Sunday, June 20, 2021

विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम

 हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार काजी नज़रुल इस्लाम

- शैलेन्द्र चौहान

हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार और महत् आकांक्षी बांग्ला कवि-लेखक काजी नज़रुल इस्लाम

आधुनिक बांग्ला काव्य एवं संगीत के इतिहास में निस्संदेह एक युग प्रवर्तक थे। प्रथम महायुद्ध के उपरांत आधुनिक बांग्ला काव्य में रवीन्द्र काव्य को एकमात्र परिष्कृत विद्यत्व और चेतना की देन माना जाता है। रवींद्र काव्य मानवीयता, विश्वबंधुत्व का प्रणेता और सामाजिक विसंगतियों से उबरने की संभ्रांत चेतना का संवाहक है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के बाद 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में केवल काजी नज़रुल इस्लाम ही एक निर्भीक और सशक्त रचनाकार रहे हैं। ध्यातव्य है कि गुरुदेव के पश्चात साहित्य और संगीत की युगलबंदी में जिन प्रख्यात कवियों और साहित्यकारों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, उनमें काज़ी नज़रुल का नाम सर्वोपरि है। नजरुल ने लगभग 4,000 गीतों की रचना की तथा कई गानों को आवाज दी। जिन्हें 'नजरुल संगीत' या ‘नजरुल गीति’ नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि यद्यपि काजी नज़रुल इस्लाम को अंग्रेजी साहित्य का उतना प्रगाढ़ ज्ञान नहीं था, तथापि उनकी अंतश्चेतना इतनी विलक्षण थी कि अंग्रेजी का अल्पबोध होते हुए भी अंग्रेजी के कई पुराने कवियों की रचनाओं के बरक्स उनकी रचनाएं रखी जा सकती हैं। उनमें काव्य का एक नूतन सौष्ठव एवं स्वरूप झांकता है। विविध भाषाओं के इंद्रधनुषी आकाश में बांग्ला साहित्य का अवदान संभवत: सर्वाधिक वैशिष्ट्यपूर्ण और सुपठित है। यहां यह कहना उचित होगा कि भारतीय वाड्मय उस महासागर की तरह विस्तीर्ण और अथाह है जिसमें अनेक नाले-नदियां अपने अस्तित्व को भुलाकर एक साथ विलीन हो जाते हैं और एक नवीन रूप सृजित हो जाता है।

कहा जा सकता है कि नज़रुल के जीवनदर्शन और प्रतिभा से, 20वीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में साहित्य और संगीत के मेलजोल से एक नए इतिहास की रचना का मार्ग प्रशस्त हुआ। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश दोनों ही जगह उनकी कविता और गीतों की बृहत व्‍याप्ति है।

नजरुल का जन्म 24 मई, 1899 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में आसनसोल के निकट चुरुलिया गांव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा धार्मिक (मजहबी) शिक्षा के रूप में हुई। इनके पिता काजी फकीर अहमद मस्जिद में इमाम थे और मां जाहिदा खातून एक घरेलू महिला। दस वर्ष की अल्पवय में ही पिता का साया सर से उठ गया। तब नज़रुल ने उसी मस्जिद में म्युज़िन (अज़ान देने वाला) का कार्य संभाला। उन्होंने ग्रामीण नाट्य समूह 'लेटो' दल के साथ काम करते हुए कविता, नाटक और साहित्य के बारे में सीखा। 'लेटो' पश्चिम बंगाल का लोक गीत शैली है, जो आमतौर पर उस क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है (उस क्षेत्र का लोक उत्सव है)। तदनंतर किशोरावस्था में विभिन्न थिएटर समूहों के साथ काम करते-करते उन्होंने कविता, नाटक एवं साहित्य का अध्ययन किया।

उनके चाचा फजले करीम एक संगीत मंडली (नाटक कंपनी) के साथ थे। वह मंडली पूरे बंगाल में घूमती और शो करती थी। नज़रुल ने मंडली के लिए गाने लिखे। इस दौरान नज़रुल ने बांग्ला भाषा को लिखना सीखा। 1910 में उन्होंने नाटक कंपनी छोड़ दी और सिअरसोल राज हाई स्कूल, रानीगंज, आसनसोल में प्रवेश ले लिया। वहां जुगांतर से संबद्ध शिक्षक निबारनचंद्र घटक के प्रभाव में आए। इसके बाद वह माथरुन हाई इंगलिश स्कूल में प्रविष्ट हुए। यहां विद्वान कवि कुमुदरंजन मलिक के संपर्क में आए। यहाां उनकी साहित्यिक रुचि विकसित हुई। लेकिन पारिवारिक कारणों से वह आगे पढ़ाई जारी नहीं रख पाए। और वह लोक कलाकारों के एक समूह 'कावियाल्स' से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने 1914 में दरियापुर स्कूल में प्रवेश ले लिया। जहां संस्कृत, बांग्ला, फारसी और अरबी भाषा सीखी। जिसके बाद कभी बांग्ला, तो कभी संस्कृत में पुराण पढ़ने लगे। आगे इसका असर उनके लेखन में भी नजर आने लगा। उन्होंने पौराणिक कथाओं पर आधारित ‘शकुनी का वध’, ‘युधिष्ठिर का गीत’, ‘दाता कर्ण’ जैसी नाटक लिखे। काली, शिव और कृष्ण पर भजन भी लिखे। मुझे लगता है कबीर के अलावा नज़ीर अकबराबादी के बाद हिंदू मिथकों और प्रतीकों पर साहित्य रचना करने वाले वह संभवतः अकेले आधुनिक और बड़े कवि हैं। सूफी परंपरा का प्रभाव भी उनपर अवश्य था। खुसरो, रूमी, फिरदौसी को भी उन्होंने पढ़ा था। 

नज़रुल 1917 में ब्रिटिश-इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। उनकी तैनाती कराची छावनी में हुई। यहां वह कराची के स्थानीय कवियों के संपर्क में आए और पठन-पाठन पर अधिक समय दे सके। इसी समय बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित हुए और साम्यवादी विचारों प्रति आकर्षित हुए। 1919 में उनकी एक कविता पुस्तक 'मुक्ति' और एक गद्य की पुस्तक 'बौंदुलेर आत्मकहिनी' प्रकाशित हुई। सेना में रहकर अंग्रेजों के औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी चरित्र को उन्होंने समझा और 1920 में सेना से त्यागपत्र दे दिया। बंगाल वापस लौटकर वह बंगाली मुस्लिम लिटरेरी सोसाइटी से जुड़ गए। इसी वर्ष उनका उपन्यास 'बंधनहारा' (बंधन-मुक्ति) आया। 12 अगस्त 1922 को उन्होंने अपनी पत्रिका 'धूमकेतु' प्रकाशित की जिसमें स्वतंत्रता के पक्ष में क्रांतिकारी साहित्य छपता था। तभी उनकी सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण कविता 'बिद्रोही' बिजली नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। तभी आनंद का आगमन कविता के प्रकाशन के बाद ब्रिटिश शासन ने उनपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया।

विद्रोही कविता की कुछ पंक्तियां देखें -


मैं महाविद्रोही अक्लांत

उस दिन होऊंगा शांत

जब उत्पीड़ितों का क्रंदन शोक

आकाश वायु में नहीं गूंजेगा

जब अत्याचारी का खड्ग

निरीह के रक्त से नहीं रंजेगा

मैं विद्रोही रणक्लांत

मैं उस दिन होऊंगा शांत

पर तब तक

मैं विद्रोही दृढ बन

भगवान के वक्ष को भी

लातों से देता रहूंगा दस्तक

तब तक

मैं विद्रोही वीर

पी कर जगत का विष

बन कर विजय ध्वजा

विश्व रणभूमि के बीचों-बीच

खड़ा रहूंगा अकेला

चिर उन्नत शीश

मैं विद्रोही वीर..


इसके पश्चात नज़रुल 'बिद्रोही कोबी' के नाम से पहचाने जाने लगे। कविता ‘विद्रोही’ काफी लोकप्रिय हुई, जिसने उन्हें पर्याप्त प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि दी। कविता में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बागी तेवर थे। इस कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। अतः ब्रिटिश हुकूमत की आंखों में वह हमेशा ही गड़ते रहे। 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में बंगाल में केवल वही एक सशक्त एवं निर्भीक कवि थे। अतः 23 जनवरी 1923 को उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। इसी वर्ष अप्रैल में जेल सुपरिंटेंडेंट के अभद्र व्यवहार और अशालीन भाषा के प्रतिरोध में उन्होंने 40 दिनों का उपवास किया। गांधी का प्रभाव रहा होगा। उसी वर्ष

दिसंबर में वे जेल से बाहर आ गए। 1924 में उनकी एक और पुस्तक 'बिषेर वंशी' प्रकाशित हुई। यह पुस्तक भी अंग्रेजी सरकार ने प्रतिबंधित कर दी। इसके बाद उन्होंने 'श्रमिक प्रजा स्वराज दल' नाम से एक समाजवादी राजनीतिक पार्टी बनाई और साम्राज्यवादी- दमनकारी अंग्रेजी सत्ता के विरोध में वे चेतना फैलाने का काम सक्रिय रूप से करने लगे। 25 अप्रैल 1925 को काजी नज़रुल इस्लाम ने एक हिंदू लड़की प्रमिला देवी से शादी कर ली, जिसका काफी विरोध हुआ था। प्रमिला ब्रह्म समाज से आती थीं। मुस्लिम मजहब के ठेकेदारों ने नज़रुल से कहा कि प्रमिला को धर्मपरिवर्तन करना होगा लेकिन नज़रुल ने एकदम मना कर दिया। इसी समय उन्होंने लांगल नाम से एक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित किया। 1926 में वे परिवार सहित कृष्णानगर में रहने लगे। 1927 में उनका बांग्ला गजलों का प्रथम संग्रह आया। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अनेक मौलिक एवं अनूदित साहित्यिक रचनाओं जैसे-उपन्यास, लघुकथा, नाटक, निबंध, अनुवाद और पत्रकारिता आदि का सृजन किया। उन्होंने बाल साहित्य भी लिखा। वे कुशल गायक व अभिनेता भी रहे। बांग्ला फिल्‍म 'ध्रुव भक्त के डायरेक्टर और रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'गोरा' पर आधारित फिल्‍म के संगीत निर्देशक भी बने। 1928 में वे संगीत की सुप्रसिद्ध कंपनी एचएमवी के साथ जुड़ गए। उसके बाद उनके गीत राष्ट्रीय रेडियो पर प्रसारित होने लगे। 1930 में उनकी पुस्तक 'प्रलय शिक्षा' आई। पुनः उनपर देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ और किताब प्रतिबंधित कर दी गई। गांधी-इर्विन समझौते के बाद रिहा हुए। तीन वर्ष बाद 1933 में उनका एक निबंध संग्रह 'मॉडर्न वर्ल्ड लिटरेचर' भी आया।

1939 में वह कलकत्ता रेडियो में आ गए। तभी उनकी पत्नी प्रमिला देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। पैरालिसिस का अटैक पड़ा। उन उनके इलाज के लिए नज़रुल ने अपनी किताबों के कॉपीराइट तक बेच दिए। उधारी बढ़ गई। वे गंभीर आर्थिक संकट में आ गए जिससे वह कभी उबर नहीं सके। गरीबी पर लिखी उनकी एक कविता में उनकी यह बेबसी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उसकी कुछ पंक्तियां हैं -

गरीबी सर्वाधिक असह्य वस्तु है

जो घर में मुझसे, मेरी पत्नी और बच्चों से

रोज मिलती है।

इन परिस्थितियों के चलते 1940 में वे गहन अवसाद से ग्रस्त हो गए। दो वर्ष बाद उनकी स्थित और गंभीर हो गई। दुर्योग से 1942 में 43 वर्ष की आयु में वह अपनी आवाज़ और याददाश्त खोते हुए एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित होने लगे। यह देखकर 1950 में उनके प्रशंसकों और समर्थकों के एक समूह ने उन्हें योरोप भिजवाने की व्यवस्था की। वह पत्नी सहित लंदन और फिर आस्ट्रिया गए। वहां वियना में डॉ हेंस हॉफ के साथ एक मेडिकल टीम ने उनमें 'पिक्स डिसीज नामक' बीमारी का पता लगाया। यह एक दुर्लभ और लाइलाज न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी थी। जिसमें याददाश्त खोने के साथ-साथ बोलने पर भी प्रभाव पड़ता है और बोलने की शक्ति चली जाती है। 15 अगस्त 1953 को वह वापस कलकत्ता लौट आए। नज़रुल के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आती जा रही थी। बीमारी के कारण वे अलग-थलग पड़ गए और अलगाव में रहने के लिए विवश हो गए। उनकी ऐसी मानसिक हालत के कारण उन्हें रांची (झारखंड ) मनोरोग अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। कई वर्षों तक वहऻ रहे लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उनका जीवन बहुत कष्टप्रद रहा। उनकी पत्नी उनकी देखभाल करती रहीं। 1962 में प्रमिला देवी की मृत्यु हो गई। यह

बहुुुत पीड़ादायक था। अगले दस वर्ष इसी दुख और पीड़ा में बीते। लेकिन इन सब परेशानियों बावजूद यह तो स्पष्ट है कि उनका इतिहास गौरवशाली था। समाज में चेतना प्रसार और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उनका अवदान चिरस्मरणीय रहेगा। साहित्य में तो वह अग्रणी पंक्ति में थे ही।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नज़रुल की राष्ट्रवादी सक्रियता और क्रांतिकारी साहित्य सृजन ही औपनिवेशिक ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उनके लगातार कारावास का कारण बने। जेल में रहते हुए ही नज़रुल ने "राजबन्दीर जबनबन्दी" ("राधारमण", 'एक राजनीतिक कैदी का बयान') लिखा था। दृष्टव्य है, उनके लेखन ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान वहां के मुक्ति संघर्ष को प्रेरित किया। नज़रुल ने अपने लेखन में स्वतंत्रता, मानवता, प्रेम, और क्रांति जैसे विषयों को मुख्य आधार बनाया। उन्होंने कट्टरता और रूढ़ियों का विरोध किया। नज़रुल जीवनपर्यन्त राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के मजबूत आधार-स्तंभ बने रहे। साम्यवाद में उनकी अटूट आस्था थी लेकिन उन्हें अहसास था कि धर्मभीरु जन इस रोग से मुक्त होने में असमर्थ हैं। इसलिए धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध और सौहार्द एवं सद्भाव के पक्ष में वह सृजनशील भी रहे और सक्रिय भी रहे।

उनकी कविता 'साम्यवादी' की पंक्तियां हैं -

गाता हूं साम्यता का गान

जहां आकर एक हो गए

सब बाधा व्यवधान

जहां मिल रहे हैं हिंदू-बौद्ध-मुस्लिम-ईसाई

गाता हूं साम्यता का गान...

द्वितीय महायुद्ध के उपरांत नज़रुल के साहित्य का बृहत् पठन-पाठन आरंभ हुआ। तब तक वह बीमारी के गिरफ्त में आ चुके थे। नज़रुल के साहित्य को पढ़ने के बाद यह अंदाजा लगाना मुश्‍किल नहीं है कि काव्य में मुक्ति, विद्रोह, लैंगिक समानता, सांप्रदायिक सौहार्द और प्रेम आपस में पूरी तरह गुंथे हुए हैं। इसके लिए वे धार्मिक प्रतीकों, मिथकों और मान्यताओं को अपने ढंग से अपनाते हैं। स्त्री समानता पर वह न केेेेवल वैचारिक प्रतिबद्धता और व्यवहारगत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं अपितु

कविता इस तरह लिखते हैं, कि कृष्ण को चुनौती देते हुए कहते हैं कि 'अगर तुम राधा होते' तो वह महसूस करते जो एक स्त्री राधा के रूप में महसूस करती है। उनकी एक कविता से -

अगर तुम राधा होते श्याम


मेरी तरह बस आठों पहर तुम,

रटते श्याम का नाम

वन-फूल की माला निराली

वन जाति नागन काली


कृष्ण, प्रेम की भीख मांगने

आते लाख जनम

तुम, आते इस बृजधाम


उन्होंने बंगाली भाषा में ग़ज़ल को भी समृद्ध किया। एक पुस्तक भी आई। उन्हें अपने कार्यों में अरबी और फारसी शब्दों के व्यापक उपयोग के लिए भी जाना जाता है। इसपर गुरुदेव को भारी आपत्ति भी रही। 'रक्तो' की जगह ॱखून' का प्रयोग उन्हें बहुत नागवार गुजरा। यह विडंबना रही कि

नज़रुल इस्लाम के साहित्य और संगीत के संदर्भ में तत्त्वमूलक और तथ्यपूर्ण विस्तृत मूल्यांकन नहीं हो सका इस क्षेत्र में बहुत थोड़े-से आलोचकों ने ध्यान दिया। यह खेद का विषय है कि उनकी समस्त आलोचनाएं प्राय: एकांगी रहीं। वे युक्तिसंगत नहीं थीं। उनके अत्यंत निकटस्थ मित्रों ने उनके बारे में कुछ समीक्षाएं अवश्य छपवाई। बीच-बीच में ऐसे कुछ मोड़ आए जहां उनका काव्य और संगीत अपने प्रकृत स्वरूप को खो बैठा। लयह उन्होंने जानबूझकर भी किया। दरअसल कंटेंट उनके लिए महत्वपूर्ण था फॉर्म गौण। इस सबके बावजूद नज़रुल बांग्ला भाषा के अन्यतम श्रेष्ठ सामाजिक चेतना के कवि रहे। नज़रुल की संपूर्ण रचनाओं का कहीं भी कोई ब्योरा तिथिवार नहीं मिलता। लेकिन यदि किसी को नज़रुल की संपूर्ण रचनाओं का विधिवत अध्ययन करना हो तो उसे पश्चिमी बंगाल में स्थित बालीगंज के पुस्तकालय को अवश्य देखना चाहिए। इसी पुस्तकालय में उनकी संपूर्ण रचनाएं संभालकर रखी हुई हैं। हिंदी में उनपर बहुत कम लिखा गया। उनकी मृत्यु के उपरांत 1976 में कवि विष्णुचंद्र शर्मा की उनके जीवन पर एक किताब 'अग्निसेतु' नाम से आई। एक जन गीतकार एवं सुर-साधक के रूप में भी नज़रुल सर्वोच्च स्थान के अधिकारी हैं। 1972 में बांग्लादेश सरकार के निमंत्रण पर नज़रुल का परिवार उन्हें ढाका, बांग्लादेश ले गया। वहां ससम्मान उन्हें पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश की नागरिकता प्रदान की गई। उन्हें बांग्लादेश ने ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया। चार साल बाद 29 अगस्त 1976 को बांग्लादेश में उनकी मृत्यु हो गई। वहां उनकी इच्छानुसार उन्हें ढाका विश्वविद्यालय के सामने दफनाया गया।

संपर्क :34/242, सेक्‍टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033

मो.7838897877


बहुत तथ्यात्मक आलेख


Palash Biswas: मेरी नज़र में कोई तथ्यात्मक गलती नहीं है। बंगाल के साहित्यिक मित्रों को भेजता हूँ। बंगला में भी उनके समग्र व्यक्तित्व और रचना संसार पर इस तरह ववचन नही हुआ। नोबेल मिलने से रवींद्र नाथ को कवि न मानने वाले बांग्ला साहित्य जगत रवीन्द्र के जनपक्षधर रचनासन्सार के बजाय उनके गीतों,नृत्य नाटिकाओं और गीतांजलि तक ही रवींद्र विमर्श को सीमाबद्ध रखता आया है। 

रवीन्द्र और नज़रुल को उनके गीतों के जरिये बांग्लादेश और बंगाल की स्त्रियों ने ज़िंदा रखा है। दोनों स्त्री स्वतंत्रता के प्रखर प्रवक्ता रहे हैं।

नज़रुल की लोक में रवींद्र के मुकाबले ज्यादा पैठ थी।क्योंकि बंगला लोकसंगीत को प्राण फूंकने वाले अब्बसुद्दीन और बांग्ला के लोक में रचे बसे जसीमुद्दीन के साथ उनकी तिकड़ी थी,जिन्होंने लोक गीतों और लोकधुनों को खोजने में पूरे बंगाल की खाक छानी। बाद में शचीन देव बर्मन,पंकज मित्र,सलिल चौधरी ,ऋत्विक घटक ने सिनेमा और इप्टा ने रंगमंच के जरिये उसे सर्व भारतीय बना दिया।

अब भी बंगाली भद्रलोक काज़ी नज़रुल को कोलाहल का कवि मानते हैं।

इस आलेख का बंगला अनुवाद जरूर होना चाहिए।

पलाश विश्वास

Thursday, June 10, 2021

उनका नाम तुलसी नहीं था,लेकिन वे तुलसी बनकर जीती रही और उसी तुलसी का महाप्रस्थान

 तुलसी चाची का महाप्रयाण

पलाश विश्वास

उनका नाम तुलसी नहीं था।


भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से सरहद पार करते हुए और शरणार्थी शिविरों में महामारी फैलते रहने से लाखों परिवार कट फट कर आधे अधूरे रह गए थे। लाखों बच्चे मनाथ हो गए थे।


बसंतीपुर में भी बहुत से परिवार आधे अधूरे आये। बाप बेटा, चाचा भतीजा, मौसी मौसा और भांजा,इस तरह के परिवार ने बसंतीपुर आकर नए सिरे से खुद को जोड़ा।


 अनेक परिवारों में स्त्रियां नहीं थीं। जो स्त्रियां आईं,उनका मायका उस पार या इस पार कहीं और छूट गया या जनसंख्या स्थानांतरण की त्रासदी में हमेशा के लिए खो गया। इन स्त्रियों ने गांव में ही किसी को पिता,किसीको भाई बनाकर नए रिश्ते बना लिए। 


बच्चों ने भी दूसरी औरत को अपनी मां और उनके बच्चों को अपना भाई मानकर जीना सीखा।


अतुल मिस्त्री और उनके भाई अनाथ किशोर थे। वे हमारे परिवार के साथ आये। उनके माता पिता अभिभावक नहीं थे।वे हमारे ही परिवार में शामिल हो गए। लेकिन अलग परिवार न होने से उनको जमीन अलॉट नहीं हो सकती थी।


 तब बसंतीपुर एक साझा परिवार था। बल्कि यह कहें कि दिनेशपुर की सभी 36 बंगाली कालोनियों के लोग एक विशाल संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे।


विवाहयोग्य युवकों की गांव में आस पास विवाह कराकर आधे अधूरे परिवार में एक स्त्री को दाखिल कराकर उनको जमीन अलॉट करवाई गई।


बसंतीपुर के मातबरों पुलिन बाबू, maandaar मण्डल, शिशुवर मण्डल, वरदाकान्त मण्डल,हरि ढाली, अतुल शील और रामेश्वर ढाली ने जुगत लगाई और विवाह से पहले ही अतुल काका को विवाहित दिखाकर उन्हें और अवनी काका को जमीन दिला दी गई।


 अतुल काका की पत्नी का नाम कागजात में तुलसी लिख डियां गया।


फिर सबने मिलकर उनके लिए दुल्हन खोज निकाला,जो पड़ोसी गांव हरिदासपुर की थी। उनका असली नाम क्या था,किसीको नहीं मालूम। 


वे तुलसी बनकर बसंतीपुर आयी और तुलसी के रूप में ही कल उनका महाप्रयाण हो गया।


 वे अरसे से अस्वस्थ थीं। छोटे से कद की काकी बिल्कुल अकेली हो गयी थी। कैसे वे अबतक जीती रहीं,यही चमत्कार है।


महीने भर पहले उनकी देवरानी अवनी काका की पत्नी का देहांत हो गया था। अतुल काका भी बहुत पहले दिवंगत हो गए। रंगकर्मी और अध्यापक अवनी काका का गेठिया टीबी अस्पताल में उनसे भी पहले निधन हो गया था। 


अतुल काका और तुलसी काका की बड़ी बेटी विवाह के बाद दिवंगत हो गयी।तो दो बेटों का भी विवाह के बाद निधन हो गया।


तुलसी काकी ने जीवन भर इतने दुख झेले कि उनके शरीर में कुछ बचा ही न था। 


चिता पर उठाने के एक घण्टा पैंतालीस मिनट के अंदर ही वे पंचतत्व में विलीन हो गयी।


 रंगकर्मी, अध्यापक अवनी काका और छोटी काकी की कथा फिर कभी।


तुलसी काकी और अतुल काका

शरत चन्द्र की नायिका से कम नही थी हमारी सावित्री भाभी

 सावित्री भाभी की त्रासदी और  लॉक डाउन और कोरोना कर्फ्यू में ज़िंदगी और मौत


पलाश विश्वास


आज बसंतीपुर में शोक का समय है।

हमारी सावित्री भाभी करीब आठ महीने तक मरणासन्न रहने के बाद कल रात 3 बजे के करीब चल बसी। वे 70 साल के करीब थी।


पति हाजू साना की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी। एकमात्र बेटा जगदीश शायद लिवर सिरोयसिस से जवानी में ही चल बसा।दो बेटियां हैं। जगदीश के दो बेटे पंकज और सूरज उनकी देखभाल करते रहे हैं।



आठ महीने पहले हल्द्वानी अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हल्द्वानी से मतकोटा काली नगर के रास्ते बसंतीपुर आते हुए गड्ढों में गाड़ी उछलते रहने से वे रास्ते में जिंदा  हो गयी। 


गांव में तब मौत की खबर फैल गयी थी। लेकिन सावित्री भाभी घर ज़िंदा लौटी।


उससे महज तीन दिन पहले उन्हें दिनेशपुर निकलते वक्त सड़क साफ करते देखा था। 


अजब गजब जीवट की थी सावित्री भाभी। शरत चन्द्र की किसी नायिका से कम कष्ट और शोक उन्होंने नहीं झेले। कम संघर्ष नही किया। वे सारी बातें याद आ रही हैं।


पहले पहल फिर अस्पताल में भर्ती करने की कोशिश हुई। कोई अस्पताल तैयार नही हुआ। वे होश में थी। दिनेशपुर से झोलाछाप डॉक्टर बुलाकर, ग्लूकोज चढ़ाकर उन्हें ठीक करने की कोशिशें की जाती रहीं। वे कभी होश में होती कभी नहीं। खाना पीना थोड़ा बहुत शुरू जरूर हुआ, लेकिन बिस्तर से उठ नहीं सकी।


आज सुबह साढ़े छह बजे उनका पोता पंकज ने दरवाजा खटखटाया और घर में गांववालों को बुलाने की बात कही। मेरी नींद नहीं खुली थी। जागते जागते वह निकल गया था।


साबिता जी बोली, कोरोना समय में क्यों गांव के लोगों को बुला रहा है पंकज?


मेरी नींद उड़नछू हो गई। में तुरन्त समझ गया। उनके घर गया तो अंत्येष्टि की तैयारी हो रही थी।


गांव के लोग सामाजिक दूरी बनाते हुए जमा थे।


सामने राशन की दुकान पर बीपीएल कार्ड वालों को पहलीबार पांच पांच किलो अनाज बांटा जा रहा था। छोटे छोटे घेरे में लोग खड़े थे।


उनका मायका करीब 60 किमी दूर शक्ति फार्म के रत्न फार्म नम्बर एक में है। फोन कर दिया था। लेकिन जाहिर है कि वे आ नहीं सकते। आस पड़ोस के गांव से पंकज और सूरज की छोटी बहन आयी। अकेली।


मैंने पूछा, तुम्हारा वर कहाँ है?

वह बोली, महाराष्ट्र में लोकडौन में फंसा है।

महाराष्ट्र में कहाँ?

चंद्रपुर के आसपास।

मैंने कहा, चिंता मत करो। वहां हालात ठीक होंगे।

वह बोली, नागपुर में कोरोना के मरीज हैं।


अंदर सावित्री भाभी की छोटी बेटी रो रही थी।

मैंने पूछा, बड़ी कहाँ है?

जवाब मिला, कर्नाटक में फंसी है लॉक डाउन में।


सावित्री भाभी के पति हाजू साना अपने मौसा बिपिन सरदार और मौसी हजारी के साथ बसंतीपुर आये थे। मौसेरे भाई नाबालिग थे। हाजू दा ही खेती करते थे।


बसंतीपुर में ऐसे परिवार काफी थे, जिनमे जोड़ तोड़ कर परिवार बना था। कोई चाचा के साथ, कोई मौसा के साथ, कोई सिर्फ दो भाई। बाकी लोग विभाजन में उस पार छूट गये। ज्यादातर महिलाओं का मायका पीछे छूट गया।


 मेरी ताई और मेरी मां के साथ भी ऐसा हुआ। धर्म भाई, धर्म पिता कहकर ऐसी महिलाओं ने तराई के गांवों में अपना नया मायका बना लिया था।


 दिलों की मरम्मत करने का वह लहूलुहान वक्त था। अपनों से बिछुड़कर परायों को अपना बनाकर फिर ज़िंदगी शुरू करने का वक्त था।


 इसलिए बसंतीपुर में अलग अलग जिलों से आये अलग अलग जातियों के लोग एक साझा परिवार में बदल गए।

इसी लिहाज से हाजू साना मेरे बड़े भाई थे। कार्तिक साना मेरे चाचा हैं। विधु अधिकारी बड़े भाई और दिवंगत महेंद्र मण्डल मेरे मामा।


सावित्री भाभी का विबाह बसंतीपुर में ही हुआ। मुझे उनकी शादी याद नही है।


तब गांव और पूरी तराई में जहां तहां सांप पाए जाते थे। जहरीले सांप। हर साल अनेक लोग सर्पदंश के शिकार होते थे। मन्तर पढ़कर जड़ी बुटी से सांप कटे का इलाज करते थे हाजू दा।


बसंतीपुर की जात्रा पार्टी की बड़ी धूम थी। हाजू दा अनोखे कलाकार थे। रुद्रपुर हल्द्वानी के कार्यक्रमों में भी वे  जाया करते। हंसमुख और हमेशा सबकी मदद करने वाले। पीने की लत लगी और इसीमें जान चली गयी।एकमात्र बेटा भी बाप की तरह मरा।


हाजू दा पता नहीं किससे प्रेम करते थे।

सावित्री भाभी सुंदर थी, लेकिन उन्हें पसंद नहीं थीं।


तीसरी चौथी कक्षा में यह बात समझ में आ गयी। तभी से भाभी अपना दुख मुझसे बांटती थी। नैनीताल पढ़ते हुए यह सिलसिला जारी रहा।


फिर मैं पत्रकारिता में ऐसे खप्प गया कि मुझे पता नही चला कि भाभी किससे अपना दुख बांटती थी। इस बीच हाजू दा और उनके बेटे की मौत हो गयी। उनके मौसा और मौसी भी नही रही। मौसेरे भाई बड़े हो गए। सबसे छोटे मौसेरे भाई से मेरी तहैरी बहन रेखा का विबाह हो गया।


में घर लौट आया 40 साल बाद तो देखा, जगदीश के दोनों बेटे पंकज और सूरज भाभी का बहुत खयाल रखते हैं। पहलीबार सावित्री भाभी को ज़िंदगी में खुश देख रहा था।


उनकी खुशी लम्बी नहों  चली।

 वह बिस्तर पर पड़ गयी। 

अब उन्हें बिस्तर से राहत मिली।


कोरोना कर्फ्यू में बसन्तीपुर में यह पहली मौत है।


मुझे इतनी राहत है कि बाकी देश की तरह सावित्री भाभी की अंत्येष्टि में कोई दिक्कत न हुईं।


लॉक डाउन की वजह से रिश्तेदार नहीं आ सके। लेकिन गांव के रिश्ते अभी सही सलामत है। लॉक डाउन तोड़ नही रहे हैं। सामाजिक दूरी भी बनाये रखते हैं। फिरभी सभी अब भी सुख दुख में साथ साथ हैं।


मनुष्यता और सभ्यता इन्ही गांवों में बसी है।


आत्मीयता और रिश्ते भी, परिवार और समाज भी गांव में बचे हुए हैं, जिनपर मुक्त बाजार और पूंजीवाद को कोई असर नही हैं।


मुझे खूब महसूस हो रहा है कि महानगरों और बड़े शहरों के मुक्त बाजार से करोड़ो की तादाद में जो लोग गांव पैदल भी पहुंचना चाहते हैं, वे रोजी रोटी के लिए नहीं, इन्ही रिश्तों, इन्हीं परिवारों और इसी शुद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के  लिए सब कुछ दांव पर लगाकर घर आना चाहते हैं।


कोरोना को हारना ही होगा।

मुक्तबाजार और पूंजीवाद का ग्लोबल तिलिस्म भी न्यूयार्क से लेकर भारत के गांवों में भी टूटने लगा है।

बसंतीपुर

2020

Tuesday, June 8, 2021

हमारे पुरखों के स्मारक

 हमारे पुरखों के स्मारक

पलाश विश्वास

दिनेशपुर के बंगाली गांवों में 1952 से 1956 तक कुल एक हजार रुपये की लागत से बिना सीमेंट के एक कमरे का यह क्वार्टर प्रति परिवार बनाकर दिया गया था। क्वॉर्टर और एक जोड़ा हलवाहा बैल के बाबत प्रति परिवार 1200 रुपये का लोन चढ़ाया गया था। जो बहुत बड़ी रकम थी उसवक्त। करीब एक दशक तक दिल्ली लखनऊ की दौड़ के बाद पिताजी पुलिनबाबू ने यह कर्ज माफ करवा लिया था।


अब गांवों में ऐसे क्वॉर्टर बहुत कम बचे हैं।60 के दशक तक ये गांव जंगल से घिरे थे। 


पचास के दशक में बाघ,चीते भी जहां तहां  घूमते नज़र आते थे। उन जंगली जानवरों से बचने और तराई में अक्सर आने वाली आंधियों के मुकाबले ये एक कमरे के क्वार्टर किसी किले से कम नहीं था।जिसमें बड़े बड़े परिवार समा जाते थे।


 जहरीले सांपों से बचने के लिए भी ये क्वार्टर बड़े काम के थे। इसी क्वार्टर को घेरकर मिट्टी और सन की झोपडियां हुआ करती थी।


मेरे घर में 2006 तक माताजी,पिताजी, ताईजी,ताऊजी,चाचाजी,चाचीजी के निधन हो जाने के बाद तक यह क्वार्टर था। एक अदद क्वार्टर और उसे घेरे झोपड़ियां।


मेरा और मेरे भाई बहनों का जन्म इसी  तरह के एक कमरे के क्वार्टर में हुआ था,जिसके बरामदे में चिमनी बनी हुई थी। जहां रसोई हुआ करती थी।जो


बिजली आई 1969 में। लैंप पोस्ट लगे थे। घरों में बिजली नहीं थी। लू से बचने के लिए आम और नीम के पेड़ हुआ करते थे। गर्मी की रातें क्वार्टर की छत पर बीतती थी और छत पर ही केले का पेड़ लगाकर दिवाली के दिये जलाए जाते थे।


यह मेरे दोस्त टेक्का उर्फ नित्यानन्द मण्डल का है। अब भी जवान सदाबहार टेक्का की दादी ललिता देवी का राजपाट यहीं से चलता था। 


इसी क्वार्टर से ललिता जी यानी टेक्का कीं दादी का बक्सा तोड़कर उनका खजना लूटकर हाईस्कूल पास करने से पहले हमारा हीरो टेक्का बम्बई भाग गया था हीरो बनने। बंबई के रास्ते आगरा में ठहर कर टीवी ठीक करने का काम सीखकर आया।सिनेमा का भूत उतर गया।लेकिन हाईस्कूल पास करने के बाद पढ़ाई अधूरी छोड़ दी।


ललिता जी बहुत दबंग थी।इतनी दबंग की अपने बेटों टेक्का के पिता भोला नाथ और   नरेन्द्र नाथ के साथ गांव के मुखिया मंदार मण्डल की भी पिटाई कर देती थी। कार्तिक    काका अपने चाचा निबारन साना और दीदी मांदरी के साथ आये थे।


 शुरुआत में कार्तिक काका की शादी तक ललिता जी उनके साथ थी। उनकी भी पिटाई हो जाती थी। हम किस खेत की मूली थे? 


नहाने के वक्त गांव के सभी बच्चों को तेल लगाकर नहलाना और खाने के वक्त पकड़कर खिलाना भी ललिताजी की दिनचर्या थी। वे गांववालों के साथ मछली मारने में भी अगुआई करती थी।


हर क्वार्टर की अलग कथा है। ये क्वार्टर सही मायने में हमारे पुरखों के स्मारक हैं।

Tuesday, February 11, 2020

एक अंग्रेजी अखबार में गिरिराज किशोर की गलत तस्वीर पर हिंदी के लेखक पत्रकार तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि अंग्रेजी वाले हिंदी की परवाह नहीं करते और वे किसी गिरिराज किशोर को नहीं जानते।
भारत में अंग्रेजी ज्ञान विज्ञान की नही सत्ता की भाषा है और इसलिए आम जनता भी आजकल हिंदी को तिलांजलि देकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के घटिया स्कूलों में भेजने लगी है। जहां टीचर इस लायक भी नहीं होते की कोई विषय जानते समझते हों। ज्ञान विज्ञान के लिए नहीं , अछि नौकरी पाने के लिए लोग हिंदी छोड़ रहे हैं।
असमिया, ओड़िया, बंगला, पंजाबी, मराठी, तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु में किसी भी बड़े साहित्यकार को लोग न सिर्फ जानते हैं,उन्हें पढ़ते भी हैं।
हिंदी वालो को अपनी भाषा, अपने साहित्य, अपनी संस्कृति अपने नायकों की कितनी परवाह है?
हिंदी पढ़े लिखे लोग अखबारों के अलावा कौन सा साहित्य पढ़ते हैं। कवियों के नाम कबीरदास सूरदास से आगे वे कितना जानते हैं?
गिरिराज किशोर या हिंदी के किसी भी आधुनिक साहित्यकार को कितने लोग जानते है?
उनका साहित्य कौन पड़ता है?
हिंदी के नाम खाने कमांड वालों में से कितने लोगों गिरमिटिया पढा है?
भारत तो क्या दुनियाभर की किसी भाषा के साहित्य और साहित्यकार से उस भाषा को जानने पढ़नेवाले लोग इतने अनजान नहीं होते।
आजादी से पहले हिंदी की इतनी दुर्गति नहीं होती थी। तब स्वतन्त्रता मनग्राम की भाषा थी हिंदी देशभर में, अहिन्दी भाषी प्रदेशों में भी। तब हिंदी न राजनीति, न सत्ता और न बाजार की भाषा थी। तब यह सही मायने में जनभाषा थी।हिंदी के नाम खाने कमानेवालों की जमात तब तैयार नहीं हुई थी।
हिंदी के आलोचकों, सम्पादकों और प्रकाशकों ने सरकारी खरौद के भरोसे किताबें किसी भी भाषा के मुकाबले ज्यादा महंगी करके हिंदी को आमलोगों के लिए लिखने पढ़ने की भाषा रहने नही दिया।
एकाधिकार कुलीन वर्चस्व के कारण आम लोगों के हिंदी में पढ़ने लिखने का कोई मौका नहीं है।
हिंदी अखबारों से साहित्य का नाता दशकों पहले खत्म हो गया है। उनमें साहित्य या साहित्यकारों की कोई चर्चा नहीं होती। बंगला, मराठी, ओड़िया, पंजाबी, असमिया, तमिल, तेलगु,कन्नड़, मलयालम में अखबारों में साहित्य और साहित्यकफोन के बारे में आम जनता को सिलसिलेवार जानकारी देते हैं।
अब टीवी के चीखते चिल्लाते एंकर ही हिंदी जनता के नायक हैं और घृणा, हिंसा, अपराध, भ्र्ष्टाचार के माफिया ही हिन्दीवालों के महानायक हैं
हम खुद हिंदी के साहित्य और साहित्यकार की चर्चा नहीं करते, उन्हें नहीं पहचानते तो कैसे उम्मीद पालते हैं कि अंग्रेजी में उन्हें पहचान जाए।

Monday, October 14, 2019

पुलिनबाबूःएक जनप्रतिबद्ध यायावर की आधी अधूरी कथा

पुलिनबाबूःएक जनप्रतिबद्ध यायावर की आधी अधूरी कथा
पलाश विश्वास
पुलिनबाबू मेरे पिता का नाम है।उनके जीते जी मैं उन्हें कभी नहीं समझ सका। उनके देहांत के बाद जिनके लिए वे तजिंदगी जीते रहे, खुद उनके हकहकूक के लिए देशभर के शरणार्थी आंदोलनों से उलझ जाने की वजह से उनके कामकाज के तौर तरीके की व्यवाहारिकता अब थोड़ा समझने लगा हूं।
पुलिनबाबू चरित्र से यायावर थे लेकिन किसान थे और किसानों के नेता थे। वे हवा हवाी नहीं थे और उनके पांव मजबूती से तराई की जमीन से लेकर उत्तराखंड के पहाड़ों पर जमे हुए थे।वे जड़ों से जुड़े हुए इंसान थे और जड़ों से कटे हुए मुझ जैसे इंसान के लिए उन्हें समझना बहुतआसान नहीं रहा है।मेहनतकशों के हकहकूक के लिए वे जाति ,धर्म और भाषा की कोई दीवार नहीं मानते थे।
फिरभी वे शरणार्थियों के देशभर में निर्विवाद नेता थे।विभाजन पीड़ित ऐसे एकमात्र शरणार्थी नेता जिन्होंने मुसलमानों को भारत विभाजन के लिए कभी जिम्मेदार नहीं माना और उत्तर प्रदेश और अन्यत्र भी वे बेझिझक दंगापीड़ित मुसलमानों के बीच जाते रहे जैसे वे देश भर में शरणार्थियों के किसी भी संकट के वक्त आंधी तूफान कैंसर वगैरह वगैरह की परवाह किये बिना भागते रहे आखिरी सांस तक।वे जोगेन मंडल के अनुयायी बने रहे आजीवन,जबकि बंगाल में जोगेन मंडल को विभाजन का जिम्मेदार माना जाता है।
उन्होंने भारत विभाजन कभी नहीं माना और जब चाहा तब बिना पासपोर्ट और बिना वीसा सीमा पार करते रहे तो किसीने उन्हें रोका भी नहीं।मेरे लिए बिना पासपोर्ट और बिना वीसा सीमापार जाना संभव नहीं है और पिता के उस अखंड भारत की राजनीतिक सीमाओं को भी मानना संभव नहीं है।उन्होंने मरत दम तक इस महादेश को अखंड माना तो हमारे लिए खंड खंड देश स्वीकार करना भी मुश्किल है।
भारत विभाजन उन्होंने नहीं माना लेकिन पूर्वी बंगाल से खदेड़े गये तमाम शरणार्थियों को उन्होंने जाति धर्म भाषा लिंग निर्विशेष जैसे अपना परिजन माना वैसे ही उन्होंने पश्चिम पाकिस्तान से आये सिख पंजाबी शरणार्थियों को भी अपने परिवार में शामिल माना।उन्हींकी वजह से तराई और पहाड़ के गांव गांव में हमें इतना प्यार मिलता रहा है।पहाड़ के लोगों को उन्होंने हमेशा शरणार्थियों से जोड़े रखने की कोशिश की है और कुल मिलाकर यही उनकी राजनीति रही है।पहाड़ से हमारे रिश्ते की बुनियाद भी यही है।जो कभी टस से मस नहीं हुई है।
पुलिनबाबू अखंड भारत के हर हिस्से को अपनी मातृभूमि मानते थे और मनुष्यता की हर भाषा को अपनी मातृभाषा मानते थे।वे आपातकाल में भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दफ्तर में बेहिचक घुस जाते थे और जब तक जीवित रहे हर राष्ट्रपति, हर प्रधानमंत्री ,हर मुख्य.मंत्री,विपक्ष के हर नेता के साथ उनका संवाद जारी था।
सर्वोच्च स्तरों पर संपर्कों के  बावजूद अपने और अपने परिवार के हित में उन संबंधों को उन्होंने कभी भुनाया नहीं।वे हमारे लिए टूटे फूटे छप्परोंवाले घर छोड़ गये और आधी जमीन आंदोलनों में खपा गये।हम भी उनकी कोई मदद नहीं कर सके। इसलिए उनसे कोई शिकायत हमारी हो नहीं सकती।हम सही मायने में उनके जीते जी न उनका जुनून समझ सकें और न उनका साथ दे सकें। फिरभी हम ऐसा कुछ भी कर नहीं सकते,जिससे उनके अधूरे मिशन को कोई नुकसान हो।कमसकम इतना तो हम कर ही सकते हैं और वही कोशिश हम कर रहे हैं।
उनका कहना था कि हर हाल में सर्वोच्च स्तर पर हमारी सुनवाई सुनिश्चित होनी चाहिए ।उनका कहना था कि इन दबे कुचले लोगों का काम हमें खुद ही करना है।हमारी योग्याता न हो तो हमें अपेक्षित योग्यताएं हासिल करनी चाहिए। संसाधनों के बारे में उनका कहना था कि जनता के लिए जनता के बीच काम करोगे तो संसाधनों की कोई कमी होगी नहीं।जुनून की हद तक आम जनता की हर समस्या से टकराना उनकी आदत थी।उन्होंने सिर्फ शरणार्थियों के बारे में कभी सोचा नहीं है।उनका मानना था कि स्थानीय तमाम जन समुदायों के साथ मिलकर ही शरणार्थी अपनी समस्याओं को सुलझा सकते हैं।शरणार्थियों को बाकी समुदायों से जोड़ते रहना उनका काम था।
पुलिनबाबू अलग उत्तराखंड राज्य के तब पक्षधर थे जब उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता की हैसियत से हम अलग राज्य की मांग बेमतलब मानते थे।वे पहाड़ और तराई के हकहकूक के लिए अलग राज्य अनिवार्य मानते थे।वे मानते थे कि उत्तराखंड में अगर तराई नहीं रही तो यूपी में बिना पहाड़ के समर्थन के तराई में बंगाली शरणार्थियों को बेदखली से बचाना असंभव है।तराई और पहाड़ को भूमाफिया के शिकंजे से बचाने के लिए वे हिमालय के साथ तराई को जोड़े रखने का लक्ष्य लेकर हमेशा सक्रिय रहे।यह मोर्चाबंदी उन्हें हमेशा सबसे जरुरी लगती रही है।
वे हिमालय को उत्तराखंड और यूपी में बसे बंगाली शरणार्थियों का रक्षाकवच और संजीवनी दोनों मानते थे।उनका यह नजरिया महतोष मोड़ आंदोलन के वक्त तराई के साथ पूरे पहाड़ के आंदोलित होने से जैसे साबित हुआ वैसे ही अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पुलिन बाबू के देहांत के तुरंत बाद सत्ता में आयी पहली केसरिया सरकार के तराई के बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता छीनने के खिलाफ पहाड़ और तराई की आम जनता के शरणार्थियों के पक्ष में खड़े हो जाने के साथ हुएकामयाब आंदोलन के बाद से लेकर अब तक वह निरंतरता जारी है।
मैंने आजीविका और नौकरी की वजह से 1979 में नैनीताल और पहाड़ छोड़ा, लेकिन पुलिनबाबू का उत्तराखंड के राजनेताओं के अलावा जनपक्षधर कार्यकर्ताओं जैसे शेखर पाठक,राजीव लोचन साह और गिरदा से संबंध 2001 में उनकी मौत तक अटूट रहे।कभी भी किसी भी मौके पर वे नैनीताल समाचार के दफ्तर जाने से हिचके नहीं।न हमारे पुराने तमाम साथियों से उनके संवाद का सिलसिला कभी टूटा।
पुलिनबाबू हर हाल में पहाड़ और तराई के नाभि नाल का संबंध अपने बंगाली और सिख शरणार्थियों,आम किसानों,बुक्सा थारु आदिवासियों के हक हकूक की लड़ाई और पहाड़ के आम लोगों के हितों के लिए बनाये रखने के पक्ष में थे।उन्हीं की वजह से पहाड़ से हमारा रिश्ता न कभी टूटा है और न टूटने वाला है।
तराई के भूमि आंदोलन में पुलिनबाबू किंवदंती हैं और हमेशा तराई में भूमिहीनों, किसानों और शरणार्थियों की जमीन,जान माल की हिफाजत के लिए वे पहाड़ और तराई की मोर्चाबंदी अनिवार्य मानते थे।इसके लिए उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत और श्याम लाल वर्मा से लेकर डूंगर सिंह बिष्ट,प्रताप भैय्या,रामदत्त जोशी और नंदन सिंह बिष्ट तक हर पहाड़ी नेता के साथ काम करते रहे और आजीवन उनकी खास दोस्ती नारायणदत्त तिवारी और केसी पंत से बनी रही।
सत्ता की राजनीति से उनके इस तालमेल का मैं विरोधी रहा हूं हमेशा जबकि उनका कहना था कि विचारधारा से क्या होना है, जब हम अपने लोगों को बचा नहीं सकते।अपने लोगों को बचाने के लिए बिना किसी राजनीति या संगठन वे अकेले दम समीकरण साधते और बिगाड़ते रहे हैं।जिन लोगों के साथ वे खड़े थे,उनके हित उनके लिए हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता पर होते थे।
हम इसे मौकापरस्ती मानते रहे हैं और वोटबैंक राजनीति के आगे आत्मसमर्पण भी मानते रहे हैं।वैचारिक भटकाव और विचलन भी मानते रहे हैं।इस वजह से उनके आंदोलनों में हमारी खास दिलचस्पी कभी नहीं रही है।इसके विपरीत,उनके समीकरण के मुताबिक तराई के हकहकूक के लिए पहाड़ के हकूकूक की साझा लड़ाई और भू माफिया के खिलाफ राजनीतिक गोलबंदी जरुरी थी।वे तराई के बड़े फार्मरों के खिलाफ हैरतअंगेज ढंग से तराई के सिखों,पंजाबियों,बुक्सों और थारुओं, देशियों और मुसलमानों को गोलबंद करने में कामयाब रहे थे।
ढिमरी ब्लाक की लड़ाई पुलिनबाबू  बेशक हार गये थे और उनके तमाम साथी टूट और बिखर गये थे लेकिन उन्होंने हार कभी नहीं मानी और आखिरी दम तक वे ढिमरी ब्लाक की लड़ाई लड़ रहे थे।
अब जबकि तराई के अलावा उत्तराखंड का चप्पा चप्पा भूमाफिया के शिकंजे में कैद है और उसका कोई प्रतिरोध शायद इसलिए नहीं हो पा रहा है कि पहाड़ और तराई की वह मोर्चाबंदी नहीं है,जिसे वे हर कीमत पर बनाये रखना चाहते थे ,ऐसे में उनकी पहाड़ के साथ तराई की मोर्चाबंदी की राजनीति समझ में आने लगी है,जिसके लिए उन्होंने तराई में,खास तौर पर बंगाली शरणार्थियों के विरोध की परवाह भी नहीं की।
उनकी इस रणनीति की प्रासंगिकता अब समझ में आती है कि कैसे बिना राजनीतिक प्रतिनिधित्व के वे न सिर्फ अपने लोगों की हिफाजत कर रहे थे बल्कि शरणार्थी इलाकों के विकास की निरंतरता बनाये रखने में भी कामयाब थे।उनके हिसाब से यह उनकी व्यवहारिक राजनीति थी,जो हमारी समझ से बाहर की चीज रही है।वे हमेशा कहते थे जमीन पर जनता के बीच रहे बिना और उनके रोजमर्रे के मुद्दों से टकराये बिना विचारधारा का किताबी ज्ञान कोई काम नहीं आता।हम उनसे वैचारिक बहस करने की स्थिति ही नहीं बना पाते थेक्योंकि वे विचारों पर नहीं,मुद्दों पर बात करते थे।हम अपनी विश्वविद्यालयी शिक्षा के अहंकार में समझते थे कि विचारधारा पर बहस करने के लिए जरुरी शिक्षा उनकी नहीं है।
पुलिनबाबू अंबेडकर और कार्ल मार्क्स की बात एक साथ करते थे और यह भी कहते थे कि नागरिकता छिनने की स्थिति में किसी शरणार्थी की न कोई जाति होती है और न उसका कोई धर्म होता है जैसे उसकी कोई मातृभाषा भी नहीं होती है।वे अस्मिता राजनीति के विरुद्ध थे और एक मुश्त कम्युनिस्ट और वामपंथी दोनों थे लेकिन मैनें उन्हें कभी किसी से कामरेड या जयभीम कहते कभी नहीं सुना।
हमारे तमाम पुरखों की तरह उनके बारे में कोई आधिकारिक संदर्भ और प्रसंग उपलब्ध नहीं हैं।पुलिनबाबू नियमित डायरी लिखा करते थे।रोजाना सैकड़ों पत्र और ज्ञापन राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को देशभर के शरणार्थियों,किसानों और मेहनतकशों की तमाम समस्याओं को लेकर दुनियाभर के समकालीन मुद्दों पर लिखा करते थे।
वे पारिवारिक कारणों से स्कूल में कक्षा दो तक ही पढ़ सके थे और पूर्वी बंगाल में तेज हो रहे तेभागा आंदोलन के मध्य भारत विभाजन से पहले रोजगार की तलाश में बंगाल आ गये थे।फिरभी आजीवन वे तमाम भाषाओं को सीखने की कोशिश में लगे रहे। तमाम पत्र और ज्ञापन वे हिंदी में ही लिखा करते थे और मेरे कक्षा दो पास करते न करते उन पत्रों और ज्ञापनों का मसविदा मुझे ही तैयार करना होता था।इससे मेरे छात्र जीवन तक देश भर में उनकी गतिविधियों में मेरा साझा रहा है।लेकिन भारत विभाजन से पहले और उसके बाद करीब सन 1960 तक की अवधि के दौरान जो घटनाएं हुई, वे जाहिर है कि मेरी स्मृतियों में दर्ज नहीं हैं।
उनके बारे में उनके साथियों से ही ज्यादा जानना समझना हुआ है और वह जानकारी भी बहुत आधी अधूरी है।
मसलन हम अब तक यही जानते रहे हैं कि 1956 में  बंगाली विस्थापितों के पुनर्वास के लिए रुद्रपुर में हुए आंदोलन के सिलसिले में दिनेशपुर की आम सभा में उन्होंने कमीज उतारकर कसम खाई ती कि जब तक एक भी शरणार्थी का पुनर्वास बाकी रहेगा,वे फिर कमीज नहीं पहनेंगे।उन्होंने मृत्युपर्यंत कमीज नहीं पहनी।पिछले दिनों कोलकाता के दमदम में निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के 22 राज्यों के  प्रतिनिधियों के कैडर कैंप में बांग्ला के साहित्यकार कपिल कृष्ण ठाकुर ने कहा कि बंगाल और उड़ीशा में शरणार्थी आंदोलन के नेतृत्व की वजह से वे सत्ता की आंखों में किरकिरी बन गये थे और उन्हें और उनके साथियों को खदेड़कर नैनीताल की तराई में भेज दिया गया था।तराई जाने से पहले बंगाल छोड़ते हुए हावड़ा स्टेशन के प्लेटफार्म पर शरणार्थियों के हुजूम के सामने उन्होंने कमीज उतारकर उन्होंने यह शपथ ली थी।
इसी तरह ढिमरी ब्लाक में चालीस गांव बसाने और हर भूमिहीन किसान परिवार को दस दस एकड़ बांटने के आंदोलन और उसके सैन्य दमन के बारे में उस आंदोलन में उनके साथियों के कहे के अलावा हमें आज तक कोई दस्तावेज वगैरह बहुत खोजने के बाद भी नहीं मिले हैं।
पूर्वी बंगाल में वे तेभागा आंदोलन से जुड़े थे तो भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में भाषा आंदोलन के दौरान ढाका में आंदोलन में शामिल होने के लिए वे जेल गये और फिर बांग्लादेश बनने के बाद दोनों बंगाल के एकीकरण की मांग लेकर भी वे ढाका में आंदोलन करने के कारण जेल गये।दोनों मौकों पर बंगाल के मशहूर पत्रकार और अमृत बाजार पत्रिका के संपादक तुषार कांति घोष उन्हें आजाद कराकर भारत ले आये।तुषार बाबू की मृत्यु से पहले भी पुलिनबाबू ने बारासात में उनके घर जाकर उनसे मुलाकात की थी और देवघर के सत्संग वार्षिकोत्सव में मैंने 1973 में तुषार बाबू और पुलिनबाबू को एक ही मंच को साझा करते देखा था लेकिन तुषारबाबू से हमारी कोई मुलाकात नहीं हुई।
इसी तरह बलिया के स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत रामजी त्रिपाठी ने पुलिनबाबू की  चंद्रशेखर से मित्रता की वजह सुचेता कृपलानी के मुख्यमंत्रित्व काल में पूर्वी पाकिस्तान से दंगों की वजह से भारत आये शरणार्थियों के पुनर्वास की मांग लेकर पुलिनबाबू ने जो लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर तीन दिनों तक ट्रेनें रोक दी थी,उस आंदोलन को बताते रहे हैं।इसका कोई ब्यौरा नहीं मिल सका।चंद्रशेखर से उनका परिचय तभी हुआ।
1960 में असम में दंगों के मध्य जब शरणार्थी खदेड़े जाने लगे तो पुलिनबाबू ने दंगाग्रस्त कामरुप,ग्वालपाड़ा, नौगांव, करीमगंज से लेकर कछाड़ जिले में सभी शरणार्थी इलाकों में डेरा डालकर महीनों काम किया और असम सरकार और प्रशासन की मदद से शरणार्थियों का बचाव तो किया ही, शरणार्थियों से  पुलिनबाबू ने यह भी कहा कि भारत विभाजन के बाद शरणार्थी जहां भी बसे हैं,वही उनकी मातृभूमि हैं और उन्हें स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर वहीं रहना है।किसी कीमत पर यह नई मातृभूमि नहीं छोड़नी है।
हमने सत्तर के दशक में मरीचझांपी आंदोलन के दौरान मध्य भारत के दंडकारण्य, महाराष्ट्र और आंध्र तक में शरणार्थियों को बंगाल लौटने के इस आत्मघाती आंदोलन के खिलाफ उनकी यही दलील सुनी है,जिसके तहत असम,उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के शरणार्थियों ने उस आंदोलन का समर्थन नहीं किया और वे मरीचझांपी नरसंहार से बच गये।लेकिन वे मध्यभारत के शरणार्थियों को मरीचझांपी जाने से रोक नहीं पाये।बल्कि उस आंदोलन के वक्त इस आंदोलन की वजह से रायपुर के माना कैंप में उनपर कातिलाना हमला भी हुआ,जिससे वे बेपरवाह थे।
त्रिपुरा के दिवंगत शिक्षा मंत्री और कवि अनिल सरकार के साथ गुवाहाटी से मालेगांव अभयारण्य के रास्ते शरणार्थी इलाकों में रुककर हर गांव में 2003 में पुलिनबाबू की मृत्यु के दो साल बाद उन गांवों की नई पीढ़ियों की स्मृति में उनका वही बयान हमने सुना है।तब लगा कि जनता की स्मृति इतिहास और दस्तावेजों से कही ज्यादा स्थाई चीज है। तराई में भले ही लोग उन्हें भूल गये हों,असम में लोग उन्हें अब भी याद करते हैं।उनकी वजह से देश भर के शरणार्थी मुझे जानते हैं।
विडंबना यह है कि हमारे पुराने घर में उनका लिखा सबकुछ,उनकी डायरियां तक ऩष्ट हो गया है रखरखाव के अभाव में।इसके लिए काफी हद तक मेरी भी जिम्मेदारी है।उनके पुराने साथी कामरेड पीसी जोशी,कामरेड हरीश ढौंढियाल,कामरेड चौधरी नेपाल सिंह वगैरह का भी ढिमरी ब्लाक पर लिखा कुछ उपलब्ध नहीं है।जेल में सड़कर मर गये बाबा गणेशा सिंह के परिवार के पास भी कुछ नहीं है।
तराई और पहाड़ में पहले भूमि आंदोलन ढिमरी ब्लाक नाकाम जरुर रहा लेकिन इसके बाद बिंदु खत्ता में उसी ढांचे पर भूमिहीनों को जमीन मिल सकी है।ढिमरी ब्लाक की निरंतरता में बिंदु खत्ता और उसके आगे जारी है।जबकि पहाड़ और तराई में अब भी किसानों को सर्वत्र भूमिधारी हक मिला नहीं है और जल जंगल जमीन से बेदखली अभियान जारी है।जो पहले तराई में हो रहा था,वह अब व्यापक पैमाने में पहाड़ में संक्रामक है।आजीविका,पर्यावरण और जलवायु से भी पहाड़ बेदखल है।
पुलिन बाबू को जिंदगी में कुछ हासिल हुआ नहीं है और न हम कुछ खास कर सके हैं।पुलिनबाबू के दिवंगत होने के बाद पंद्रह साल बीत गये हैं और तराई और पाहड़ के लोगों को अब इसका कोई अहसास ही नहीं होगा कि पहाड़ और मैदान के बीच सेतुबंधन का कितना महत्वपूर्ण काम वे कर रहे थे।यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथक उत्तराखंड होने के बाद पहाड़ से तराई का अलगाव हो गया है और यह उत्तराखंड के वर्तमान और भविष्य लिए बेहद खतरनाक है।
पुलिनबाबू के संघर्ष के मूल में तराई के विभिन्न समुदायों के साथ पहाड़ के साझा आंदोलन मेहनतकशों के हकहकूक के लिए सबसे खास है और फिलहाल हम उस विरासत से बेदखल हैं।
पुलिनबाबू की स्मृतियों की साझेदारी,अपनी यादों और देशभर में उनके आंदोलन के साथियों और मित्रों के कहे मुताबिक पुलिनबाबू के जीवन के बारे में जो जानकारियां हमें अबतक मिली हैं,हम उसे साझा कर रहे हैं।इसे लेकर हमारा कोई दावा नहीं है।इस जानकारी को संशोधित करने की गुंजाइश बनी रहेगी।जो उनके बारे में बेहतर जानते हैं,बहुत संभव है कि हमारा संपर्क उनसे अभी हुआ नहीं है।बहरहाल हमारे पास जो भी जानकारी उपलब्ध है,हम बिंदुवार वही साझा कर रहे हैं।
हमारे पुरखे बुद्धमय बंगाल के उत्तराधिकारी थे जो बाद में नील विद्रोह के मार्फत मतुआ आंदोलन के सिपाही बने,जिसकी निरंतरता तेभागा आंदोलन तक जारी थी।भारत विभाजन के दौरान मेरे ताउ दिवंगत अनिल विश्वास और चाचा डा.सुधीर विश्वास बंगाल पुलिस में थे और कोलकाता में डाइरेक्ट एक्शन के वक्त दोनों ड्यूटी पर थे।लेकिन पुलिनबाबू विभाजन से पहले पूर्वी बंगाल में तेभागा में शामिल थे और उसी सिलसिले में वे विभाजन से पहले भारत आ गये और बारासात के नजदीक दत्तोपुकुर में एक सिनामा हाल में वे गेटकीपर बतौर काम कर रहे थे।
हमारा पुश्तैनी घर पूर्वी बंगाल के जैशोर जिले के नड़ाइल सबडिवीजन के लोहागढ़ थाना के कुमोरडांगा गांव रहा है जो मधुमती नदी के किनारे पर बसा है और जिसके उसपार फरीदपुर जिले का गोपालगंज इलाका और मतुआकेंद्र ओड़ाकांदि है।पुलिनबाबू के पिता का नाम उमेश विश्वास है।दादा पड़दादा का नाम उदय और आदित्य है।जो आदित्य और उदय भी हो सकते हैं।उमेश विश्वास के तीन और भाई थे।उनके बड़े भाई कैलास विश्वास जो मशहूर लड़ाके थे।भूमि आंदोलन के लड़ाके।
उमेश विश्वास के मंझले भाई का नाम याद नहीं है जबकि उन्हींका पुलिनबाबू पर सबसे ज्यादा असर रहा है।पुलिनबाबू मेरे बचपन में उन्हींके किस्सा सुनाते रहे हैं,जो पूरे इलाके में हिंदू मुसलमान किसानों के नेता थे।कालीपूजा की रात वे काफिला के साथ नाव से किसी पड़ोस के गांव जा रहे थे कि घर से निकलते ही उन्हें जहरीले सांप ने काट लिया।उन्हें बचाया नहीं जा सका और उनके शोक में तीन महीने के भीतर हमारे दादा उमेश विश्वास का भी देहांत हो गया।
उस वक्त पुलिनबाबू कक्षा दो में पढ़ रहे थे तो ताउजी कक्षा छह में।जल्दी ही कैलाश विश्वास का भी निधन हो गया और बाकी परिवार वालों ने उन्हें संपत्ति से बेदखल कर दिया,जिससे आगे उनकी पढ़ाई हो नही सकी।पुलिनबाबू के चाचा इंद्र विश्वास विभाजन के वक्त जीवित थे ।उन्होंने और बाकी परिवार वालों ने संपत्ति के बदले मालदह,नदिया और उत्तर 24 परगना में जमीन लेकर नई जिंदगी शुरु की।
हमारी दादी अकेली इस पार चली आयी हमारे फुफेरे भाई निताई सरकार के साथ जो बाद में नैहाटी के बस गये।पुलिनबाबू मां के साथ रानाघाट कूपर्स कैंप में चले गये,जहां उनके साथ ताउ ताई और चाचा जी भी रहे।
रानाघाट में ही वे शरणार्थी आंदोलन में शामिल हो गये।1950 के आसपास शरणार्थियों को कूली कार्ड देकर  दार्जिलिंग के चायबागानों में खपाने के लिए जब ले जाया गया ,तब सिलिगुड़ी में पुलिनबाबू ने इसके खिलाफ आंदोलन किया तो उन सबको फिर लौटाकर रानाघाट लाया गया।तब कम्युनिस्ट शरणार्थियों को बंगाल से बाहर भेजने के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे।पुलिनबाबू भी कम्युनिस्ट थे और उस वक्त कामरेड ज्योति बसु से लेकर तमाम छोटे बड़े कम्युनिस्ट नेता शरणार्थी आंदोलन में थे।शरणार्थी आंदोलनतब क्मुनिस्ट आंदोलन ही था।
पुलिन बाबू ने नई मांग उठा दी कि बेशक शरणार्थियों को बंगाल के बाहर पुनर्वास दिया जाये लेकिन उन सभीको एक ही जगह मसलन अंडमान या दंडकारण्य में बसाया जाये ताकि वे नये सिरे से अपना होमलैंड बसा सकें।
कामरेड ज्योति बसु और बाकी नेता शरणार्थियों को बंगाल के  बाहर भेजने के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे।जब पुलिनबाबू ने कोलकाता के केवड़ातला महाश्मसान में शरणार्थियों के बंगाल के बाहर होमलैंड बनाने की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गये तो कामरेडों के साथ उनका सीधा टकराव हो गया और वे और उनके तमाम साथी ओड़ीशा में कटक के पास खन्नासी रिफ्युजी कैंप में भेज दिये गये।
1951 में खन्नासी रिफ्युजी कैंप में ताउजी और चाचाजी उनके साथ थे। खन्नासी कैंप में रहते हुए पुलिनबाबू का विवाह ओड़ीशा के ही बालेश्वर जिले के बारीपदा में व्यवसायिक पुनर्वास के तहत बसे बरिशाल जिले से आये वसंत कुमार कीर्तनिया की बेटी बसंतीदेवी के साथ हो गया।
इसी बीच ताउजी का पुनर्वास संबलपुर में हो गया।तभी पुलिनबाबू और उनके साथियों को 1953 के आसपास नैनीताल जिले की तराई में दिनेशपुर इलाके में भेज दिया गया।बाद में पुलिनबाबू ने संबलपुर से ताउजी को भी दिनेशुपर बुला लिया।
जो लोग रानाघाट से होकर खन्नासी तक पुलिनबाबू के साथ थे,वे तमाम लोग उनके साथ दिनेशपुर चले आये ,जहां पहले ही तैतीस कालोनियों में शरणार्थी बस चुके थे।पुलिनबाबू और उनके साथी विजयनगर कालोनी में तंबुओं में ठहरा दिये गये।
इसी बीच 1952 के आम चुनाव में लखनऊ से वकालत पास करके श्याम लाल वर्मा को हराकर नारायणदत्त तिवारी एमएलए बन गये।वे 1954 में ही दिनेशपुर पहुंच गये और लक्ष्मीपुर बंगाली कालोनी पहुंचकर वे सीधे शरणार्थी आंदोलन में शामिल हो गये।तभी से पुलिनबाबू का उनसे आजीवन मित्रता का रिश्ता रहा है।
1954 में ही तराई उद्वास्तु समिति बनी।जिसके अध्यक्ष थे राधाकांत राय और महासचिव पुलिनबाबू।उद्वास्तु समिति की ओर से दिनेशपुर से लंबा जुलूस निकालकर शरणार्थी स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े रुद्रपुर पहुंचे।
पुलिस की घेराबंदी में उनका आंदोलन जारी रहा।इसी आंदोलन के दौराम स्वतंत्र भारत,पायोनियर और पीटीआी के बरेली संवाददाता एन एम मुखर्जी के मार्फत प्रेस से पुलिनबाबू के ठोस संबंध बन गये और प्रेस से अपने इसी संबंध के आधार पर आजीवन सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठान से संवाद जारी रखा।रुद्रपुर से शरणार्थियों को जबरन उठाकर ट्रकों में भर कर किलाखेड़ा के घने जंगल में फेंक दिया गया,जहां से वे पैदल दिनेशपुर लौटे।लेकिन इस आंदोलन की सारी मांगे मान ली गयीं। स्कूल, आईटीआई,अस्पताल ,सड़क. इत्यादि के साथ शरणार्थियों के तीन गांव और बसे।
रानाघाट से ओड़ीशा होकर जो लोग पुलिनबाबू के साथ दिनेशपुर चले आये,उन लोगों ने हमारी मां बसंतीदेवी के नाम पर बसंतीपुर गांव बसाया।बसंतीपुर के साथ साथ पंचाननपुर और उदयनगर गांव भी बसे।
1958 में लालकुंआ और गूलरभोज रेलवे स्टेशनों के बीच ढिमरी ब्ल्का के जंगल में किसानसभा की अगुवाई में चालीस गांव बसाये गये।हर परिवार को दस दस एकड़ जमीन दी गयी।इस आंदोलने के नेता पुलिनबाबू के साथ साथ चौधरी नेपाल सिंह, कामरेड हरीश ढौंढियाल और बाबा गणेशा सिंह थे।तब चौधरी चरण सिंह यूपी के गृहमंत्री थे।पुलिस और सेना ने भारी पैमाने पर आगजनी,लाठीचार्ज करके भूमिहीनों को ढिमरी ब्लाक से हटा दिया।हजारों लोग गिरफ्तार किये गये।पुलिनबाबू का पुलिस हिरासत में पीट पीटकर हाथ तोड़ दिया गया।उनपर और उनके साथियों के खिलाफ करीब दस साल तक मुकदमा चलता रहा।मुकदमा के दौरान ही जेल में बाबा गणेशा सिंह की मृत्यु हो गयी।
1960 के आसपास नैनीताल की तराई में ही शक्तिफार्म में फिर शरणार्थियों को बसाया गया तो तबतक रामपुर,बरेली,बिजनौर,लखीमपुर खीरी,बहराइच और पीलीभीत जिलों में भी शरणार्थियों का पुनर्वास हुआ।इसी दौरान रुद्रपुर में ट्रेंजिट कैंप बना।इन तमाम शरणार्थियों की रोजमर्रे की जिंदगी से पुलिनबाबू जुड़े हुए थे और इस वजह से उन्हें गर परिवार की कोई खास परवाह नहीं थी।बाद में मेरठ,बदांयू और कानपुर जिलों में भी शरणार्थी बसाये गये।
1967 में यूपी में संविद सरकार बनने के बाद दिनेशपुर में बसे शरणार्थियों को भूमिधारी हक मिला तो ढिमरी ब्लाक केस भी वापस हो गया।अब वह ढिमरी ब्लाक आबाद है,जिससे बहुत दूर भी नहीं है बिंदुखत्ता।
1958 के ढिमरी ब्लाक आंदोलन के सिलसिले में जमानत पर रिहा पुलिनबाबू बंगाल चले आये और उन्होंने नदिया के हरीशचंद्रपुर में जोगेन मंडल के साथ एक सभा में शिरकत की।जोगेन मंडल पाकिस्तान के कानून मंत्री बनने के बाद पूर्वी बंगाल में हो रहे दंगों और दलितों की बेदखली रोक नहीं सके तो वे गुपचुप भारत चले आये।मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन की राजनीति की बहुत कड़ी आलोचना के मध्य जोगेन मंडल लगभग खलनायक बन गये थे,जिनके साथ पुलिनबाबू का गहरा नाता था।लेकिन हरीशचंद्रपुर की उस सभा में जोगेन मंडल और उनमें तीखी झड़प हो गयी।
नाराज पुलिनबाबू सीधे ढाका निकल गये और वहां भाषा आंदोलन के साथियों के साथ सड़क पर उतर गये।शुरु से ही वे भाषा आंदोलन के सिलसिले में ढाका आते जाते रहे हैं।लेकिन इसबार वे ढाका में गिरफ्तार लिये गये।
तुषारबाबू की मदद से वे पूर्वी बंगाल की जेल से छूटे तो 1960 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन किया।इसी बीच असम में दंगे शुरु हो गये तो वे असम चले गये।वहां से लौटे तो चाचा डा.सुधीर विश्वास को वहां भेज दिया ताकि शरणार्थियों के इलाज का इंतजाम हो सके।चाचाजी भी लंबे समय तक असम के शरणार्थी इलाकों में रहे।
इस बीच कम्युनिस्टों से उनका पूरा मोहभंग हो गया क्योंकि ढिमरी ब्लाक के आंदोलन से पार्टी ने अपना पल्ला झाड़ लिया और तेलंगाना आंदोलन इससे पहले वापस हो चुका था।बंगाल के कामरेडों से लगातार उनका टकराव होता रहा है।
1964 में पूर्वी बंगाल के दंगों की वजह से जो शरणार्थी सैलाब आया,उसे लेकर पुलिनबाबू ने फिर नये सिरे सेा आंदोलन की शुरुआत कर दी जिसके तहत लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर लगातार तीन दिनों तक ट्रेनें रोकी गयीं।
साठ के दशक में ही पुलिनबाबू तराई के सभी समुदायों के नेता के तौर पर स्थापित हो गये थे।वे तराई विकास सहकारिता समिति के उपाध्यक्ष बने सरदार भगत सिंह को हराकर।तो अगली दफा वे निर्विरोध उपाध्यक्ष बने।इस समिति के अध्यक्ष पदेन एसडीएम होते थे।इसी के साथ पूरी तराई के सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की इनकी रणनीति मजबूत होती रही।
1971 में मुजीब इंदिरा समझौते के तहत पूर्वीबंगाल से आनेवाले शरणार्थियों का पंजीकरण रुक गया।शरणार्थी पुनर्वास का काम अधूरा था और पुनर्वास मंत्रालय खत्म हो गया।तजिंदगी वे इसके खिलाफ लड़ते रहे।
1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता युद्ध के बाद वे फिर ढाका में थे और शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए दोनों बंगाल के एकीकरणकी मांग कर रहे थे।वे फिर गिरफ्तार कर लिये गये और वहां से रिहा होकर लौटे तो 1971 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी के समर्थन में बंगालियों को एकजुट करने के लिए सभी दलों के झंडे छोड़ दिये।इसी चुनाव में नैनीताल से केसी पंत भारी मतों से जीते और तबसे लेकर केसी पंत से उनके बहुत गहरे संबंध रहे।
1974 में इंदिरा जी की पहल पर उन्होंने भारत भर में शरणार्थी इलाकों का दौरा किया और उनके बारे में विस्तृत रपट इंदिरा जी को सौंपी।वे शरणार्थियों को सर्वत्र मातृभाषा और संवैधानिक आरक्षण देने की मांग कर रहे थे और भारत भर में बसे शरणार्थियों का पंजीकरण भारतीय नागरिक की हैसियत से करने की मांग कर रहे थे।आपातकाल में भी शरणार्थी समस्याओं को सुलझाने की गरज से वे इंदिरा गांधी के साथ थे।जबकि हम इंदिरा की तानाशाही के खिलाफ जारी लड़ाई से सीधे जुड़े हुए थे।इसी के तहत 1977 के चुनाव में जब वे कांग्रेस के साथ थे ,तब हम कांग्रेस के खिलाफ छात्रों और युवाओं का नेतृत्व कर रहे थे।तभी उनके और हमारे रास्ते अलग हो गये थे।
उस चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद इंदिरा जी के साथ पुलिनबाबू के सीधे संवाद का सिलसिला बना और इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में वापसी से पहले दिनेशपुर भी आयीं।लेकिन पुलिनबाबू की मांगें मानने के सिलिसिले में उन्होंने क्या किया, हमें मालूम नहीं है।जबकि 1974 से लगातार शरणार्थियों की नागरिकता,उनकी मातृभाषा के अधिकार और संवैधानिक आरक्षण की मांग लेकर वे बार बार भारतभर के शरणार्थी इलाकों में भटकते रहे थे।इंदिराजी के संपर्क में होने के बावजूद कांग्रेस ने तबसे लेकर आज तक शरणार्थियों की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने में कोई पहल नहीं की।फिर भी वे तिवारी और पंत के भरोसे थे,यह हमारे लिए अबूझ पहेली रही है।
31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें देखने पुलिनबाबू अस्पताल भी पहुंचे थे।वे दिल्ली में ही ते उस वक्त।तब तक दिल्ली में दंगा शुरु हो चुका था।नारायण दत्त तिवारी उन्हें अस्पताल से सुरक्षित अपने निवास तक ले गये थे।
इस मित्रता को जटका तब लगा ,जब 1984 में केसी पंत को टिकट नहीं मिला तो पुलिनबाबू तिवारी की ओर से पंत के खिलाफ खड़े  सत्येंद्र गुड़िया के खिलाफ लोकसभा चुनाव में खड़े हो गये तो उन्हें महज दो हजार वोट ही मिले। लेकिन पुलिनबाबू को आखिरी वक्त देखने वाले वे ही तिवारी थे।
अस्सी के दशक में शरणार्थियों के खिलाफ असम और त्रिपुरा में हुए खूनखराबा के विदेशी हटाओ आंदोलन से पुलिनबाबू शरणार्थियों की नागरिकता को लेकर बेहद परेशान हो गये और वे देस भर में शरणार्थियों को एकजुट करने में लगे रहे।उन्हे यूपी में दूसरे लोगों का समर्थन मिल गया लेकिन असम की समस्या से बाकी देस के शरणार्थी बेपरवाह रहे 2003 के नागरिकता संशोधन कानून के तहत उनकी नागरिकता छीन जाने तक।आखिरी दिनों में पुलिनबाबू एकदम अकेले हो गये थे।दूसरों की क्या कहें,हम भी उनके साथ नहीं थे।हमने भी 2003 से पहले शरणार्थियों की नागरिकता को कोई समस्या नहीं माना।हम सभी पुलिनबाबू की चिंता बेवजह मान रहे थे।
बहरहाल साठ के दशक में अखिल भारतीय उद्वास्तु समिति बनी,जिसके पुलिनबाबू अध्यक्ष थे।लेकिन वे राष्ट्रव्यापी संगठन बना नहीं सकें।
इसी के मध्य साठ के दशक में वे चौधरी चरण सिंह के किसान समाज की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति में थे तो 1969 में अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर वे भारतीय जनसंघ में शामिल हो गये लेकिन जनसंघ के राष्ट्रीय मंच पर उन्हें अटल जी के वायदे के मुताबिक शरणार्थी समस्या पर कुछ कहने की इजाजत नहीं दी गयी तो सालभर में उन्होंने जनसंघ छोड़ दिया।
1971 में दस गावों के विजयनगर ग्रामशभा के सभापति वे निर्विरोध चुने गये।लेकिन फिर उसे भी तोबा कर लिया।
1973 में मेरे नैनीताल जीआईसी मार्फत डीेएसबी कालेज परिसर  में दाखिले के बाद मैं उनके किसी आंदोलन में शामिल नहीं हो पाया,पर चिपको आंदोलन और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के हर आंदोलन में वे हमारे साथ थे।हमारे विरोध के बावजूद वे पृथक उत्तराखंड का समर्थन करने लगे थे।
नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बंगाली शरणार्थियों की जमीन से बेदखली के मामलों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बना,जिसके सदस्य थे,पुलिनबाबू,सरदार भगत सिंह और हरिपद विश्वास।
असम आंदोलन के मद्देनजर देशभर में बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता छिनने की आशंका से पुलिनबाबू ने 1983 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन किया तो सत्तर के दशक से मृत्युपर्यंत भारत के कोने कोने में शरणार्था आंदोलनों में निरंतर सक्रिय रहे।
1993 में वे फिर किसी को कुछ बताये बिना बांग्लादेश गये।वे चाहते थे कि किसी तरह से बांग्लादेश से आनेवाला शरणार्थी सैलाब बंद हो।लेकिन शरणार्थियों का राष्ट्रीय संगठन बनाने के अपने प्रयासों में उन्हें कभी कामयाबी नहीं मिली।जिसकी वजह से शरणार्थी जहां के तहां रह गये।बांग्लादेश तक उनका संदेश कभी नहीं पहुंचा।

2001 में पता चला कि उन्हें कैंसर है और 12 जून 2001 को कैंसर की वजह से उनकी मृत्यु हो गयी।

नर्मदा डायरी

 नर्मदा डायरी
सरदार सरोवर बांध परियोजना के प्रतिकूल प्रभाव वाले लोगों के संघर्ष पर एक नर्मदा डायरी 1995 की डॉक्यूमेंट्री है। इसे आनंद पटवर्धन और सिमंतिनी धूरू द्वारा निर्देशित किया गया था और वर्ष 1995 में रिलीज़ किया गया था।  
हमने यह फिल्म हाल में देखी।कोलकाता जनसत्ता से रिटायर होने के बाद अपने पैतृक गांव बसंतीपुर,उत्तराखंड में इन दिनों हूं ,जहां पूरी तरह डिसकनेक्टेड हूं।
इस वर्ष सरकारी और गैरसरकारी दोनों तरफ से दुनियाभर में महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मनायी जा रही है और सत्य,अहिंसा और प्रेम पर आधारित गांधी की विचारधारा,ग्राम स्वराज और रामराज्य पर व्यापक पैमाने पर चर्चा परिचर्चा हो रही है।
1985 से लगातार जारी नर्मदा बचाओ आंदोलन स्वतंत्र भारत में विशुद्ध गांधीवादी सत्याग्रह आंदोलन के सिद्धांतों के अनुसार चल रहा है। नर्मदा की जलधारा को बांधकर प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ के अक्षम्य अपराध के अलावा इस बांध के डूब में शामिल गांवों के करीब दो लाख आदिवासियों के जबरन विस्थापन विकास के नाम पर हो रहा है,जिसका अहिसंक प्रतिरोध और विस्थापित मनुष्यता के जीने के संघर्ष का मानवीय डाक्युमेंटशन इस फिल्म में किया गया है। जिसमें गुजरात और अन्य राज्यों के विस्थापित आदिवासी गांवों की दिनचर्या,उनकी आजीविका,जीवन शैली अपने रंग रूप में इस फिल्म में उपस्थित है।
तीन दशक के नर्मदा बचाओ आंदोलन के देस के स्वतन्त्रता संग्राम में गांधी के नेतृत्व में चले मैराथन सत्याग्रह की समकालीन यथार्थ है। गांधी के सत्याग्रह के परिणामस्वरूप देश स्वतन्तर हुआ क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत,ब्रिटिश सत्ता और ब्रिटिश संसद में कुछ तत्व इस सत्याग्रह से अव्शय ही प्राभावित हुए रहे होंगे। लेकिन विडंबना है कि स्वतन्त्र भारत में गांधीवादी सत्याग्रह की कोी सुनवाई न सरकार में है और न प्रशासन में । बांध की ऊंचाई लगातार बढ़ती ही जा रही है।
निर्देशक आनन्द पटवर्द्धन ने अपने इस वृत्तचित्र में तथ्यों,आंकड़ों को कालक्रमके अनुसार रखते हुए इस मानवीय संकट को यथार्थ के मुताबिक उपस्थित करते हुए वर्तमान समय में गांधी के सत्याग्रह के औचित्य पर बुनियादी सवाल खड़े किया है।
गौरतलब है कि नर्मदा घाटी के आदिवासी ही गांधीवादी सत्याग्रह के तहत जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि बाकी देश में समूचे मध्य भारत और पूर्वोत्तर में आदिवासी प्रतिरोध सशस्त्र है। मधय भारत और आदिवासी भूगोल में िस प्रतिरोध को माओवादी कहा जाता है तो पूर्वोतत्र में मणिपुर,मिजोरम,नगालैंड,त्रिपुरा,असम जैसे राज्यों में उग्रवादी। मजे की बात यह है कि सिक्किम को छोड़कर पूर्वोत्तर में इस आदिवासी सशत्र प्रतिरोध के कारण गांव , हरियाली और प्रकृति की कीमत पर कहीं कोी विकास परियोजना नहीं चल पा रही है। इसके विपरीत नर्मदा घाटी में तीनदशक के आंदोलन के बावजूद आदिवासी अपने जल जंगल दमीन से बेदखल हो रहे हैं।
पलाश विश्वास
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