Monday, February 6, 2017

भू डोल , ज़लज़ला , भूकम्प , अर्थ क्वेक पहाड़ों में भूकंप से पर्यावरण के बारुदी सुरंगों में धमाका।राजधानियों की सेहत पर कोई असर नहीं।आपदा प्रबंधन सुसुप्त है। पलाश विश्वास

भू डोल , ज़लज़ला , भूकम्प , अर्थ क्वेक

पहाड़ों में भूकंप से पर्यावरण के बारुदी सुरंगों में धमाका।राजधानियों की सेहत पर कोई असर नहीं।आपदा प्रबंधन सुसुप्त है।

पलाश विश्वास

राष्‍ट्रीय भूकंप ब्‍यूरो के अनुसार भूकंप की तीव्रता 5.8 थी। भूकंप का केंद्र उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग के पीपलकोटि को बताया जा रहा है। भूकंप जमीन के 33 किलोमीटर नीचे आया था और 7-10 सेकेंड तक झटके महसूस किए गए. देहरादून और हरिद्वार में अपेक्षाकृत ज्‍यादा तेज झटके महसूस हुए।

फिलहाल उत्तराखंड में लोग भूकंप के बाद आने वाले झटकों के खौफ में घर नहीं जा रहे। रुद्रप्रयाग डीएम रंजना के अनुसार, आपदा केंद्र को पूरी तरह से एक्टिव कर दिया गया है। सभी पुलिस थानों और तहसील से जानकारी जुटाई जा रही है। अभी तक कहीं से भी जनहानि की कोई सूचना नहीं है। वहीं अभी तक यह भी साफ नहीं हो सका है कि भूकंप का केंद्र रुद्रप्रयाग है या फिर पीपलकोटी। पीपलकोटी चमोली जिले में आता है और यह रुद्रप्रयाग को पड़ोसी जिला है। डीएम ने बताया कि भूकंप के झटके महसूस करने के बाद हम और सारा स्टाफ क्वार्टरों से बाहर आ गया। भूकंप के तेज झटके दो बार महसूस किए गए।

देहरादून, चमोली, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, केदारनाथ और ऋषिकेश समेत उत्तराखंड के कई शहर भूकंप के तेज झटकों से कांप उठे। झटके इतने तेज थे कि लोग नींद से जाग गए। घबराकर लोग निकलकर बाहर आ गए।

उत्तराखंड टुडे के मुताबिक,रुद्रप्रयाग रहा भूकंप रहा केंद्र, हल्द्वानी-देहरादून के लोगों ने बताई आप बीती । NDRF टीमें हाई अलर्ट पर

#Earthquake #Rudraprayag #Haldwani #Uttarakhand Earthquakes Today

राजीव नयन बहुगुआ का शब्द चित्र सटीक हैः

भू डोल , ज़लज़ला , भूकम्प , अर्थ क्वेक

भूकम्प और भालू अक्सर पुनः लौट कर आते हैं , और ज़्यादा शिद्दत से धावा बोलते हैं । हड़बड़ाना मत । धैर्य रखना । दिवार से तुरन्त अलग हट कर खड़े हों । दरवाज़े की कुण्डी मत लगाना । सीढ़ियों से बाहर भागना , लिफ्ट से नहीं ।

दिनेश ल्वेशाली ने चेतावनी दी हैः

मौसम विभाग,,,

ब्रेकिंग न्यूज़ रात 12.30 पर फिर आ सकते है भूकम्प के झटके सतर्क रहे ।

ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करे।

हम रात को खाना खा रहे थे।टीक साढ़े दस बजे थे।दस मिनट के भीतर बसंतीपुर से भाई पद्दोलोचन का फोन आ गया कि उत्तराखंड में भूकंप आ गया है और तराई में मौसम बेहद खराब है।वह हमेशा की तरह अपनी भाभी को खबर दे रहा था।घर में बहूू उम्मीद से हैं तो हम किसी खुशखबरी का इंतजार कर रहे थे।इसके बदले हमें उत्तराखंड और पूरे उत्तर भारत में भूकंप की खबर मिली।भंकप इलाका होने के बावजूद पहाड़ों में आपदा प्रबंधन का नजारा यह है कि मौसम विभाग भी टीवी चैनलों को ठीक से बता नहीं पा रहा है कि भूकंप का एपीसेंटर ठीक कहां है।रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ दोनों को एपीसेंटर बताया जा रहा है।किसी चैनल में भूकंप का केंद्र सतह से एक किमी नीचे तो किसी दूसरे चैनल में जमीन के अंदर तीस किमी नीचे बताया जा रहा है।पहले रेक्टर स्केल पर 5.3 का भूकंप बताया गया तो बाद में यह 5.8 में बदल गया।

संस्थागत विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि इस पैमाने पर भूकंप से जानमाल के नुकसान का अंदाजा कम है।भूस्खलनों से पहाड़ में जितना नुकसान हो जाता है,भारी वर्षा से जो नुकसान होता है,बाढ़ से जो तबाही मचती है,उसके मद्देनजर उत्तराखंड के पहाड़ों के बारुदी सुरंगों के फटने से गावों और घाटियों का क्या बनना है,हाल के केदार जलसुनामी और नेपाल के महाभूकंप के अनुभव और बचाव राहत अभियान,हवा हवाई मीडिया कवरेज से उसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है।पहाड़ का एक एक इंच जमीन बेदखल है तो भारी पैमाने पर रोजगार की तलाश में पलायन है।जनादेश बनाने से पहले पहाड़ की सेहत पर टंगा पर्दा गिर गया है लेकिन मजहबी सियासत के कारिंदों को इसकी खास परवाह नहीं है और उत्तराखंड केसरिया है।

पद्दो ने बताया तराई में आंधी पानी से मौसम बेहद खराब है और तेज भूकंप के झटकों से अफरातफरी मची है।उसने बताया कि भतीजा टुटुल अभी घर लौटा नहीं है लेकिन उसने घर पर फोन से खबर दी है कि चंडीपुर और दिनेशपुर में बिजली गिरने से दो लोगों की मौत हो गयी है।चंडीपुर में पिताजी के मित्र संन्यासी मंडल के बेटे का निधन बिजली गिरने से हो गयी है।संन्यासी मंडल इमरजेंसी के खिलाप हमारे साथ थे और 1977 के मध्यावधि चुनाव के दौरान उनने हमारी बगावत का समर्तन पिताजी से अपनी मित्रता दांव पर लगाकर किया था।

अभी टीवी और इंटरनेट पर भूकंप से जानमाल के नुकसान की कोई खबर नहीं है।जाहिर है कि तराई में रुद्रपुर और पंतनगर इलाके में इस आपदा से मारे जाने वाले दोनों लोगों की खबर भी अभी रिपोर्ट नहीं हुई है।

टीवी के समाचारों में सलन इंडिया टुडे पर  अबभी पिथौरागढ़ के पीपल कोट को भूकंप का एपीसेंटर बताया जा रहा है,जबकि हिंदी चैनलों ने पहले एपीसेंटर पिथौरागढ़ को बताने के बाद में रुद्रप्रयाग को भूकंप का केंद्र बताया है।

गौरतलब है कि केदार आपदा के वक्तभी पिथौरागढ़ और नेपाल तक में तबाही मची थी।गांव के गांव और घाटियों का नामोनिशां मिट गया था ।लेकिन तब निकटवर्ती टिहरी जिले की तबाही की खबर भी बहुत बाद में लगी थी।नेपाल के महाभूकंप से हाल मं पूरा उत्तराखंड प्रभावित हो गया था।राजधानी को शायद यह खबर भी नहीं है।

भूकंप से पहाड़ का जो बी हाल हो राजधानियों की सेहत पर असर नहीं होना है और न मलाईदार चमड़ी पर कोई आंच आनी है।जलवायू,मौसम और पर्यावरण को ठिकाने लगाने का मुक्तबाजार का स्वर्ग उत्तराखंड है जहां चार धाम की यात्रा के लिए सपर एक्सप्रेसवे अभी बनना है।

भूकंप केंद्र के नाभिनाल से जुड़ा टिहरी जलाशय का आपदा परमाणु बम की आवाज किसी को सुनायी भी नहीं पड़ती है।अंध विशेषज्ञों को खबर भी नहीं है कि ग्लेशियर कहां कहां पिघल रहे हैं और कैसे गंगोत्री रेगिस्तान में तब्दील है।बाकी चुनाव का मौसम है।राजनीति के अलावा पहाडो़ं की सेहत की फिक्र बहुत आसान भी नहीं है।

बहरहाल पर्यटन और धर्म के लिहाज से केदारघाटी की आपदा फोकस में थी।जबकि पिथौरागढ़ पहाड़ों में सबसे पिछड़े इलाकों में है।रुद्र प्रयाग के इलाके भी बेहद पिछड़े है और अभी पर्यटन का मौसम नहीं होने से भूकंप से होने वाली तबाही के शिकार ज्यादातर स्थानीय लोगों के होने का अंदेशा है।

1992 के अक्तूबर में जिस रात मैं बरेली से कोलकाता की यात्रा पर था जनसत्ता में नौकरी ज्वाइन करने के लिए,उस रात भी गढ़वाल के उत्तरकाशी में भारी भूकंप आया था।उत्तरकाशी,टिहरी और भागीरथी,अलकनंदा से लेकर टौंस और यमुना घाटियों में हुई भारी तबाही का ब्यौरा तब भी नहीं मिला था।

रुद्रप्रयाग और पिथौरागड़ में बैठे अफसरान के लिए दूर दराज के गांवों और घाटियों के बारे में आधी रात के बारे में जानकारी लेना बेहद मुश्किल है।

अफसरान टीवी वालों को वे जान माल के नुकसान की फिलहाल कोई खबर नहीं है,इतना ही बता पा रहे हैं।जाहिर है कि मीडियावाले मौके पर अभी पहुंचे नहीं है।उनका हवाई सर्वेक्षण कल ही शुरु हो पायेगा।राहत और बचाव अभियान कब तक शुरु हो पायेगा,कहना फिलहाल मुश्किल है।

फिलहाल खबरों का लब्बोलुआब यही है कि  दिल्ली एनसीआर में देर शाम भूकंप के झटके महसूस किए गए। देहरादून से भी खबर है कि भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए हैं। भूकंप का केंद्र उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में बताया गया है। रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.8 मापी गई है। रात 10.35 मिनट पर झटके महसूस किए गए। भूकंप के झटके काफी देर तक महसूस किए गए. देहरादून में झटकों के बाद लोग सड़कों पर निकल आए. देहरादून से मिली खबरों के मुताबिक लोग कुमाऊं, गढ़वाल की रेंज में झटके महसूस किए गए। पश्चिमी यूपी में भी झटके महसूस किए गए. पंजाब में झटके महसूस किए जाने की खबर है।

भूकंप के झटके पंजाब, हरियाणा, उनकी संयुक्त राजधानी चंडीगढ में भी महसूस किये गये, जिसके बाद कई लोग अपने घरों से बाहर निकल आए।फिलहाल, जान माल को कोई नुकसान पहुंचने की खबर नहीं है। खबरों के मुताबिक समूचे हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भूकंप महसूस किया गया। उंची इमारतों में रहने वाले लोग नीचे की ओर दौड़ पड़े। गुरूग्राम, फरीदाबाद, रोहतक, अंबाला, पंचकुला, सोनीपत, पानीपत और करनाल सहित हरियाणा में विभिन्न स्थानों पर भूकंप के झटके महसूस किए गए। पंजाब में मोहाली, पटियाला, रोपड़, लुधियाना और जलंधर सहित कई स्थानों पर भी भूकंप के झटके महसूस किए गए।

टिहरी की जाजल घाटी से अरण्य रंजन ने लिखा हैः

अभी अभी भूकंप आया है. काफी तेज़ झटका था और आवाज भी काफी तेज़ हुयी.

Just came sharp blow. It was very strong.

साहित्यकार उदय प्रकाश ने लिखा हैः

अभी कुछ ही देर पहले भूकंप के झटके हमारे वैशाली के घर पर आये। सिर्फ मैंने महसूस किया और कहा कि भूकंप है।

किसी ने मेरी बात नहीं मानी।

यही तो समस्या है !

अब जब टीवी पर ख़बर चल रही है, तो सब मान रहे हैं।

हम उस समय में हैं जब मानवीय सूचनाओं को इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं ने अपदस्थ कर दिया है।

(गंभीर बात है। हल्की भले लगे।)

Амит Холия ने लिखा हैः

Worldwide earthquake 6-feb- 2017

35 minutes ago 5.6 magnitude, 14 km depth

Pīpalkoti, Uttarakhand, India

38 minutes ago 2.0 magnitude, 29 km depth

Glendora, California, United States

39 minutes ago 2.1 magnitude, 0 km depth

Angwin, California, United States

about an hour ago 2.0 magnitude, 0 km depth

Y, Alaska, United States

about an hour ago 2.4 magnitude, 1 km depth

Healdsburg, California, United States

about 2 hours ago 1.5 magnitude, 12 km depth

Friday Harbor, Washington, United States

about 2 hours ago 5.0 magnitude, 33 km depth

Opotiki, Bay of Plenty, New Zealand

about 2 hours ago 1.5 magnitude, 0 km depth

Southern Yukon Territory, Canada

about 2 hours ago 2.3 magnitude, 0 km depth

Sutton-Alpine, Alaska, United States

about 2 hours ago 1.7 magnitude, 7 km depth

Muscoy, California, United States

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उपभोक्तावाद के युद्धोन्माद में बच्चे अपराधी हैं तो कोई मां बाप,कोई रिश्ता नाता सुरक्षित नहीं है। दरअसल असल अपराधी तो हम भारत के नागरिक हैं जो पिछले 26 सालों से लगातार परिवार,समाज,संस्कृति ,लोक , जनपद, उत्पादन, अर्थव्यवस्था को तिलांजलि देकर ऐसा नरसंहारी मुक्तबाजार बनाते रहे हैं। अखंड क्रयशक्ति की कैसलैस डिजिटल अमेरिकी जीवनशैली यही है।जो अब मुक्त बाजार का अर्थशास्त्र है,जहां श्रम

उपभोक्तावाद के युद्धोन्माद में बच्चे अपराधी हैं तो कोई मां बाप,कोई रिश्ता नाता सुरक्षित नहीं है।

दरअसल असल अपराधी तो हम भारत के नागरिक हैं जो पिछले 26 सालों से लगातार परिवार,समाज,संस्कृति ,लोक , जनपद, उत्पादन, अर्थव्यवस्था को तिलांजलि देकर ऐसा नरसंहारी मुक्तबाजार बनाते रहे हैं।

अखंड क्रयशक्ति की कैसलैस डिजिटल अमेरिकी जीवनशैली यही है।जो अब मुक्त बाजार का अर्थशास्त्र है,जहां श्रम और उत्पादन सिरे से खत्म है और सामाजिक सांस्कृतिक उत्पादन संबंधों का तानाबाना खत्म है और उसकी सहिष्णुता , उदारता, विविधता और बहुलता की जगह एक भयंकर उपभोक्तावादी उन्माद है जिसका न श्रम से कोई संबंध है और न उत्पादन प्रणाली से और जिसके लिए परिवार या समाज या राष्ट्र जस्ट लिव इन डिजिटल कैशलैस इंडिया मेकिंग इन है।यही हुिंदुत्व है।

नकदी के तकनीक जरिये हस्तांतरण से अर्थ तंत्र का भयंकर अपराधीकरण हो रहा है और बेहतर तकनीक वाले बच्चे इसके सबसे बड़े शिकार होंगे।मां बाप के कत्लेआम का सारा सामान,मुकम्मल माहौल बना रहा है हिंदुत्व का यह कारपोरेट डिजिटल अर्थतंत्र।


यही हिंदुत्व का पुनरुत्थान है,राष्ट्रवाद है और रामराज्य भी यही है।

पलाश विश्वास

भोपाल में बंगाल की 28 साल की बेटी आकांक्षा अपने प्रेमी उदयन दास के साथ लिव इन कर रही थी।वह महीनों पहले अमेरिका में युनेस्को की नौकरी की बात कहकर बांकुड़ा में बैंक के चीफ मैनेजर पिता के घर से निकली थी।इस प्रेमकथा का अंत त्रासद साबित हुआ जब भोपाल में उदयन दास के घर में पूजा बेदी के नीचे दफनायी हुई सीमेंट की ममी बना दी गयी आकांक्षा का नरकंकाल निकला।

किसी प्रेमकथा की ऐसी भयानक अंत आजकल कही न कहीं किसी न किसी रुप में दीखता रहता है।आनर किलिंग,भ्रूण हत्या और दहेज हत्या और स्त्री उत्पीड़न के तमाम मुक्तबाजारी वारदातों के साथ बिन ब्याह लिव इन संबंधों की ऐसी परिणति अमेरिकी संस्कृति की तरह हमारी नींद में खलल नहीं डालती।

जैसे हम नरसंहारों क अभ्यस्त हैं,जैसे हम बलात्कार सुनामियों के अभ्यस्त है,जैसे हम दलितों और स्त्रियों पर उतक्पीड़न के अभ्यस्त हैं,वैसे ही मुक्तबाजारी वारदातें अब रोजमर्रे की जिंदगी है।

अब बारी किसकी है,कहीं हमारी तो नहीं,इसकी कोई परवाह किसी को नहीं है।

मुक्तबाजार में पागल दौड़ अब हमारा लोकतंत्र है।

मुक्तबाजार में पागल दौड़ मजहबी सियासत है तो अखंड कारपोरेट राज भी यही।इसी  पागल दौड़ में हमारा रीढ़विहीन कंबंध वजूद है।

सदमा तब गहराता है जब प्रेमिका को ठंडे दिमाग से मारने वाला शराब पीकर जीने वाला कार फ्लैटवाला रईस प्रेमी बिना किसी हिचक के अपने मां बाप का कत्ल करके रायपुर में अपने ही घर के आंगन में उनकी लाशें दफना देने का जुर्म पुलिस पूछताछ में कबूल करता है और 24 घंटे के भीतर उसी घर के आंगन में मां बाप की लाशें मिल जाती हैं।

किसी भी मां बाप के लिए किसी बच्चे की यह क्रूरता भयंकर असुरक्षाबोध का सबब है क्योंकि उपभोक्तावाद के युद्धोन्माद में बच्चे अपराधी हैं तो कोई मां बाप,कोई रिश्ता नाता सुरक्षित नहीं है।

दरअसल असल अपराधी तो हम भारत के नागरिक हैं जो पिछले 26 सालों से लगातार परिवार,समाज,संस्कृति ,लोक , जनपद, उत्पादन, अर्थव्यवस्था को तिलांजलि देकर ऐसा नरसंहारी मुक्तबाजार बनाते रहे हैं।

यही हिंदुत्व का पुनरुत्थान है,राष्ट्रवाद है और रामराज्य भी यही है।

अखंड क्रयशक्ति की कैसलैस डिजिटल अमेरिकी जीवनशैली यही है।जो अब मुक्त बाजार का अर्थशास्त्र है,जहां श्रम और उत्पादन सिरे से खत्म है और सामाजिक सांस्कृतिक उत्पादन संबंधों का तानाबाना खत्म है और उसकी सहिष्णुता, उदारता, विविधता और बहुलता की जगह एक भयंकर उपभोक्तावादी उन्माद है जिसका न श्रम से कोई संबंध है और न उत्पादन प्रणाली से और जिसके लिए परिवार या समाज या राष्ट्र जस्ट लिव इन डिजिटल कैशलैस इंडिया मेकिंग इन है।यही हुिंदुत्व है।

उदयन दास हत्यारा है जिसने प्रेमिका की हत्या से पहले अपने मां बाप की हत्या की है।अपने अपराधों को उसने डिजिटल तकनीक की तरह सर्जिकल स्ट्राइक की तरह बिना सुराग अंजाम दिया है,परिवार और समाज से उसका कोई संपर्क सूत्र नहीं है और उपभोक्ता जीवन के लिए उसके लिए सारे संबंध बेमायने हैं,जिनकी कोई बुनियाद नहीं है। जाहिर है कि वह एक मानसिक अपराधी है और क्रिमिनल पर्सनलिटी डिसआर्डर का शिकार है।यह बीमारी मुक्तबाजार का उपभोक्तावाद है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि मुक्तबाजार के इसी उपभोक्तावाद के लिए सारा का सारा अर्थतंत्र बदला जा रहा है।यही बजट का सार है।आर्थिक सुधार,पारदर्शिता है।

यह आर्थिक क्रांति भी रामराज्य और राममंदिर के नाम हो रहा है।

भारतीय जनसंघ के जमाने में कोई बलराज मधोक इसके अध्यक्ष भी बने थे शायद,ठीक से याद नहीं पड़ता क्योंकि साठ के दशक में तब हम निहायत बच्चे थे।

अब चूंकि संघ परिवार को श्यामाप्रसाद मुखर्जी,वीर सावरकर और गांधी हत्यारा के अलावा अपने जीवित मृत सिपाहसालारों की याद नहीं आती,इसलिए दशकों से बलराज मधोक चर्चा में नहीं हैं।

बलराज मधोक साठ के दशक में भारतीयकरण की बात करते थे।

जनसंघ तब भारतीयकरण के एजंडे पर था।यानी भारत में रहना है तो भारतीय बनना होगा और जाहिर है कि संघ परिवार की भारतीयता से तात्पर्य हिंदुत्व से है।

अब भी संघ परिवार के झोलाछाप विशेषज्ञ, सिद्धांतकार हिंदुत्व को धर्म के बदले संस्कृति बताते हुए सभी भारतवासियों के हिंदुत्वकरण पर आमादा हैं।

सबसे खतरनाक बात तो यह है कि समूचा लोकतंत्र,सारी की सारी राष्ट्र व्यवस्था,राजकाज, नीति निर्माण,संसदीय प्रणाली,लोकतांत्रिक संस्थाएं,मीडिया और माध्यम,अर्थव्यवस्था और समूचा सांस्कृतिक परिदृश्य,शिक्षा और आधारभूत संरचना ऐसे झोलाछाप विशेषज्ञों और सिद्धांतकारों के शिकंजे में हैं।

नोटबंदी से लेकर बजट,रिजर्व बैंक से लेकर विश्वविद्यालय हर स्तर पर अंतिम फैसला इन्हीं मुक्तबाजारी भूखे प्यासे बगुला भगतों का है।उन्ही का राज,राजकाज है।

मुक्तबाजार के कारपोरेट हिंदुत्व का अब सिरे से अमेरिकी करण हो गया है।मसलन डिजिटल कैशलैस लेनदेन भारतीय संस्कृति और परंपरा में किसी भी स्तर पर नहीं है।संघ परिवार की महिमा से रामराज्य में यही स्वदेशी नवजागरण है।

नकदी के तकनीक जरिये हस्तांतरण से अर्थ तंत्र का भयंकर अपराधीकरण हो रहा है और बेहतर तकनीक वाले बच्चे इसके सबसे बड़े शिकार होंगे।मां बाप के कत्लेआम का सारा समान बना रहा है हिंदुत्व का यह कारपोरेट डिजिटल अर्थतंत्र। कयामती फिजां की इंतहा है यह।अब इस अर्थतंत्र के डिजिटल धमाके में परिवार,समाज,राष्ट्र ,सारे के सारे पारिवारिक सामाजिक उत्पादन संबंध खत्म हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में बाजार की गतिविधियां भी सामाजिक कार्य कलाप है।यहां जनदों में हाट बाजार ब भी कमोबेश चौपाल की तरह काम करते हैं,जहां लेनदेन के तहत समाजिक और उत्पादन संबंध की अनिवार्यता है।

अब तीन लाख रुपये से ज्यादा कैश रखने पर सौ फीसद जुर्माना के साथ नोटबंदी से पैदा हुए नकदी संकट से उबरने के साथ नोटबंदी को जायज ठहराने के लिए कर सुधारों के साथ जो बजट पेश किया गया है,वहां बाजार की भारतीयता को सबसे पहले खत्म कर दिया गया है।

बाजार अब मुक्तबाजार है जो किसानों,मजदूरों ,कारोबारियों,बहुजनों,स्त्रियों और बच्चों के साथ साथ युवा पीढ़ियों का अबाध वधस्थल वैदिकी है।इस  बाजार का उत्पादन प्रणाली ,मनुष्यों,समाज,सभ्यता और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है।

डिजिटल कैशलैस क्रयशक्ति का उपभोक्ता वाद हिंदुत्व का नया अंध राष्ट्रवाद है।बेतहाशा बढ़ते विज्ञापनी उपभोक्ता बाजार के निशाने पर बच्चे हैं।

तकनीकी क्रांति में ज्ञान की खोज सिरे से खत्म है तो शिक्षा अब नालेज इकोनामी है यानी हर हाल में संबूक हत्या अनिवार्य है।

अंधाधुंध उपभोक्तावाद अब कारपोरेट हिंदुत्व है और इस कारपोरेट हिंदुत्व के लिए परिवार,विवाह,समाज,लोकतंत्र,संविधान,कानून का राज वैसे ही फालतू हैं जैसे समता,सामाजिक न्याय,विविधता और बहुलता,उदारता और सहिष्णुता।

इस अमेरिकी हिंदुत्व के नये प्रतीक के बतौर उदयन दास का चेहरा है और सबसे खतरनाक बात तो यह है कि हर गली मोहल्ले में,गांव शहर में,हर परिवार में एलसीडी, कंप्यूटर, मोटरसाईकिल, फ्लैट ,गाड़ी लिव इन पार्टनर के लिए बच्चे क्रमशः अपराधी और हत्यारे में तब्दील हो रहे हैं।

पूरी मुक्तबाजारी नई धर्मोनेमादी पीढ़ी अब क्रिमिनल पर्सनलिटी डिसआर्डर का शिकार है।बाहैसियत वारिस विरासत के हस्तांतरण तक रुकर उपभोग को विलंबित करने के मूड में नहीं है नई पीढ़ी।

उसे बाजार की हर तमकीली भड़कीली चीजे तुंरत चाहिए।

दूधमुंहा बच्चे तक स्मार्टफोन के रोज नये अवतार के लिए हंगामा बरपा देते हैं।

जोखिम भरे डिजिटल कैशलैस लेनदेनके साथ तकनीक बेहतर जानने वाले बच्चों का गृहयुद्ध अब नया महाभारत की पटकथा है।

उदयन दास अकेला अपराधी नहीं है।

मुक्तबाजार बड़े पैमाने पर बच्चों को अपराधी बना रहा है।

बंगाल में दुर्गापूजा के बाजार फेस्टिवल में महंगी खरीददारी के लिए क्रयशक्ति न होने की वजह से गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों में बच्चों की आत्महत्या आम है।

कोलकाता में ही मां,बाप,दादा दादी और भाई बहन की मुक्तबाजारी उन्माद की वजह से हत्या अऱकबारी सुर्खियां और टीवी की सनसनी है।

आकांक्षा की प्रेमकथा के प्रसंग में वे सारी कथाएं उपकथाएं सनसनीखेज तरीके से फिर अखबारी पन्नों पर हैं और टीवी के परदे पर हैं।

यह क्राइम सस्पेंस और हारर मुक्तबाजार की संस्कृति है और इस उपभोक्ता युद्धोन्माद में कोई परिवार या कोई मां बाप सुरक्षित नहीं है।

गौरतलब है कि भोपाल और रायपुर की मूलतः देशज कस्बाई संस्कृति से जुड़े नये महानगरों का किस्सा आकांक्षा उदयन है।यह अबाध केसरिया अमेरिकीकरण का सिलसिलेवार विस्फोट है।भूकंप के निरंतर झटके हैं जो कभी भी तबाही में तब्दील हैं।

कोलकाता,दिल्ली,मुंबई,बंगलूर से सलेकर अत्याधुनिक असंख्य उपनगरों और स्मार्ट शहरों में इसका अंजाम कितना भयानक होगा,यह देखना बाकी है।

विडंबना है कि रामराज्य का वैचारिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक,सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं और इसके विपरीत भारतीय संविधान और भारतीय लोकगणराज्य का प्रतीक धम्मचक्र है।

संविधान और लोकगणराज्य और इनके प्रतीक धम्मचक्र जाहिर है कि बजरंगवाहिनी के रामवाण के निशाने पर हैं।

रामराज्य के भव्य राममंदिर के निरमाण के लिए सबसे पहले संविधान, लोकगणराज्य और उसके प्रतीक धम्मचक्र का सफाया जरुरी है और उनमें निहित मौलिक सिद्धांत,विचारधारा,आदर्श,कायदा कानून, समता,सहिष्णुता,उदारता, लोकतंत्र,न्याय,नागरिकता,नागरिक और मौलिक अधिकारों के खात्मे के साथ साथ मुकम्मलमनुस्मृति राज अनिवार्य है और संयोग से  राम उसके भी प्रतीक हैं जो मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था को लागू करनेके लिए शंबूक की हत्या करते हैं और मनुस्मृति साम्राज्य के लिए अश्वमेध यज्ञ का वैदिकी आयोजन करके जनपदों को रौंद डालते हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम पितृसत्ता का निर्मम प्रतीक भी हैं जो सतीत्व की अवधारणा का जनक है और उनका न्याय सीता की अग्निपरीक्षा और सीता का ही गर्भावस्था में वनवास है।रामराज्य में सामाजिक न्याय और समता का यही रसायन शास्त्र है जो अब मुक्तबाजार का भौतिकीशास्त्र और अर्थशास्त्र भी है।

सत्ता पर वर्गीय,नस्ली कब्जा और संसाधनों,अवसरों से लेकर जीवन के हर क्षेत्र में सत्ता वर्ग का जन्मजात जमींदारी वर्चस्व बनाये रखकर समता और सामाजिक न्याय को सिरे से खत्म करने के लिए मजहबी सियासत जिस तरह कारपोरेट और नरसंहारी हो गयी है,उसमें कानून का राज जैसे हवाई किला है,लोकतंत्र उसी तरह ख्वाबी पुलाव है और विचारधारा विशुध वैदिकी कर्मकांड का पाखंड है।

इसका कुल नतीजा दस दिगंत सर्वनाश है।

अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली का विध्वंस है और राष्ट्र का,समाज का परिवार का,संस्थानों का खंड खंड विभाजन है।सारा तंत्र मंत्र यंत्र समरसता के नाम संपन्नता क्रयशक्ति के हितों में वर्गीय समझौता है और विचारधारा पाखंड है।

मजहबी सियासत का कुल नतीजा मुक्त बाजार है और मुक्तबाजार मजहबी सियासत में तब्दील है।सभ्यता और संस्कृति का अंत है तो विचारधारा और इतिहास का अंत है।

विडंबना है कि भारतीय धर्म कर्म राष्ट्रीयता के साथ साथ भारतीय संस्कृति और इतिहास का स्वयंभू धारक वाहक संस्थागत संघ परिवार है और देश में सत्ता की कमान उसी के हाथ में है।

राजकाज और नीति निर्धारण में संसदीय प्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थानों को हाशिये पर रखकर कारपोरेट हितों के मुताबिक ग्लोबल हिंदुत्व का एजंडा संघ परिवार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और मुफ्त में नस्ली रंगभेद के नये मसीहा डान डोनाल्ड अब उनका विष्णु अवतार है।

ट्रंप कार्ड से लैस हिंदुत्व की सरकार अर्थव्वस्था को उत्पादन प्रणाली से उखाड़कर कारपोरेट शेयर बाजार में तब्दील करके एकाधिकार आवारा पूंजी के वर्चस्व को स्थापित करने के मकसद से मुक्त बाजार के विस्तार को वित्तीय प्रबंधन में तब्दील कर चुका है और इसी सिलसिले में उसने नोटबंदी का रामवाण का इस्तेमाल करके यूपी दखल के जरिये राज्यसभा में बहुमत के लिए फिर राममंदिर का जाप करने लगा है।

नोटबंदी के बाद रेलवे को समाहित करके जो पहला बजट निकला है संघ परिवार के राम तुनीर से उसका कुल मकसद टैक्स सुधार है ताकि आम जनता पर सारे टैक्स और कर्ज को बोझ लाद दिया जाये।

डिजिटल कैसलैस सोसाइटी का मकसद भी खेती और व्यापार में लगे बहसंख्य बहुजन सर्वहारा का नरसंहार है।

रेलवे का निजीकरण खास एजंडा है प्राकृतिक संसाधनों और बुनियादी सेवाओं की निलामी के साथ साथ ,रक्षा,आंतरिक सुरक्षा,परमाणू ऊर्जा, बैंकिंग, बंदरगाह, संचार, ऊर्जा, बिजली पानी सिंचाई,निर्माण विनिर्माण,खनन कोयला इस्पात, परिवहन, उड्डयन,तेल गैस,शिक्षा,चिकित्सा,औषधि,उर्वरक,रसायन,खुदरा कारोबार  समेत तमाम सेक्टरों में अंधाधुंध विनिवेश और निजीकरण संघी रामराज्य का वसंत है,पर्यावरण ,जलवायु और मौसम है।

वायदा था बुलेट ट्रेनों का तो पटरियों पर निजी ट्रेनें दौड़ाने की तैयारी है और यात्री सुरक्षा के बजाय तमाम यात्री सेवाएं कारपोरेट हवाले है।

रेलकर्मचारियों पर छंटनी की तलवार है।

रेलवे पर संसद में किसी किस्म की विशेष चर्चा रोकने के लिए अबाध निजीकरण के मकसद से भारतीय रेल कारपोरेट हवाले पर पर्दा डालने के लिए रेल बजट बजट में समाहित है और नई पुरानी परियोजनाओं का कोई ब्यौरा नहीं है।

आर्थिक सुधारों को राजनीतिक सुधारों की चाशनी में डालकर लोक लुभावन बनाने का फंडा डिजिटल कैशलैस है तो नोटबंदी की वजह से सुरसामुखी हो रहे बजट घाटा,वित्तीय घाटा मुद्रास्फीति और मंहगाई,गिरती विकास दर, तबाह खेत खलिहान जनपद,तहस नहस उत्पादन प्राणाली,तबाह खेती,कारोबार और काम धंधे, बेरोजगारी, भुखमरी और मंदी के सर्वव्यापी संकट से निबटकर सुधारों के नरसंहारी कार्यक्रम को तेज करने का हिंदुत्व नस्ली एजंडा यह बजट है।

गांधी ने पूंजीवादी विकास को पागल दौड़ कहा था तो अंबेडकर ने बहुजनों को सामाजिक बदलाव और जाति उन्मूलन के एजंडे के साथ दो शत्रुओं कसे लड़ने का आह्वाण किया था-पूंजीवाद के खिलाफ और ब्राह्मणवाद के खिलाफ।

आजादी के सत्तर साल बाद सारा का सारा तंत्र ब्राह्मणवादी है और रामराज्य के जरिये तथागत गौतम बुद्ध की क्रांति में खत्म ब्राह्मणवाद का पुनरूत्थान सर्वव्यापी है और पूरा देश अब आर्यावर्त है तो अमेरिका को भी आर्यावर्त बनाने की तमन्ना है।

1991 से भारतवर्ष लगातार अमेरिका बन रहा है।डिजिटल कैशलैस आधार अनिवार्य भारत अमेरिका बनते बनते पूरी तरह अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील है।

हिंदुत्व एजंडा की पूंजी मुसलमानों के खिलाफ घृणा और वैमनस्य का अंध राष्ट्रवाद है तो सोना पर सुहागा यह है कि डान डोनाल्ड ने मुसलमानों और काली दुनिया के खिलाफ तीसरे विश्वयुद्ध का ऐलान कर दिया है।

इस तीसरे विश्वयुद्ध में भारत अब अमेरिका और इजराइल का पार्टनर है तो संघ परिवार की समरसता का नया पंडा है कि अगला राष्ट्रपति ब्राह्मण होगा और उपराष्ट्रपति दलित।वर्ग समझौते का यह नायाब उपक्रम है तो अर्थव्यवस्था के साथ साथ रिजर्व बैंक की स्वायत्तता का सत्यानाश करने के बाद शगूफा है कि नये नोट पर गांधी के बजाय अंबेडकर होंगे।

बहुत ताज्जुब नहीं है कि हिंदू धर्मस्थलों पर बहुत जल्द तथागत गौतम बुद्ध और अंबेडकर के साथ डान डोनाल्ड की मूर्ति की भी प्राण प्रतिष्ठा हो जाये और तीनों एकमुश्त भगवान विष्णु के अवतार घोषित कर दिये जाये।नया इतिहास जैसे रचा जा रहा है,वैसे ही नये धर्म ग्रंथ रचने में कोई बाधा नहीं है।

बहुसंख्य का अंधा राष्ट्रवाद लोकतंत्र और संविधान,कानून के राज,नागरिकत और मानवाधिकार,स्त्री बच्चों युवाजनों के साथ साथ वंचित वर्ग के लिए नरसंहार के वास्ते ब्रह्मास्त्र है।इस ब्रह्मास्त्र को कानूनी जामा संसद में पेश नया बजट है।

सन 1991 से बजटअगर पोटाशियम सायोनाइड का तेज जहर रहा है तो अब यह विशुध हिरोशिमा नागासाकी बहुराष्ट्रीय कारपोरेट उपक्रम है।

जनादेश आत्मघाती भी होता है।

विभाजित अमेरिका इसका ताजा नजीर है जो आधी से ज्यादा जनता को मंजूर नहीं है। अमेरिकी संसदीय परंपरा के मुताबिक राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों के वावजूद राजकाज के हर फैसले और समझौते को संसद में कानून बनाकर लागू करने की परंपरा है,उसे तिलांजलि देकर व्हाइट हाउस में चरण धरते ही डान डोनाल्ड एक के बाद एक एक्जीक्युटिवआर्डर के जरिये संसद को बाईपास करके अपने नस्ली कुक्लाक्स श्वेत तांडव से दुनिया में सुनामियां पैदा कर रहे हैं।

गौरतलब है कि हिटलर और मुसोलिनी भी लोकप्रिय जनादेश से पैदा हुए थे।

भारत में वहीं हो रहा है जो दोनों विश्वयुद्धों के दरम्यान जर्मनी और इटली में हुआ था या जो डान डोनाल्ड का राजकाज है।अब हिटलर,मुसोलिनी और डान डोनाल्ड हमारे अपने हुक्मरान हैं और हम उनके गुलाम प्रजाजन हैं।


১৯৪৭-এর জুন মাসে বাংলার বিধানসভায় বাংলাভাগ চূড়ান্ত হলে পূর্ববাংলা থেকে নির্বাচিত ড. আম্বেদকরের সদস্যপদ স্বাভাবিক কারণেই খোয়া যায়, একই কারণে খোয়া যায় প্রমথ রঞ্জন ঠাকুরের সদস্যপদও।

পি. আর. ঠাকুর(3)

কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর
পি. আর. ঠাকুর প্রসঙ্গে যাবার আগে বাবাসাহেব ড. আম্বেদকর সম্পর্কে দুয়েকটি কথা বলা দরকার। গণ-পরিষদে বাংলা থেকে তাঁর নির্বাচন আটকাতে কংগ্রেস, বিশেষত সরদার বল্লভভাই প্যাটেল সর্বাত্মক যুদ্ধ ঘোষণা করেছিলেন। যার ফলে আমরা স্বাভাবিক ভাবে ধরে নিই, সংবিধান পরিষদের ভেতরেও কংগ্রেস সদস্য ও নেতৃবৃন্দ নিশ্চয়ই সেই বিরোধিতা অব্যাহত রেখেছিলেন। ঘটনাবলী কিন্তু তার বিপরীত সাক্ষ্যই দেয়। একেবারে সূচনা থেকেই সেখানে বাবাসাহেবকে প্রাপ্য মর্যাদা দেওয়া হয়েছে। বাইরের বিরোধিতা ভেতরে টেনে আনা হয়নি।
৯ ডিসেম্বর '৪৬, অধিবেশন শুরুর দিন উপস্থিত ছিলেন সর্বমোট ২০৭ জন। সম্মানের সঙ্গে একেবারে প্রথম সারিতে যাঁদের বসানো হয়েছিল, তালিকাটা লক্ষণীয়: পণ্ডিত জহরলাল নেহেরু, মৌলানা আবুল কালাম আজাদ, সর্দার বল্লভভাই প্যাটেল, আচার্য কৃপালিনী, ড. রাজেন্দ্র প্রসাদ, সরোজিনী নাইডু, হরেকৃষ্ণ মহতাব, জি বি পন্ত, বি আর আম্বেদকর, শরৎচন্দ্র বোস, সি রাজাগোপালাচারী এবং এম. আসফ আলি। পরবর্তী কালেও লক্ষ করা গেছে, সংবিধান সভার চেয়ারম্যান রাজেন্দ্রপ্রসাদ একটি বিষয় নিয়ে বিতর্কে কুড়িজনের তালিকা ডিঙিয়ে আম্বেদকরকে বলার সুযোগ দিচ্ছেন। বাবাসাহেব সেজন্য বক্তব্যের আগে বিস্ময়ও প্রকাশ করছেন। ১৯৪৭-এর জুন মাসে বাংলার বিধানসভায় বাংলাভাগ চূড়ান্ত হলে পূর্ববাংলা থেকে নির্বাচিত ড. আম্বেদকরের সদস্যপদ স্বাভাবিক কারণেই খোয়া যায়, একই কারণে খোয়া যায় প্রমথ রঞ্জন ঠাকুরের সদস্যপদও।
৩০শে জুন ১৯৪৭, ড. রাজেন্দ্রপ্রসাদ বোম্বের প্রাইম মিনিস্টার বি জি খেরকে অনুরোধ করেন ড. আম্বেদকরকে পুনঃনির্বাচিত করতে। সেই সূত্রে জুলাই মাসেই ড. আম্বেদকর সংবিধান পরিষদে পুনঃনির্বাচিত হয়ে আসেন এবং বাংলার পরিবর্তে বোম্বের সদস্য হিসেবে পরিচিতি লাভ করেন। বাংলার সঙ্গে তাঁর নির্বাচনী বন্ধন ছিন্ন হয়। ইতিপূর্বে, জুন মাসের ২তারিখে মহাপ্রাণ যোগেন্দ্রনাথ মণ্ডলকে (Law Member to the Govt.of India) তিনি একটি গুরুত্বপূর্ণ চিঠি লেখেন যোগেন্দ্রনাথের ৩০মে '৪৭-এর চিঠির উত্তরে। যাতে ড.আম্বেদকরের দৃষ্টিভঙ্গী, বিশ্বাস ও আগামী কর্মসূচি সম্পর্কে সুস্পষ্ট ছবি ধরা পড়ে। ধরা পড়ে হিন্দু ও মুসলমান নেতৃবৃন্দ সম্পর্কে তাঁর প্রকৃত মনোভাব। ওই পরিস্থিতিতে দু'দিকেই রক্ষাকবচ (safeguards)আদায় করাকেই তপশিলিদের একমাত্র লক্ষ্য হওয়া উচিত বলে তিনি মন্তব্য করেছেন। নানা বিষয়ে আলো ফেলা সেই গুরুত্বপূর্ণ চিঠিটি প্রসঙ্গান্তরে নিশ্চয়ই কেন্দ্রীয় আলোচ্য বিষয় হতে পারে, কিন্তু বর্তমান আলোচনায় তা ততটা প্রাসঙ্গিক নয়। 
সংবিধান সভায় পি আর ঠাকুরের যা কিছু অবদান, জুন '৪৭-এর মধ্যে সীমাবদ্ধ। এই সময়ে যেখানে সুযোগ মিলেছে, তিনি নিজের বক্তব্য তুলে ধরেছেন। যেমন সংবিধান সভাতেও (২৫/১/৪৭) তিনি পূর্ববাংলার দুর্ভিক্ষ আর দাঙ্গা পীড়িতদের জন্য জোরালো কন্ঠে ত্রাণের দাবী তুলে ধরেছেন। এই দরদ ও দায়বদ্ধতা সংবিধান পরিষদে আর কোনও সদস্যের কন্ঠে আমরা শুনতে পাই না। তাঁর সম্পর্কে আর কয়েকটি তথ্য দিয়ে এই আলোচনার ইতি টানব।

Sunday, February 5, 2017

15 thousand Bengali Hindu refugees served notice to leave Assam by Ulfa RSS linked outfit under RSS Governance RSS Never treated Bengali refuges as Hindu but Refugees always voted for Hindutva agenda! Palash Biswas

15 thousand Bengali Hindu refugees served notice to leave Assam by Ulfa RSS linked outfit under RSS Governance 

RSS Never treated Bengali refuges as Hindu but Refugees always voted for Hindutva agenda!

Refugees in Uttarakhand and Uttarpradesh must think twice about their future in RSS Governance before they vote this time.

Palash Biswas

Refugees in Uttarakhand and Uttarpradesh must think twice about their future in RSS Governance before they vote this time.

I am not surprised to see 15 thousand Bengali refugees in Assam being served notice by Assamese Extremist outfit under RSS Ulfa governance as Bengali Hindu refugees voted for RSS.


Refugees have voted for RSS governance in Assam.It is ULFA empire now.I had been warning refugees against RSS Manusmiti agenda which ensured partition of India to eject out East Bengal SC OBC population out of their homeland.It is the original sin which refugees never knew because we have no firs persion account from partition victin fisrt generation.

It was LK Adwani the iron man who passed Citizenship amendment Act with all party onsensus in the parliament.Refugees seem to forget this also.

While Uttarakhand was created by RSS governace in the centre along with Chhatisgargh and Jharkhand,first RSS government declared Bengali refugees Illegal migrants in Donald Trump style just after the death of my father,the refugee leader Pulin Babu who had been most worried because of Assam movement against refugees where he have been working in sixties during the riots against Bengali refugees.He had been trying hard to organize refugees to get citizenship, reservation and right to mother tongue but failed as no All India Refugee orgnization shaped in.

It was the local support by all sections of Uttarakhand people,intelligentsia,media and politics which saved Bengali Refugees against RSS prtition replicated eviction plan yet again.

Citizenship amendment act was passed by RSS and the ruling hegemony has been targeting the refugees resettled all over India under great deportation drive which began with Orrissa.

Under such circumstances Nikhil Bharat Udvastu Samnya samiti was launched under the leadership of Dr.Subodh Biswas.

But refugee leaders have been trying hard to get citizenship with RSS Hindutva agenda.

I always warned against it even if it is our movement and we may not afford to disintegrate the refugee movement just because of ideology or difference of opinion.I support the refugee leaders irrespective of my ideology and opinion.

Under RSS Governance in Chhatisgargh, Bengali refugees face unprecedented persecution and a movement against refugees has already been launched there.
But refugee leaders were hoping against hope that RSS would reinstate citizenship to Hindu Bengali refugees for which they voted RSS in Bengal,Assam and elsewhere,but RSS ensured every law enacted to reform the economy for destruction but skipped the most wanted citizenship amendment bill to restore citizenship to Hindu Bengali refugees.

Now it is deportation drive launched by RSS linked outfits afresh in Assam and Dandkaranya.
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Saturday, February 4, 2017

বঞ্চিত সমাজের জন্য পি. আর. ঠাকুরের এই অধিকারের লড়াই বৃথা যায়নি। কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর

পি. আর. ঠাকুর (২)

কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর
২৯ আগস্ট ১৯৪৭ তারিখে বাবাসাহেব ড. আম্বেদকরকে সভাপতি রেখে সংবিধান ড্রাফ্টিং কমিটি ঘোষিত হয়। এর আগের ৯মাসকে বলা যায় সংবিধানের নীতি নির্ধারণ তথা দিশা ঠিক করার পর্ব। নানাবিধ সাব কমিটি গঠিত হয়েছিল এ সময়, যাদের কাজ ছিল বিভিন্ন বিষয়ে প্রস্তাব বা পরামর্শ দান করা। 
২১ ডিসেম্বর ১৯৪৬ তারিখে Constituent Assembly Negotiating Committiee গড়ার জন্য ৬জনকে দায়িত্ব দেবার প্রস্তাব পেশ হয়, এঁরা হলেন—1 আবুল কালাম আজাদ 2.পণ্ডিত জহরলাল নেহেরু 3.সর্দার বল্লভভাই প্যাটেল 4.ড. বি. পট্টভি সীতারামাইয়া 5.শংকররাও দেও এবং 6.স্যার এন, গোপালস্বামী আয়েঙ্গার। এই কমিটির হাতে বিভিন্ন রাজ্য থেকে Negotiating কমিটিতে কারা এবং ক'জন নির্বাচিত হবেন সে ক্ষমতা দেওয়া হয়েছিল। প্রস্তাবটিতে একটি সংশোধনী দাবি করেন পি. আর. ঠাকুর। তিনি বলেন—" Sir, I want to move an amendment that after the name of the Hon'ble Sir N Gopalswami Ayyanger, the name of one of the depressed class member of the House be added….." এই সংশোধনী ঘিরে বিতর্ক শুরু হয়। বিহারের আদিবাসী সমাজের লড়াকু নেতা জয়পাল সিং একজন আদিবাসী সদস্য রাখার প্রস্তাব দেন।V.I. Munniswami Pillai পি. আর. ঠাকুরের সমর্থনে এগিয়ে আসেন। বোম্বের B.G Kher প্রমুখ বিরোধিতা করেন।শেষে স্বয়ং নেহেরু হাল ধরেন। তিনি আশ্বস্ত করেন এই বলে যে, তপশিলিদের প্রতি অবিচার করা হবে না। ঠাকুরকে তিনি সংশোধনী প্রত্যাহার করতে অনুরোধ করেন।
ক্ষুব্ধ পি.আর.ঠাকুর আসন ছেড়ে Rostram-এ চলে আসেন এবং ঘোষণা করেন: "In view of the statement made by the Hon'ble Pandit Jahar Lal Neheru, I want to withdraw the amendment that I have moved. But I want to mention..(Voices- 'No, no.') one thing only (several member –No, no'). I want this assurance that at least five out of the 93 seats will be given to the Depressed Classes." 
বঞ্চিত সমাজের জন্য পি. আর. ঠাকুরের এই অধিকারের লড়াই বৃথা যায়নি। কমিটিতে তপশিলিদের পাঁচের অধিক প্রতিনিধির স্থান হয়েছিল। এরপর ২৪/১/৪৭ তারিখে একটি Advisory Committee গঠিত হয় সংসদ এবং সংসদের বাইরের বিশিষ্ট ব্যক্তিদের নিয়ে।যাঁরা গুরুত্বপূর্ণ মতামত এবং পরামর্শ দান করবেন। এই কমিটির হাতে ছিল সাব-কমিটি গঠনের ক্ষমতাও। এছাড়া নাগরিকদের অধিকার, সংখ্যালঘু এবং আদিবাসীদের অধিকার এবং মৌলিক অধিকার(Fundamental rights) ছিল এই কমিটির বিবেচনার ক্ষেত্র। স্মরণে রাখা দরকার, সংখ্যালঘু হিসেবে তখন তপশিলিদেরও গণ্য করা হতো। ৭২ জনের এই Advisory Committee-তে তপশিলি সমাজের প্রতিনিধি হিসেবে নির্বাচিত হন-- 1.Sardar Prithvi Singh Azad 2.Dharam Prakash 3.H.J. Khandelkar 4.Jagjiban Ram 5.P.R. Thakur 6.Dr. B.R. Ambedkar 7.V.I. Munniswami Pillai. বাংলা থেকে গুরুত্বপূর্ণ এই কমিটিতে স্থান হয়েছিল গণ-পরিষদের সদস্য ড.প্রফুল্লচন্দ্র ঘোষ, ড.শ্যামাপ্রসাদ মুখার্জী, সুরেন্দ্রমোহন ঘোষ এবং ড.এইচ. সি. মুখার্জীর।

पी. और । टैगोर (2)
29 अगस्त 1947 को । डा. बाबा साहेब के राष्ट्रपति राष्ट्रपति के अवसर के अवसर पर । यह एक निवेदन है 9 महीने पहले । यह संविधान और मौजूदा नीति को सही करने के लिए कहा जा सकता है. इस समय विभिन्न उप समिति के एपिसोड में बनाई गई, जो अलग-अलग काम कर रहे थे या सलाह देते हैं ।
21 दिसंबर 1946 को 6 दिसंबर 1946 को 6 से 6 से 6 में 6 से 6 लोग कलाम नेहरू संविधान 2. पंडित नेहरू 3. सरदार संविधान भाई भाई भाई. 4. डा. बी. बी. बी. बी. शुभ वे देव देव और 6. सर, गोपाल स्वामी आय अयंगार । इस समिति में अलग-अलग राज्य में बातचीत करने वाले समिति के हाथ में है जो कि उन्हें शक्ति प्रदान की जा रही है. Prastābaṭitē का दावा है, एक संशोधन है, पी. और । ठाकुर । उसने कहा -" सर, मैं एक संशोधन करने के बाद एक संशोधन करने के बाद सर के नाम से खिसकाएँ के नाम से एक संशोधन के नाम से एक संशोधन जोड़ा के नाम से जोड़ा है....." इस संशोधन के आस-पास बहस शुरू करने के लिए. है । बिहार । आदिवासी समाज का समाज नेता जय सिंह एक पिल्लै पिल्लै पिल्लै पिल्लै पिल्लै पी. और । रवीन्द्रनाथ में टैगोर के समर्थन में आये । बंबई बी. जी खेर उसके चेहरे का विरोध करते हुए । आत्म नेहरू के अंत में प्रकाश के लिए । उसने कहा, " यह तुम्हारे लिए है कि उनपर कोई ज़ुल्म न होगा टैगोर संशोधन को वापसी से अनुरोध करने के लिए.
Kṣubdha pi । Āra. Ṭhākura āsana----:::: के दृश्य में ' ' माननीय पंडित जाहर लाल neheru द्वारा बनाया गया है, मुझे संशोधन करना चाहते हैं कि मैंने संशोधन कर लिया है । लेकिन मैं उल्लेख करना चाहता हूँ.. (आवाज-कोई नहीं, कोई भी नहीं है, कोई भी ' ' नहीं, मैं इस आश्वासन से कम से कम 93 सीटों से 93 सीटें होगी. उदास वर्ग."
समाज के के लिए p. और । इस लड़ाई में रवीन्द्रनाथ का अधिकार व्यर्थ हो सकता है । 24/1/47 वें प्रतिनिधियों के अवसर पर 24/1/47 वें प्रतिनिधियों का स्थान 24/1/47 वें स्थान पर थे. तब संसद में एक सलाहकार समिति का गठन किया गया था और उस व्यक्ति की संसद में सबसे महत्वपूर्ण है. अपनी राय और सलाह के अवसर पर आप लोगों के लिए धन्यवाद । यह उप-समिति का गठन और नागरिक के हाथ में था. इसके अलावा, अल्पसंख्यक अधिकारों और मूल अधिकारों और मूल अधिकारों का मूल अधिकार है । इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक की आवश्यकता है, जैसे कि भारत के एक प्रतिनिधि के रूप में. 72 सरदार पृथ्वी के रूप में एक सलाहकार समिति. 1. सरदार पृथ्वी singh आजाद 2. धरम प्रकाश 3. H.j. jagjiban khandelkar 4. राम 5. व्याख्याताओं ठाकुर 6. डॉ भीमराव अम्बेडकर 7. v.i. पिल्लै पिल्लै. इस समिति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय सभा सदस्य डॉ. श्याम चन्द्र घोष, डॉ. मुखर्जी मुखर्जी, धुन घोष और डॉ. सी. मुखर्जी.
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