कोलकाता के पास kaanchrapada में बस गई।वह अच्छी कथाकार हैं। जून अंक में भी उसकी रचना प्रेरणा अंशु में छपीं है। उसकी तीन बेटियां हैं।जिनमें से बड़ी बरहमपुर मुर्शिदाबाद में तैनात थे।


उपेनबाबू लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। होश में थे लेकिन किसी को पहचान नहीं रहे थे।


छात्र जीवन मे आपातकाल के खिलाफ लड़ाई में उपेनबाबू हमारे साथ थे। 1977 में जब मैं उनके घर गया था तब आरती शायद कक्षा 6 की छात्रा थी। कोलकाता में होने के बावजूद हम उससे मिल नहीं सके।


प्रेरणा अंशु परिवार की ओर से उपेन बाबू को विनम्र श्रद्धांजलि।हम शोक में परिजनों के साथ हैं।


अंजलि ने लिखा है-


पिताजी को अंतिम श्रद्धांजलि


गत 22 जून, 2021 दिन मंगलवार पूर्वाह्न 11.47 बजे मेरे परमपूज्य पिताजी स्व. उपेन्द्र नाथ मंडल का देहावसान हो गया है। वे पिछले कई वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे। लगभग 100 वर्ष पूर्ण कर उन्होंने अंतिम साँस ली। जन्मतिथि के बारे में सठीक प्रमाण न मिलने के कारण 100 वर्ष पूर्ण या अपूर्ण कहना मुश्किल है। उनके अनुसार 19 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी जन्मभूमि पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान बांग्लादेश छोड़ा था। अपने परिवार के साथ घुसुड़ी, शिउड़ी आदि शरणार्थी कैम्पों में शरणार्थी बनकर डोल में मिलनेवाले पैसों के सहारे जीवन-यापन कर रहे थे। नैनीताल के लिए बुलावा आने पर अन्य 23 फैमिली के साथ पिताजी लोग भी नैनीताल आने को राजी हो गए। और अंततः एक दिन एक गाड़ी इनको लेकर नैनीताल को रवाना हो गई। अर्धरात्रि को गाड़ी उत्तराखंड के इस तराई क्षेत्र के दिनेशपुर बाजार में एक बेर के पेड़ के नीचे इनको छोड़ गई। उस समय दिनेशपुर के चारों ओर घना जंगल था। जहाँ जंगली जीवों का वास था। एक साथ आए 24 फैमिली किसी तरह एकजगह बैठकर रात गुजारने के बाद सुबह दुर्गापुर नं 2 के ‘‘जोड़ा वट गाछ तला’’ आ गए और वहीं लगभग एक वर्ष तक रहे।  इसी जोड़ा वट तला का एक किस्सा जो पिताजी बार-बार सुनाते थे-रोजी -रोटी के लिए पिताजी एक छोटी सी दुकान चलाते थे। दुकान का सामान लाने के लिए उन्हें सप्ताह में एक बार रूद्रपुर बाजार जाना पड़ता था। एक दोपहर जब वे एक हाथ में सरसो तेल का टिन, दूसरे हाथ में सामान की टोकरी और सिर पर चावल-आटा की बोरी लादकर रूद्रपुर से पैदल चले आ रहे थे कि अचानक एक बाघ बिलकुल उनके सामने आ गया। दोनों हतप्रभ! क्या करें! क्या न करे! कुछ देर एक-दूसरे को ताकने के बाद दोनों उल्टे पैर भाग निकले। पिताजी के भागने का तो कारण था, परन्तु बाघ किसलिए भागा ये समझ नहीं आया।  सामान छोड़कर पिताजी भागते हुए जंगल में भटक गए। शाम ढलने के बाद किसी तरह हाँफते हुए जोड़ा वट तला पहुंचे और हैंडपंप मंे मुंह लगाकर गटागट पानी पीने लगे। यह देख, बरिसाल जिले के एक बुजुर्ग ने उनको खींचकर एक जोरदार थप्पड़ मारा। पिताजी तो गुस्से से लाल-पीले हो गए लेकिन बुजुर्ग आदमी ने उनका हाथ पकड़ा, जमीन से थोड़ी मिट्टी ली और उनके माथे पर टीका लगाया। दो-चार फूँक मारने के बाद पिताजी शांत हुए तो बुजुर्ग ने पूछा-‘‘‘ बाघ से मुलाकात हुई थी क्या?’’ पिताजी आश्चर्यचकित रह गए।

सालभर बाद इन 24 परिवारों को क्वार्टर मिला और ये जंगल के पास कल-कल करती छोटी सी नदी किनारे बसे जगदीशपुर गाँव में आ बसे। जगदीशपुर का नामकरण भी मेरे पिताजी ने ही किया था। इन 24 परिवारों में एक परिवार जो पिताजी लोगों के पड़ोसी भी थे सुरेन्द्र बाछाड़ और पागली का था। अपने सभी संतानों को खोने के बाद जब उनकी हालात पागलों जैसी हो गई तो सभी उन्हें पागली कहकर पुकारने लगे जिस कारण उनका असली नाम खो गया और वह पागली नाम से परिचित हो गई। संतानों की बलि चढ़ने के बाद बची मेरी माँ आरती को वे लोग नजरों से दूर नहीं करना चाहते थे इसलिए मेरे दादाजी और नानाजी ने मित्रता को रिश्तेदारी में बदल दिया।

 पिताजी केे घनिष्ठ मित्रों में माननीय एनडी तिवारी जी (तब वे युवा थे), पुलिन बाबु,, कुमुद बाबु, अमूल्य बाबु, राधाकान्त बाबु, हरेन बाबु, मनोरंजन डाक्टर, विरंचीपद बाबु, तरूणि हालदार, चंद्रबाबु, रवि ढाली आदि आदि थे। पिताजी के अनुसार उस जमाने में एनडी तिवारी जी का ज्यादातर समय इन्हीं बंगाली विस्थापितों के साथ बीतता था। कई-कई बार वे उनके साथ तौलिया पहनकर हैंडपंप के पानी से स्नान करते थे। घर में बना साधारण भोजन करते थे। 

समाजसेवा अथवा राजनीति में पिताजी का वर्चस्व कम रहा परन्तु शुरूआती दौर में विस्थापितों के उत्थान में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे पुलिन बाबु के सभापतित्व काल में उद्बास्तु कमिटि के सदस्य रहे। तत्कालीन न्याय पंचायत, आनन्दखेड़ा के सदस्य पद पर रहते हुए कई वर्षों तक लोक कल्याणार्थ कार्य किए। 

इन सबसे अलग वे साँप काटे का भी इलाज करते थे। इसलिए 36 कालोनी में वे ‘उपेन ओझा’ नाम से भी परिचित थे।मोहनपुर के देव गाइन जी एवं मोतीपुर के आदित्य मास्टार जी के पिताजी ज्योतिश बाबु उनके मंत्र गुरू रहे थे।  

बाद में माता, छोटे भाई स्व0 सुधीर कुमार मंडल एवं पिताजी स्व0 बिहारी लाल मंडल के एक के बाद एक गुजर जाने से वे टूट गए और बाहरी दुनिया से नाता तोड़ लिया।

 मेरे जीवन में पिताजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। मेरी उलझी हुई जिन्दगी के हर मोड़ पर उन्होंने मेरा साथ दिया और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के गुर सिखाए। आज उनकी कमी खल रही है। रह-रहकर उनके सानिध्य में गुजारे पल याद आ रहे हैं काश! उस बहुमूल्य समय को बरबाद न कर उनसे कुछ और जानकारियां हासिल करती, उनके जीवन के हर पहलु से वाकिफ होती, 100 साल का लंबा सफर जो उन्होंने तय किया, उनको अक्षरों में पिरों सकती... मेरी नाकामी जिन्दगी भर शूल बनकर मेरे हृदय को भेदती रहेगी। 

आज अंतिम श्रद्धांजलि देते समय जो कुछ भी स्मरण हो आया मैने आपके साथ साझा किया। इसका कोई पुख्ता प्रमाण मेरे पास नहीं है जो कुछ उनके मुंह से सुना है वही सपाट व्यक्त किया है। यदि कहीं कोई त्रुटि हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं। 

अंत में पिताजी को मेरी तरफ से कोटि-कोटि प्रणाम एवं हार्दिक श्रद्धांजलि।

अंजलि मंडल

25-6-2021

कुंए के मेंढक का ब्रह्मांड- पलाश विश्वास

 कुएं के मेंढक के लिए उसका कुआं ही समूचा ब्रह्मांड है। सृष्टि का आदि अंत है। 

इसीलिए देव देवी पुजारी अमचे चमचे मालामाल हैं। भक्त बेहाल हैरान परेशान है। अपनी हालत के लिए किस्मत को कोसते हुए फेंकी हुई रोटी के टुकड़े के लड़ते हुए आपस में लहूलुहान हैं। अपने ही जख्म चाटते हुए दुश्मनों के छक्के छुड़ाने का गुमान है।

अंधों बहरों की दुनिया में रोशनी और शब्द नाद की बातें बेमानी हैं।

गुलामी की जंजीरों से जिन्हें मुहब्बत है,उनके लिये आजादी का ख्वाब अज़ाब का खौफ है।

इसी खौफ का ताजा नाम कोरोना है।

हम दुनिया के बारे में कितना जानते हैं?

हम पाकिस्तान,बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, अफगानिस्तान के बारे में कितना जानते हैं?

हम अमेरिका,चीन,रूस,जापान,फ्रांस,इटली,जर्मनी,इंग्लैंड ,

स्पेन, पुर्तगाल, एशिया,यूरोप, अफ्रीका, लातिन अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका के बारे में कितना जानते हैं?

हमने परीक्षा पास करने की गरज से जितना पढा है,पास करने के बाद कितना और पढा है? पढा है तो क्या क्या पढ़ा है?

हमने कितना इतिहास कितना भूगोल जाना है?

धर्म,धर्म ग्रन्थों के बारे में,मिथकों के बारे में, टोटेम के बारे में, तर्कशास्त्र के बारे में हम कितना जानते हैं?

हमने दर्शन और विचारधाराओं का कितना अध्धयन किया है?

हमने कितना साहित्य कितने क्लासिक आत्मसात किये हैं?

हम संस्कृति, उसके इतिहास भूगोल के बारे में कितना जानते हैं?

 हम ज्ञान विज्ञान की विविध शाखाओं का कितना वस्तुगत अध्दगीं किया है?

अपनी और पराई भाषा और बोली का हम कितना इस्तेमाल करते हैं और कैसे करते हैं?

विज्ञान और तकनीक हमारे लिये क्या है?

विज्ञान ने हमें कितनी वैज्ञानिक दृष्टि दी है?

हमें अपनी जड़पन,अपनी पहचान और अपनी नस्ल के बारे में कितना पता है,क्या पता है?

हम कितना सीखते हैं?

क्या सीखते हैं?

हम तर्कों का कितना इस्तेमाल करते हैं?

हम अपनी इंद्रियों का कैसे और कितना इस्तेमाल करते हैं?

हम अपने को कितना अभिव्यक्त कर पाते हैं?

जितना भी बोलें, जितना भी लिखे,हम कितनों को सम्बोधित कर पाते हैं?

प्रकृति,पर्यावरण और ब्रह्मांड के बारे में हम कितना जानते हैं?

अपने दिलोदिमाग का हम कितना इस्तेमाल करते हैं?

हम ख्वाब देखते हैं?

अच्छा या बुरा ख्वाब देखते हैं?

हमने कितने दोस्त बनाये हैं और कितने दुश्मन?

इन सवालों का जवाब वस्तुनिष्ठ नहीं है।

सरल भी नहीं है।

आईने में अपने चेहरे को एक बार पहचान तो लीजिये।


राज की बात यह है कि हम भी कुछ खास नहीं जानते। अभी बहुत कुछ जानना,समझना और आत्मसात म

करके ज्ञान का विवेकसम्मत प्रयोग करना बाकी है।

वक्त मुट्ठी में रेत की तरह फिसलता जा रहा है।

परीक्षा का आखरी लमहा है और सवालों के मुखातिब हम सिरे से निरुत्तर हैं।


हम मनुष्य हैं और हम नागरिक भी हैं।

अपने समाज को हम कितना जानते समझते हैं?

अपने देश को हम कितना जानते समझते हैं?


जानते समझते होते तो मुट्ठी भर पुरोहित, राजनेता और बुद्धिंजीवी हमारे कंधे पर बंदूक रखकर चांदमारी का शिकार हमें ही नहीं बना सकते थे


हम मर रहे हैं और हम मारे जा रहे हैं।

यह अकालमृत्यु और ये हत्याएं किसी नियति के द्वारा   नियंत्रित नहीं है।

यह हमारा कर्मफल है। यह हमारी निष्क्रिय विवेक का परिणाम है।


हम अफ्रीका को गरीबी और बेबसी का भूगोल मानते हैं।

विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मिश्र की सभ्यता के बावजूद दुनियाभर के मीडिया के अज्ञान से हम अफ्रीका और अफ्रिकी जनता को कुछ नहीं समझते।


गांधी की कर्मभूमि दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद से आज़ादी की लड़ाई को हम रूसी,चीनी या अमरीकी या फ्रांसीसी क्रांति के समकक्ष नहीं रखते।

हमारे लिए यूरोप का नवजागरण इतिहास का आदि और अंत नहीं भी है तो मुक्त बाजार हमारे लिए ज्ञान का अनन्त भंडार है। हम ऑनलाइन ज्ञान के ज्ञानी हैं और तकनीक हमारा ज्ञान विज्ञान गणित है।


हमारे मित्र 74 साल के पंतनगर विश्व विद्यालय के रिटायर प्राध्यापक डॉ पीजी विश्वास से पन्तनगर के पास नगला स्थित आवास में जाकर असज हम मिले तो अफ्रीकी देश इथोपिया के बारे में हमारी अनेक गलतफहमियां दूर हो गयी। डॉ विश्वास 2007 में पन्त नगर विश्व विद्यालय से रिटायर होने के बाद कृषि वैज्ञानिक की हैसियत से ईडी होकर  बांग्लादेश के बाद इथोपिया में चार साल तक रहे।

इथोपिया के लोग अफ्रीकी देशों की तरह गरीब हैं जरूर लेकिन उतने भी गरीब नहैं हैं जितने की सोमालिया के लोग। वहां केन्या की तरह न अराजकता है और न बाकी अफ्रीका और यरोप अमेरिका की तरह अपराध। यह हैरत अंगेज़ है कि सुसभ्य यूरोप और अमेरिका से बेहतर नागरिक हैं अफ्रीका के देश इथोपिया में। जहां कानून व्यवस्था मि हालत देखने के लिए दो चार पुलिसवाले काफी होते है और सारे विदेशी और अल्पसंख्यक सुरक्षित।

क्या ऐसा हमारे देश में है कि कानून के खौफ और पुलिस सेना के बिना हम अमन चैन से बिना किसी को सताए जी सकते हैं?

हो सकता है कि यह डा विश्वास का निजी सनुभव हो और दूसरों के अनुभव भिन्न हो। लेकिन सच के इस आयाम से हम अपरिचित थे।

डॉ विश्वास से हम 2005 के आस पास मिले थे। जब वह उत्तराखण्ड के बंगालियों को बंगाल की तरह अनुसूचित  जाति का दर्जा देने की मांग पर केंद्र सरकार के निर्देश पर पन्तनगर विश्ववविद्यालय की ओर से सामाजिक सर्वे करा रहे थे। 

अफ्रीका से लौटकर वे बंगाल के बारासात में बस चुके हैं। लेकिन नगला मन अपना घर बेचा नहीं है ताकि वे अपनी कर्मभूमि से जुड़े रहे।

हम उन्हें प्रेरणा अंशु का जून अंक और मास्साब की किताब गांव और किसान देने गए थे।

वे वहां अकेले अपनी पत्नी के साथ रहते हैं।

भाभीजी ने काशीपुर के खजुर के गुड़ की खीर खिलाई यह कहते हुए कि इससे शुगर के मरीज को नुकसान नहीं होता। रूपेश अन्यथा न लें।

हमारे साथ मतकोटा दिनेशपुर गदरपुर मार्ग आंदोलन के हीरो विकास स्वर्णकार थे,जिन्होंने इसी रास्ते के गड्ढों में जमा बरसात के पानी में कल मछलियां मारी।

डॉ विश्वास  ने बिन मांगे प्रेरणा अंशु की सदस्यता ले ली। उन्होंने तराई के छात्रों युवाओं की शिक्षा के लिए समाजोत्थान स्कूल के जरिये हम क्या कर सकते हैं ,इस सिलसिले में हमसे निरन्तर सम्पर्क में रहने का वायदा किया है। इसके अलावा विभाजन के शिकार बंगालियों के इतिहास लिखने में भी वे हमारी मदद करेंगे।


डॉ विश्वास से मिलने से पहले हम पन्त नगर विश्विद्यालय में कृषि वैज्ञानिक डॉ राजेश प्रताप सिंह के आवास बिना पूर्व सूचना के पहुँचे। डॉ साहब किसी मीटिंग में गए हुए थे। इस मौके पर हमने भाभीजी के आतिथ्य का आनन्द उठाया और बच्चों से खूब बातें की। प्राची मद्रास आईआईटी में बायो टेक्नोलॉजी की छात्रा हैं और क्वोटौएँ भी लिखती है। उससे बायो टेक्नॉलॉजी और कविता पर काफी मजेदार चर्चा हुई। डॉ साहब नहीं मिले तो हमने मौका को जाया नहीं होने दिया।

Thursday, June 24, 2021

जहां हमारे पुरखे बसते थे- पलाश विश्वास

 Palash Biswas:

हमारे पुरखे जहां बसते थे। https://en.m.wikipedia.org/wiki/List_of_rivers_of_Bangladesh#/media/File%3ABangladesh_LOC_1996_map.jpg

इस साइट पर जाकर नदियों का नक्शा देखें। खुलना जिला अब baagerhat, सात्खीरा और खुलना जिलों में विभाजित है। तो बरीशाल पिरोज़पुर,भोला और बरीशाल जिलों में। यह पूरा इलाका नदियों और द्वीपों का है। जो सुंदरवन इलाका है।


उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड की  तराई, आंध्र, ओडीशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और राजस्थान में आये बंगाली शरणार्थी इन्ही इलाकों से हैं।


 इस विशाल इलाके के उत्तर में जैशोर, फरीदपुर और ढाका जिले हैं।जिनमें फरीदपुर से कुछ लोग शरणार्थी बने। 


ढाका और जैशोर,राजशाही और कुसठिया के ज्यादातर लोग पशिम बंगाल में सम्पत्ति विनिमय करके बस गए। वे बंगाली भूगोल से बाहर नही गए।


 त्रिपुरा के पूरब में और असम के दक्षिण में कुमिल्ला जिले से सबसे ज्यादा शरणार्थी त्रिपुरा और असम में जा बसे। 


नोआखाली बरीशाल से पूरब में हैं जहां सबसे भयानक दंगे 1947 में हुए। ये लोग तितर बितर होकर बंगाल असम त्रिपुरा और भारतभर में बिखर गए।


नोआखाली और कुमिल्ला के साथ भारत के त्रिपुरा से नीचे बंगाल की खाड़ी से लगा इलाका चटगांव और कक्ष बाजार का है,जिसके पश्चिम में बर्मा यानी म्यांमार है।  पहाड़ों और द्वीपों का यह पूरा इलाका आदिवासियों का था। जहां जनसंख्या का 98 प्रतिशत बौद्ध चकमा आदिवासी थे,जो विभाजन के बाद त्रिपुरा से लेकर अरुणाचल तक बस गए।

Wednesday, June 23, 2021

रेडक्लिफ कमिशन, शरणार्थी सैलाब और नागरिकता का मसला- पलाश विश्वास

 रेडक्लिफ कमीशन, शर्णार्थिब्सलाब और नागरिकता का मसला


पलाश विश्वास


मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में विभाजन के बाद तीन दिनों तक पाकिस्तान का झंडा फहराया जाता रहा तो खुलना में भारत का। 


खुलना का हिन्दू बहुल जिला मुर्शिदाबाद और मालदा के बदले पाकिस्तान को दे दिया गया। 


इसीतरह सिलहट का हिन्दुबहुल जिला पाकिस्तान को। चटगांव आदिवासी बौद्ध इलाका था।जिसमे जनसंख्या का 97 प्रतिशत चकमा बौद्ध आदिवासियों का  था। सन 1900 से यह आदुवासी इलाका एक्सक्लुडेड एरिया था।बंगाल या असम में न होने के कारण असेम्बली  में चटगांव का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। 


चटगांव के रंगमाटी में 15 अगस्त को भारत का झंडा फहराया गया। आदिवासियों का प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली जाकर भारत में बने रहने की मांग की ।लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।


रेडक्लिफ कमीशन ने हफ्तेभर के कम समय में भारत पाकिस्तान की सीमाएं कांग्रेस और मुस्लिम लीग के जमींदार नेताओं की सैदेबाजी से तय किया। 


10 अगस्त से 12 अगस्त तक सीमाएं तय कर दी गई। जिसकी जानकारी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के शीर्ष नेताओं को थी।लेलिन रेडक्लिफ कमीशन की रिपोर्ट 17 अगस्त कों प्रकाशित हुई।


 इससे सीमा के आर पार भारी अराजकता फैल गयी। हिन्दू बभूलनिलकों में मुसलमानों के खिलाफ और मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं के खिलाफ दंगे शुरू हो गए। बंगाल में कोलकाता, नदिया,मालदा,मुर्शिदाबाद, 24 परगना और हावड़ा में दंगे शुरू हो गए। 


पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान के समर्थन में कोई आंदोलन नहीं था।कोलकाता और पश्चिमनबंगल में पाकिस्तान समर्थक ज्यादा थे और उत्तर प्रदेश और बिहार में भी। जो अंततः भारत में रह गए।


इसकी भारी कीमत पूर्वी बंगाल के खुलना, जैशोर, फरीदपुर,बरीशाल, कुमिल्ला, व्हटगांव जैसे जिलों को 1947 सेव1964 तक,1971 से लेकर अभीतक चुकानी पड़ी। झाने से शरणार्थियों का सैलाब आज भी नही रुक रहा। 


पूर्वी बंगाल के बंगाली हिन्दू मुसलमानों में कोई तनाव नही था। लेकिन बिहार और पसजचिम बंगाल से विभाजन के बाद वहां पहुंचे पाकिस्तान समर्थक उर्दूभाषी मुसलमानों के वहां पहुंचने पर हिंदुओं के खिलाफ कभी न थमने वाला उत्पीड़न शुरू हो गया।


1971 में इन्ही पाकिसयं समर्थकों ने रज़ाकर वाहिनी बनाकर बंगाली हिंदुओं और मुसलमानों का कत्लेआम पाकिस्तानी फौजों के साथ मिलकर किया।


बांग्लादेश बनने के बाद ये पाकिस्तान समर्थक तत्व लगातार मजबूत होते गए। जिसके खिलाफ बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें लड़ रही हैं।लेकिन अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न रुक नहीं रहा।


शरणार्थी 2021 में भी आ रहे हैं।


इस समस्या के स्थायी समाधान के बिना भारत में नागरिकता का मसला अनसुलझा ही रहेगा। 


1947 के बाद आये और जन्मजात भारतीय नागरिकों की नागरिकता छीनकर इस समस्या को और उलझा डियां गया है,जो किसी नागरिकता कानून संशोधन या गैर मुसलमानों को एकतरफा नागरिकता दिए जाने से सुलझेगी नहीं।क्योंकि शरणार्थी समस्या के कारण बंगाल, असम,त्रिपुरा और पूर्वोत्तर में जनसंख्या समीकरण सिरे से बदल गए हैं और सत्ता की राजनीति जनसंख्या केंद्रित है।


Radcliffe Line


The Radcliffe Line was the boundary demarcation line between the Indian and Pakistani portions of the Punjab and Bengal provinces of British India. It was named after its architect, Sir Cyril Radcliffe, who, as the joint chairman of the two boundary commissions for the two provinces, received the responsibility to equitably divide 175,000 square miles (450,000 km2) of territory with 88 million people.[1]


The regions affected by the extended Partition of India: green regions were all part of Pakistan by 1948, and orange part of India. The darker-shaded regions represent the Punjab and Bengal provinces partitioned by the Radcliffe Line. The grey areas represent some of the key princely states that were eventually integrated into India or Pakistan, but others which initially became independent are not shown.

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Radcliffe Award

The demarcation line was published on 17 August 1947 upon the Partition of India. Today its western side still serves as the Indo-Pakistan border and the eastern side serves as the India-Bangladesh border. It is 3,323 km long.


Background 

Process and key people Edit

A crude border had already been drawn up by Lord Wavell, the Viceroy of India prior to his replacement as Viceroy, in February 1947, by Lord Louis Mountbatten. In order to determine exactly which territories to assign to each country, in June 1947, Britain appointed Sir Cyril Radcliffe to chair two boundary commissions—one for Bengal and one for Punjab.[31]


The commission was instructed to "demarcate the boundaries of the two parts of the Punjab on the basis of ascertaining the contiguous majority areas of Muslims and non-Muslims. In doing so, it will also take into account other factors."[32] Other factors were undefined, giving Radcliffe leeway, but included decisions regarding "natural boundaries, communications, watercourses and irrigation systems", as well as socio-political consideration.[33] Each commission also had four representatives—two from the Indian National Congress and two from the Muslim League. Given the deadlock between the interests of the two sides and their rancorous relationship, the final decision was essentially Radcliffe's.


After arriving in India on 8 July 1947, Radcliffe was given just five weeks to decide on a border.[31] He soon met with his fellow college alumnus Mountbatten and travelled to Lahore and Calcutta to meet with commission members, chiefly Nehru from the Congress and Jinnah, president of the Muslim League.[34] He objected to the short time frame, but all parties were insistent that the line be finished by 15 August British withdrawal from India. Mountbatten had accepted the post as Viceroy on the condition of an early deadline.[35] The decision was completed just a couple of days before the withdrawal, but due to political manoeuvring, not published until 17 August 1947, two days after the grant of independence to India and Pakistan.[31]


Members of the commissions Edit

Each boundary commission consisted of five people – a chairman (Radcliffe), two members nominated by the Indian National Congress and two members nominated by the Muslim League.[36]


The Bengal Boundary Commission consisted of justices C. C. Biswas, B. K. Mukherji, Abu Saleh Mohamed Akram and S.A.Rahman.[37]


The members of the Punjab Commission were justices Mehr Chand Mahajan, Teja Singh, Din Mohamed and Muhammad Munir.[37]


Problems in the process Edit

Boundary-making procedures Edit


The Punjabi section of the Radcliffe Line

All lawyers by profession, Radcliffe and the other commissioners had all of the polish and none of the specialized knowledge needed for the task. They had no advisers to inform them of the well-established procedures and information needed to draw a boundary. Nor was there time to gather the survey and regional information. The absence of some experts and advisers, such as the United Nations, was deliberate, to avoid delay.[38] Britain's new Labour government "deep in wartime debt, simply couldn’t afford to hold on to its increasingly unstable empire."[39] "The absence of outside participants—for example, from the United Nations—also satisfied the British Government's urgent desire to save face by avoiding the appearance that it required outside help to govern—or stop governing—its own empire."[40]


Political representation Edit

The equal representation given to politicians from Indian National Congress and the Muslim League appeared to provide balance, but instead created deadlock. The relationships were so tendentious that the judges "could hardly bear to speak to each other", and the agendas so at odds that there seemed to be little point anyway. Even worse, "the wife and two children of the Sikh judge in Lahore had been murdered by Muslims in Rawalpindi a few weeks earlier."[41]


In fact, minimizing the numbers of Hindus and Muslims on the wrong side of the line was not the only concern to balance. The Punjab Border Commission was to draw a border through the middle of an area home to the Sikh community.[42] Lord Islay was rueful for the British not to give more consideration to the community who, in his words, had "provided many thousands of splendid recruits for the Indian Army" in its service for the crown in World War I.[43] However, the Sikhs were militant in their opposition to any solution which would put their community in a Muslim ruled state. Moreover, many insisted on their own sovereign state, something no one else would agree to.[44]


Last of all, were the communities without any representation. The Bengal Border Commission representatives were chiefly concerned with the question of who would get Calcutta. The Buddhist tribes in the Chittagong Hill Tracts in Bengal had no official representation and were left totally without information to prepare for their situation until two days after the partition.[45]


Perceiving the situation as intractable and urgent, Radcliffe went on to make all the difficult decisions himself. This was impossible from inception, but Radcliffe seems to have had no doubt in himself and raised no official complaint or proposal to change the circumstances.[1]


Local knowledge Edit

Before his appointment, Radcliffe had never visited India and knew no one there. To the British and the feuding politicians alike, this neutrality was looked upon as an asset; he was considered to be unbiased toward any of the parties, except of course Britain.[1] Only his private secretary, Christopher Beaumont, was familiar with the administration and life in the Punjab. Wanting to preserve the appearance of impartiality, Radcliffe also kept his distance from Viceroy Mountbatten.[3]


No amount of knowledge could produce a line that would completely avoid conflict; already, "sectarian riots in Punjab and Bengal dimmed hopes for a quick and dignified British withdrawal".[46] "Many of the seeds of postcolonial disorder in South Asia were sown much earlier, in a century and half of direct and indirect British control of large part of the region, but, as book after book has demonstrated, nothing in the complex tragedy of partition was inevitable."[47]


Haste and indifference Edit

Radcliffe justified the casual division with the truism that no matter what he did, people would suffer. The thinking behind this justification may never be known since Radcliffe "destroyed all his papers before he left India".[48] He departed on Independence Day itself, before even the boundary awards were distributed. By his own admission, Radcliffe was heavily influenced by his lack of fitness for the Indian climate and his eagerness to depart India.[49]


The implementation was no less hasty than the process of drawing the border. On 16 August 1947 at 5:00 pm, the Indian and Pakistani representatives were given two hours to study copies, before the Radcliffe award was published on 17 August.[50]


Secrecy Edit

To avoid disputes and delays, the division was done in secret. The final Awards were ready on 9 and 12 August, but not published until two days after the partition.


According to Read and Fisher, there is some circumstantial evidence that Nehru and Patel were secretly informed of the Punjab Award's contents on 9 or 10 August, either through Mountbatten or Radcliffe's Indian assistant secretary.[51] Regardless of how it transpired, the award was changed to put a salient east of the Sutlej canal within India's domain instead of Pakistan's. This area consisted of two Muslim-majority tehsils with a combined population of over half a million. There were two apparent reasons for the switch: the area housed an army arms depot, and contained the headwaters of a canal which irrigated the princely state of Bikaner, which would accede to India.[citation needed]


Implementation Edit

After the partition, the fledgling governments of India and Pakistan were left with all responsibility to implement the border. After visiting Lahore in August, Viceroy Mountbatten hastily arranged a Punjab Boundary Force to keep the peace around Lahore, but 50,000 men was not enough to prevent thousands of killings, 77% of which were in the rural areas. Given the size of the territory, the force amounted to less than one soldier per square mile. This was not enough to protect the cities much less the caravans of the hundreds of thousands of refugees who were fleeing their homes in what would become Pakistan.[52]


Both India and Pakistan were loath to violate the agreement by supporting the rebellions of villages drawn on the wrong side of the border, as this could prompt a loss of face on the international stage and require the British or the UN to intervene. Border conflicts led to three wars, in 1947, 1965, and 1971, and the Kargil conflict of 1999.


Disputes along the Radcliffe Line Edit

There were disputes regarding the Radcliffe Line's award of the Chittagong Hill Tracts and the Gurdaspur district. Disputes also evolved around the districts of Malda, Khulna, and Murshidabad in Bengal and the sub-division of Karimganj of Assam.


In addition to Gurdaspur's Muslim majority tehsils, Radcliffe also gave the Muslim majority tehsils of Ajnala (Amritsar District), Zira, Ferozpur (in Ferozpur District), Nakodar and Jullander (in Jullander District) to India instead of Pakistan.[53]


Punjab Edit

Lahore Edit

Lahore having Muslims in majority with about 64.5% percent but Hindus and Sikhs controlled approximately 80% of city's assets,[54] Radcliffe had originally planned to give Lahore to India.[55][56][57] When speaking with journalist Kuldip Nayar, he stated "I nearly gave you Lahore. ... But then I realised that Pakistan would not have any large city. I had already earmarked Calcutta for India."[55][56] When Sir Cyril Radcliffe was told that “the Muslims in Pakistan have a grievance that [he] favoured India”, he replied, “they should be thankful to me because I went out of the way to give them Lahore which deserved to go to India.”[56]


Ferozpur District Edit

Indian historians now accept that Mountbatten probably did influence the Ferozpur award in India's favour.[58] The headworks of River Beas, which later joins River Sutlej flowing into Pakistan, were located in Ferozepur. Congress leader Nehru and Viceroy Mountbatten had lobbied Radcliffe that headworks should not go to Pakistan.[citation needed]


Gurdaspur District Edit

Under British control, the Gurdaspur district was the northernmost district of the Punjab Province. The district itself was administratively subdivided into four tehsils: Shakargarh and Pathankot tehsils to the north, and Gurdaspur and Batala tehsils to the south. Of the four, only the Shakargarh tehsil, which was separated from the rest of the district by the Ravi river, was awarded to Pakistan. (It was subsequently merged into the Narowal district of West Punjab.[59]) The Gurdaspur, Batala and Pathankot tehsils became part of India's East Punjab state. The division of the district was followed by a population transfer between the two nations, with Muslims leaving for Pakistan and Hindus and Sikhs leaving for India.


The entire district of Gurdaspur had a bare majority of 50.2% Muslims.[60] (In the `notional' award attached to the Indian Independence Act, all of Gurdaspur district was marked as Pakistan with 51.14% Muslim majority.[61] In the 1901 census, the population of Gurdaspur district was 49% Muslim, 40% Hindu, and 10% Sikh.[62]) The Pathankot tehsil was predominantly Hindu while the other three tehsils were Muslim majority.[63] In the event, only Shakargarh was awarded to Pakistan.


Radcliffe explained that the reason for deviating from the notional award in case of Gurdaspur was that the headwaters of the canals that irrigated the Amritsar district lay in the Gurdaspur district and it was important to keep them under one administration.[61] Lord Wavell had stated in February 1946 that Gurdaspur had to go with the Amritsar district, and the latter could not be in Pakistan due to its Sikh religious shrines.[61] In addition, the railway line from Amritsar to Pathankot passed through the Batala and Gurdaspur tehsils.[64]


Pakistanis have alleged that the award of the three tehsils to India was a manipulation of the Award by Lord Mountbatten in an effort to provide a land route for India to Jammu and Kashmir.[60] However, Shereen Ilahi points out that the land route to Kashmir was entirely within the Pathankot tehsil, which had a Hindu majority. The award of the Batala and Gurdaspur tehsils to India did not affect Kashmir.[65]


Pakistani view on the award of Gurdaspur to India Edit

Pakistan maintains that the Radcliffe Award was altered by Mountbatten; Gurdaspur was handed over to India and thus was manipulated the accession of Kashmir to India.[66][failed verification] In support of this view, some scholars claim the award to India "had little to do with Sikh demands but had much more to do with providing India a road link to Jammu and Kashmir."[67]


As per the 'notional' award that had already been put into effect for purposes of administration ad interim, all of Gurdaspur district, owing to its Muslim majority, was assigned to Pakistan.[68] From 14 to 17 August, Mushtaq Ahmed Cheema acted as the Deputy Commissioner of the Gurdaspur District, but when, after a delay of two days, it was announced that the major portion of the district had been awarded to India instead of Pakistan, Cheema left for Pakistan.[69] The major part of Gurdaspur district, i.e. three of the four sub-districts had been handed over to India giving India practical land access to Kashmir.[70] It came as a great blow to Pakistan. Jinnah and other leaders of Pakistan, and particularly its officials, criticized the award as 'extremely unjust and unfair'.[71][need quotation to verify]


Muhammad Zafarullah Khan, who represented the Muslim League in July 1947 before the Radcliffe Boundary Commission, stated that the boundary commission was a farce. A secret deal between Mountbatten and Congress leaders had already been struck.[72] Mehr Chand Mahajan, one of the two non-Muslim members of the boundary commission, in his autobiography, has acknowledged that when he was selected for the boundary commission, he was not inclined to accept the invitation as he believed that the commission was just a farce and that decisions were actually to be taken by Mountbatten himself.[73] It was only under British pressure that the charges against Mountbatten of last minute alterations in the Radcliffe Award were not officially brought forward by Pakistani Government in the UN Security Council while presenting its case on Kashmir.[74]


Zafrullah Khan states that, in actual fact, adopting the tehsil as a unit would have given Pakistan the Ferozepur and Zira tehsils of the Ferozpur District, the Jullundur and Rahon tehsils of Jullundur district and the Dasuya tehsil of the Hoshiarpur district. The line so drawn would also give Pakistan the State of Kapurthala (which had a Muslim majority) and would enclose within Pakistan the whole of the Amritsar district of which only one tehsil, Ajnala, had a Muslim majority. It would also give Pakistan the Shakargarh, Batala and Gurdaspur tehsils of the Gurdaspur district. If the boundary went by Doabs, Pakistan could get not only the 16 districts which had already under the notional partition been put into West Punjab, including the Gurdaspur District, but also get the Kangra District in the mountains, to the north and east of Gurdaspur. Or one could go by commissioners' divisions. Any of these units being adopted would have been more favourable to Pakistan than the present boundary line. The tehsil was the most favourable unit.[68] But all of the aforementioned Muslim majority tehsils, with the exception of Shakargarh, were handed over to India while Pakistan didn't receive any Non-Muslim majority district or tehsil in Punjab.[53] Zafruallh Khan states that Radcliffe used district, tehsil, thana, and even village boundaries to divide Punjab in such a way that the boundary line was drawn much to the prejudice of Pakistan.[68] However, while Muslims formed about 53% of the total population of Punjab in 1941, Pakistan received around 58% of the total area of the Punjab, including the most fertile parts of it.


According to Zafrullah Khan, the assertion that the award of the Batala and Gurdaspur tehsils to India did not 'affect' Kashmir is far-fetched. If Batala and Gurdaspur had gone to Pakistan, Pathankot tehsil would have been isolated and blocked. Even though it would have been possible for India to get access to Pathankot through the Hoshiarpur district, it would have taken quite long time to construct the roads, bridges and communications that would have been necessary for military movements.[70]


Assessments on the 'Controversial Award of Gurdaspur to India and the Kashmir Dispute' Edit

Stanley Wolpert writes that Radcliffe in his initial maps awarded Gurdaspur district to Pakistan but one of Nehru’s and Mountbatten’s greatest concerns over the new Punjab border was to make sure that Gurdaspur would not go to Pakistan, since that would have deprived India of direct road access to Kashmir.[75] As per "The Different Aspects of Islamic Culture", a part of UNESCO’s Histories flagship project, recently disclosed documents of the history of the partition reveal British complicity with the top Indian leadership to wrest Kashmir from Pakistan. Alastair Lamb, based on the study of recently declassified documents, has convincingly[citation needed] proven that Mountbatten, in league with Nehru, was instrumental in pressurizing Radcliffe to award the Muslim-majority district of Gurdaspur in East Punjab to India which could provide India with the only possible access to Kashmir.[76] Andrew Roberts believes that Mountbatten cheated over India-Pak frontier[77] and states that if gerrymandering took place in the case of Ferozepur, it is not too hard to believe that Mountbatten also pressurized Radcliffe to ensure that Gurdaspur wound up in India to give India road access to Kashmir.[78][79][80]


Perry Anderson states that Mountbatten, who was officially supposed to neither exercise any influence on Radcliffe nor to have any knowledge of his findings, intervened behind the scenes – probably at Nehru’s behest – to alter the award. He had little difficulty in getting Radcliffe to change his boundaries to allot the Muslim-majority district of Gurdaspur to India instead of Pakistan, thus giving India the only road access from Delhi to Kashmir.[81]


However, some British works suggest that the 'Kashmir State was not in anybody's mind'[82] when the Award was being drawn and that even the Pakistanis themselves had not realized the importance of Gurdaspur to Kashmir until the Indian forces actually entered Kashmir.[83] Both Mountbatten and Radcliffe, of course, have strongly denied those charges. It is impossible to accurately quantify the personal responsibility for the tragedy of Kashmir as the Mountbatten papers relating to the issue at the India Office Library and records are closed to scholars for an indefinite period.[84]


Bengal Edit

Learn more

This section needs additional citations for verification. (August 2020)

Chittagong Hill Tracts Edit

Chittagong Hill Tracts had a majority non-Muslim population of 97% (most of them Buddhists), but was given to Pakistan. The Chittagong Hill Tracts People's Association (CHTPA) petitioned the Bengal Boundary Commission that, since the CHTs were inhabited largely by non-Muslims, they should remain within India. Chittagong Hill Tracts was an excluded area since 1900 and was not part of Bengal. It had no representative at the Bengal Legislative Assembly in Calcutta, since it was not part of Bengal. Since they had no official representation, there was no official discussion on the matter, and many on the Indian side assumed the CHT would be awarded to India.[85][86]


On 15 August 1947, Chakma and other indigenous Buddhists celebrated independence day by hoisting Indian flag in Rangamati, the capital of Chittagong Hill Tracts. When the boundaries of Pakistan and India were announced by radio on 17 August 1947, they were shocked to know that the Chittagong Hill Tracts had been awarded to Pakistan. The Baluch Regiment of the Pakistani Army entered Chittagong Hill Tracts a week later and lowered the Indian flag at gun point.[87][88] The rationale of giving the Chittagong Hill Tracts to Pakistan was that they were inaccessible to India and to provide a substantial rural buffer to support Chittagong (now in Bangladesh), a major city and port; advocates for Pakistan forcefully argued to the Bengal Boundary Commission that the only approach was through Chittagong.


The indigenous people sent a delegation led by Sneha Kumar Chakma to Delhi to seek help from the Indian leadership. Sneha Kumar Chakma contacted Sardar Patel by phone. Sardar Patel was willing to help, but insisted Sneha Kumar Chakma to seek assistance from Prime Minister Pandit Nehru. But Nehru refused to help fearing that military conflict for Chittagong Hill Tracts might draw the British back to India.[89]


Malda District Edit

Another disputed decision made by Radcliffe was division of the Malda district of Bengal. The district overall had a slight Muslim majority, but was divided and most of it, including Malda town, went to India. The district remained under East Pakistan administration for 3–4 days after 15 August 1947. It was only when the award was made public that the Pakistani flag was replaced by the Indian flag in Malda.


Khulna and Murshidabad Districts Edit

The Khulna District with a marginal Hindu majority of 51% was given to East Pakistan in lieu of the Murshidabad district with a 70% Muslim majority, which went to India. However, Pakistani flag remained hoisted in Murshidabad for three days until it was replaced by Indian flag on the afternoon of 17 August 1947.[90]


Karimganj Edit

Sylhet district of Assam joined Pakistan in accordance with a referendum.[91] However, the Karimganj sub-division with a Muslim majority was severed from Sylhet and given to India which became a district in 1983. As of the 2001 Indian Census, Karimganj district now has a Muslim majority of 52.3%.[92]


Legacy 

See also 

Notes 

References 

Bibliography 

Further reading 

Documentary Film and TV 

External links 

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RELATED ARTICLES

Partition of India

1947 separation of Pakistan from India


1947 in India

Indian Independence Act 1947

United Kingdom legislation


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Tuesday, June 22, 2021

कैसी रचना जरूरी है?

 कैसी रचना जरूरी है?

पलाश विश्वास

हमारे गुरुजी ताराचन्द्र त्रिपाठी जी हमे gic नैनीताल

 में बताया करते थे कि रचना इतनी मौलिक और ताकतवर होनी चाहिए कि नाम न भी डालें तो पाठक रचनाकार को फौरन पहचान ले।


वॉल्टेयर ऐसे ही रचनाकार थे।जो हमेशा रचना और नाम छुपाते थे। लेकिन हर बार रचना सामने आ जाती थी।नाम उजागर हो जाता था।उन्हें निर्वासन और मृत्यु दंड की सजा सुनाई जाती रही लेखन के लिए।किसी देश में उन्हें राहत नहीं मिली।हारकर उन्होंने अपनी सारी रचनाएँ जला डाली।


पाठकों के माध्यम से उनकी हर रचना अग्निपाखी बन गयी,जिनकी उड़ान अभी थमी नहीं है और न थमनेवाली है। कालजयी ऐसी रचना ही बनती है। 


प्रायोजित रचना की ज़िंदगी बेहद छोटी होती है।


पाठक जिस रचनाकार को पहचान नहीं पाते,मार्केटिंग से उसकी रचना भले बिक जाए, समय की कसौटी पर टिक नहीं सकती।


बेस्टसेलर या लोकप्रिय साहित्य कालजयी होता तो बहुत लोग हैं जिन्हें हम भूल नहीं पाते।


Dsb Campus Nainital में हम अक्सर किसी साहित्यकार को न पढ़ पाने पर यह तर्क देते थे कि जिसे हमने पढ़ा ही नहीं वह साहित्य महान कैसे हो सकता है?


यह कुतर्क है,निःसन्देह। लेकिन कटु सत्य भी है।


रचना आम लोगों के लिए है तो हर हाल में आम लोगो तक पहुंचनी चाहिए। रचना उनतक सम्प्रेषित भी होनी चाहिए और देश दुनिया,समय,पृथ्वी,प्रकृति और समूचे ब्रह्मांड पर उसका असर भी होना चाहिए।


आलोचकों के मानक से बढ़कर है जनता और समय के प्रतिमान। अप्रकाशित रचना में भी दम हो तो वह दावानल की तरह फैल जाती है।


निरंकुश नरसंहारी विध्वंसक वर्चस्व के विरुद्ध ठीक ऐसी ही रचनाओं की जरूरत है।

Sunday, June 20, 2021

देवभूमि में अस्पताल की क्या जरूरत?सीधे स्वर्गवास और मोक्ष

 हमारे पूरे इलाके में आम लोगों की चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं है। बाकी कसाईबाड़ा खूब हैं। पूरे उत्तराखण्ड झोला छाप डॉक्टर और नीम हकीम के भरोसे। कोई शिकायत नहीं।कोई आंदोलन नहीं।सिर्फ कुर्सी की लड़ाई।बीमारी कितनी आम हो या गम्भीर,फर्क नहीं पड़ता। सपनों के उत्तराखण्ड में विकास की लूट है।बिना इलाज स्वर्गवास और मोक्ष है। बधाई। लोग गूंगे बहरे और अंधे हों तो उन्हें स्वर्गवासी ही होना चाहिए।आखिर यह देवभूमि है।




हम लोग इतनी बुरीतरह पार्टी बद्ध हैं कि राजनीतिक सवाल पर तो आपस में लड़ने भिड़ने को तैयार हो जाते हैं,लेकिन आम जनता और क्षेत्रीय हित पर सहमति असहमति जताने की जरूरत नहीं समझते।


राजनीति करने वालों की बात समझ में आती है।लेकिन पढ़े लिखे बुद्धिजीवियों,सामाजिक संगठनों के अगुवा लोगों का क्या?


प्रेमानंद महाजन जी 10 साल तक विधायक रहे।उनका कहना है कि दिनेशपुर ग्रामीण इलाका होने के अस्पताल के अच्छीकरण दिक्कत हो रही है। जबकि आसपास के तमाम ग्रामीण इलाकों में बड़े बड़े शहरों के पास बड़े अस्पताल हैं। जनप्रतिनिधि जनता के बीच जाने की,उनकी तकलीफें सुनने की भी जहमत नहीं उठाते।


बंगाली कल्याण समिति दिनेशपुर  के चुनाव पर पूरा जोर लगा दिया जाता है।पदाधिकारी के लिए खूब जोर आजमाइश राजनीति होती है।


2001 के बाद यह संगठन कुम्भकर्णी निद्रा में है। 10 साल बाद चुनाव हुए।पहले चुनाव न होने का बहाना था।रूद्रपुर में भव्य शपथ ग्रहण के बाद वे पदाधिकारी कहाँ हैं?


बंगाली एकता संगठन, पंजाबी संगठन,पहाड़ी संगठन ,यूथ फेडरेशन न जाने कितने संगठन हैं,जिनके लम्बे चौड़े समाजसेवी पोस्ट आये दिन सोशल मीडिया पर वायरल दिखते हैं। लेकिन जनता के मुद्दे पर ये अति सक्रिय लोग मौन साध लेते हैं।


टैग करने पर भी उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।


पत्रकार बिरादरी की तो महिमा अपरम्पार है।


कुछ मित्रो का कहना है कि पुलिन बाबू के नाम पर अस्पताल का नाम रखने पर जोर था। अस्पताल के उच्चीकरण पर नहीं। हम उनसे सौ फीसदी सहमत है।


मैँ उनका बड़ा बेटा की हैसियत से पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि बेशक उनका नाम हटा दिया जाए।हमें बिना काम नाम नहीं चाहिए।काम पर भी नाम नहीं चाहिए।जनता की तकलीफें दूर करने की व्यवस्था कीजिये। आप चाहे तो इंटर कालेज के सामने उनकी मूर्ति भी विसर्जित कर दीजिए।


पुराना पोस्ट


संदर्भ


Pulin kumar Biswas  

अस्पताल दिनेश पुर और बदहाल चिकित्सा

प्रसंग

Sanjiv Sanjeev Mandal 

और दूसरे मित्रों के पोस्ट,वीडियो,वक्तव्य


बिना रोए मां भी दूध नहीं देती। हमने चिकित्सा और उच्च शिक्षा की मांग उठाई ही नहीं है।जन प्रतिनिधि हो या सरका या प्रशासन, वहां तक जनता की बुलंद आवाज नहीं गूंजेगी 1956 या 2001की तरह तो को होना था,वहीं हुआ। जनसमस्याओं के समाधान के लिए खुद पहल करनी होगी।सबको साथ लेकर आवाज़ उठानी होगी,तभी जनप्रतिनिधि हो या प्रशासन या सरकार,उनकी गहरी नींद खुलेगी। पीछे पीछे घूमते रहने से सुनवाई नहीं होगी।अपनी आवाज जोरदार ढ़ंग से बुलंद करने की जरूरत है।

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रघुवीर सहाय और हम

 मैं डीएसबी कालेज नैनीताल का छात्र था। तभी पन्तनगर गोलीकांड हुआ था। शेखर पाठक गिर्दा और मैंने रपट लिखी और रघुवीर सहाय जी ने छाप दी यह साझा रपट। उसके बाद विविध मुद्दों पर लिखने के लिए उनके पत्र आ जाते थे।


अब याद आया,पंतनगर गोलीकांड से पहले हमारे खास दोस्त पवन राकेश ने मेरे लेख धर्मयुग और दिनमान दोनों जगह भेजें थे,दोनों जगह ये लेख छप गए।उं दिनों पत्र पत्रिकाओं में हर रचना का पारिश्रमिक मिलता था। नैनीताल जैसे हिल स्टेशन में 1973 से 1975 तक हमारे खर्चे एक डेढ़ हजार तक हो जाते थे।लेकिन BA में पहुंचते ही वैचारिक असर में हमने गैर जरूरी खर्च बन्द कर दिए। गुरुजी के घर मोहन निवास में जाने के बाद 1976 से खर्च और कम हो गए।फिर पत्र पत्रिकाओं से इतना पारिश्रमिक आने लगा कि बीए एमए में ही हमने घर से पैसे लेने बन्द कर दिए।


1979 में एमए पास करने के बाद एमफिल के लिए इलाहाबाद विश्विद्यालय होकर जेएनयू पहुँचा तो उर्मिलेश के कमरे में पूर्वांचल होस्टल में डेरा डाला। जब भी दिनमान के दफ्तर गए, मुझे अपनी गाड़ी में बैठाकर जेएनयू गेट पर छोड़ते थे। रोक लेते थे। काम देते थे। एडवांस पेमेंट करते थे।


धनबाद गया तो खान दुर्घटनाओं और आदिवासियों पर लिखवाया। जब भी दिल्ली गए, उन्होंने दिमान में बैठकर लिखवाया।


कहते थे,धनबाद से आये हो, खर्च तो निकलना चाहिए।लिखवाने के बाद वाउचर से एडवांस पेमेंट।


हमारे अनेक सहकर्मियों का यही अनुभव रहा है।

हमेशा नए लोगों से लिखवाते रहने,उन्हें निखारने की जितनी बेचैनी उनमें देखी,वही हममें भी जाने अनजाने संक्रमित होती रही।


मेरे तमाम मित्र दिनमान के लेखक रहे हैं। जिनसे अबभी चार दशक के बाद भी वही मित्रता है,जो दिनमान से शुरू हुई।


पेशेवर पत्रकारिता में प्रभाष जोशी को छोड़कर बाकी लोग बॉस थे या विशुद्ध मैनेजर या विशुद्ध दलाल। 


दैनिक आवाज़,धनबाद के सम्पादक ने जरूर सम्पादन सीखने में मेरी पूरी मदद की। कोयला खानों और आदिवासियों,झारखण्ड आंदोलन पर लिखने की पूरी आजादी दी,जो मुझे अन्यत्र कहीं नहीं मिली,जनसत्ता में भी नहीं।

सम्पादक की भूमिका

 सम्पादक की भूमिका

वाचस्पति 

साहित्यिक रचनाशीलता और पत्रकारिता के अनुभवी पलाश बिश्वास ने आज की लेखन -संपादन की गतिविधियों की चर्चा की है।पलाश ने "दिनमान"के रघुवीर सहाय,"उत्तरार्द्ध"के सव्यसाची के उदाहरण देकर कहा है कि उन जैसे संपादक नवोदित लेखकों की भूल-चूक पर ध्यान देकर रचनाओं को परिमार्जित कराते थे।आज युग बदल गया है।मिशन नहीं, अब साहित्येतर लक्ष्य हावी हैं।हाशिया भूलें ठीक करने को ही छोड़ा जाता था।अब सिर्फ़ ईमेल का बटन दबता है।सामग्री जस की तस तत्काल इस्तेमाल हो जाती है।भाषा दुरुस्त करने की तकलीफ अब कोई नहीं उठाता।व्याकरणिक अनुशासन, शब्दकोशों को देखना अब बीते ज़माने की बात है।बहुत से संपादक सामंती मानसिकता के हैं।वे संवाद नहीं चाहते।पत्रिका से "व्यक्तित्व बनाने और चमकाने की कला"के अलावा उनका अन्य कोई उद्देश्य प्रायः नहीं रहता।पत्रिकाओं का सीमित प्रसार होने से साहित्यिक गुणवत्ता की कोई खास परवाह नहीं की जाती।पत्रिकाएँ टिकाऊ होने पर पुरस्कार देना शुरू करती हैं पर सहयोगी रचनाकारों को पत्रं-पुष्पं अर्पित नहीं करतीं।स्थानीय ठीक से हुए बिना ही अखिल भारतीय क्या वैश्विक होने का उतावलापन संपादकों में दिखलाई देता है।साहित्यिक लघुपत्रिकाओं के लिए स्थानीयता एक अनिवार्यता है।कुछ मामलों में तो वहाँ घनघोर क्षेत्रीयतावाद और जातिगत संकीर्णता के दुष्प्रभाव भी नज़र आते हैं।

आज के पाठक को गंभीर साहित्य से विमुख करने में पत्रकारिता उद्योग और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की भी बड़ी भूमिका है।वहाँ क्षुद्र राजनीति, फिल्मी गपशप,खेलों की सनसनी, फैशन,वास्तुशास्त्र वगैरह का बोलबाला है।इन्टरनेट गूगल ज्ञान के अंतिम प्रमाण हैं।पत्रिकाओं में स्थानीय रंगत की वैचारिक अनुशासन में निबद्ध छोटी रचनाओं के चयन की जरूरत है।बहुत गुरु गंभीर रचनाओं के लिए तो विश्वविद्यालयों के परिसरों की रचनात्मकता से शून्य तमाम पत्रिकाएँ हैं।संपादक को युगनिर्माता होने का भ्रम मन से निकाल कर नयी रचनाशीलता के लिये नवलेखन की नर्सरी तैयार करनी ही होगी।अन्यथा इस क्षेत्र से हट जाने में ही भाषा और साहित्य की भलाई है।

करीब चार दशक पहले बाबा नागार्जुन ने मुझसे कहा कि पत्रिकाएँ आकार प्रकार में सचमुच"लघु"होनी चाहिए।हजारीबाग से वे लौटे थे।उन्होंने एक संपादक से पत्रिका निकालने का उद्देश्य पूछा।सहज उत्तर मिला, "प्रशासन में कोर्ट-कचहरी में कुछ पहचान बन जाती है!"ऐसे"यश"के अलावा और भी पदोन्नतिमूलक-देशविदेश में पर्यटन-अमरत्व की लालसा आदि से प्रेरित होकर पत्रिकाओं के दस-बीस अंक निकाल दिये जाते हैं।सोशलमीडिया ने अनेक"शार्ट कट"साहित्यिक पत्रकारिता को सुलभ करा दिये हैं। फिर भी साहित्य-साधना के पुराने पारंपरिक रास्ते अभी बन्द नहीं हुए।उन रास्तों के झाड़-झंखाड़ साफ करते हुए लघु पत्रिकाओं का अर्थशास्त्र भी ठीक से समझना अनिवार्य है।-वाचस्पति.



रचनाकर्म को उत्कर्ष तक पहुंचाना सम्पादक का काम

 नए रचनाकारों को उत्कर्ष तक पहुंचना हमारा दायित्व

पलाश विश्वास


हमारे हिसाब से अप्रतिष्ठित, युवा और नए, ग्रामीण और वंचित तबकों,छात्रों,बच्चो और स्त्रियों की रचना को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन संपादकीय चुनौती यह होती है कि ऐसे रचनाकारों से निरन्तर संवाद के जरिए उनकी रचनात्मकता को दिशा और दृष्टि के साथ उत्कर्ष तक पहुंचाना होता है।


 कमजोर रचना से रचनाकार को नुक्सान सबसे ज्यादा होता है। उससे बेहतर और श्रेष्ठ लिखवाने का कार्य भार संपादक का होता है।


उत्तरार्द्ध के संपादक सव्यसाची और दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय ऐसे विरल संपादकों में थे। रचना लौटाने के साथ वे बार बार प्रासंगिक सामग्री को रचना बनाने तक रचनाकार से लगातार संवाद करते थे। हमने संपादन प्रभाष जोशी जी से नहीं,इनसे सीखा है।


देश के दूर दराज के इलाकों में इन दोनों ने हर तबके में रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की थी।


जनसत्ता संपादकीय में मंगलेश डबराल, हरिशंकर व्यास, जवाहर लाल कौल, बनवारी जी के अलावा बाकी साथी भी किसी न किसी रूप में दोनों से जुड़े हुए थे। प्रभाष जी ने इसी टीम का नेतृत्व किया। नतीजा अब इतिहास है।


कुछ संपादकों ने कस्बों और महानगरों में अपने लोग तैयार जरूर किए, आंदोलन भी चलाए, वाणिज्यिक दृष्टि से पत्रिका को सफल भी बनाया। लेकिन समता और न्याय के सिद्धांत से वे दूर थे। 


गिरोह की तरह काम करने वाले ऐसे नेटवर्क ने साहित्य में आभिजात्य, जाति और वर्ग वर्चस्व को मजबूत किया। जिससे अनेक रचनाकारों की भ्रूण हत्याएं भी होती रही।


अब अस्मिता और विमर्श केन्द्रित संपादन से साहित्य में बाड़ा बन्दी और इजारेदारी की हालत भी बनने लगी है। असहिष्णुता रचनात्मकता और सृजन पर भारी है।


हिंदी में राष्ट्रभाषा होने के दावे के बावजूद भाषा और बोलियों का लोकतंत्र अनुपस्थित है। 


कुलीन बौद्धिकता और निषेधात्मक रवैये के कारण, आलोचकों की जातीय पूर्वाग्रह और प्रकाशकों की मुनाफाखोर सरकारी खरीद निर्भर प्रकाशन के कारण साहित्य में आम जनता और सामान्य पाठकों की कोई भूमिका नहीं बन सकी।


संवाद का माहौल भी धीरे धीरे ख़तम होता चला गया।

आत्मलोचना से हम इस स्थिति को बदल सके तो हिंदी के जरिए देश की जनता के हक जकुक की लड़ाई इस तानाशाही के आलम में भी बुलंद हो सकती है।


इस पर सहमति असहमति के साथ व्यापक संवाद अनिवार्य है।


रघुवीर सहाय की दिनमान से विदाई के साथ हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में कारपोरेट युग की शुरुआत हो गई। प्रभाष जोशी, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव के अवसान के साथ लघु पत्रिका आंदोलन के बिखराव और विचलन से अब संपादक नामक प्रतिष्ठान ख़तम है। संपादक या तो बॉस है या फिर मैनेजर। इस युग में दलाल और बाजारू साहित्य और पत्रकारिता के मसीहा, माफिया आलोचकों का उत्थान भी हुआ।


इससे हिंदी, साहित्य और पत्रकारिता का चरित्र जनविरोधी बन गया है। यह सत्ता और तानाशाही में निष्णात है। इस पर क्या हम बात करने को तैयार हैं?


पलाश विश्वास

बसन्ती पुर

16.06.2021

विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम

 हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार काजी नज़रुल इस्लाम

- शैलेन्द्र चौहान

हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार और महत् आकांक्षी बांग्ला कवि-लेखक काजी नज़रुल इस्लाम

आधुनिक बांग्ला काव्य एवं संगीत के इतिहास में निस्संदेह एक युग प्रवर्तक थे। प्रथम महायुद्ध के उपरांत आधुनिक बांग्ला काव्य में रवीन्द्र काव्य को एकमात्र परिष्कृत विद्यत्व और चेतना की देन माना जाता है। रवींद्र काव्य मानवीयता, विश्वबंधुत्व का प्रणेता और सामाजिक विसंगतियों से उबरने की संभ्रांत चेतना का संवाहक है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के बाद 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में केवल काजी नज़रुल इस्लाम ही एक निर्भीक और सशक्त रचनाकार रहे हैं। ध्यातव्य है कि गुरुदेव के पश्चात साहित्य और संगीत की युगलबंदी में जिन प्रख्यात कवियों और साहित्यकारों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, उनमें काज़ी नज़रुल का नाम सर्वोपरि है। नजरुल ने लगभग 4,000 गीतों की रचना की तथा कई गानों को आवाज दी। जिन्हें 'नजरुल संगीत' या ‘नजरुल गीति’ नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि यद्यपि काजी नज़रुल इस्लाम को अंग्रेजी साहित्य का उतना प्रगाढ़ ज्ञान नहीं था, तथापि उनकी अंतश्चेतना इतनी विलक्षण थी कि अंग्रेजी का अल्पबोध होते हुए भी अंग्रेजी के कई पुराने कवियों की रचनाओं के बरक्स उनकी रचनाएं रखी जा सकती हैं। उनमें काव्य का एक नूतन सौष्ठव एवं स्वरूप झांकता है। विविध भाषाओं के इंद्रधनुषी आकाश में बांग्ला साहित्य का अवदान संभवत: सर्वाधिक वैशिष्ट्यपूर्ण और सुपठित है। यहां यह कहना उचित होगा कि भारतीय वाड्मय उस महासागर की तरह विस्तीर्ण और अथाह है जिसमें अनेक नाले-नदियां अपने अस्तित्व को भुलाकर एक साथ विलीन हो जाते हैं और एक नवीन रूप सृजित हो जाता है।

कहा जा सकता है कि नज़रुल के जीवनदर्शन और प्रतिभा से, 20वीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में साहित्य और संगीत के मेलजोल से एक नए इतिहास की रचना का मार्ग प्रशस्त हुआ। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश दोनों ही जगह उनकी कविता और गीतों की बृहत व्‍याप्ति है।

नजरुल का जन्म 24 मई, 1899 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में आसनसोल के निकट चुरुलिया गांव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा धार्मिक (मजहबी) शिक्षा के रूप में हुई। इनके पिता काजी फकीर अहमद मस्जिद में इमाम थे और मां जाहिदा खातून एक घरेलू महिला। दस वर्ष की अल्पवय में ही पिता का साया सर से उठ गया। तब नज़रुल ने उसी मस्जिद में म्युज़िन (अज़ान देने वाला) का कार्य संभाला। उन्होंने ग्रामीण नाट्य समूह 'लेटो' दल के साथ काम करते हुए कविता, नाटक और साहित्य के बारे में सीखा। 'लेटो' पश्चिम बंगाल का लोक गीत शैली है, जो आमतौर पर उस क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है (उस क्षेत्र का लोक उत्सव है)। तदनंतर किशोरावस्था में विभिन्न थिएटर समूहों के साथ काम करते-करते उन्होंने कविता, नाटक एवं साहित्य का अध्ययन किया।

उनके चाचा फजले करीम एक संगीत मंडली (नाटक कंपनी) के साथ थे। वह मंडली पूरे बंगाल में घूमती और शो करती थी। नज़रुल ने मंडली के लिए गाने लिखे। इस दौरान नज़रुल ने बांग्ला भाषा को लिखना सीखा। 1910 में उन्होंने नाटक कंपनी छोड़ दी और सिअरसोल राज हाई स्कूल, रानीगंज, आसनसोल में प्रवेश ले लिया। वहां जुगांतर से संबद्ध शिक्षक निबारनचंद्र घटक के प्रभाव में आए। इसके बाद वह माथरुन हाई इंगलिश स्कूल में प्रविष्ट हुए। यहां विद्वान कवि कुमुदरंजन मलिक के संपर्क में आए। यहाां उनकी साहित्यिक रुचि विकसित हुई। लेकिन पारिवारिक कारणों से वह आगे पढ़ाई जारी नहीं रख पाए। और वह लोक कलाकारों के एक समूह 'कावियाल्स' से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने 1914 में दरियापुर स्कूल में प्रवेश ले लिया। जहां संस्कृत, बांग्ला, फारसी और अरबी भाषा सीखी। जिसके बाद कभी बांग्ला, तो कभी संस्कृत में पुराण पढ़ने लगे। आगे इसका असर उनके लेखन में भी नजर आने लगा। उन्होंने पौराणिक कथाओं पर आधारित ‘शकुनी का वध’, ‘युधिष्ठिर का गीत’, ‘दाता कर्ण’ जैसी नाटक लिखे। काली, शिव और कृष्ण पर भजन भी लिखे। मुझे लगता है कबीर के अलावा नज़ीर अकबराबादी के बाद हिंदू मिथकों और प्रतीकों पर साहित्य रचना करने वाले वह संभवतः अकेले आधुनिक और बड़े कवि हैं। सूफी परंपरा का प्रभाव भी उनपर अवश्य था। खुसरो, रूमी, फिरदौसी को भी उन्होंने पढ़ा था। 

नज़रुल 1917 में ब्रिटिश-इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। उनकी तैनाती कराची छावनी में हुई। यहां वह कराची के स्थानीय कवियों के संपर्क में आए और पठन-पाठन पर अधिक समय दे सके। इसी समय बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित हुए और साम्यवादी विचारों प्रति आकर्षित हुए। 1919 में उनकी एक कविता पुस्तक 'मुक्ति' और एक गद्य की पुस्तक 'बौंदुलेर आत्मकहिनी' प्रकाशित हुई। सेना में रहकर अंग्रेजों के औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी चरित्र को उन्होंने समझा और 1920 में सेना से त्यागपत्र दे दिया। बंगाल वापस लौटकर वह बंगाली मुस्लिम लिटरेरी सोसाइटी से जुड़ गए। इसी वर्ष उनका उपन्यास 'बंधनहारा' (बंधन-मुक्ति) आया। 12 अगस्त 1922 को उन्होंने अपनी पत्रिका 'धूमकेतु' प्रकाशित की जिसमें स्वतंत्रता के पक्ष में क्रांतिकारी साहित्य छपता था। तभी उनकी सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण कविता 'बिद्रोही' बिजली नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। तभी आनंद का आगमन कविता के प्रकाशन के बाद ब्रिटिश शासन ने उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया।

विद्रोही कविता की कुछ पंक्तियां देखें -


मैं महाविद्रोही अक्लांत

उस दिन होऊंगा शांत

जब उत्पीड़ितों का क्रंदन शोक

आकाश वायु में नहीं गूंजेगा

जब अत्याचारी का खड्ग

निरीह के रक्त से नहीं रंजेगा

मैं विद्रोही रणक्लांत

मैं उस दिन होऊंगा शांत

पर तब तक

मैं विद्रोही दृढ बन

भगवान के वक्ष को भी

लातों से देता रहूंगा दस्तक

तब तक

मैं विद्रोही वीर

पी कर जगत का विष

बन कर विजय ध्वजा

विश्व रणभूमि के बीचों-बीच

खड़ा रहूंगा अकेला

चिर उन्नत शीश

मैं विद्रोही वीर..


इसके पश्चात नज़रुल 'बिद्रोही कोबी' के नाम से पहचाने जाने लगे। कविता ‘विद्रोही’ काफी लोकप्रिय हुई, जिसने उन्हें पर्याप्त प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि दी। कविता में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बागी तेवर थे। इस कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। अतः ब्रिटिश हुकूमत की आंखों में वह हमेशा ही गड़ते रहे। 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में बंगाल में केवल वही एक सशक्त एवं निर्भीक कवि थे। अतः 23 जनवरी 1923 को उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। इसी वर्ष अप्रैल में जेल सुपरिंटेंडेंट के अभद्र व्यवहार और अशालीन भाषा के प्रतिरोध में उन्होंने 40 दिनों का उपवास किया। गांधी का प्रभाव रहा होगा। उसी वर्ष

दिसंबर में वे जेल से बाहर आ गए। 1924 में उनकी एक और पुस्तक 'बिषेर वंशी' प्रकाशित हुई। यह पुस्तक भी अंग्रेजी सरकार ने प्रतिबंधित कर दी। इसके बाद उन्होंने 'श्रमिक प्रजा स्वराज दल' नाम से एक समाजवादी राजनीतिक पार्टी बनाई और साम्राज्यवादी- दमनकारी अंग्रेजी सत्ता के विरोध में वे चेतना फैलाने का काम सक्रिय रूप से करने लगे। 25 अप्रैल 1925 को काजी नज़रुल इस्लाम ने एक हिंदू लड़की प्रमिला देवी से शादी कर ली, जिसका काफी विरोध हुआ था। प्रमिला ब्रह्म समाज से आती थीं। मुस्लिम मजहब के ठेकेदारों ने नज़रुल से कहा कि प्रमिला को धर्मपरिवर्तन करना होगा लेकिन नज़रुल ने एकदम मना कर दिया। इसी समय उन्होंने लांगल नाम से एक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित किया। 1926 में वे परिवार सहित कृष्णानगर में रहने लगे। 1927 में उनका बांग्ला गजलों का प्रथम संग्रह आया। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अनेक मौलिक एवं अनूदित साहित्यिक रचनाओं जैसे-उपन्यास, लघुकथा, नाटक, निबंध, अनुवाद और पत्रकारिता आदि का सृजन किया। उन्होंने बाल साहित्य भी लिखा। वे कुशल गायक व अभिनेता भी रहे। बांग्ला फिल्‍म 'ध्रुव भक्त के डायरेक्टर और रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'गोरा' पर आधारित फिल्‍म के संगीत निर्देशक भी बने। 1928 में वे संगीत की सुप्रसिद्ध कंपनी एचएमवी के साथ जुड़ गए। उसके बाद उनके गीत राष्ट्रीय रेडियो पर प्रसारित होने लगे। 1930 में उनकी पुस्तक 'प्रलय शिक्षा' आई। पुनः उनपर देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ और किताब प्रतिबंधित कर दी गई। गांधी-इर्विन समझौते के बाद रिहा हुए। तीन वर्ष बाद 1933 में उनका एक निबंध संग्रह 'मॉडर्न वर्ल्ड लिटरेचर' भी आया।

1939 में वह कलकत्ता रेडियो में आ गए। तभी उनकी पत्नी प्रमिला देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। पैरालिसिस का अटैक पड़ा। उन उनके इलाज के लिए नज़रुल ने अपनी किताबों के कॉपीराइट तक बेच दिए। उधारी बढ़ गई। वे गंभीर आर्थिक संकट में आ गए जिससे वह कभी उबर नहीं सके। गरीबी पर लिखी उनकी एक कविता में उनकी यह बेबसी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उसकी कुछ पंक्तियां हैं -

गरीबी सर्वाधिक असह्य वस्तु है

जो घर में मुझसे, मेरी पत्नी और बच्चों से

रोज मिलती है।

इन परिस्थितियों के चलते 1940 में वे गहन अवसाद से ग्रस्त हो गए। दो वर्ष बाद उनकी स्थित और गंभीर हो गई। दुर्योग से 1942 में 43 वर्ष की आयु में वह अपनी आवाज़ और याददाश्त खोते हुए एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित होने लगे। यह देखकर 1950 में उनके प्रशंसकों और समर्थकों के एक समूह ने उन्हें योरोप भिजवाने की व्यवस्था की। वह पत्नी सहित लंदन और फिर आस्ट्रिया गए। वहां वियना में डॉ हेंस हॉफ के साथ एक मेडिकल टीम ने उनमें 'पिक्स डिसीज नामक' बीमारी का पता लगाया। यह एक दुर्लभ और लाइलाज न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी थी। जिसमें याददाश्त खोने के साथ-साथ बोलने पर भी प्रभाव पड़ता है और बोलने की शक्ति चली जाती है। 15 अगस्त 1953 को वह वापस कलकत्ता लौट आए। नज़रुल के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आती जा रही थी। बीमारी के कारण वे अलग-थलग पड़ गए और अलगाव में रहने के लिए विवश हो गए। उनकी ऐसी मानसिक हालत के कारण उन्हें रांची (झारखंड ) मनोरोग अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। कई वर्षों तक वहऻ रहे लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उनका जीवन बहुत कष्टप्रद रहा। उनकी पत्नी उनकी देखभाल करती रहीं। 1962 में प्रमिला देवी की मृत्यु हो गई। यह

बहुुुत पीड़ादायक था। अगले दस वर्ष इसी दुख और पीड़ा में बीते। लेकिन इन सब परेशानियों बावजूद यह तो स्पष्ट है कि उनका इतिहास गौरवशाली था। समाज में चेतना प्रसार और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उनका अवदान चिरस्मरणीय रहेगा। साहित्य में तो वह अग्रणी पंक्ति में थे ही।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नज़रुल की राष्ट्रवादी सक्रियता और क्रांतिकारी साहित्य सृजन ही औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उनके लगातार कारावास का कारण बने। जेल में रहते हुए ही नज़रुल ने "राजबन्दीर जबनबन्दी" ("राधारमण", 'एक राजनीतिक कैदी का बयान') लिखा था। दृष्टव्य है, उनके लेखन ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान वहां के मुक्ति संघर्ष को प्रेरित किया। नज़रुल ने अपने लेखन में स्वतंत्रता, मानवता, प्रेम, और क्रांति जैसे विषयों को मुख्य आधार बनाया। उन्होंने कट्टरता और रूढ़ियों का विरोध किया। नज़रुल जीवनपर्यन्त राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के मजबूत आधार-स्तंभ बने रहे। साम्यवाद में उनकी अटूट आस्था थी लेकिन उन्हें अहसास था कि धर्मभीरु जन इस रोग से मुक्त होने में असमर्थ हैं। इसलिए धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध और सौहार्द एवं सद्भाव के पक्ष में वह सृजनशील भी रहे और सक्रिय भी रहे।

उनकी कविता 'साम्यवादी' की पंक्तियां हैं -

गाता हूं साम्यता का गान

जहां आकर एक हो गए

सब बाधा व्यवधान

जहां मिल रहे हैं हिंदू-बौद्ध-मुस्लिम-ईसाई

गाता हूं साम्यता का गान...

द्वितीय महायुद्ध के उपरांत नज़रुल के साहित्य का बृहत् पठन-पाठन आरंभ हुआ। तब तक वह बीमारी के गिरफ्त में आ चुके थे। नज़रुल के साहित्य को पढ़ने के बाद यह अंदाजा लगाना मुश्‍किल नहीं है कि काव्य में मुक्ति, विद्रोह, लैंगिक समानता, सांप्रदायिक सौहार्द और प्रेम आपस में पूरी तरह गुंथे हुए हैं। इसके लिए वे धार्मिक प्रतीकों, मिथकों और मान्यताओं को अपने ढंग से अपनाते हैं। स्त्री समानता पर वह न केेेेवल वैचारिक प्रतिबद्धता और व्यवहारगत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं अपितु

कविता इस तरह लिखते हैं, कि कृष्ण को चुनौती देते हुए कहते हैं कि 'अगर तुम राधा होते' तो वह महसूस करते जो एक स्त्री राधा के रूप में महसूस करती है। उनकी एक कविता से -

अगर तुम राधा होते श्याम


मेरी तरह बस आठों पहर तुम,

रटते श्याम का नाम

वन-फूल की माला निराली

वन जाति नागन काली


कृष्ण, प्रेम की भीख मांगने

आते लाख जनम

तुम, आते इस बृजधाम


उन्होंने बंगाली भाषा में ग़ज़ल को भी समृद्ध किया। एक पुस्तक भी आई। उन्हें अपने कार्यों में अरबी और फारसी शब्दों के व्यापक उपयोग के लिए भी जाना जाता है। इसपर गुरुदेव को भारी आपत्ति भी रही। 'रक्तो' की जगह ॱखून' का प्रयोग उन्हें बहुत नागवार गुजरा। यह विडंबना रही कि

नज़रुल इस्लाम के साहित्य और संगीत के संदर्भ में तत्त्वमूलक और तथ्यपूर्ण विस्तृत मूल्यांकन नहीं हो सका इस क्षेत्र में बहुत थोड़े-से आलोचकों ने ध्यान दिया। यह खेद का विषय है कि उनकी समस्त आलोचनाएं प्राय: एकांगी रहीं। वे युक्तिसंगत नहीं थीं। उनके अत्यंत निकटस्थ मित्रों ने उनके बारे में कुछ समीक्षाएं अवश्य छपवाई। बीच-बीच में ऐसे कुछ मोड़ आए जहां उनका काव्य और संगीत अपने प्रकृत स्वरूप को खो बैठा। लयह उन्होंने जानबूझकर भी किया। दरअसल कंटेंट उनके लिए महत्वपूर्ण था फॉर्म गौण। इस सबके बावजूद नज़रुल बांग्ला भाषा के अन्यतम श्रेष्ठ सामाजिक चेतना के कवि रहे। नज़रुल की संपूर्ण रचनाओं का कहीं भी कोई ब्योरा तिथिवार नहीं मिलता। लेकिन यदि किसी को नज़रुल की संपूर्ण रचनाओं का विधिवत अध्ययन करना हो तो उसे पश्चिमी बंगाल में स्थित बालीगंज के पुस्तकालय को अवश्य देखना चाहिए। इसी पुस्तकालय में उनकी संपूर्ण रचनाएं संभालकर रखी हुई हैं। हिंदी में उनपर बहुत कम लिखा गया। उनकी मृत्यु के उपरांत 1976 में कवि विष्णुचंद्र शर्मा की उनके जीवन पर एक किताब 'अग्निसेतु' नाम से आई। एक जन गीतकार एवं सुर-साधक के रूप में भी नज़रुल सर्वोच्च स्थान के अधिकारी हैं। 1972 में बांग्लादेश सरकार के निमंत्रण पर नज़रुल का परिवार उन्हें ढाका, बांग्लादेश ले गया। वहां ससम्मान उन्हें पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश की नागरिकता प्रदान की गई। उन्हें बांग्लादेश ने ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया। चार साल बाद 29 अगस्त 1976 को बांग्लादेश में उनकी मृत्यु हो गई। वहां उनकी इच्छानुसार उन्हें ढाका विश्वविद्यालय के सामने दफनाया गया।

संपर्क :34/242, सेक्‍टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033

मो.7838897877


बहुत तथ्यात्मक आलेख


Palash Biswas: मेरी नज़र में कोई तथ्यात्मक गलती नहीं है। बंगाल के साहित्यिक मित्रों को भेजता हूँ। बंगला में भी उनके समग्र व्यक्तित्व और रचना संसार पर इस तरह ववचन नही हुआ। नोबेल मिलने से रवींद्र नाथ को कवि न मानने वाले बांग्ला साहित्य जगत रवीन्द्र के जनपक्षधर रचनासन्सार के बजाय उनके गीतों,नृत्य नाटिकाओं और गीतांजलि तक ही रवींद्र विमर्श को सीमाबद्ध रखता आया है। 

रवीन्द्र और नज़रुल को उनके गीतों के जरिये बांग्लादेश और बंगाल की स्त्रियों ने ज़िंदा रखा है। दोनों स्त्री स्वतंत्रता के प्रखर प्रवक्ता रहे हैं।

नज़रुल की लोक में रवींद्र के मुकाबले ज्यादा पैठ थी।क्योंकि बंगला लोकसंगीत को प्राण फूंकने वाले अब्बसुद्दीन और बांग्ला के लोक में रचे बसे जसीमुद्दीन के साथ उनकी तिकड़ी थी,जिन्होंने लोक गीतों और लोकधुनों को खोजने में पूरे बंगाल की खाक छानी। बाद में शचीन देव बर्मन,पंकज मित्र,सलिल चौधरी ,ऋत्विक घटक ने सिनेमा और इप्टा ने रंगमंच के जरिये उसे सर्व भारतीय बना दिया।

अब भी बंगाली भद्रलोक काज़ी नज़रुल को कोलाहल का कवि मानते हैं।

इस आलेख का बंगला अनुवाद जरूर होना चाहिए।

पलाश विश्वास

Thursday, June 10, 2021

उनका नाम तुलसी नहीं था,लेकिन वे तुलसी बनकर जीती रही और उसी तुलसी का महाप्रस्थान

 तुलसी चाची का महाप्रयाण

पलाश विश्वास

उनका नाम तुलसी नहीं था।


भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से सरहद पार करते हुए और शरणार्थी शिविरों में महामारी फैलते रहने से लाखों परिवार कट फट कर आधे अधूरे रह गए थे। लाखों बच्चे मनाथ हो गए थे।


बसंतीपुर में भी बहुत से परिवार आधे अधूरे आये। बाप बेटा, चाचा भतीजा, मौसी मौसा और भांजा,इस तरह के परिवार ने बसंतीपुर आकर नए सिरे से खुद को जोड़ा।


 अनेक परिवारों में स्त्रियां नहीं थीं। जो स्त्रियां आईं,उनका मायका उस पार या इस पार कहीं और छूट गया या जनसंख्या स्थानांतरण की त्रासदी में हमेशा के लिए खो गया। इन स्त्रियों ने गांव में ही किसी को पिता,किसीको भाई बनाकर नए रिश्ते बना लिए। 


बच्चों ने भी दूसरी औरत को अपनी मां और उनके बच्चों को अपना भाई मानकर जीना सीखा।


अतुल मिस्त्री और उनके भाई अनाथ किशोर थे। वे हमारे परिवार के साथ आये। उनके माता पिता अभिभावक नहीं थे।वे हमारे ही परिवार में शामिल हो गए। लेकिन अलग परिवार न होने से उनको जमीन अलॉट नहीं हो सकती थी।


 तब बसंतीपुर एक साझा परिवार था। बल्कि यह कहें कि दिनेशपुर की सभी 36 बंगाली कालोनियों के लोग एक विशाल संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे।


विवाहयोग्य युवकों की गांव में आस पास विवाह कराकर आधे अधूरे परिवार में एक स्त्री को दाखिल कराकर उनको जमीन अलॉट करवाई गई।


बसंतीपुर के मातबरों पुलिन बाबू, maandaar मण्डल, शिशुवर मण्डल, वरदाकान्त मण्डल,हरि ढाली, अतुल शील और रामेश्वर ढाली ने जुगत लगाई और विवाह से पहले ही अतुल काका को विवाहित दिखाकर उन्हें और अवनी काका को जमीन दिला दी गई।


 अतुल काका की पत्नी का नाम कागजात में तुलसी लिख डियां गया।


फिर सबने मिलकर उनके लिए दुल्हन खोज निकाला,जो पड़ोसी गांव हरिदासपुर की थी। उनका असली नाम क्या था,किसीको नहीं मालूम। 


वे तुलसी बनकर बसंतीपुर आयी और तुलसी के रूप में ही कल उनका महाप्रयाण हो गया।


 वे अरसे से अस्वस्थ थीं। छोटे से कद की काकी बिल्कुल अकेली हो गयी थी। कैसे वे अबतक जीती रहीं,यही चमत्कार है।


महीने भर पहले उनकी देवरानी अवनी काका की पत्नी का देहांत हो गया था। अतुल काका भी बहुत पहले दिवंगत हो गए। रंगकर्मी और अध्यापक अवनी काका का गेठिया टीबी अस्पताल में उनसे भी पहले निधन हो गया था। 


अतुल काका और तुलसी काका की बड़ी बेटी विवाह के बाद दिवंगत हो गयी।तो दो बेटों का भी विवाह के बाद निधन हो गया।


तुलसी काकी ने जीवन भर इतने दुख झेले कि उनके शरीर में कुछ बचा ही न था। 


चिता पर उठाने के एक घण्टा पैंतालीस मिनट के अंदर ही वे पंचतत्व में विलीन हो गयी।


 रंगकर्मी, अध्यापक अवनी काका और छोटी काकी की कथा फिर कभी।


तुलसी काकी और अतुल काका

शरत चन्द्र की नायिका से कम नही थी हमारी सावित्री भाभी

 सावित्री भाभी की त्रासदी और  लॉक डाउन और कोरोना कर्फ्यू में ज़िंदगी और मौत


पलाश विश्वास


आज बसंतीपुर में शोक का समय है।

हमारी सावित्री भाभी करीब आठ महीने तक मरणासन्न रहने के बाद कल रात 3 बजे के करीब चल बसी। वे 70 साल के करीब थी।


पति हाजू साना की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी। एकमात्र बेटा जगदीश शायद लिवर सिरोयसिस से जवानी में ही चल बसा।दो बेटियां हैं। जगदीश के दो बेटे पंकज और सूरज उनकी देखभाल करते रहे हैं।



आठ महीने पहले हल्द्वानी अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हल्द्वानी से मतकोटा काली नगर के रास्ते बसंतीपुर आते हुए गड्ढों में गाड़ी उछलते रहने से वे रास्ते में जिंदा  हो गयी। 


गांव में तब मौत की खबर फैल गयी थी। लेकिन सावित्री भाभी घर ज़िंदा लौटी।


उससे महज तीन दिन पहले उन्हें दिनेशपुर निकलते वक्त सड़क साफ करते देखा था। 


अजब गजब जीवट की थी सावित्री भाभी। शरत चन्द्र की किसी नायिका से कम कष्ट और शोक उन्होंने नहीं झेले। कम संघर्ष नही किया। वे सारी बातें याद आ रही हैं।


पहले पहल फिर अस्पताल में भर्ती करने की कोशिश हुई। कोई अस्पताल तैयार नही हुआ। वे होश में थी। दिनेशपुर से झोलाछाप डॉक्टर बुलाकर, ग्लूकोज चढ़ाकर उन्हें ठीक करने की कोशिशें की जाती रहीं। वे कभी होश में होती कभी नहीं। खाना पीना थोड़ा बहुत शुरू जरूर हुआ, लेकिन बिस्तर से उठ नहीं सकी।


आज सुबह साढ़े छह बजे उनका पोता पंकज ने दरवाजा खटखटाया और घर में गांववालों को बुलाने की बात कही। मेरी नींद नहीं खुली थी। जागते जागते वह निकल गया था।


साबिता जी बोली, कोरोना समय में क्यों गांव के लोगों को बुला रहा है पंकज?


मेरी नींद उड़नछू हो गई। में तुरन्त समझ गया। उनके घर गया तो अंत्येष्टि की तैयारी हो रही थी।


गांव के लोग सामाजिक दूरी बनाते हुए जमा थे।


सामने राशन की दुकान पर बीपीएल कार्ड वालों को पहलीबार पांच पांच किलो अनाज बांटा जा रहा था। छोटे छोटे घेरे में लोग खड़े थे।


उनका मायका करीब 60 किमी दूर शक्ति फार्म के रत्न फार्म नम्बर एक में है। फोन कर दिया था। लेकिन जाहिर है कि वे आ नहीं सकते। आस पड़ोस के गांव से पंकज और सूरज की छोटी बहन आयी। अकेली।


मैंने पूछा, तुम्हारा वर कहाँ है?

वह बोली, महाराष्ट्र में लोकडौन में फंसा है।

महाराष्ट्र में कहाँ?

चंद्रपुर के आसपास।

मैंने कहा, चिंता मत करो। वहां हालात ठीक होंगे।

वह बोली, नागपुर में कोरोना के मरीज हैं।


अंदर सावित्री भाभी की छोटी बेटी रो रही थी।

मैंने पूछा, बड़ी कहाँ है?

जवाब मिला, कर्नाटक में फंसी है लॉक डाउन में।


सावित्री भाभी के पति हाजू साना अपने मौसा बिपिन सरदार और मौसी हजारी के साथ बसंतीपुर आये थे। मौसेरे भाई नाबालिग थे। हाजू दा ही खेती करते थे।


बसंतीपुर में ऐसे परिवार काफी थे, जिनमे जोड़ तोड़ कर परिवार बना था। कोई चाचा के साथ, कोई मौसा के साथ, कोई सिर्फ दो भाई। बाकी लोग विभाजन में उस पार छूट गये। ज्यादातर महिलाओं का मायका पीछे छूट गया।


 मेरी ताई और मेरी मां के साथ भी ऐसा हुआ। धर्म भाई, धर्म पिता कहकर ऐसी महिलाओं ने तराई के गांवों में अपना नया मायका बना लिया था।


 दिलों की मरम्मत करने का वह लहूलुहान वक्त था। अपनों से बिछुड़कर परायों को अपना बनाकर फिर ज़िंदगी शुरू करने का वक्त था।


 इसलिए बसंतीपुर में अलग अलग जिलों से आये अलग अलग जातियों के लोग एक साझा परिवार में बदल गए।

इसी लिहाज से हाजू साना मेरे बड़े भाई थे। कार्तिक साना मेरे चाचा हैं। विधु अधिकारी बड़े भाई और दिवंगत महेंद्र मण्डल मेरे मामा।


सावित्री भाभी का विबाह बसंतीपुर में ही हुआ। मुझे उनकी शादी याद नही है।


तब गांव और पूरी तराई में जहां तहां सांप पाए जाते थे। जहरीले सांप। हर साल अनेक लोग सर्पदंश के शिकार होते थे। मन्तर पढ़कर जड़ी बुटी से सांप कटे का इलाज करते थे हाजू दा।


बसंतीपुर की जात्रा पार्टी की बड़ी धूम थी। हाजू दा अनोखे कलाकार थे। रुद्रपुर हल्द्वानी के कार्यक्रमों में भी वे  जाया करते। हंसमुख और हमेशा सबकी मदद करने वाले। पीने की लत लगी और इसीमें जान चली गयी।एकमात्र बेटा भी बाप की तरह मरा।


हाजू दा पता नहीं किससे प्रेम करते थे।

सावित्री भाभी सुंदर थी, लेकिन उन्हें पसंद नहीं थीं।


तीसरी चौथी कक्षा में यह बात समझ में आ गयी। तभी से भाभी अपना दुख मुझसे बांटती थी। नैनीताल पढ़ते हुए यह सिलसिला जारी रहा।


फिर मैं पत्रकारिता में ऐसे खप्प गया कि मुझे पता नही चला कि भाभी किससे अपना दुख बांटती थी। इस बीच हाजू दा और उनके बेटे की मौत हो गयी। उनके मौसा और मौसी भी नही रही। मौसेरे भाई बड़े हो गए। सबसे छोटे मौसेरे भाई से मेरी तहैरी बहन रेखा का विबाह हो गया।


में घर लौट आया 40 साल बाद तो देखा, जगदीश के दोनों बेटे पंकज और सूरज भाभी का बहुत खयाल रखते हैं। पहलीबार सावित्री भाभी को ज़िंदगी में खुश देख रहा था।


उनकी खुशी लम्बी नहों  चली।

 वह बिस्तर पर पड़ गयी। 

अब उन्हें बिस्तर से राहत मिली।


कोरोना कर्फ्यू में बसन्तीपुर में यह पहली मौत है।


मुझे इतनी राहत है कि बाकी देश की तरह सावित्री भाभी की अंत्येष्टि में कोई दिक्कत न हुईं।


लॉक डाउन की वजह से रिश्तेदार नहीं आ सके। लेकिन गांव के रिश्ते अभी सही सलामत है। लॉक डाउन तोड़ नही रहे हैं। सामाजिक दूरी भी बनाये रखते हैं। फिरभी सभी अब भी सुख दुख में साथ साथ हैं।


मनुष्यता और सभ्यता इन्ही गांवों में बसी है।


आत्मीयता और रिश्ते भी, परिवार और समाज भी गांव में बचे हुए हैं, जिनपर मुक्त बाजार और पूंजीवाद को कोई असर नही हैं।


मुझे खूब महसूस हो रहा है कि महानगरों और बड़े शहरों के मुक्त बाजार से करोड़ो की तादाद में जो लोग गांव पैदल भी पहुंचना चाहते हैं, वे रोजी रोटी के लिए नहीं, इन्ही रिश्तों, इन्हीं परिवारों और इसी शुद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के  लिए सब कुछ दांव पर लगाकर घर आना चाहते हैं।


कोरोना को हारना ही होगा।

मुक्तबाजार और पूंजीवाद का ग्लोबल तिलिस्म भी न्यूयार्क से लेकर भारत के गांवों में भी टूटने लगा है।

बसंतीपुर

2020

Tuesday, June 8, 2021

हमारे पुरखों के स्मारक

 हमारे पुरखों के स्मारक

पलाश विश्वास

दिनेशपुर के बंगाली गांवों में 1952 से 1956 तक कुल एक हजार रुपये की लागत से बिना सीमेंट के एक कमरे का यह क्वार्टर प्रति परिवार बनाकर दिया गया था। क्वॉर्टर और एक जोड़ा हलवाहा बैल के बाबत प्रति परिवार 1200 रुपये का लोन चढ़ाया गया था। जो बहुत बड़ी रकम थी उसवक्त। करीब एक दशक तक दिल्ली लखनऊ की दौड़ के बाद पिताजी पुलिनबाबू ने यह कर्ज माफ करवा लिया था।


अब गांवों में ऐसे क्वॉर्टर बहुत कम बचे हैं।60 के दशक तक ये गांव जंगल से घिरे थे। 


पचास के दशक में बाघ,चीते भी जहां तहां  घूमते नज़र आते थे। उन जंगली जानवरों से बचने और तराई में अक्सर आने वाली आंधियों के मुकाबले ये एक कमरे के क्वार्टर किसी किले से कम नहीं था।जिसमें बड़े बड़े परिवार समा जाते थे।


 जहरीले सांपों से बचने के लिए भी ये क्वार्टर बड़े काम के थे। इसी क्वार्टर को घेरकर मिट्टी और सन की झोपडियां हुआ करती थी।


मेरे घर में 2006 तक माताजी,पिताजी, ताईजी,ताऊजी,चाचाजी,चाचीजी के निधन हो जाने के बाद तक यह क्वार्टर था। एक अदद क्वार्टर और उसे घेरे झोपड़ियां।


मेरा और मेरे भाई बहनों का जन्म इसी  तरह के एक कमरे के क्वार्टर में हुआ था,जिसके बरामदे में चिमनी बनी हुई थी। जहां रसोई हुआ करती थी।जो


बिजली आई 1969 में। लैंप पोस्ट लगे थे। घरों में बिजली नहीं थी। लू से बचने के लिए आम और नीम के पेड़ हुआ करते थे। गर्मी की रातें क्वार्टर की छत पर बीतती थी और छत पर ही केले का पेड़ लगाकर दिवाली के दिये जलाए जाते थे।


यह मेरे दोस्त टेक्का उर्फ नित्यानन्द मण्डल का है। अब भी जवान सदाबहार टेक्का की दादी ललिता देवी का राजपाट यहीं से चलता था। 


इसी क्वार्टर से ललिता जी यानी टेक्का कीं दादी का बक्सा तोड़कर उनका खजना लूटकर हाईस्कूल पास करने से पहले हमारा हीरो टेक्का बम्बई भाग गया था हीरो बनने। बंबई के रास्ते आगरा में ठहर कर टीवी ठीक करने का काम सीखकर आया।सिनेमा का भूत उतर गया।लेकिन हाईस्कूल पास करने के बाद पढ़ाई अधूरी छोड़ दी।


ललिता जी बहुत दबंग थी।इतनी दबंग की अपने बेटों टेक्का के पिता भोला नाथ और   नरेन्द्र नाथ के साथ गांव के मुखिया मंदार मण्डल की भी पिटाई कर देती थी। कार्तिक    काका अपने चाचा निबारन साना और दीदी मांदरी के साथ आये थे।


 शुरुआत में कार्तिक काका की शादी तक ललिता जी उनके साथ थी। उनकी भी पिटाई हो जाती थी। हम किस खेत की मूली थे? 


नहाने के वक्त गांव के सभी बच्चों को तेल लगाकर नहलाना और खाने के वक्त पकड़कर खिलाना भी ललिताजी की दिनचर्या थी। वे गांववालों के साथ मछली मारने में भी अगुआई करती थी।


हर क्वार्टर की अलग कथा है। ये क्वार्टर सही मायने में हमारे पुरखों के स्मारक हैं।