Thursday, July 29, 2021

हम ओलंपिक पदक जीतेंगे,टॉप पर भी होंगे।बशर्ते

 न लिखने का वायरस और चन्दोला जी का जन्मदिन।जी रौ सौ बरीस

पलाश विश्वास



ये महाशय हमारे परम् मित्र कैलाश चन्दोला जी हैं और प्रेरणा अंशु के प्राचीनतम सदस्य हैं।मास्साब जब तक सम्पादकीय सम्भाल रहे थे,तब तक हर अंक में लिख रहे थे।लेकिन उनके बाद हम उनसे लिखा नहीं पा रहे।


महाशय अब फेसबुक पर अपना लिखा प्रकाशित कर देते हैं। हम आईटीआई परिसर में उनके क्वार्टर जाकर लिखने का तकादा करके चाय नाश्ता उड़ा आते थे।जनाब पर कोई असर नहीं हुआ। नगीना खान  को भी न लिखने की बीमारी लग गई है। वह भी फेसबुक पर लिख रही हैं।  चन्दोला जी तो चाय नाश्ते की बचत के लिए हल्द्वानी जाकर छुप जातक हैं। 


अच्छे दिन लहलहा रहे हैं।फिरभी?


मित्रों में यह बीमारी अब महामारी हो गयी है। मसलन एम एस के के विजय सिंह।हर अंक में वायदा करके नहीं लिखते। Subir Vandana Das  और  Manoj Ray,साथ में  Subeer Goswamin ..मनोज और सुबीर बेतरीन रंगकर्मी भी हैं। 


सुबीर वन्दना दास फेसबुक पर रोजाना सैकड़ों लाइक बटोरते हैं और प्रिंट के लिए न लिखने की कसम खाई है। मनोज तो कलम पकड़ने की तकलीफ भी नहीं उठाते। रंगकर्म की इतिश्री हो गई। सुबीर गोस्वा मी न रंगकर्म करते हैं और न लिखते हैं।फेसबुक पोस्ट भी नहीं करते।


न लिखने का इस फेसबुकिया वायरस का स्रोत हालांकि चीन नहीं है और न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पढ़ने लिखने की संस्कृति खत्म होने के लिए चीन को दोषी ठहराया है। 


फेसबुक से जो बचे हुए हैं,उनमें खासकर युवा और बच्चे पब्जी में निष्णात है। पब्जी अब राष्ट्रीय खेल है,हॉकी नहीं है। उनकी प्रतिभा इसमें खिलखिला रही है।


ओलंपिक में पदकों की कमी तभी पूरी होगी जब नशाखोरी, सट्टा, जुआ,रिश्वत, आपसी फूट, चमचागिरी, घृणा और हिंसा के साथ ही आलस्य और बहाने बाजीबमें अपनी प्रतिभा जाया करने पर भीबपडक मिलेंगे। 


तब शायद पदक तालिका में हम शीर्ष पर होंगे।


लगे रहो मुन्ना भाई का अनुसरण करते हुए कैलाश चन्दोला और अपनी प्रतिभा को ताक पर रखने वाले ऐसे मित्रों के घर पर गुलाब के साथ गोमूत्र और गोबर रखने की जरूरत है।


गोबर और गोमूत्र तो भारत में हारी, बीमारी और महामारी का रामवाण है।जरूर आजमाइए।


हालांकि चन्दोला जी ने लिखा है


अब कल 30 जुलाई ठैरा बल ये हर साल मल्लब साल में एक ही बार आने वाला हुआ बल।

हाँ कल का दिन मेरे लिये भौति महत्व का ठैरा क्योंकि कल ही के दिन मैने इस पावन धरा में पदार्पण किया लोगो को ज्ञान बाटने ,अपने ज्ञान का विस्तार करते हुए कल मुझे पचास वर्ष हो जाएंगे।

हाँ अपने पराक्रम से कल मैं दो जगह मित्रो के साथ रहूँगा स्थानीय मित्र अपनी अपनी सुविधा के अनुसार मुझसे समय मल्लब अपॉइंटमेंट ले सकते है दो जगहों में सुविधानुसार जगह का चुनाव कर ले।

हा फेसबुक के मित्र अभी से आशीर्वाद, शुभकामनाएं,बधाई संदेश प्रेषित कर सकते है।


बधाई जी। जय हो। जी रौ सौ बरीस।


इतनी लंबी शुभकामना सन्देश के बाद क्या कैलाश चन्दोला फिर लिखना शुरू करेंगे और बाकी लोग पढ़ना लिखना?


स्टारपोल पर आप खूब वोट दाल रहे हैं। इनबॉक्स में इस बारे में अपनी राय हां या ना में दर्ज करें।


दिनेशपुर के बाहर के साथी यहां अपने इलाके के अपनी प्रतिभा के साथ ऐसा ही सलूक करने वाले मित्रो के खिलाफ नामजद रपट दर्ज कर सकते हैं ताकि हमें यह मालूम हो सके कि दिनेशपुर से बाहर भी ऐसे मित्र हैं।


लाइक करें या न करें, वोट जरूर डालें।बहुत जल्द नए सुअरों,बंदरों और मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों की आमद के लिए आप वोट डालेंगे ही।थोडी प्रैक्टिस कर लेने में बुराई क्या है?

खिलता हुआ इंद्रधनुष।पलाश विश्वास

 खिलता हुआ इंद्रधनुष और भावनाओं की राजनीति


पलाश विश्वास









दफ्तर से बसन्ती पुर लौटते हुए हरिदासपुर से गांव के रास्ते पैदल चलते हुए हल्की बूंदाबांदी और सांझ की धूप में हिमालय की छनव में आसमान के एक छोर से दूसरे छोर तक अर्धचन्द्राकार इंद्रधनुष खिलते दिखा। 


मेरे मोबाइल से ज़ूम नहीं जो सकता।फिर भी सिर्फ दृष्टि के भरोसे नौसीखिए हाथों से खींची ये तस्वीरें। 


रास्ते में खेत का काम करके सुस्त रहे बचपन के मित्र,जबरदस्त किसान प्रभाष ढाली मिल गए।उसके साथ बिल बाडी का भाई बाबू।


 फटाक से फोटू खिंचवा ली। 


प्रभाष के पास गांव में पहले पहल कैमरा आया। तब हम डीएसबी में एमए के छात्र थे और नैनिताल समाचार निकला ही था। राजीव लोचन साह दाज्यू और गिर्दा ने कहा कि नैनीताल समाचार के लिए लिखो। 


तब तराई की खबरें नहीं छपती थी कहीं। हालांकि हाल में दिवंगत रुद्रपुर के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष और पिताजी के मित्र सुभाष चतुर्वेदी हिमालय की पुकार निकाला करते थे। हमारे अग्रज गोपाल विश्वास ने भी तराई टाइम्स निकाला था। लेकिन तराई पर खोजी पत्रकारिता करना जोखिम का काम था।


जगन्नाथ मिश्र जी की पत्रकारिता के चलते गदरपुर बाजार में सरेआम गोली मार दी गई थी। हालांकि 1979 के 13 अप्रैल को पन्तनगर गोलीकांड की रपट शेखर पाठक ,गिर्दा और मैंने नैनिताल समाचार और दिनमान के लिए कर दी थी। 


तभी नैनिताल से दिल्ली आकाशवाणी की रिकार्डिंग के वक्त जाते हुए रास्ते में बस से उतारकर गिर्दा को हमलावरों ने बुरी तरह पीटा था।


हकीकत का सामना पीड़ित पक्ष के लोग भी नहीं करते। भावनाएं भड़काकर उनकी आवाज़ बुलंद करने वालों के खिलाफ हमला करवाना तबभी दस्तूर था।


हमने कब तक सहती रहेगी तराई श्रृंखला लिखनी शुरू की तो दिनेशपुर और शक्तिफार्म में ही भयंकर विरोध झेलना पड़ा।राजनीति प्रबल थी हमारे खिलाफ। 


नैनीताल समाचार और मुझे धमकियां दी गईं।घेरकर मारने की कोशिशें भी होती रही। लेकिन हमने लिखना बन्द नहीं किया।


तब तराई के गांवों और जंगलों में मेरे साथ अपने कैमरे के साथ प्रभाष ढाली हुआ करते थे। उनके पिताजी रामेश्वर ढाली बसंतीपुर को बसाने वालों में थे। उसकी मां का उसके बचपन में ही सेप्टीसीमिया से निधन हो गया था।


आज बसन्ती पुर में उम्र हो जाने के बाद भी रात दिन जमीन पर डटे रहने वाले किसान का नाम प्रभाष ढाली है। मेरे भाई पद्दोलोचन, दोस्त नित्यानन्द मण्डल और गांव के दूसरे किसानों के साथ प्रभाष भी लगातार पन्तनगर कृषि विश्व विद्यालय के निर्देशन में आधुनिक खेती करते हैं। प्रभाष ऑर्गनिक खेती भी कर रहै हैं।


इंद्रधनुष के शिकार के प्रयास में फ्रेम में गांव और खेतों में घुसपैठ करते हुए शहर की झांकियां भी कैद हो गयी।लेकिन अफसोस पहाड़ कैद नहीं कर सका।


 हिमालय की उत्तुंग शिखर बहुत पास होते हुए भी हमसे दूर हैं। यह दूरी उतनी ही है,जितनी उत्तराखण्ड बनने के बाद पहाड़ी और गैर पहाड़ी जनता के बीच बनती जा रही है। अफसोस की भावनाओं की राजनीति अब बेलगाम है और दूरियां बढ़ती जा रही है।


मेरा नैनीताल अब लगता है कि अनजान किसी और आकाशगंगा में है।

Tuesday, July 27, 2021

वजूद से चस्पां

 शिवन्ना का भाई ननिहाल में मस्त।कभी हम भी ऐसे ही रहे होंगे। मेरी माँ बसन्ती देवी,ताई हेमलता,चाची उषा और बड़ी दीदी मीरा के पास जाहिर है कि तराई के घनघोर जंगल में मोबाइल फोन नहीं रहा होगा।






जब बाघ भालू से जिंदा बचने की लड़ाई हो तो फोटो का क्या मतलब? फिर ऐसे कपड़े?

 हम तो मिट्टी कीचड़ से लथपथ रहे होंगे जैसे पलाश के फूल। मेरे पिता पुलिनबाबू तब आंदोलनों की आग में दहक महक रहे थे।

यह तस्वीर साहब की मम्मी गायत्री ने खींची है।

मेरी ताई ज्यादा होशियार थी,नाम के साथ पूरे पर्यावरण की समूची तस्वीर हमारे वजूद के साथ चस्पां कर दी।

फिर दर्द होता है तो चीखना मजबूरी भी है।पलाश विश्वास

 फिर दर्द होता है तो चीखना मजबूरी भी है।

पलाश विश्वास



शायद जब तक जीता रहूंगा मेरी चीखें आपको तकलीफ देती रहेंगी,अफसोस।

जो बच्चे 30-35 साल की उम्र में हाथ पांव कटे लहूलुहान हो रहे हैं,उनमें से हरेक के चेहरे पर मैं अपना ही चेहरा नत्थी पाता हूं।

बत्रा साहेब की मेहरबानी है कि उन्होंने फासिज्म के प्रतिरोध में खड़े भारत के महान रचनाकारों को चिन्हित कर दिया।इन प्रतिबंधित रचनाकारों में कोई जीवित और सक्रिय रचनाकार नहीं है तो इससे साफ जाहिर है कि संघ परिवार के नजरिये से भी उनके हिंदुत्व के प्रतिरोध में कोई समकालीन रचनाकार नहीं है।

उन्हीं मृत रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के संघ परिवार के कार्यक्रम के बारे में समकालीन रचनाकारों की चुप्पी उनकी विचारधारा,उनकी प्रतिबद्धता और उनकी रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करती है।

जैसे इस वक्त सारे के सारे लोग नीतीश कुमार के खिलाफ बोल लिख रहे हैं।जैसे कि बिहार का राजनीतिक दंगल की देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा हो।

डोकलाम की युद्ध परिस्थितियां, प्राकृतिक आपदाएं,किसानों की आत्महत्या,व्यापक छंटनी और बेरोजगारी, दार्जिंलिंग में हिंसा, कश्मीर की समस्या, जीएसटी, आधार अनिवार्यता, नोटबंदी का असर , खुदरा कारोबार पर एकाधिकार वर्चस्व, शिक्षा और चिकित्सा पर एकाधिकार कंपनियों का वर्चस्व, बच्चों का अनिश्चित भविष्य, महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार,दलित उत्पीड़न की निरंतरता,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार संस्कृति जैसे मुद्दों पर कोई बहस की जैसे कोई गुंजाइश ही नहीं है।

गौरतलब है कि मुक्तिबोध पर अभी हिंदुत्व जिहादियों की कृपा नहीं हुई है।शायद उन्हें समझना हर किसी के बस में नहीं है,गोबरपंथियों के लिए तो वे अबूझ ही हैं।

पलाश विश्वास

सत्ता समीकरण और सत्ता संघर्ष मीडिया का रोजनामचा हो सकता है,लेकिन यह रोजनामचा ही समूचा विमर्श में तब्दील हो जाये,तो शायद संवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचती।आम जनता की दिनचर्या,उनकी तकलीफों,उनकी समस्याओं में किसी की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती तो सारे बुनियादी सवाल और मुद्दे जिन बुनियादी आर्थिक सवालों से जुड़े हैं,उनपर संवाद की स्थिति बनी नहीं है।

हमारे लिए मुद्दे कभी नीतीशकुमार हैं तो कभी लालू प्रसाद तो कभी अखिलेश यादव तो कभी मुलायसिंह यादव,तो कभी मायावती तो कभी ममता बनर्जी।हम उनकी सियासत के पक्ष विपक्ष में खड़े होकर फासिज्म के राजकाज का विरोध करते रहते हैं।

जैसे इस वक्त सारे के सारे लोग नीतीश कुमार के खिलाफ बोल लिख रहे हैं।जैसे कि बिहार का राजनीतिक दंगल की देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा हो।

डोकलाम की युद्ध परिस्थितियां, प्राकृतिक आपदाएं,किसानों की आत्महत्या,व्यापक छंटनी और बेरोजगारी, दार्जिंलिंग में हिंसा, कश्मीर की समस्या, जीएसटी, आधार अनिवार्यता, नोटबंदी का असर , खुदरा कारोबार पर एकाधिकार वर्चस्व, शिक्षा और चिकित्सा पर एकाधिकार कंपनियों का वर्चस्व, बच्चों का अनिश्चित भविष्य, महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार,दलित उत्पीड़न की निरंतरता,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार संस्कृति जैसे मुद्दों पर कोई बहस की जैसे कोई गुंजाइश ही नहीं है।

लोकतंत्र का मतलब यह है कि राजकाज में नागरिकों का प्रतिनिधित्व और नीति निर्माण प्रक्रिया में जनता की हिस्सेदारी।

सत्ता संघर्ष तक हमारी राजनीति सीमाबद्ध है और राजकाज,राजनय,नीति निर्माण,वित्तीय प्रबंधन,संसाधनों के उपयोग जैसे आम जनता के लिए जीवन मरण के प्रश्नों को संबोधित करने का कोई प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं हो रहा है।

सामाजिक यथार्थ से कटे होने की वजह से हम सबकुछ बाजार के नजरिये से देखने को अभ्यस्त हो गये हैं।

बाजार का विकास और विस्तार के लिए आर्थिक सुधारों के डिजिटल इंडिया को इसलिए सर्वदलीय समर्थन है और इसकी कीमत जिस बहुसंख्य जनगण को अपने जल जंगल जमीन रोजगार आजीविका नागरिक और मानवाधिकार खोकर चुकानी पड़ती है,उसकी परवाह न राजनीति को है और न साहित्य और संस्कृति को।

हम जब साहित्य और संस्कृति के इस भयंकर संकट को चिन्हित करके समकालीन संस्कृतिकर्म की प्रासंगिकता और प्रतिबद्धता पर सवाल उठाये,तो समकालीन रचनाकारों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई है।

बत्रा साहेब की मेहरबानी है कि उन्होंने फासिज्म के प्रतिरोध में खड़े भारत के महान रचनाकारों को चिन्हित कर दिया।

इन प्रतिबंधित रचनाकारों में कोई जीवित और सक्रिय रचनाकार नहीं है तो इससे साफ जाहिर है कि संघ परिवार के नजरिये से भी उनके हिंदुत्व के प्रतिरोध में कोई समकालीन रचनाकार नहीं है।

उन्हीं मृत रचनाकारों को प्रतिबंधित करने के संघ परिवार के कार्यक्रम के बारे में समकालीन रचनाकारों की चुप्पी उनकी विचारधारा,उनकी प्रतिबद्धता और उनकी रचनाधर्मिता को अभिव्यक्त करती है।


गौरतलब है कि मुक्तिबोध पर अभी हिंदुत्व जिहादियों की कृपा नहीं हुई है।शायद उन्हें समझना हर किसी के बस में नहीं है,गोबरपंथियों के लिए तो वे अबूझ ही हैं।अगर कांटेट के लिहाज से देखें तो फासिजम के राजकाज के लिए सबसे खतरनाक मुक्तिबोध है,जो वर्गीय ध्रूवीकरण की बात अपनी कविताओं में कहते हैं और उनका अंधेरा फासिज्म का अखंड आतंकाकारी चेहरा है।शायद महामहिम बत्रा महोदय ने अभी मुक्तबोध को कायदे से पढ़ा नहीं है।

बत्रा साहेब की कृपा से जो प्रतिबंधित हैं,उनमें रवींद्र,गांधी,प्रेमचंद,पाश, गालिब को समझना भी गोबरपंथियों के लिए असंभव है।

जिन गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस के रामराज्य और मर्यादा पुरुषोत्तम को कैंद्रित यह मनुस्मृति सुनामी है,उन्हें भी वे कितना समझते होंगे,इसका भी अंदाजा लगाना मुश्किल है।

बंगाली दिनचर्या में रवींद्रनाथ की उपस्थिति अनिवार्य सी है,  जाति,  धर्म,  वर्ग, राष्ट्र, राजनीति के सारे अवरोधों के आर पार रवींद्र बांग्लाभाषियों के लिए सार्वभौम हैं,लेकिन बंगाली होने से ही लोग रवींद्र के जीवन दर्शन को समझते होंगे,ऐसी प्रत्याशा करना मुश्किल है।

कबीर दास और सूरदास लोक में रचे बसे भारत के सबसे बड़े सार्वजनीन कवि हैं,जिनके बिना भारतीयता की कल्पना असंभव है और देश के हर हिस्से में जिनका असर है। मध्यभारत में तो कबीर को गाने की वैसी ही संस्कृति है,जैसे बंगाल में रवींद्र नाथ को गाने की है और उसी मध्यभारत में हिंदुत्व के सबसे मजबूत गढ़ और आधार है।

निजी समस्याओं से उलझने के दौरान इन्हीं वजहों से लिखने पढ़ने के औचित्य पर मैंने कुछ सवाल खड़े किये थे,जाहिर है कि इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई है। 

मैंने कई दिनों पहले लिखा,हालांकि हमारे लिखने से कुछ बदलने वाला नहीं है.प्रेमचंद.टैगोर,गालिब,पाश,गांधी जैसे लोगों पर पाबंदी के बाद जब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा तो हम जैसे लोगों के लिखने न लिखने से आप लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।अमेरिका से सावधान के बाद जब मैंने साहित्यिक गतिविधियां बंंद कर दी,जब 1970 से लगातार लिखते रहने के बावजूद अखबारों में लिखना बंद कर दिया है,तब सिर्फ सोशल मीडिया में लिखने न लिखने से किसी को कोई फ्रक नहीं पड़ेगा।

कलेजा जख्मी है।दिलोदिमाग लहूलुहान है।हालात संगीन है और फिजां जहरीली।ऐसे में जब हमारी समूची परंपरा और इतिहास पर रंगभेदी हमले का सिलसिला है और विचारधाराओं,प्रतिबद्धताओं के मोर्टे पर अटूट सन्नाटा है,तब ऐशे समय में अपनों को आवाज लगाने या यूं ही चीखते चले जाना का भी कोई मतलब नहीं है।

जिन वजहों से लिखता रहा हूं,वे वजहें तेजी से खत्म होती जा रही है।वजूद किरचों के मानिंद टूटकर बिखर गया है।जिंदगी जीना बंद नहीं करना चाहता फिलहाल,हालांकि अब सांसें लेना भी मुश्किल है।लेकिन इस दुस्समय में जब सबकुछ खत्म हो रहा है और इस देश में नपुंसक सन्नाटा की अवसरवादी राजनीति के अलावा कुछ भी बची नहीं है,तब शायद लिखते रहने का कोई औचित्य भी नहीं है।

मुश्किल यह कि आंखर पहचानते न पहचानते हिंदी जानने की वजह से अपने पिता भारत विभाजन के शिकार पूर्वी बंगाल और पश्चिम पाकिस्तान के विभाजनपीड़ितों के नैनीताल की तराई में नेता मेरे पिता की भारत भर में बिखरे शरणार्थियों के दिन प्रतिदिन की समस्याओं के बारे में रोज उनके पत्र व्यवहार औऱ आंदोलन के परचे लिखते रहने से मेरी जो लिखने पढ़ने की आदत बनी है और करीब पांच दशकों से जो लगातार लिख पढ़ रहा हूं,अब समाज और परिवार से कटा हुआ अपने घर और अपने पहाड़ से हजार मील दूर बैठे मेरे लिए जीने का कोई दूसरा बहाना नहीं है।

फिर दर्द होता है तो चीखना मजबूरी भी है।

शायद जब तक जीता रहूंगा,मेरी चीखें आपको तकलीफ देती रहेंगी,अफसोस।

अभी अखबारों और मीडिया में लाखों की छंटनी की खबरें आयी हैं।जिनके बच्चे सेटिल हैं,उन्हें अपने बच्चों पर गर्व होगा लेकिन उन्हें बाकी बच्चों की भी थोड़ी चिंता होती तो शायद हालात बदल जाते।

मेरे लिए  रोजगार अनिवार्य है क्योंकि मेरा इकलौता बेटा अभी बेरोजगार है।इसलिए जो बच्चे 30-35 साल की उम्र में हाथ पांव कटे लहूलुहान हो रहे हैं,उनमें से हरेक के चेहरे पर मैं अपना ही चेहरा नत्थी पाता हूं।

अभी सर्वे आ गया है कि नोटबंदी के बाद पंद्रह लाख लोग बेरोजगार हो गये हैं।जीएसटी का नतीजा अभी आया नहीं है।असंगठित क्षेत्र का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है और संगठित क्षेत्र में विनिवेश और निजीकरण के बाद ठेके पर नौकरियां हैं तो ठीक से पता लगना मुश्किल है कि कुल कितने लोगों की नौकरियां बैंकिंग, बीमा, निर्माण,  विनिर्माण, खुदरा बाजार,संचार,परिवहन जैसे क्षेत्रों में रोज खथ्म हो रही है।

मसलन रेलवे में सत्रह लाख कर्मचारी रेलवे के अभूतपूर्व विस्तार के बाद अब ग्यारह लाख हो गये हैं जिन्हें चार लाख तक घटाने का निजी उपक्रम रेलवे का आधुनिकीकरण है,भारत के आम लोग इस विकास के माडल से खुश हैं और इसके समर्थक भी हैं।

संकट कितना गहरा है,उसके लिए हम अपने आसपास का नजारा थोड़ा बयान कर रहे हैं।बंगाल में 56 हजार कल कारखाने बंद होने के सावल पर परिव्रतन की सरकार बनी।बंद कारखाने तो खुले ही नहीं है और विकास का पीपीपी माडल फारमूला लागू है।कपड़ा,जूट,इंजीनियरिंग,चाय उद्योग ठप है।कल कारखानों की जमीन पर तमाम तरहके हब हैं और तेजी से बाकी कलकारखाने बंद हो रहे हैं।

आसपास के उत्पादन इकाइयों में पचास पार को नौकरी से हटाया जा रहा हो।यूपी और उत्तराखंड में भी विकास इसी तर्ज पर होना है और बिहार का केसरिया सुशासन का अंजाम भी यही होना है।

सिर्फ आईटी नहीं,बाकी क्षेत्रों में भी डिजिटल इंडिया के सौजन्य से तकनीकी दक्षता और ऩई तकनीक के बहाने एनडीवी की तर्ज पर 30-40 आयुवर्ग के कर्मचारियों की व्यापक छंटनी हो रही है।

सोदपुर कोलकाता का सबसे तेजी से विकसित उपनगर और बाजार है,जो पहले उत्पादन इकाइयों का केद्र हुआ करता था।यहां रोजाना लाखों यात्री ट्रेनों से नौकरी या काराबोर या अध्ययन के लिए निकलते हैं।चार नंबर प्लैटफार्म के सारे टिकट काउंटर महीनेभर से बंद है।आरक्षण काफी दिनों से बंद रहने के बाद आज खुला दिखा।जबकि टिकट के लिए एकर नंबर प्लेटफार्म पर दो खिडकियां हैं।

सोदपुर स्टेशन के दो रेलवे बुकिंग क्लर्क की कैंसर से मौत हो गयी हैा,जिनकी जगह नियुक्ति नहीं हुई है।सात दूसरे कर्मचारियों का तबादला हो गया है और बचे खुचे लोगं से काम निकाला जा रहा है।

आम जनता को इससे कुछ लेना देना नहीं है।

आर्थिक सुधारों,नोटबंदी,जीएसटी,आधार के खिलाफ आम लोगों को कुछ नहीं सुनना है।उनमें से ज्यादातर बजरंगी है।

बजरंगी इसलिए हैं कि उनसे कोई संवाद नहीं हो रहा है।

बुनियादी सवालों और मुद्दों से न टकराने का यह नतीजा है,क्षत्रपों के दल बदल, अवसरवाद जो हो सो है,लेकिन जनता के हकहकूक के सिलसिले में सन्नाटा का यह अखंड बजरंगी समय है।

वीरेनदा ने कहा था,खूब लिखो बसंतीपुर पर

 फिल्मकार राजीव कुमार ने सूचना दी है




Rajkr: साहित्यकार बटरोही ने वीरेन के परिवार के साथ उनके स्मारक का लोकार्पण किया।

साहित्य अकादमी पुरस्कार ‌समादृत कवि वीरेन डंगवाल

 बरेली

धन्यवाद राजीव भाई। फोटो में बटरोही जी के अलावा सुधीर विद्यार्थी जी भी शायद नज़र आ रहै हैं दोनों को नमन।

वीरेन दा का असली स्मारक तो दोस्तों और पाठकों के दिलोदिमाग में बना बनाया है,जिसके लोकार्पण की शायद जरूरत भी नहीं है। न ही वीरेन दा साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने के बावजूद ऐसी औपचारिकता के कायल थे।

उनके अवसान के बाद परिवार के लोगों से मिलने का मौका नहीं बना।इसका अफसोस है।

वीरेनदा कहा करते थे कि बसंतीपुर पर खूब लिखो।

विडम्बना यह है कि मैं फिर बसंतीपुर में बस गया,लेकिन उनके जाने के बाद। वे नान भी न सके कि मैं घर लौट आया।

फिर बसंतीपुर के सिवाय मेरे पास लिखने को क्या है?

पलाश विश्वास

Let us live the rural hell!Palash Biswas

 Live in your urban heaven!Let us live in our hell in Indian villages! 


Palash Biswas



Urban people should not shift in the villages as they never considered rural people as human being. If circumstances drive them to their native places,they feel abandoned in the hell.


Where they lived once,even were born, they never longed for the forgotten land. Economy made them run for life and they got shelter in their roots only. But it is very hard to forget the glittering markets and th freedom of purchasing which they lost with the loss of job or position.


They tend to be habitual to maintain their so called class status. They always tried to live with the class and struggle to get the stairs to reach the upper class.


They never tried to go back to the roots but tried their best to get rid of the old memories of misery and poverty amit growing purchasing crowd leaving the society and community as well.


They were never happy as they always wept for more. They never knew happiness .They had been always sad for the missing things they could not afford.


Being quite unsocial,they might not adjust with the cruel realities in rural life.


It is better for them to succumb in their urban heaven. Let us live in the hell.

50 लाख साल बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि घृणा, हिंसा और पितृसत्ता? पलाश विश्वास

50 लाख साल की बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि हिंसा,घृणा और पितृसत्ता है?

पितृसत्ता रहेगी, नफरत और मार्केट की सियासत की शिकार स्त्री होगी, जाति के नाम सामूहिक बलात्कार होंगे,तो फूलनदेवी भी होगी

पलाश विश्वास





अन्याय और अत्याचार की दुःखद परिणति यही है। जाति हिंसा किसी महायद्ध से कम नहीं है। 


अंध जातिवाद से पीड़ित मनुष्यता का प्रत्युत्तर भी हिंसा है। यह होती रहेगी।इसका अंत नहीं,क्रमबद्ध है यह।


आजादी के बाद इस महादेश में धर्म,नस्ल, भाषा,क्षेत्र और जाति की अस्मिता से जितनी हिंसा हुई है,जितने निर्दोष लोग मारे गए, वैसा दोनों विश्वयुद्धों को मिलाकर भी नहीं हुआ।


वहां तो फिरभी फौजें एक दूसरे के खिलाफ लड़ रही थीं।


 11 वी सदी से लेकर 15 वीं सदी तक के धर्मयुद्धों और बीसवीं सदी के सांस्कृतिक युद्ध से भी भयानक परिदृश्य से हम गुज़र जाते हैं।इसी भारतवर्ष में। जब घर से निकलना भी मौत को दावत दी सकता है। घर में भी सामूहिक बलात्कार हो सकता है।


इसी  परिदृश्य में सामने आता है ,एक पीड़ित महिला का चेहरा जो जाति के नाम सामूहिक बलात्कार को जायज मानने वाली भीड़ से कुछेक को मौत के घाट उतारकर निजी बदला चुका देती है।


जाति जब तक रहेगी,गैर बराबरी, अन्याय,उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार की व्यवस्था जब तक स्त्री देह को उपनिवेश और युद्ध का मैदान बनाती रहेगी,फिर फिर फूलन देवी का जन्म होगा।


यह कानून व्यवस्था का मामला उतना नहीं है,जितना मनुष्यता और सभ्यता के विकास का मामला है।


 मनुष्यता कितनी आगे बढ़ी है?


 सभ्यता का कितना बिकास हुआ है? 


50 लाख साल बाद भी आदिम मनुष्यों की तरह स्त्री को आखेट का सामान माना जाता है?


50 लाख साल बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि घृणा और हिंसा की पितृसत्ता है?


हम इक्कीसवीं सदी में हैं।हम अखण्ड भारत के खंडित हिस्सों में हैं।अर्थ व्यवस्था बदल गयी है। स्थानीय रोजगार कदिन नहीं है। रोजगार के लिए विस्थापन अनिवार्य है।


हम अपने हिस्से का देश लेकर स्थानांतर नहीं हो सकते। दूसरे के हिस्से के देश में विस्थापन की वजह से ही विविधता बहुलता का यह लोकतंत्र है।


किसी भी नस्ल,जाति, धर्म,भाषा का विशुद्ध भूगोल नहीं है आज। न विशुद्ध रक्त की तरह स्वतंत्र सम्प्रभु अर्थव्यबस्था है।


अस्मिता की राजनीति से देश का बंटवारा हुआ, जिसके शिकार हम लोग उसकी यातना पीढ़ी दर पीढ़ी भुगत रहे हैं। आज भी कोई भी किसी को यह फरमान जारी कर देता है किसी शहंशाह की तरह,यह देश तुम्हारा नही है।यह जमीन तुम्हारी नहीं है।


 फिर जाति,धर्म,नस्ल,भाषा के नाम पर हिंसा और खून का सैलाब,फिर स्त्रियों से सामूहिक बलात्कार। 


देश के हर हिस्से का यह हाल है।


नफरत और हिंसा की सियासत निरंकुश है।

ऐसे में फूलन देवी के अवतार आते रहेंगे।


इस नफरत,हिंसा और स्त्री विरोधी पितृसत्ता से क्या हमें कभी मुक्ति मिलेगी?


क्या हम मुक्ति चहते हैं?