Sunday, June 20, 2021

रघुवीर सहाय और हम

 मैं डीएसबी कालेज नैनीताल का छात्र था। तभी पन्तनगर गोलीकांड हुआ था। शेखर पाठक गिर्दा और मैंने रपट लिखी और रघुवीर सहाय जी ने छाप दी यह साझा रपट। उसके बाद विविध मुद्दों पर लिखने के लिए उनके पत्र आ जाते थे।


अब याद आया,पंतनगर गोलीकांड से पहले हमारे खास दोस्त पवन राकेश ने मेरे लेख धर्मयुग और दिनमान दोनों जगह भेजें थे,दोनों जगह ये लेख छप गए।उं दिनों पत्र पत्रिकाओं में हर रचना का पारिश्रमिक मिलता था। नैनीताल जैसे हिल स्टेशन में 1973 से 1975 तक हमारे खर्चे एक डेढ़ हजार तक हो जाते थे।लेकिन BA में पहुंचते ही वैचारिक असर में हमने गैर जरूरी खर्च बन्द कर दिए। गुरुजी के घर मोहन निवास में जाने के बाद 1976 से खर्च और कम हो गए।फिर पत्र पत्रिकाओं से इतना पारिश्रमिक आने लगा कि बीए एमए में ही हमने घर से पैसे लेने बन्द कर दिए।


1979 में एमए पास करने के बाद एमफिल के लिए इलाहाबाद विश्विद्यालय होकर जेएनयू पहुँचा तो उर्मिलेश के कमरे में पूर्वांचल होस्टल में डेरा डाला। जब भी दिनमान के दफ्तर गए, मुझे अपनी गाड़ी में बैठाकर जेएनयू गेट पर छोड़ते थे। रोक लेते थे। काम देते थे। एडवांस पेमेंट करते थे।


धनबाद गया तो खान दुर्घटनाओं और आदिवासियों पर लिखवाया। जब भी दिल्ली गए, उन्होंने दिमान में बैठकर लिखवाया।


कहते थे,धनबाद से आये हो, खर्च तो निकलना चाहिए।लिखवाने के बाद वाउचर से एडवांस पेमेंट।


हमारे अनेक सहकर्मियों का यही अनुभव रहा है।

हमेशा नए लोगों से लिखवाते रहने,उन्हें निखारने की जितनी बेचैनी उनमें देखी,वही हममें भी जाने अनजाने संक्रमित होती रही।


मेरे तमाम मित्र दिनमान के लेखक रहे हैं। जिनसे अबभी चार दशक के बाद भी वही मित्रता है,जो दिनमान से शुरू हुई।


पेशेवर पत्रकारिता में प्रभाष जोशी को छोड़कर बाकी लोग बॉस थे या विशुद्ध मैनेजर या विशुद्ध दलाल। 


दैनिक आवाज़,धनबाद के सम्पादक ने जरूर सम्पादन सीखने में मेरी पूरी मदद की। कोयला खानों और आदिवासियों,झारखण्ड आंदोलन पर लिखने की पूरी आजादी दी,जो मुझे अन्यत्र कहीं नहीं मिली,जनसत्ता में भी नहीं।

सम्पादक की भूमिका

 सम्पादक की भूमिका

वाचस्पति 

साहित्यिक रचनाशीलता और पत्रकारिता के अनुभवी पलाश बिश्वास ने आज की लेखन -संपादन की गतिविधियों की चर्चा की है।पलाश ने "दिनमान"के रघुवीर सहाय,"उत्तरार्द्ध"के सव्यसाची के उदाहरण देकर कहा है कि उन जैसे संपादक नवोदित लेखकों की भूल-चूक पर ध्यान देकर रचनाओं को परिमार्जित कराते थे।आज युग बदल गया है।मिशन नहीं, अब साहित्येतर लक्ष्य हावी हैं।हाशिया भूलें ठीक करने को ही छोड़ा जाता था।अब सिर्फ़ ईमेल का बटन दबता है।सामग्री जस की तस तत्काल इस्तेमाल हो जाती है।भाषा दुरुस्त करने की तकलीफ अब कोई नहीं उठाता।व्याकरणिक अनुशासन, शब्दकोशों को देखना अब बीते ज़माने की बात है।बहुत से संपादक सामंती मानसिकता के हैं।वे संवाद नहीं चाहते।पत्रिका से "व्यक्तित्व बनाने और चमकाने की कला"के अलावा उनका अन्य कोई उद्देश्य प्रायः नहीं रहता।पत्रिकाओं का सीमित प्रसार होने से साहित्यिक गुणवत्ता की कोई खास परवाह नहीं की जाती।पत्रिकाएँ टिकाऊ होने पर पुरस्कार देना शुरू करती हैं पर सहयोगी रचनाकारों को पत्रं-पुष्पं अर्पित नहीं करतीं।स्थानीय ठीक से हुए बिना ही अखिल भारतीय क्या वैश्विक होने का उतावलापन संपादकों में दिखलाई देता है।साहित्यिक लघुपत्रिकाओं के लिए स्थानीयता एक अनिवार्यता है।कुछ मामलों में तो वहाँ घनघोर क्षेत्रीयतावाद और जातिगत संकीर्णता के दुष्प्रभाव भी नज़र आते हैं।

आज के पाठक को गंभीर साहित्य से विमुख करने में पत्रकारिता उद्योग और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की भी बड़ी भूमिका है।वहाँ क्षुद्र राजनीति, फिल्मी गपशप,खेलों की सनसनी, फैशन,वास्तुशास्त्र वगैरह का बोलबाला है।इन्टरनेट गूगल ज्ञान के अंतिम प्रमाण हैं।पत्रिकाओं में स्थानीय रंगत की वैचारिक अनुशासन में निबद्ध छोटी रचनाओं के चयन की जरूरत है।बहुत गुरु गंभीर रचनाओं के लिए तो विश्वविद्यालयों के परिसरों की रचनात्मकता से शून्य तमाम पत्रिकाएँ हैं।संपादक को युगनिर्माता होने का भ्रम मन से निकाल कर नयी रचनाशीलता के लिये नवलेखन की नर्सरी तैयार करनी ही होगी।अन्यथा इस क्षेत्र से हट जाने में ही भाषा और साहित्य की भलाई है।

करीब चार दशक पहले बाबा नागार्जुन ने मुझसे कहा कि पत्रिकाएँ आकार प्रकार में सचमुच"लघु"होनी चाहिए।हजारीबाग से वे लौटे थे।उन्होंने एक संपादक से पत्रिका निकालने का उद्देश्य पूछा।सहज उत्तर मिला, "प्रशासन में कोर्ट-कचहरी में कुछ पहचान बन जाती है!"ऐसे"यश"के अलावा और भी पदोन्नतिमूलक-देशविदेश में पर्यटन-अमरत्व की लालसा आदि से प्रेरित होकर पत्रिकाओं के दस-बीस अंक निकाल दिये जाते हैं।सोशलमीडिया ने अनेक"शार्ट कट"साहित्यिक पत्रकारिता को सुलभ करा दिये हैं। फिर भी साहित्य-साधना के पुराने पारंपरिक रास्ते अभी बन्द नहीं हुए।उन रास्तों के झाड़-झंखाड़ साफ करते हुए लघु पत्रिकाओं का अर्थशास्त्र भी ठीक से समझना अनिवार्य है।-वाचस्पति.



रचनाकर्म को उत्कर्ष तक पहुंचाना सम्पादक का काम

 नए रचनाकारों को उत्कर्ष तक पहुंचना हमारा दायित्व

पलाश विश्वास


हमारे हिसाब से अप्रतिष्ठित, युवा और नए, ग्रामीण और वंचित तबकों,छात्रों,बच्चो और स्त्रियों की रचना को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन संपादकीय चुनौती यह होती है कि ऐसे रचनाकारों से निरन्तर संवाद के जरिए उनकी रचनात्मकता को दिशा और दृष्टि के साथ उत्कर्ष तक पहुंचाना होता है।


 कमजोर रचना से रचनाकार को नुक्सान सबसे ज्यादा होता है। उससे बेहतर और श्रेष्ठ लिखवाने का कार्य भार संपादक का होता है।


उत्तरार्द्ध के संपादक सव्यसाची और दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय ऐसे विरल संपादकों में थे। रचना लौटाने के साथ वे बार बार प्रासंगिक सामग्री को रचना बनाने तक रचनाकार से लगातार संवाद करते थे। हमने संपादन प्रभाष जोशी जी से नहीं,इनसे सीखा है।


देश के दूर दराज के इलाकों में इन दोनों ने हर तबके में रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की थी।


जनसत्ता संपादकीय में मंगलेश डबराल, हरिशंकर व्यास, जवाहर लाल कौल, बनवारी जी के अलावा बाकी साथी भी किसी न किसी रूप में दोनों से जुड़े हुए थे। प्रभाष जी ने इसी टीम का नेतृत्व किया। नतीजा अब इतिहास है।


कुछ संपादकों ने कस्बों और महानगरों में अपने लोग तैयार जरूर किए, आंदोलन भी चलाए, वाणिज्यिक दृष्टि से पत्रिका को सफल भी बनाया। लेकिन समता और न्याय के सिद्धांत से वे दूर थे। 


गिरोह की तरह काम करने वाले ऐसे नेटवर्क ने साहित्य में आभिजात्य, जाति और वर्ग वर्चस्व को मजबूत किया। जिससे अनेक रचनाकारों की भ्रूण हत्याएं भी होती रही।


अब अस्मिता और विमर्श केन्द्रित संपादन से साहित्य में बाड़ा बन्दी और इजारेदारी की हालत भी बनने लगी है। असहिष्णुता रचनात्मकता और सृजन पर भारी है।


हिंदी में राष्ट्रभाषा होने के दावे के बावजूद भाषा और बोलियों का लोकतंत्र अनुपस्थित है। 


कुलीन बौद्धिकता और निषेधात्मक रवैये के कारण, आलोचकों की जातीय पूर्वाग्रह और प्रकाशकों की मुनाफाखोर सरकारी खरीद निर्भर प्रकाशन के कारण साहित्य में आम जनता और सामान्य पाठकों की कोई भूमिका नहीं बन सकी।


संवाद का माहौल भी धीरे धीरे ख़तम होता चला गया।

आत्मलोचना से हम इस स्थिति को बदल सके तो हिंदी के जरिए देश की जनता के हक जकुक की लड़ाई इस तानाशाही के आलम में भी बुलंद हो सकती है।


इस पर सहमति असहमति के साथ व्यापक संवाद अनिवार्य है।


रघुवीर सहाय की दिनमान से विदाई के साथ हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में कारपोरेट युग की शुरुआत हो गई। प्रभाष जोशी, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव के अवसान के साथ लघु पत्रिका आंदोलन के बिखराव और विचलन से अब संपादक नामक प्रतिष्ठान ख़तम है। संपादक या तो बॉस है या फिर मैनेजर। इस युग में दलाल और बाजारू साहित्य और पत्रकारिता के मसीहा, माफिया आलोचकों का उत्थान भी हुआ।


इससे हिंदी, साहित्य और पत्रकारिता का चरित्र जनविरोधी बन गया है। यह सत्ता और तानाशाही में निष्णात है। इस पर क्या हम बात करने को तैयार हैं?


पलाश विश्वास

बसन्ती पुर

16.06.2021

विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम

 हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार काजी नज़रुल इस्लाम

- शैलेन्द्र चौहान

हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार और महत् आकांक्षी बांग्ला कवि-लेखक काजी नज़रुल इस्लाम

आधुनिक बांग्ला काव्य एवं संगीत के इतिहास में निस्संदेह एक युग प्रवर्तक थे। प्रथम महायुद्ध के उपरांत आधुनिक बांग्ला काव्य में रवीन्द्र काव्य को एकमात्र परिष्कृत विद्यत्व और चेतना की देन माना जाता है। रवींद्र काव्य मानवीयता, विश्वबंधुत्व का प्रणेता और सामाजिक विसंगतियों से उबरने की संभ्रांत चेतना का संवाहक है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के बाद 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में केवल काजी नज़रुल इस्लाम ही एक निर्भीक और सशक्त रचनाकार रहे हैं। ध्यातव्य है कि गुरुदेव के पश्चात साहित्य और संगीत की युगलबंदी में जिन प्रख्यात कवियों और साहित्यकारों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, उनमें काज़ी नज़रुल का नाम सर्वोपरि है। नजरुल ने लगभग 4,000 गीतों की रचना की तथा कई गानों को आवाज दी। जिन्हें 'नजरुल संगीत' या ‘नजरुल गीति’ नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि यद्यपि काजी नज़रुल इस्लाम को अंग्रेजी साहित्य का उतना प्रगाढ़ ज्ञान नहीं था, तथापि उनकी अंतश्चेतना इतनी विलक्षण थी कि अंग्रेजी का अल्पबोध होते हुए भी अंग्रेजी के कई पुराने कवियों की रचनाओं के बरक्स उनकी रचनाएं रखी जा सकती हैं। उनमें काव्य का एक नूतन सौष्ठव एवं स्वरूप झांकता है। विविध भाषाओं के इंद्रधनुषी आकाश में बांग्ला साहित्य का अवदान संभवत: सर्वाधिक वैशिष्ट्यपूर्ण और सुपठित है। यहां यह कहना उचित होगा कि भारतीय वाड्मय उस महासागर की तरह विस्तीर्ण और अथाह है जिसमें अनेक नाले-नदियां अपने अस्तित्व को भुलाकर एक साथ विलीन हो जाते हैं और एक नवीन रूप सृजित हो जाता है।

कहा जा सकता है कि नज़रुल के जीवनदर्शन और प्रतिभा से, 20वीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में साहित्य और संगीत के मेलजोल से एक नए इतिहास की रचना का मार्ग प्रशस्त हुआ। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश दोनों ही जगह उनकी कविता और गीतों की बृहत व्‍याप्ति है।

नजरुल का जन्म 24 मई, 1899 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में आसनसोल के निकट चुरुलिया गांव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा धार्मिक (मजहबी) शिक्षा के रूप में हुई। इनके पिता काजी फकीर अहमद मस्जिद में इमाम थे और मां जाहिदा खातून एक घरेलू महिला। दस वर्ष की अल्पवय में ही पिता का साया सर से उठ गया। तब नज़रुल ने उसी मस्जिद में म्युज़िन (अज़ान देने वाला) का कार्य संभाला। उन्होंने ग्रामीण नाट्य समूह 'लेटो' दल के साथ काम करते हुए कविता, नाटक और साहित्य के बारे में सीखा। 'लेटो' पश्चिम बंगाल का लोक गीत शैली है, जो आमतौर पर उस क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है (उस क्षेत्र का लोक उत्सव है)। तदनंतर किशोरावस्था में विभिन्न थिएटर समूहों के साथ काम करते-करते उन्होंने कविता, नाटक एवं साहित्य का अध्ययन किया।

उनके चाचा फजले करीम एक संगीत मंडली (नाटक कंपनी) के साथ थे। वह मंडली पूरे बंगाल में घूमती और शो करती थी। नज़रुल ने मंडली के लिए गाने लिखे। इस दौरान नज़रुल ने बांग्ला भाषा को लिखना सीखा। 1910 में उन्होंने नाटक कंपनी छोड़ दी और सिअरसोल राज हाई स्कूल, रानीगंज, आसनसोल में प्रवेश ले लिया। वहां जुगांतर से संबद्ध शिक्षक निबारनचंद्र घटक के प्रभाव में आए। इसके बाद वह माथरुन हाई इंगलिश स्कूल में प्रविष्ट हुए। यहां विद्वान कवि कुमुदरंजन मलिक के संपर्क में आए। यहाां उनकी साहित्यिक रुचि विकसित हुई। लेकिन पारिवारिक कारणों से वह आगे पढ़ाई जारी नहीं रख पाए। और वह लोक कलाकारों के एक समूह 'कावियाल्स' से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने 1914 में दरियापुर स्कूल में प्रवेश ले लिया। जहां संस्कृत, बांग्ला, फारसी और अरबी भाषा सीखी। जिसके बाद कभी बांग्ला, तो कभी संस्कृत में पुराण पढ़ने लगे। आगे इसका असर उनके लेखन में भी नजर आने लगा। उन्होंने पौराणिक कथाओं पर आधारित ‘शकुनी का वध’, ‘युधिष्ठिर का गीत’, ‘दाता कर्ण’ जैसी नाटक लिखे। काली, शिव और कृष्ण पर भजन भी लिखे। मुझे लगता है कबीर के अलावा नज़ीर अकबराबादी के बाद हिंदू मिथकों और प्रतीकों पर साहित्य रचना करने वाले वह संभवतः अकेले आधुनिक और बड़े कवि हैं। सूफी परंपरा का प्रभाव भी उनपर अवश्य था। खुसरो, रूमी, फिरदौसी को भी उन्होंने पढ़ा था। 

नज़रुल 1917 में ब्रिटिश-इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। उनकी तैनाती कराची छावनी में हुई। यहां वह कराची के स्थानीय कवियों के संपर्क में आए और पठन-पाठन पर अधिक समय दे सके। इसी समय बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित हुए और साम्यवादी विचारों प्रति आकर्षित हुए। 1919 में उनकी एक कविता पुस्तक 'मुक्ति' और एक गद्य की पुस्तक 'बौंदुलेर आत्मकहिनी' प्रकाशित हुई। सेना में रहकर अंग्रेजों के औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी चरित्र को उन्होंने समझा और 1920 में सेना से त्यागपत्र दे दिया। बंगाल वापस लौटकर वह बंगाली मुस्लिम लिटरेरी सोसाइटी से जुड़ गए। इसी वर्ष उनका उपन्यास 'बंधनहारा' (बंधन-मुक्ति) आया। 12 अगस्त 1922 को उन्होंने अपनी पत्रिका 'धूमकेतु' प्रकाशित की जिसमें स्वतंत्रता के पक्ष में क्रांतिकारी साहित्य छपता था। तभी उनकी सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण कविता 'बिद्रोही' बिजली नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। तभी आनंद का आगमन कविता के प्रकाशन के बाद ब्रिटिश शासन ने उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया।

विद्रोही कविता की कुछ पंक्तियां देखें -


मैं महाविद्रोही अक्लांत

उस दिन होऊंगा शांत

जब उत्पीड़ितों का क्रंदन शोक

आकाश वायु में नहीं गूंजेगा

जब अत्याचारी का खड्ग

निरीह के रक्त से नहीं रंजेगा

मैं विद्रोही रणक्लांत

मैं उस दिन होऊंगा शांत

पर तब तक

मैं विद्रोही दृढ बन

भगवान के वक्ष को भी

लातों से देता रहूंगा दस्तक

तब तक

मैं विद्रोही वीर

पी कर जगत का विष

बन कर विजय ध्वजा

विश्व रणभूमि के बीचों-बीच

खड़ा रहूंगा अकेला

चिर उन्नत शीश

मैं विद्रोही वीर..


इसके पश्चात नज़रुल 'बिद्रोही कोबी' के नाम से पहचाने जाने लगे। कविता ‘विद्रोही’ काफी लोकप्रिय हुई, जिसने उन्हें पर्याप्त प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि दी। कविता में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बागी तेवर थे। इस कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। अतः ब्रिटिश हुकूमत की आंखों में वह हमेशा ही गड़ते रहे। 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में बंगाल में केवल वही एक सशक्त एवं निर्भीक कवि थे। अतः 23 जनवरी 1923 को उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। इसी वर्ष अप्रैल में जेल सुपरिंटेंडेंट के अभद्र व्यवहार और अशालीन भाषा के प्रतिरोध में उन्होंने 40 दिनों का उपवास किया। गांधी का प्रभाव रहा होगा। उसी वर्ष

दिसंबर में वे जेल से बाहर आ गए। 1924 में उनकी एक और पुस्तक 'बिषेर वंशी' प्रकाशित हुई। यह पुस्तक भी अंग्रेजी सरकार ने प्रतिबंधित कर दी। इसके बाद उन्होंने 'श्रमिक प्रजा स्वराज दल' नाम से एक समाजवादी राजनीतिक पार्टी बनाई और साम्राज्यवादी- दमनकारी अंग्रेजी सत्ता के विरोध में वे चेतना फैलाने का काम सक्रिय रूप से करने लगे। 25 अप्रैल 1925 को काजी नज़रुल इस्लाम ने एक हिंदू लड़की प्रमिला देवी से शादी कर ली, जिसका काफी विरोध हुआ था। प्रमिला ब्रह्म समाज से आती थीं। मुस्लिम मजहब के ठेकेदारों ने नज़रुल से कहा कि प्रमिला को धर्मपरिवर्तन करना होगा लेकिन नज़रुल ने एकदम मना कर दिया। इसी समय उन्होंने लांगल नाम से एक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित किया। 1926 में वे परिवार सहित कृष्णानगर में रहने लगे। 1927 में उनका बांग्ला गजलों का प्रथम संग्रह आया। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अनेक मौलिक एवं अनूदित साहित्यिक रचनाओं जैसे-उपन्यास, लघुकथा, नाटक, निबंध, अनुवाद और पत्रकारिता आदि का सृजन किया। उन्होंने बाल साहित्य भी लिखा। वे कुशल गायक व अभिनेता भी रहे। बांग्ला फिल्‍म 'ध्रुव भक्त के डायरेक्टर और रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'गोरा' पर आधारित फिल्‍म के संगीत निर्देशक भी बने। 1928 में वे संगीत की सुप्रसिद्ध कंपनी एचएमवी के साथ जुड़ गए। उसके बाद उनके गीत राष्ट्रीय रेडियो पर प्रसारित होने लगे। 1930 में उनकी पुस्तक 'प्रलय शिक्षा' आई। पुनः उनपर देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ और किताब प्रतिबंधित कर दी गई। गांधी-इर्विन समझौते के बाद रिहा हुए। तीन वर्ष बाद 1933 में उनका एक निबंध संग्रह 'मॉडर्न वर्ल्ड लिटरेचर' भी आया।

1939 में वह कलकत्ता रेडियो में आ गए। तभी उनकी पत्नी प्रमिला देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। पैरालिसिस का अटैक पड़ा। उन उनके इलाज के लिए नज़रुल ने अपनी किताबों के कॉपीराइट तक बेच दिए। उधारी बढ़ गई। वे गंभीर आर्थिक संकट में आ गए जिससे वह कभी उबर नहीं सके। गरीबी पर लिखी उनकी एक कविता में उनकी यह बेबसी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उसकी कुछ पंक्तियां हैं -

गरीबी सर्वाधिक असह्य वस्तु है

जो घर में मुझसे, मेरी पत्नी और बच्चों से

रोज मिलती है।

इन परिस्थितियों के चलते 1940 में वे गहन अवसाद से ग्रस्त हो गए। दो वर्ष बाद उनकी स्थित और गंभीर हो गई। दुर्योग से 1942 में 43 वर्ष की आयु में वह अपनी आवाज़ और याददाश्त खोते हुए एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित होने लगे। यह देखकर 1950 में उनके प्रशंसकों और समर्थकों के एक समूह ने उन्हें योरोप भिजवाने की व्यवस्था की। वह पत्नी सहित लंदन और फिर आस्ट्रिया गए। वहां वियना में डॉ हेंस हॉफ के साथ एक मेडिकल टीम ने उनमें 'पिक्स डिसीज नामक' बीमारी का पता लगाया। यह एक दुर्लभ और लाइलाज न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी थी। जिसमें याददाश्त खोने के साथ-साथ बोलने पर भी प्रभाव पड़ता है और बोलने की शक्ति चली जाती है। 15 अगस्त 1953 को वह वापस कलकत्ता लौट आए। नज़रुल के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आती जा रही थी। बीमारी के कारण वे अलग-थलग पड़ गए और अलगाव में रहने के लिए विवश हो गए। उनकी ऐसी मानसिक हालत के कारण उन्हें रांची (झारखंड ) मनोरोग अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। कई वर्षों तक वहऻ रहे लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उनका जीवन बहुत कष्टप्रद रहा। उनकी पत्नी उनकी देखभाल करती रहीं। 1962 में प्रमिला देवी की मृत्यु हो गई। यह

बहुुुत पीड़ादायक था। अगले दस वर्ष इसी दुख और पीड़ा में बीते। लेकिन इन सब परेशानियों बावजूद यह तो स्पष्ट है कि उनका इतिहास गौरवशाली था। समाज में चेतना प्रसार और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उनका अवदान चिरस्मरणीय रहेगा। साहित्य में तो वह अग्रणी पंक्ति में थे ही।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नज़रुल की राष्ट्रवादी सक्रियता और क्रांतिकारी साहित्य सृजन ही औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उनके लगातार कारावास का कारण बने। जेल में रहते हुए ही नज़रुल ने "राजबन्दीर जबनबन्दी" ("राधारमण", 'एक राजनीतिक कैदी का बयान') लिखा था। दृष्टव्य है, उनके लेखन ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान वहां के मुक्ति संघर्ष को प्रेरित किया। नज़रुल ने अपने लेखन में स्वतंत्रता, मानवता, प्रेम, और क्रांति जैसे विषयों को मुख्य आधार बनाया। उन्होंने कट्टरता और रूढ़ियों का विरोध किया। नज़रुल जीवनपर्यन्त राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के मजबूत आधार-स्तंभ बने रहे। साम्यवाद में उनकी अटूट आस्था थी लेकिन उन्हें अहसास था कि धर्मभीरु जन इस रोग से मुक्त होने में असमर्थ हैं। इसलिए धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध और सौहार्द एवं सद्भाव के पक्ष में वह सृजनशील भी रहे और सक्रिय भी रहे।

उनकी कविता 'साम्यवादी' की पंक्तियां हैं -

गाता हूं साम्यता का गान

जहां आकर एक हो गए

सब बाधा व्यवधान

जहां मिल रहे हैं हिंदू-बौद्ध-मुस्लिम-ईसाई

गाता हूं साम्यता का गान...

द्वितीय महायुद्ध के उपरांत नज़रुल के साहित्य का बृहत् पठन-पाठन आरंभ हुआ। तब तक वह बीमारी के गिरफ्त में आ चुके थे। नज़रुल के साहित्य को पढ़ने के बाद यह अंदाजा लगाना मुश्‍किल नहीं है कि काव्य में मुक्ति, विद्रोह, लैंगिक समानता, सांप्रदायिक सौहार्द और प्रेम आपस में पूरी तरह गुंथे हुए हैं। इसके लिए वे धार्मिक प्रतीकों, मिथकों और मान्यताओं को अपने ढंग से अपनाते हैं। स्त्री समानता पर वह न केेेेवल वैचारिक प्रतिबद्धता और व्यवहारगत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं अपितु

कविता इस तरह लिखते हैं, कि कृष्ण को चुनौती देते हुए कहते हैं कि 'अगर तुम राधा होते' तो वह महसूस करते जो एक स्त्री राधा के रूप में महसूस करती है। उनकी एक कविता से -

अगर तुम राधा होते श्याम


मेरी तरह बस आठों पहर तुम,

रटते श्याम का नाम

वन-फूल की माला निराली

वन जाति नागन काली


कृष्ण, प्रेम की भीख मांगने

आते लाख जनम

तुम, आते इस बृजधाम


उन्होंने बंगाली भाषा में ग़ज़ल को भी समृद्ध किया। एक पुस्तक भी आई। उन्हें अपने कार्यों में अरबी और फारसी शब्दों के व्यापक उपयोग के लिए भी जाना जाता है। इसपर गुरुदेव को भारी आपत्ति भी रही। 'रक्तो' की जगह ॱखून' का प्रयोग उन्हें बहुत नागवार गुजरा। यह विडंबना रही कि

नज़रुल इस्लाम के साहित्य और संगीत के संदर्भ में तत्त्वमूलक और तथ्यपूर्ण विस्तृत मूल्यांकन नहीं हो सका इस क्षेत्र में बहुत थोड़े-से आलोचकों ने ध्यान दिया। यह खेद का विषय है कि उनकी समस्त आलोचनाएं प्राय: एकांगी रहीं। वे युक्तिसंगत नहीं थीं। उनके अत्यंत निकटस्थ मित्रों ने उनके बारे में कुछ समीक्षाएं अवश्य छपवाई। बीच-बीच में ऐसे कुछ मोड़ आए जहां उनका काव्य और संगीत अपने प्रकृत स्वरूप को खो बैठा। लयह उन्होंने जानबूझकर भी किया। दरअसल कंटेंट उनके लिए महत्वपूर्ण था फॉर्म गौण। इस सबके बावजूद नज़रुल बांग्ला भाषा के अन्यतम श्रेष्ठ सामाजिक चेतना के कवि रहे। नज़रुल की संपूर्ण रचनाओं का कहीं भी कोई ब्योरा तिथिवार नहीं मिलता। लेकिन यदि किसी को नज़रुल की संपूर्ण रचनाओं का विधिवत अध्ययन करना हो तो उसे पश्चिमी बंगाल में स्थित बालीगंज के पुस्तकालय को अवश्य देखना चाहिए। इसी पुस्तकालय में उनकी संपूर्ण रचनाएं संभालकर रखी हुई हैं। हिंदी में उनपर बहुत कम लिखा गया। उनकी मृत्यु के उपरांत 1976 में कवि विष्णुचंद्र शर्मा की उनके जीवन पर एक किताब 'अग्निसेतु' नाम से आई। एक जन गीतकार एवं सुर-साधक के रूप में भी नज़रुल सर्वोच्च स्थान के अधिकारी हैं। 1972 में बांग्लादेश सरकार के निमंत्रण पर नज़रुल का परिवार उन्हें ढाका, बांग्लादेश ले गया। वहां ससम्मान उन्हें पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश की नागरिकता प्रदान की गई। उन्हें बांग्लादेश ने ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया। चार साल बाद 29 अगस्त 1976 को बांग्लादेश में उनकी मृत्यु हो गई। वहां उनकी इच्छानुसार उन्हें ढाका विश्वविद्यालय के सामने दफनाया गया।

संपर्क :34/242, सेक्‍टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033

मो.7838897877


बहुत तथ्यात्मक आलेख


Palash Biswas: मेरी नज़र में कोई तथ्यात्मक गलती नहीं है। बंगाल के साहित्यिक मित्रों को भेजता हूँ। बंगला में भी उनके समग्र व्यक्तित्व और रचना संसार पर इस तरह ववचन नही हुआ। नोबेल मिलने से रवींद्र नाथ को कवि न मानने वाले बांग्ला साहित्य जगत रवीन्द्र के जनपक्षधर रचनासन्सार के बजाय उनके गीतों,नृत्य नाटिकाओं और गीतांजलि तक ही रवींद्र विमर्श को सीमाबद्ध रखता आया है। 

रवीन्द्र और नज़रुल को उनके गीतों के जरिये बांग्लादेश और बंगाल की स्त्रियों ने ज़िंदा रखा है। दोनों स्त्री स्वतंत्रता के प्रखर प्रवक्ता रहे हैं।

नज़रुल की लोक में रवींद्र के मुकाबले ज्यादा पैठ थी।क्योंकि बंगला लोकसंगीत को प्राण फूंकने वाले अब्बसुद्दीन और बांग्ला के लोक में रचे बसे जसीमुद्दीन के साथ उनकी तिकड़ी थी,जिन्होंने लोक गीतों और लोकधुनों को खोजने में पूरे बंगाल की खाक छानी। बाद में शचीन देव बर्मन,पंकज मित्र,सलिल चौधरी ,ऋत्विक घटक ने सिनेमा और इप्टा ने रंगमंच के जरिये उसे सर्व भारतीय बना दिया।

अब भी बंगाली भद्रलोक काज़ी नज़रुल को कोलाहल का कवि मानते हैं।

इस आलेख का बंगला अनुवाद जरूर होना चाहिए।

पलाश विश्वास

Thursday, June 10, 2021

उनका नाम तुलसी नहीं था,लेकिन वे तुलसी बनकर जीती रही और उसी तुलसी का महाप्रस्थान

 तुलसी चाची का महाप्रयाण

पलाश विश्वास

उनका नाम तुलसी नहीं था।


भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से सरहद पार करते हुए और शरणार्थी शिविरों में महामारी फैलते रहने से लाखों परिवार कट फट कर आधे अधूरे रह गए थे। लाखों बच्चे मनाथ हो गए थे।


बसंतीपुर में भी बहुत से परिवार आधे अधूरे आये। बाप बेटा, चाचा भतीजा, मौसी मौसा और भांजा,इस तरह के परिवार ने बसंतीपुर आकर नए सिरे से खुद को जोड़ा।


 अनेक परिवारों में स्त्रियां नहीं थीं। जो स्त्रियां आईं,उनका मायका उस पार या इस पार कहीं और छूट गया या जनसंख्या स्थानांतरण की त्रासदी में हमेशा के लिए खो गया। इन स्त्रियों ने गांव में ही किसी को पिता,किसीको भाई बनाकर नए रिश्ते बना लिए। 


बच्चों ने भी दूसरी औरत को अपनी मां और उनके बच्चों को अपना भाई मानकर जीना सीखा।


अतुल मिस्त्री और उनके भाई अनाथ किशोर थे। वे हमारे परिवार के साथ आये। उनके माता पिता अभिभावक नहीं थे।वे हमारे ही परिवार में शामिल हो गए। लेकिन अलग परिवार न होने से उनको जमीन अलॉट नहीं हो सकती थी।


 तब बसंतीपुर एक साझा परिवार था। बल्कि यह कहें कि दिनेशपुर की सभी 36 बंगाली कालोनियों के लोग एक विशाल संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे।


विवाहयोग्य युवकों की गांव में आस पास विवाह कराकर आधे अधूरे परिवार में एक स्त्री को दाखिल कराकर उनको जमीन अलॉट करवाई गई।


बसंतीपुर के मातबरों पुलिन बाबू, maandaar मण्डल, शिशुवर मण्डल, वरदाकान्त मण्डल,हरि ढाली, अतुल शील और रामेश्वर ढाली ने जुगत लगाई और विवाह से पहले ही अतुल काका को विवाहित दिखाकर उन्हें और अवनी काका को जमीन दिला दी गई।


 अतुल काका की पत्नी का नाम कागजात में तुलसी लिख डियां गया।


फिर सबने मिलकर उनके लिए दुल्हन खोज निकाला,जो पड़ोसी गांव हरिदासपुर की थी। उनका असली नाम क्या था,किसीको नहीं मालूम। 


वे तुलसी बनकर बसंतीपुर आयी और तुलसी के रूप में ही कल उनका महाप्रयाण हो गया।


 वे अरसे से अस्वस्थ थीं। छोटे से कद की काकी बिल्कुल अकेली हो गयी थी। कैसे वे अबतक जीती रहीं,यही चमत्कार है।


महीने भर पहले उनकी देवरानी अवनी काका की पत्नी का देहांत हो गया था। अतुल काका भी बहुत पहले दिवंगत हो गए। रंगकर्मी और अध्यापक अवनी काका का गेठिया टीबी अस्पताल में उनसे भी पहले निधन हो गया था। 


अतुल काका और तुलसी काका की बड़ी बेटी विवाह के बाद दिवंगत हो गयी।तो दो बेटों का भी विवाह के बाद निधन हो गया।


तुलसी काकी ने जीवन भर इतने दुख झेले कि उनके शरीर में कुछ बचा ही न था। 


चिता पर उठाने के एक घण्टा पैंतालीस मिनट के अंदर ही वे पंचतत्व में विलीन हो गयी।


 रंगकर्मी, अध्यापक अवनी काका और छोटी काकी की कथा फिर कभी।


तुलसी काकी और अतुल काका

शरत चन्द्र की नायिका से कम नही थी हमारी सावित्री भाभी

 सावित्री भाभी की त्रासदी और  लॉक डाउन और कोरोना कर्फ्यू में ज़िंदगी और मौत


पलाश विश्वास


आज बसंतीपुर में शोक का समय है।

हमारी सावित्री भाभी करीब आठ महीने तक मरणासन्न रहने के बाद कल रात 3 बजे के करीब चल बसी। वे 70 साल के करीब थी।


पति हाजू साना की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी। एकमात्र बेटा जगदीश शायद लिवर सिरोयसिस से जवानी में ही चल बसा।दो बेटियां हैं। जगदीश के दो बेटे पंकज और सूरज उनकी देखभाल करते रहे हैं।



आठ महीने पहले हल्द्वानी अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हल्द्वानी से मतकोटा काली नगर के रास्ते बसंतीपुर आते हुए गड्ढों में गाड़ी उछलते रहने से वे रास्ते में जिंदा  हो गयी। 


गांव में तब मौत की खबर फैल गयी थी। लेकिन सावित्री भाभी घर ज़िंदा लौटी।


उससे महज तीन दिन पहले उन्हें दिनेशपुर निकलते वक्त सड़क साफ करते देखा था। 


अजब गजब जीवट की थी सावित्री भाभी। शरत चन्द्र की किसी नायिका से कम कष्ट और शोक उन्होंने नहीं झेले। कम संघर्ष नही किया। वे सारी बातें याद आ रही हैं।


पहले पहल फिर अस्पताल में भर्ती करने की कोशिश हुई। कोई अस्पताल तैयार नही हुआ। वे होश में थी। दिनेशपुर से झोलाछाप डॉक्टर बुलाकर, ग्लूकोज चढ़ाकर उन्हें ठीक करने की कोशिशें की जाती रहीं। वे कभी होश में होती कभी नहीं। खाना पीना थोड़ा बहुत शुरू जरूर हुआ, लेकिन बिस्तर से उठ नहीं सकी।


आज सुबह साढ़े छह बजे उनका पोता पंकज ने दरवाजा खटखटाया और घर में गांववालों को बुलाने की बात कही। मेरी नींद नहीं खुली थी। जागते जागते वह निकल गया था।


साबिता जी बोली, कोरोना समय में क्यों गांव के लोगों को बुला रहा है पंकज?


मेरी नींद उड़नछू हो गई। में तुरन्त समझ गया। उनके घर गया तो अंत्येष्टि की तैयारी हो रही थी।


गांव के लोग सामाजिक दूरी बनाते हुए जमा थे।


सामने राशन की दुकान पर बीपीएल कार्ड वालों को पहलीबार पांच पांच किलो अनाज बांटा जा रहा था। छोटे छोटे घेरे में लोग खड़े थे।


उनका मायका करीब 60 किमी दूर शक्ति फार्म के रत्न फार्म नम्बर एक में है। फोन कर दिया था। लेकिन जाहिर है कि वे आ नहीं सकते। आस पड़ोस के गांव से पंकज और सूरज की छोटी बहन आयी। अकेली।


मैंने पूछा, तुम्हारा वर कहाँ है?

वह बोली, महाराष्ट्र में लोकडौन में फंसा है।

महाराष्ट्र में कहाँ?

चंद्रपुर के आसपास।

मैंने कहा, चिंता मत करो। वहां हालात ठीक होंगे।

वह बोली, नागपुर में कोरोना के मरीज हैं।


अंदर सावित्री भाभी की छोटी बेटी रो रही थी।

मैंने पूछा, बड़ी कहाँ है?

जवाब मिला, कर्नाटक में फंसी है लॉक डाउन में।


सावित्री भाभी के पति हाजू साना अपने मौसा बिपिन सरदार और मौसी हजारी के साथ बसंतीपुर आये थे। मौसेरे भाई नाबालिग थे। हाजू दा ही खेती करते थे।


बसंतीपुर में ऐसे परिवार काफी थे, जिनमे जोड़ तोड़ कर परिवार बना था। कोई चाचा के साथ, कोई मौसा के साथ, कोई सिर्फ दो भाई। बाकी लोग विभाजन में उस पार छूट गये। ज्यादातर महिलाओं का मायका पीछे छूट गया।


 मेरी ताई और मेरी मां के साथ भी ऐसा हुआ। धर्म भाई, धर्म पिता कहकर ऐसी महिलाओं ने तराई के गांवों में अपना नया मायका बना लिया था।


 दिलों की मरम्मत करने का वह लहूलुहान वक्त था। अपनों से बिछुड़कर परायों को अपना बनाकर फिर ज़िंदगी शुरू करने का वक्त था।


 इसलिए बसंतीपुर में अलग अलग जिलों से आये अलग अलग जातियों के लोग एक साझा परिवार में बदल गए।

इसी लिहाज से हाजू साना मेरे बड़े भाई थे। कार्तिक साना मेरे चाचा हैं। विधु अधिकारी बड़े भाई और दिवंगत महेंद्र मण्डल मेरे मामा।


सावित्री भाभी का विबाह बसंतीपुर में ही हुआ। मुझे उनकी शादी याद नही है।


तब गांव और पूरी तराई में जहां तहां सांप पाए जाते थे। जहरीले सांप। हर साल अनेक लोग सर्पदंश के शिकार होते थे। मन्तर पढ़कर जड़ी बुटी से सांप कटे का इलाज करते थे हाजू दा।


बसंतीपुर की जात्रा पार्टी की बड़ी धूम थी। हाजू दा अनोखे कलाकार थे। रुद्रपुर हल्द्वानी के कार्यक्रमों में भी वे  जाया करते। हंसमुख और हमेशा सबकी मदद करने वाले। पीने की लत लगी और इसीमें जान चली गयी।एकमात्र बेटा भी बाप की तरह मरा।


हाजू दा पता नहीं किससे प्रेम करते थे।

सावित्री भाभी सुंदर थी, लेकिन उन्हें पसंद नहीं थीं।


तीसरी चौथी कक्षा में यह बात समझ में आ गयी। तभी से भाभी अपना दुख मुझसे बांटती थी। नैनीताल पढ़ते हुए यह सिलसिला जारी रहा।


फिर मैं पत्रकारिता में ऐसे खप्प गया कि मुझे पता नही चला कि भाभी किससे अपना दुख बांटती थी। इस बीच हाजू दा और उनके बेटे की मौत हो गयी। उनके मौसा और मौसी भी नही रही। मौसेरे भाई बड़े हो गए। सबसे छोटे मौसेरे भाई से मेरी तहैरी बहन रेखा का विबाह हो गया।


में घर लौट आया 40 साल बाद तो देखा, जगदीश के दोनों बेटे पंकज और सूरज भाभी का बहुत खयाल रखते हैं। पहलीबार सावित्री भाभी को ज़िंदगी में खुश देख रहा था।


उनकी खुशी लम्बी नहों  चली।

 वह बिस्तर पर पड़ गयी। 

अब उन्हें बिस्तर से राहत मिली।


कोरोना कर्फ्यू में बसन्तीपुर में यह पहली मौत है।


मुझे इतनी राहत है कि बाकी देश की तरह सावित्री भाभी की अंत्येष्टि में कोई दिक्कत न हुईं।


लॉक डाउन की वजह से रिश्तेदार नहीं आ सके। लेकिन गांव के रिश्ते अभी सही सलामत है। लॉक डाउन तोड़ नही रहे हैं। सामाजिक दूरी भी बनाये रखते हैं। फिरभी सभी अब भी सुख दुख में साथ साथ हैं।


मनुष्यता और सभ्यता इन्ही गांवों में बसी है।


आत्मीयता और रिश्ते भी, परिवार और समाज भी गांव में बचे हुए हैं, जिनपर मुक्त बाजार और पूंजीवाद को कोई असर नही हैं।


मुझे खूब महसूस हो रहा है कि महानगरों और बड़े शहरों के मुक्त बाजार से करोड़ो की तादाद में जो लोग गांव पैदल भी पहुंचना चाहते हैं, वे रोजी रोटी के लिए नहीं, इन्ही रिश्तों, इन्हीं परिवारों और इसी शुद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के  लिए सब कुछ दांव पर लगाकर घर आना चाहते हैं।


कोरोना को हारना ही होगा।

मुक्तबाजार और पूंजीवाद का ग्लोबल तिलिस्म भी न्यूयार्क से लेकर भारत के गांवों में भी टूटने लगा है।

बसंतीपुर

2020

Tuesday, June 8, 2021

हमारे पुरखों के स्मारक

 हमारे पुरखों के स्मारक

पलाश विश्वास

दिनेशपुर के बंगाली गांवों में 1952 से 1956 तक कुल एक हजार रुपये की लागत से बिना सीमेंट के एक कमरे का यह क्वार्टर प्रति परिवार बनाकर दिया गया था। क्वॉर्टर और एक जोड़ा हलवाहा बैल के बाबत प्रति परिवार 1200 रुपये का लोन चढ़ाया गया था। जो बहुत बड़ी रकम थी उसवक्त। करीब एक दशक तक दिल्ली लखनऊ की दौड़ के बाद पिताजी पुलिनबाबू ने यह कर्ज माफ करवा लिया था।


अब गांवों में ऐसे क्वॉर्टर बहुत कम बचे हैं।60 के दशक तक ये गांव जंगल से घिरे थे। 


पचास के दशक में बाघ,चीते भी जहां तहां  घूमते नज़र आते थे। उन जंगली जानवरों से बचने और तराई में अक्सर आने वाली आंधियों के मुकाबले ये एक कमरे के क्वार्टर किसी किले से कम नहीं था।जिसमें बड़े बड़े परिवार समा जाते थे।


 जहरीले सांपों से बचने के लिए भी ये क्वार्टर बड़े काम के थे। इसी क्वार्टर को घेरकर मिट्टी और सन की झोपडियां हुआ करती थी।


मेरे घर में 2006 तक माताजी,पिताजी, ताईजी,ताऊजी,चाचाजी,चाचीजी के निधन हो जाने के बाद तक यह क्वार्टर था। एक अदद क्वार्टर और उसे घेरे झोपड़ियां।


मेरा और मेरे भाई बहनों का जन्म इसी  तरह के एक कमरे के क्वार्टर में हुआ था,जिसके बरामदे में चिमनी बनी हुई थी। जहां रसोई हुआ करती थी।जो


बिजली आई 1969 में। लैंप पोस्ट लगे थे। घरों में बिजली नहीं थी। लू से बचने के लिए आम और नीम के पेड़ हुआ करते थे। गर्मी की रातें क्वार्टर की छत पर बीतती थी और छत पर ही केले का पेड़ लगाकर दिवाली के दिये जलाए जाते थे।


यह मेरे दोस्त टेक्का उर्फ नित्यानन्द मण्डल का है। अब भी जवान सदाबहार टेक्का की दादी ललिता देवी का राजपाट यहीं से चलता था। 


इसी क्वार्टर से ललिता जी यानी टेक्का कीं दादी का बक्सा तोड़कर उनका खजना लूटकर हाईस्कूल पास करने से पहले हमारा हीरो टेक्का बम्बई भाग गया था हीरो बनने। बंबई के रास्ते आगरा में ठहर कर टीवी ठीक करने का काम सीखकर आया।सिनेमा का भूत उतर गया।लेकिन हाईस्कूल पास करने के बाद पढ़ाई अधूरी छोड़ दी।


ललिता जी बहुत दबंग थी।इतनी दबंग की अपने बेटों टेक्का के पिता भोला नाथ और   नरेन्द्र नाथ के साथ गांव के मुखिया मंदार मण्डल की भी पिटाई कर देती थी। कार्तिक    काका अपने चाचा निबारन साना और दीदी मांदरी के साथ आये थे।


 शुरुआत में कार्तिक काका की शादी तक ललिता जी उनके साथ थी। उनकी भी पिटाई हो जाती थी। हम किस खेत की मूली थे? 


नहाने के वक्त गांव के सभी बच्चों को तेल लगाकर नहलाना और खाने के वक्त पकड़कर खिलाना भी ललिताजी की दिनचर्या थी। वे गांववालों के साथ मछली मारने में भी अगुआई करती थी।


हर क्वार्टर की अलग कथा है। ये क्वार्टर सही मायने में हमारे पुरखों के स्मारक हैं।