Saturday, August 7, 2021

हमारा जो हुआ,सो हुआ,जनसत्ता और पत्रकारिता का क्या हुआ?

 आज फिर कोलकाता से गुरुजी जयनारायण का फोन आया। कोलकाता जनसत्ता में सिर्फ मार्केटिंग विभाग है। दो इंजीनियर हैं। बिल्डिंग है,सम्पादकीय नहीं है।प्रेस लखनऊ चला गया।दिल्ली से पीडीएफ आता है।


कोलकाता महानगर ने हिंदी,बांग्ला,ओड़िया, उर्दू, गुरमुखी और उर्दू,किसी भी भाषा के अखबार में किसी की स्थायी नौकरी नहीं है।सभी पत्रकार संविदा पर है।


योग्य,प्रशिक्षित और पढ़े लिखे पत्रकारों में कोलकाता में दिहाड़ी मजदूरी तो क्या बीस रुपये का भी काम नहीं है।


जिंदगीभर किसी और पेशा या नौकरी की कोशिश न करके 5 दशक पत्रकारिता को मिशन मानकर सबकुछ दांव पर लगाकर सबकुछ हारने के बावजूद अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं रहा।


मीडिया में बचे हुए साथियों की इस दुर्गति और आदरणीय प्रभाष जोशी के अखबार जनसत्ता की इस दशा पर बहुत दुखी हूं।


ओम थानवी ने हमारी कभी सुनी नहीं। लेकिन उनके जमाने में भी यह हाल नहीं हुआ।


जाति, वर्ण और नस्ल देखकर सम्पादक चुनने की परंपरा ने जनसत्ता जैसी संस्था, नई दुनिया जैसे अखबार और पूरी हिंदी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर दिया।





कोलकाता में जिस तरीके से मुझे मेरी औकात में रखने की तिकड़में भिड़ाई गई और हार न मानते हुए प्रभाष जी से और बाकी सम्पादकों और मैनेजरों से लड़ते भिड़ते हुए हम जनपक्षधर पत्रकारिता का विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे, उसकी कथा कम रोमांचक और कम दुःखद नहीं है। हमने कभी किसीको बख्शा भी नहीं है।


इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली हो या हंस का पन्ना या कोलकाता,हम पिछले बीस साल से हिंदी समाज से अपनी गौरवशाली विरासत सहेजने की अपील करते रहे हैं। बांग्ला समाज से तो हम बहिस्कृत थे ही। वहां का कूलित वर्चस्व तो निरंकुश है ही।


बदलाव की उम्मीद तो फिर भी गाय पट्टी से ही थी क्योंकि यहां सामाजिक ताकतें और लोक अभी ज़िंदा है।बस,यही पूंजी है,जिसके भरोसे न सिर्फ ज़िंदा हूँ, हाशिये पर होबे के बावजूद सक्रिया हूँ।


पत्रकारिता के मिशन और साहित्य का क्या हुआ,कहने की जरूरत नहीं है,लेकिन हमारा मिशन जारी है

ओलंपिक सोना और जयपाल सिंह मुंडा।पलाश विश्वास

 ओलंपिक सोना और जयपाल सिंह मुंडा

पलाश विश्वास

जयपाल सिंह मुंडा 1928 men ओलंपिक का पहला स्वर्ण जीतने वाली भारतीय टीम के कप्तान थे। वे ics भी थे और संविधान सभा के एकमात्र मुखर आदिवासी सदस्य भी।


उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का अभीतक सही मूल्यांकन नहीं हुआ।जसिंता,यह काम भी हमें ही करना है।कोई दूसरा हमारा मूल्यांकन कभी नहीं करेगा।हमें उनके मूल्यांकन का मोहताज भी नहीं होना चाहिए।


निजी तौर पर जाति वर्ण नस्ल वर्चस्व के मातबरों से में जीवन के किसी भी क्षेत्र में न्याय की उम्मीद नहीं करता।


छल प्रपंच और दमन से बहुसंख्यक आबादी के प्रतिनिधत्व और अवसर खत्म करने वालों के कारण ही हम 138 करोड़ भारतवासी आजादी के सत्तर साल बाद किसी एक अदद स्वर्णपदक का जश्न मनाकर करोड़ो प्रतिभाओं के साथ हुए अन्याय को सिरे से नज़रंदाज़ करते हैं।


हमारे बच्चे भूख और कुपोषण के शिकार होते हैं।

हमारे बच्चे बिना चिकित्सा के बेमौत मारे जाते हैं।

घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए स्कूल नही जा पाते।

जो स्कूल जाते भी हैं,उनके लिए समान शिक्षा और समान अवसर नहीं है।


बच्चों को न खेलने की आज़ादी है और न उन्हें खेलने का अवसर मिलता है।


फिरभी हम पदकों की गिनती करते हुए तिरंगा लहराते हैं। इस व्यवस्था को बदलने की नहीं सोचते।


70 साल तो क्या 700 साल भी हम इसीतरह वंचना के जख्म पर मलहम लगाते रहेंगे छिटपुट कामयाबी पर।



Friday, August 6, 2021

क्यों खतरे में है उत्तराखण्ड की अस्मिता? पलाश विश्वास

 हल्द्वानी सम्वाद के संदर्भ में

क्यों खतरे में हैं उत्तराखण्ड की अस्मिता?


पलाश विश्वास


बैठक के लिए आप सभी को शुभकामनाएं। हम लोग प्रेरणा अंशु के छपने की प्रक्रिया में फंसे हुए हैं,इसलिए आ नहीं सके।कृपया अन्यथा ने ले।हमें कल तक पत्रिका छाप देनी है।


बेहद जरूरी मुद्दे पर आपने यह पहल की है,इसका स्वागत है।


पिछले 21 साल में हम लोग सिर्फ भावनाओं में फंसे हुए हैं और व्यवहारिक राजनीति से कोसों दूर है।




राजनीतिक मसलों को भी भावात्मक ढंग से सुलझा लेने की कोशिश में गहरे विभाजन और अलगाव के शिकार हैं,जबकि इस कठिन दौर में निरंकुश कारपोरेट फासीवादी सत्ता के लिए मेहनतकश आवाम को एकजुट करने की सबसे ज्यादा जरूरत है।


उत्तराखण्ड के बुनियादी मसलों , जल जमीन जंगल जलवायु और पर्यावरण के मुद्दों पर एकताबद्ध राजनीतिक लड़ाई की जगह अस्मिता की राजनीति को पहाड़ी गैर पहाड़ी मुद्दे तक सीमित कर दिया गया है।


 जबकि अस्मिता का मतलब भाषा,संस्कृति और पहचान को बनाये रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनता की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है।


बार बार भूमि माफिया की सरकारें बनाकर हम जनता को जल जंगल जमीन से बेदखल करने वाली ताकतों की जाने अनजाने मदद कर रहे हैं।


वैकल्पिक राजनीति चुनाव से पहले विशुद्ध चुनावी समीकरण बनाने के खेल से आगे नहीं बढ़ता। 


बाकी चार साल हम अपनी अपनी खिचड़ी अलग पकाते हुए सत्ता से ज्यादा से ज्यादा अपना हिस्सा बटोरने की कोशिश करते हैं। 


न्यूनतम कार्यक्रम के साथ जनता के बीच लगातार काम किये बिना हम कौन सी राजनीति कर रहे हैं?


हम मानते हैं कि उत्तराखण्ड में बदलाव की राजनीति में पहाड़ का जितना मजत्व है,उससे कम महत्व तराई और भाबर का नहीं है।


पहाड़ और तराई भाबर को अलग करने वाली किसी भी राजनीति के हम खिलाफ हैं और ऐसे किसी भी राजनीतिक बिमर्ष में हम शामिल नहीं हो सकते।


हम नही आ सके, अगर जरूरी लगा तो मित्रों तक हमारी बात जरूर पहुंचा दें।


सन्दर्भ-

 Prabhat Dhyani: *संगोष्ठी/ आमंत्रण* 

            *ख़तरे में है उत्तराखंडी अस्मिता?*

प्रिय साथी/ महोदय, 

उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों,  ज़मीनों की निर्मम लूट, राज्य की अवधारणा एवं अस्मिता से हो रहे खिलवाड़ से आज राज्य का नागरिक समाज चिंतित व आक्रोशित है। 

जिस आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अस्मिता के लिए राज्य आंदोलन लड़ा गया था उसके सभी मोर्चों पर हम कमज़ोर हुए हैं। 

सरकार के विकास के दावों के बावजूद उत्तराखंड  विस्थापन, बेरोज़गारी,  शिक्षा, स्वास्थ्य की बदहाली से जूझ रहा है। 

जनता के इस आक्रोश से बचने के लिए राजनीतिक दल लूटखसोट की नीतियां बदलने के बदले चुनाव से पहले मुख्यमंत्रियों का चेहरा बदलने से इस आक्रोश को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। 

इन महत्वपूर्ण सवालों पर गहन विचार हेतु उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी एवम राजनैतिक,सामाजिक संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों द्वारा  7 अगस्त 2021 शनिवार को प्रातः 11 बजे से *ट्रिपल जे बिल्डिंग सभागार, छोटी मुखानी, निकट एसबीआई बैंक हल्द्वानी* में एक संगोष्ठी आयोजित होने जा रही है ।जिसमें हल्द्वानी के अलावा अन्य क्षेत्रों से भी सक्रिय सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता भागीदारी करेंगे। 

स्थान:ट्रिपल जे बिल्डिंग सभागार, 

छोटी मुखानी, 

निकट SBI हल्द्वानी ।

दिनांक 7 अगस्त 2021 शनिवार ,प्रातः 11 बजे से।

निवेदक-उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी एवम राजनैतिक,सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधिगण।

सम्पर्क -पी सी तिवारी केंद्रीय अध्यक्ष  उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी 9412092159

प्रभात ध्यानी 9837758770, 9368555136

अमीनुर्रहमान राज्य आंदोलनकारी  72488 44902

तरुण जोशी सामजिक कार्यकर्ता    919412438714

भोपाल सिंह धपोला +91 70558 78080

विनोद जोशी

9837390155

[07/08, 11:33 am] Palash Biswas: पलाश विश्वास

Thursday, August 5, 2021

संविधान में समता और न्याय का लक्ष्य सबसे बड़ा ढोंग और ओलंपिक पदक? पलाश विश्वास

 ओलंपिक तमगे पर जश्न मनाए या घृणा और नफरत की संस्कृति पर शोक?

पलाश विश्वास


इससे बड़ी शर्मिंदगी क्या होगी? कदम कदम पर इस तरह का बर्ताव होता है अछूतों के साथ। उनमें सभी वन्दना कटारिया नहीं होते और न उनका कोई नोटिस लेता है। इससे पहले जैसे वन्दना का भी नोटिस नहीं लिया गया।जाति जब तक रहेगी,अस्पृश्यता तब तक रहेगी।इसी गंदगी में जीते हुए हम सफेदपोश बने रहेंगे।


इसी भेदभाव की वजह से ओलंपिक में एक सोने के लिए तरसते 138 करोड़ करोड़ लोग दो चार चांदी कांसे के तमगों को लेकर जश्न मनाते हैं। 


मनुष्यता ही नहीं बची हो तो दस बीस पचास सोने से भी क्या आता जाता है?


समान अवसर से हर क्षेत्र में जब देश की बहुसंख्य आबादी वंचित है। ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। न चिकित्सा है और न शिक्षा,न भोजन। 


बचपन भट्टियों में भूनकर खा जस्ते हैं हम। बच्चों के लिए न खेल के मैदान हैं और न खेलने की आज़ादी।


हम ओलंपिक के चांदी और कांसे पर जश्न मनाए या इस घृणा,हिंसा और दमन पर,जाति के अभिशाप पर शोक मनाएं?


संविधान में समता और न्याय का लक्ष्य इस गणतंत्र का सबसे बड़ा पाखंड है।




Wednesday, August 4, 2021

नोबेल के लिए कोलकाता जाना जरूरी,वीरेन द ने कहा था

 आज वीरेनदा की जन्मतिथि है। वक्त कितनी तेजी से बदला है। अभी तो साथ काम कर रहे थे। बातें हो रही थीं। इतना वक्त निकल गया। सबकुछ याद भी नहीं है।


उनकी स्मृति को नमन। वे नहीं होते तो कोलकाता कभी नहीं जाते। कहते थे,जब चाहोगे लौट आओगे।जाना जरूरी है। 


कहते थे कि कोलकाता बड़ा बसंतीपुर है। ठीक से देख लो वरना नोबेल पुरस्कार मिस हो जाएगा।


 यह नोबेल पाने का उनका नुस्खा था।


 हमें कोई पुरस्कार कभी नहीं चाहिए था। लेकिन उनकी तरह छोटीनसे छोटी चीज देखने की भरसक कोशिश की है। लेकिन उनकी तरह लिख नहीं सका।लिख भी नहीं सकते।अपनी तरह लिख पाया।


वीरेनदा के साथ तस्वीरें भी थीं ।सहेज कर नहीं रख सके।


वीरेनदा के रहते हुए कोलकाता नहीं छोड़ सका।उन्हें अब कभी पता नहीं होगा कि फिर में वह हूं, जहां से चला था। बसंतीपुर। 


हमारी नई टीम के बारे में भी उन्हें न बता सका और न प्रेरणा अंशु में उनकी ताज़ा कविता लगा सका।


आज तुमसे फिर बात करने की जरूरत है वीरेनदा!

काश! तुम जवाब दे पाते। उसी तरह खुलकर हंसते।


प्रेरणा अंशु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।


हक हकूक की जानकारी सबसे जरूरी।पलाश विश्वास

 नगालैंड,मिजोरम,अरुणाचल मेघालय और हिमाचल के बाद प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध तीन और छोटे राज्य बने उत्तराखण्ड,झारखण्ड और छत्तीसगढ़।एक साथ।जनाकांक्षा,आंदोलन,जल जंगल और पर्यवर्क कि लड़ाई और अस्मिता के सवाल पर ये राज्य बने। जो अब भृष्टाचार,रिश्वत कमीशनखोरी और लोटखसोत के सबसे बड़े केंद्र बन गए है।जहां सरकार किसी की भी बने,जनल जल जंगल जमीन,जलवायु और पर्यावरण न्याय,समता और सामाजिक न्याय,कानून के राज और मानवाधिकार से वंचित है। यहां सत्ता भूमि माफिया,कारपोरेट दलालों और जनविरोधी तत्वों की बनती है जो भावनाओं की हिंसा और घृणा की राजनीति पर टिकी है।


 जहां ज्वलन्त मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती और तंत्र के स्तम्भ बन गए हैं आंदोलनकारी जो अब आंदोल


न को कैश करने में लगे हैं।निरन्तर जड़ों में सामाजिक, सांस्कृतिक सक्रियता से ही इन तीनों राज्यों और बाकी देश में वैकल्पिक जन राजनीति ,अर्थव्यवस्था,पर्यावरण और जलवायु का निर्माण हो सकता है।


इसके लिए जनता को हक़ हकूक की जानकारी और कानून की समझ होनी चाहिए। इसके लिए युवा वकीलों की जनप्रतिबद्ध भूमिका समय की मांग है।


जलवायु न्याय पर इस सम्वाद के आयोजन और हमें भी शामिल करने के लिए इन्ही युवा अधिवक्ताओं का आभार।सम्वाद से ही नया रास्ता बनेगा। हम पीड़ितों के सवाल लेकर आपके दरवाजा जरूर खटखटाएंगे।आपको अपना पक्ष तय करना होगा।


आंदोलन प्रोजेक्ट तक सीमित न रहे।

Tuesday, August 3, 2021

हॉकी और नैनीताल, डीएसबी और हम। पलाश विश्वास

 नैनीताल में ट्रेडर्स कप हॉकी में देश की चुनिंदा टीमें भाग लेती थीं।इस प्रतियोगिता में डीएसबी की टीम का प्रदर्शन हमारे लिए गर्व का विषय रहा है।सैय्यद अली तो हमारे सामने ही ओलंपिक खिलाड़ी बने।तब नैनिताल हाकी का गढ़ था।रेडियो पर हम लोग हर मैच की कमेंट्री सुनने के लिए चाय और पैन की दुकानों पर भीड़ लगते थे।


उन दिनों नीताल में मूसलाधार बारिश भी हुआ करती थी। मैदान में छाता लेकर बैठना जरूरी था।अपनी डीएसबी या किसी पसंदीदा टीम की जीत की खुशी में हमने न जाने कितने छाते खोए। शायद उतने ही जितने मिड लेक लाइब्रेरी में कैटलॉग ढूंढकर जरूरी किताब पा लेने की खुशी में जितने छाते खोए,उतने ही। अफसोस, नैनिताल की चमक दमक बढ़ने के बावजूद खेलने और पढ़ने की संस्कृति गायब हो गयी।


तब हम क्रिकेट के दीवाने नहीं थे।यह सत्तर के दशक की बात है।इससे पहले की समृतियाँ तो और भी सुनहली है। हमारा हथियार तब हॉकी स्टिक हुआ करता था।हम लोग दांत और सत्तर के दशक में कबड्डी के अलावा सिर्फ हॉकी खेलते थे। और अब?


शायद ओलंपिक में फिर हॉकी के मैदान पर हमारी टीमों के तिरंगा फहराने से धूमिल हो गयी समृतियाँ कि चमक लौटे?


क्या नशा,सट्टा, सत्ता और पब्जी को मात देकर क्रिकेट के बाजार को शिकस्त देकर हॉकी फिर राष्ट्रीय खेल बनेगा? उसमें नैनिताल की गौरवशाली भूमिका होगी?


याद दिलाने के लिए राजीव दाज्यू का आभार।


कल अल्मोड़ा से बसंतीपुर लौटने में रात हो गयी। दिन में जब कार्यक्रम चल रहा थ तो पवन राकेश का फोन आया।मेरे साथ खड़ी थी हाईकोर्ट की वकील  हमारे परममित्र पीसी तिवारी की बेटी स्निग्धा,जो मानवाधिकार कार्यकर्ता और अल्मोड़ा सम्वाद के आयोजकों में खास है।


राकेश बेहद भावुक हो गया था।बोला,अल्मोड़ा से घर लौटते वक्त नैनिताल होकर जाना। हमने कहा,नैनिताल पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी।कोई नहीं मिलेगा।हमें रात को ही घर लौटना है। प्रेरणा अंशु की तैयारी बीच में छोड़कर आये हैं। कल ही रूपेश को प्रेस जाना है।


हमने कहा,नैनिताल अलग से आएंगे। स्निग्धा से भी राकेश की बात हुई।वह राकेश से मिलती रहती है।


स्निग्धा से कहा,नैनिताल के युवा छात्रों से बात हो सकती है? डीएसबी का माहौल सम्वाद का है?


स्निग्धा जवाब नहीं दे सकी।


क्या सत्तर के दशक में देशभर से आनेवाले लेखकों,कवियों,पत्रकारों,रंगकर्मियों,फ़िल्मी कलाकारों के सामने ऐसी संवादहीनता का संकट था? 


क्या हम डीएसबी के छात्र तब देश दुनिया से कटे हुए थे या सिर्फ कैरियर की चिंता करते थे?


घर लौटकर अल्मोड़ा में 3 कार्यक्रमों में गए। हरिद्वार और बागेश्री भी हो आये। हल्द्वानी आना जाना लगा रहता है। हल्द्वानी और भुवाली के बेहद जंफिक नैनिताल हमारे लिए इतना दूर क्यों हो गया है।


ठीक है कि गिर्दा नहीं हैं। ठीक है कि शेखर पाठक, उमा भट्ट और बटरोही अक्सर नैनीताल में नहीं मिलते।ठीक है कि सखा दाज्यू सख्त बीमात हैं और राजीव लोचन साह बीमार हैं तो ज़हूर और इदरीश लगभग अकेले हैं।


एक डीएसबी का माहौल बदल जाने से कितना अजनबी हो गया अपना नैनीताल! कितना पराया! कितना बेरौनक! कितना बेनूर। हिमपात भी नहीं बुलाता।


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