Friday, April 4, 2014

गुजरात का ‘विकास मॉडल’



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लेनिन ने मैक्सिम गोर्की की किताब मां के बारे में कहा था कि यह किताब अपने समय का बेशकीमती दस्तावेज तो है ही साथ में सामयिक भी है। ठीक इसी तरह पिछले साल प्रकाशित होनेवाली किताब पॉवर्टी अमिड प्रोसपेरिटी : एस्सेज ऑन द ट्रैजेक्ट्री ऑफ डेवलपमेंट इन गुजरात यकीनन प्रासंगिक है। आज सारा कॉरपोरेट मीडिया—प्रिंट हो या ऑडियो विजुअल—एक सुर में राग अलाप रहा है कि 'गुजरात मॉडल' ही वह मॉडल है जो देश को विकास के रास्तों पर ले जा सकता है। गोया सारी कठिनाईयों को पार करने का एक मात्र रास्ता 'गुजरात मॉडल' और बकौल नरेंद्र मोदी ' गुड गवर्नेंस' उर्फ अच्छे प्रशासन को अपनाना ही है। मीडिया ने इस विचार के व्यापक प्रचार में भी कोई कोर-कसर नहीं उठा रखी है कि हिंदुस्तान में गुजरात विकास के परिदृश्य पर एक रोशन सितारा है और इस प्रदेश ने जो विकास नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किया है उसका अनुसरण करके भारतीय जनता की बड़ी खिदमत की जा सकती है। यह किताब न सिर्फ गुजरात के तथाकथित विकास की कलई खोलती है बल्कि यह भी बताती है कि आर्थिक वृद्धि की अंधी दौड़ में समाजी मुद्दों—गरीबी, विषमता, लैंगिक भेद-भाव, बेरोजगारी और अशिक्षा वगैरह को कैसे एक तरफ किया गया है। इस पुस्तक को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री प्रोफेसर अतुल सूद ने संपादित किया है, यह पुस्तक दर असल सूद के अलावा बारह स्वतंत्र शोधकर्ताओं के शोध और विश्लेषण पर आधारित दस लेखों का संग्रह है। सूद की दृष्टि में मौजूदा गुजरात मॉडल, जिसे दूसरे प्रदेश नकल करने को तैयार हैं, की 'विशेषता देश की अर्थव्यवस्था का अविनियमन (डीरेग्यूलेशन) और वैश्विक बाजारों के साथ एकीकरण' है।

सुचरिता सेन और चिनमय मलिक का लेख ऐतिहासिक संदर्भों में, कृषि में नीतिगत बदलाव—मुख्यत: भूमि संबंधी नीतियों की पड़ताल करते हुए इस हकीकत की बाकायदा पुष्टि करता है कि कैसे कृषि का निगमीकरण बढ़ रहा है। प्रदेश कृषि क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत की तुलना में एक से डेढ़ गुना तेजी से वृद्धि कर रहा है। बाजार पहुंच, तकनीकी प्रसार, बुनियादी ढांचे के विकास और अन्य क्षेत्रों के विकास ने इस क्षेत्र की वृद्धि दर में योगदान दिया है। कृषि में इस वृद्धि का वितरण प्रभाव काफी हद तक भूमि स्वामित्व और भूमि उपयोग पैटर्न के साथ-साथ इस बात पर निर्भर करता है कि छोटे किसान की लाभकारी फसलों में कितनी भागीदारी है। कृषि खरीद, मूल्य निर्धारण और बाजारीकरण की नीतियों में उदारीकरण के द्वारा लायी गई वृद्धि से फसल विशेष और क्षेत्र विशेष भी कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। फसल पैटर्न में भारी परिवर्तन आया है—खाद्य फसलों का स्थान अब गैर-खाद्य फसलों और नकदी और नफा कमानेवाली फसलों ने ले लिया है। गौरतलब है कि भूमि आवंटन और फसली आंकड़े बताते हैं कि कपास की खेती और उच्च मूल्य की फसलों का फायदा ज्यादातर बड़े किसानों ने उठाया है। अगर हम जोत आकार से किसान समूहों को देखें, तो गुजरात में, सबसे छोटे जोत वाले किसान समूह के परिवारों की संख्या में वृद्धि तो हुई है परंतु उनके औसत रकबे में कमी हुई है, वहीं दूसरी ओर बड़ी जोत वाले किसान समूहों के औसत रकबे में बढ़ोत्तरी हुई है। यह बढ़ती हुई असमानता का संकेत है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुजरात में काश्त की जमीनों को जिस तरीके से बड़ी-बड़ी कंपनियों को कौडिय़ों के भाव दिया गया है वह मोदी सरकार और क्रोनी पूंजीवाद के बीच के मजबूत होते रिश्ते को बताता है। अडाणी समूह—जो कि विश्व प्रसिद्ध फोब्र्स पत्रिका के अनुसार 208 करोड़ डॉलर की पूंजी के साथ विश्व का 609वां बड़ा व्यापार घराना है और भारत के निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बंदरगाह, एक बिजली कंपनी और कॉमोडिटी ट्रेडिंग का व्यवसाय चलाता है—को मात्र एक रुपए प्रति मीटर की दर से 14305.49 एकड़ (5.78 करोड़ वर्ग मीटर) कच्छ की जमीनें दी गईं। वहीं इस घराने ने, इन जमीनों को राज्य के स्वामित्व वाली इंडियन ऑयल कंपनी सहित अन्य कंपनियों को 11 डॉलर प्रति वर्ग मीटर की दर से उप-पट्टे (सबलेट) पर देकर भारी मुनाफा कमाया। ये भारी मुनाफा, दरअसल, राजस्व की हानि ही है। दूसरी तरफ, जमीन की खरीद-फरोख्त की नीति में हुए बदलाव ने काश्त की जमीनों तक आम किसानों की पहुंच को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है।

काबिले गौर बात है कि जमीन की इस लूट से न सिर्फ राजस्व की हानि हुई है बल्कि इसने पर्यावरण को भी बहुत प्रभावित किया है। तमाम पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर अडाणी के पॉवर प्लांट को लाइसेंस दिया गया। सुनीता नारायण की अध्यक्षता में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित कमेटी (कमेटी फॉर इंस्पेक्शन ऑफ मेसर्स अडाणी पोर्ट एंड एसईजेड लिमिटेड, मुंदरा, गुजरात) की रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ कि इसके पॉवर प्लांट की हवा में उडऩेवाली राख (फ्लाई ऐश) से ज्वरीय वन (मैंग्रोव्स) नष्ट हो रहे हैं, कच्छ की संकरी खडिय़ां (क्रीक) भर रही हैं तथा जल और भूमि का क्षरण हो रहा है। पर्यावरण का यह क्षरण लोगों की रोजी-रोटी पर भारी पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, कच्छ के मछुआरों का कहना है कि मछली पकडऩे के मौके में लगभग साठ फीसदी की कमी आई है। गुजरात का यह विकास मॉडल जहां बड़े उद्योगों के मुनाफा कमाने के अवसरों को बढ़ा रहा है वहीं यह छोटे-छोटे किसानों, मछुआरों और मजदूरों से उनका रोजगार छीन रहा है।

रुचिका रानी और कलाई यारासान ने अपने लेख में तेजी से बढ़ते हुए विकास और रोजगार के क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलन का बखूबी विश्लेषण किया है। इन का यह लेख इस बात की पुष्टि करता है कि कैसे गुजरात में तथाकथित विकास की सब से बड़ी विडंबना यह है कि यहां रोजगार का मसला ज्यों का त्यों बना हुआ है—गुजरात में रोजगार के अवसर मंदी और जड़ता की दास्तान बयान करते हैं। यानी रोजगार की दर में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आंकड़ों के अनुसार में 1993-94 से 2004-05 तक रोजगार में वृद्धि दर 2.69 प्रतिशत वार्षिक थी जो 2004-05 से 2009-10 तक यह दर घट कर शून्य तक पहुंच गई।

गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले सत्रह सालों के दौरान (1993 से 2010 तक) रोजगार में वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत के तकरीबन बराबर है, वहीं शहरी रोजगार की दर राष्ट्रीय औसत की तुलना में बेहतर है। पिछले पांच सालों में ग्रामीण क्षेत्र में गैरमामूली दर से हुई आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार के अवसर कम हुए हैं। पिछले चंद बरसों में रोजगार के सिलसिले, खासतौर से नौकरियों, में वृद्धि की दर मामूली रही और यह वृद्धि अमूमन अल्पकालिक और अस्थायी तौर पर मिलने वाली नौकरियों में हुई है। गुजरात में आर्थिक विकास की निर्भरता—जिस को अर्थशास्त्र की शब्दावली में ड्राईवरज आफ ग्रोथ कहते हैं—औद्योगिक क्षेत्र है। इस किताब के एक और लेख में संगीता घोष ने इसी क्षेत्र का बहुत ही विस्तार से विश्लेषण किया है। वह इस बात को बड़े ही तार्किक अंदाज में प्रस्तुत करती हैं कि गुजरात में अन्य प्रदेशों के मुकाबले मजदूरी में तेजी से गिरावट आई है। तीस साल पहले, गुजरात का देश में ग्रास वैल्यू एडेड में जो हिस्सा हुआ करता था वह आज दो गुना हो गया है। इसके बावजूद देश के औद्योगिक क्षेत्र के रोजगार में गुजरात की भागीदारी संतोषजनक नहीं है—रोजगार की वृद्धि दर जड़ बनी हुई है जो अर्थशास्त्रियों के लिए एक अहम सवाल है। विदित हो कि ग्रास वैल्यू एडेड (जीवीए) या सकल वर्धित मूल्य अर्थव्यवस्था के एक क्षेत्रक (विनिर्माण) में तैयार कुल उत्पादों का मौद्रिक मूल्य है।

जहां तक मजदूरी की बात है, रोजगार में लाभ के बावजूद मजदूरी में कोई संतोषजनक वृद्धि नहीं हुई है। मजदूरी में इजाफे़ की यह दर 2000 के दशक में सिर्फ 1.5 प्रतिशत थी जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 3.8 प्रतिशत थी। इसी दशक में, इस प्रदेश का देश के औद्योगिक उत्पादन (मैनूफैक्चरिंग) जीवीए का हिस्सा 14 फीसदी था वहीं रोजगार में यह हिस्सा 9 प्रतिशत था। गुजरात ऐसा एक मात्र प्रदेश है जहां मजदूरी और जीवीए का अनुपात सब से कम रहा है। इस अविश्वसनीय हालत में अनुबंध पर लगे अस्थायी और अल्पकालिक मजदूरों का शोषण बढ़ा है। गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जहां 2000 के दशक में मजदूरी का जीवीए में हिस्सा देश के अन्य प्रदेशों—हरियाणा, महाराष्ट्र और तामिलनाडु के मुकाबले सब से नीचे रहा है। उस की वजह से एक समय में परस्पर विरोधी स्थितियां पैदा हो गईं हैं—जहां एक तरफ कारखानों में मजदूरों की हालत बदतर हुई है वहीं दूसरी तरफ पूंजी और मुनाफे में वृद्धि हुई है।

हम जानते हैं कि गुजरात में कारखाने फल-फूल रहे हैं। अनुसूचित जनजातियों के जीवन की निर्भरता, विशेषत: 2005-10 के दौरान कृषि पर केंद्रित रही है। 1993-94 के रोजगार में उनका हिस्सा सात प्रतिशत था, जो 2009-10 में भी ज्यों-का-त्यों बना रहा। जहां तक मुसलमानों की हिस्सेदारी का सवाल है वो पंद्रह प्रतिशत से घट कर चौदह प्रतिशत हो गई। इस संदर्भ में डॉ. सूद का विचार कुछ इस प्रकार है: "गुजरात में जो कुछ हो रहा है हिंदुस्तान के दूसरे प्रदेशों में होने वाले परिवर्तनों—अल्प रोजगार, कैपिटल ईंटेंसिव ग्रोथ और श्रम के अस्थायी और अल्पकालिक होने का अग्रदूत है।''

पिछले पांच सालों में दूसरे प्रदेशों के विकास और औसत राष्ट्रीय विकास के मुकाबले गुजरात में प्रति व्यक्ति मासिक खपत (एमपीसीई )शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में कम रही है। गुजरात में 2009-10 में एमपीसीई 1388 रुपए था जो हरियाणा (1598 रुपए) और महाराष्ट्र्र (1549 रुपए) से बहुत कम है। इस तरह गुजरात में एमपीसीई की सतह जो 1993 में अपेक्षाकृत अच्छी थी वह 2010 तक पहुंचते-पहुंचते खत्म हो गई।

इसी तरह गुजरात में गत पांच वर्षों के दौरान ग्रामीण निर्धनता में 2.5 प्रतिशत सालाना की कमी आई है जो राष्ट्रीय स्तर की औसत हालत से बेहतर है मगर महाराष्ट्र और तमिलनाडु से कम है। 2009-10 के अंत तक ग्रामीण गुजरात में गरीबों की संख्या हरियाणा और तमिलनाडु की तुलना में ज्यादा थी और 1990 की दहाई के आरंभ में दूसरे प्रदेशों के मुकाबले इनकी गिनती में ज्यादा सुधार नहीं आया है। गरीबों की संख्या और निर्धनता की दर का विश्लेषण उस परिदृश्य की पुष्टि करता है जिसमें 1993 से 2005 तक और 2005 से 2010 तक शहरी क्षेत्रों में गरीबी की दर में गिरावट की रफ्तार राष्ट्रीय स्तर और दूसरे प्रदेशों की अपेक्षा कम रही है और दिलचस्प बात यह है कि शहर में निर्धनता की दर में यह वृद्धि वाइब्रेंट गुजरात वाले दौर में हुई है।

बराबरी और समता के स्तर पर भी गुजरात में कोई बेहतरी नहीं आई है। 1993-94 में देश की औसत विषमता का स्तर 32 प्रतिशत के करीब था और गुजरात के लिए यही स्तर लगभग 27 प्रतिशत था, लेकिन 2009-10 में यह बढ़कर 33 प्रतिशत के करीब हो गया, मतलब यह कि पिछले सत्रह सालों में विषमता में वृद्धि हुई है। पिछले पांच सालों में यानी 2005 से 2010 के बीच जहां तमिलनाडु, महाराष्ट्र और हरियाणा में इसमें कमी आई है वहीं गुजरात में असमानता की दर में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।

आज गुजरात एक समृद्ध प्रदेश है मगर स्वास्थ्य और शिक्षा में इसकी हालत डावांडोल है। प्राथमिक शिक्षा के सिलसिले में एक अनुमान के मुताबिक देश के दूसरे प्रदेशों की अपेक्षा साक्षरता की दर में सुधार की रफ्तार सुस्त है। 2000 से 2008 के दौरान, छह से अधिक वर्षों के बच्चों में साक्षरता के लिहाज से गुजरात का रैंक देश के अन्य राज्यों के मुकाबले गिरा है जो कि पांचवे से सातवें स्थान पर पहुंच गया है। शैक्षिक संस्थाओं में जाने वालों का अनुपात हाल में 21 से 26 प्रतिशत कम हुआ है। जबकि अन्य पंद्रह प्रदेशों में छह से दस प्रतिशत की कमी आई है। छह से चौदह साल के बच्चों में इसी अवधि में साक्षरता का लैंगिक-अंतर 20 प्रतिशत है। हालांकि, गुजरात में साक्षरता दर (स्कूल जाने वाले बच्चों की) कुल राष्ट्रीय औसत की साक्षरता दर से ऊंची है—महाराष्ट्र और हरियाणा से भी ज्यादा है; परंतु यह दर तमिलनाडु से थोड़ा कम है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में, जहां तक शिशु मृत्यु दर की गिरावट का सवाल है, अगर देश के अन्य प्रदेशों से गुजरात का मुकाबला करें तो यह दसवें पायदान पर है। 2000 और 2010 के दौरान शिशु मृत्यु दर के ग्रामीण-शहरी अनुपात में कोई फर्क नहीं हुआ है। गत दस सालों में शहरी-ग्रामीण असंतुलन और विषमता वैसी-की-वैसी बनी हुई है। मृत्यु दर के लैंगिक-अंतर को कम करने की कारगुजारी भी संतोषजनक नहीं है। 2000 और 2010 के दौरान अनुसूचित जातियों और जनजातियों और अन्य सामाजिक समूहों के बीच असमानता में वृद्धि हुई है। जहां तक आहार और पोषण का मामला है, प्रदेश में 1998-99 में पोषण की कमी के प्रभाव का अनुपात राष्ट्रीय औसत की अपेक्षा से समाज के वर्गों में कम हुआ है जबकि 2005-06 में राष्ट्रीय औसत के अनुपात से पोषण की स्थिति और खराब हुई है। अनुसूचित जातियों में पोषण की कमी राष्ट्रीय औसत के बराबर है वहीं अनुसूचित जनजातियों में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। पोषण में, 1999 और 1995 के दौरान जो प्रदेश नौवीं पायदान पर था वही प्रदेश 2005 से 2010 के बीच ग्यारहवीं पायदान पर पहुंच गया। यह सब तब हुआ जब विकास का राष्ट्रीय स्तर लगातार बढ़ता ही रहा है।

यह बात भी काबिल-ए-जिक्र है कि सामाजिक सेवाओं के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदेश का व्यय जीएसडीपी के प्रतिशत और कुल व्यय के प्रतिशत के रूप में दूसरे प्रदेशों की औसत गिरावट से ज्यादा गिरा है और राष्ट्रीय औसत के नीचे आकर ठहर गया है। यह स्थिति इस बात का संकेत करती है कि सरकार क ी सामाजिक सेवाओं को उपलब्ध कराने की बुनियादी जिम्मेदारी से ध्यान हटाया गया है।

एक तरह से गुजरात ऐसे राजनीतिक और आर्थिक मॉडल की झलक पेश करता है जिस में बाजार के तहत होने वाली वृद्धि के फार्मूले पर विश्वास किया गया है। सरकारी खजाने का इस्तेमाल निजी निवेश को बढ़ावा देने के साथ-साथ उस को ज्यादा से ज्यादा लाभप्रद बनाने के लिए हुआ है। इस अंधी दौड़ में विकास के बुनियादी अधिमानों—सबका विकास, स्वास्थ्य व शिक्षा तक सबकी पहुंच, रोजगार और समता—को नजरअंदाज किया गया है। तेज रफ्तार वृद्धि को विकास की गारंटी समझा गया जबकि हकीकत यह है कि वृद्धि दर का विकास-दर से कोई संबंध नहीं है। काबिल फख्र वृद्धि का हुसूल, निर्धनता और समावेश की बिगड़ती स्थिति को बेहतर बनाने की जमानत नहीं बन सका। इसके उलट बेरोजगारी बढ़ाने, सामाजिक न्याय बिगाडऩे, निर्धनता और विषमता को बढ़ाने में कारगर हुआ है। अगर केंद्रीय नीतियों में तब्दीलियां नहीं लाई गईं या फिर प्रदेशों में प्रभावी ढंग से विभिन्न प्रकार के विकास एजेंडों पर अमल नहीं किया गया, तो गुजरात जैसे हालात दूसरी जगहों पर भी उत्पन्न हो सकते हैं।

अपसंस्‍कृति की संस्‍कृति

अपसंस्‍कृति की संस्‍कृति

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saifai-mahotsavसमाजवादी सरकार का 'सैफई महोत्सव' सिनेमाई सितारों के वैभव का बिंदास प्रदर्शन करके गुजर गया। इस महोत्सव को अपसंस्कृति का सांस्कृतिक विद्रुप इसलिए माना जा रहा है,क्योंकि यह आयोजन जिस समय सैफई की धरती पर रंगीनियां बिखेर रहा था,उसी समय मुजफ्फरनगर दंगों के पीडि़त खुले आसमान में हड्डियां कंपकपा देने वाली ठंड की मानव निर्मित त्रासदी झेल रहे थे। जाहिर है,ऐसे में एक संवेदनशील और जवाबदेही सरकार का दायित्व बनता है कि वह राहत-शिवरों में कराह रहे लोगों की सुध लेता? वैसे तो वृहत्तर भारत का लोक उत्सवधर्मी है,इसमें किसी को कोई संदेह भी नहीं है। लेकिन किसी प्रदेश की पूरी की पूरी सरकार ठंड से तीन दर्जन से ज्यादा बच्चों की मौत और हजारों लोगों के विस्थापन की पीड़ा से रूबरू होने के बावजूद फूहड़ और भड़काऊ आयोजन के रंग में डूबकर सत्ता के मद में चूर हो जाए तो यह स्थिति समाजवादी चरित्र और लोकतांत्रिक भावना को जानबूझकर नजरअंदाज करने की मानी जाएगी? प्रजातंत्र की जनकल्याणकारी सरकारों से अधिकतम संवेदनशील होने की अपेक्षा की जाती है, न कि संवेदनशून्य हो जाने की?

उत्तर प्रदेश के शासक पिता-पुत्र को मुजफ्फरनगर दंगों और सैफई महोत्सव से जुड़ी खबरों के प्रकाशन और प्रसारण में पूर्वाग्रही मानसिकता और षड्यंत्र की बू आ रही है। जब कोई शासक नीरो की तरह बंसी बजाने लगता है, तो उसे ऐसा ही भ्रम होता है। और सावन के अंधों को सब जगह हरा-हरा ही दिखता है। मीडिया की जबावदेही विसंगतियों पर प्रश्न खड़े करना और सत्ता के स्याह पक्ष को प्रकट करना है। विज्ञापन अथवा अन्य राजनीतिक लाभ से विभूषित करने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मीडिया हकीकत से आंख मूंद ले? इसके उलट सत्ताधारियों का जरूर यह कर्तव्य बनता है कि उनकी असफलताओं की कोई खबर आकार ले रही है तो वे उससे सामना करें और समस्या के निराकरण की दिशा में जरूरी पहल करें? किंतु उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसा करने की बजाए, जले पर नमक छिड़कने का काम किया। गोया, उसने सैफई महोत्सव में तो आठ-दस करोड़ रुपए खर्च किए ही, सत्रह मंत्री और विधायकों को अध्ययन के बहाने कई देशों में सैर-सपाटे के लिए भेज दिया। अब इस फिजूलखर्ची पर मीडिया सवाल नहीं उठाएगा तो क्या सरकार का जयगान करने लग जाएगा? यदि आप वाकई सच्चे समाजवादी होते अथवा आपके अंतर में कहीं आत्मा होती, तो आप यात्रा और महोत्सव की मौज-मस्तियों में डूबने की बजाय असहायों के दुख-दर्द में साथ खड़े होते?

चित्रपट के कलाकारों को नचाने का काम अखिलेश सरकार ने ही किया हो, ऐसा नहीं है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारें भी इसी प्रकृति की हैं। एक नबंवर को इन दोनों प्रदेशों का स्थापना दिवस पड़ता है। इस दिन ये सरकारें भी लोक संस्कृति के सरंक्षण के बहाने फिल्मी सितारों के फूहड़ व भड़काऊ प्रदर्शन करने लगी थीं। इन सरकारों ने भोपाल में जहां हेमा मलिनी और संगीतकार एआर रहमान के कार्यक्रम कराए, वहीं रायपुर में बिंदास अभिनेत्री करीना कपूर के साथ गायक सोनू निगम के कार्यक्रमों को जमीन पर उतारा। इन्हें पौने दो-दो करोड़ रुपए बतौर पारिश्रमिक दिए गए। आवास, आहार और आवागमन की पंचसितारा व्यवस्थाओं का खर्च अलग से उठाया गया। वैचारिक विपन्नता का यह चरम इसलिए भी ज्यादा हास्यास्पद, लज्जाजनक व आश्चर्य में डालने वाला है,क्योंकि इन दोनों प्रांतों में उस भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं,जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ध्वजा फहराने का दंभ भरती है। जबकि विडंबना यह है कि संस्कृति के सरंक्षण के बहाने सिने सितारों की प्रस्तुतियां, लोक की जो स्थानीय सांस्कृतिक पहचान है,उसे ही लीलने का काम कर रहीं हैं।

यह सांस्कृतिक संरक्षण का बाजारी मुखौटा है। इसमें प्रच्छन्न शोषण तो है ही,भष्ट आचरण भी परिलक्षित होता है? यह कदाचार चतुराई भरा है। इसमें प्रत्यक्ष रूप में न तो संस्कृतिकर्मियों की बेदखली का शोषण और अवमानना दिखाई देता है और न ही लेन-देन का कारोबारी कुचक्र। सिनेमाई महिमामंडन होता ही इतना मायावी है कि देशज लोक कितना ही उत्पीडि़त क्यूं न हो, वह दिखाई नहीं देता। देशज लोक की यह उपेक्षा आगे भी जारी रहती है,तो तय है,लोककर्मी और बदतर हालत में पहुंचने वाले हैं। भारत के राज्य ऐसे हैं,जहां समृद्ध लोक संस्कृति बिखरी पड़ी है। आर्थिक वंचना की पीड़ा झेलते हुए भी ये लोक कलाकार मंच मिलने पर स्वर्णिम आभा रचने को तत्पर दिखाई देते हैं। इन्हीं लोक प्रस्तुतियों को हम स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस के अवसरों पर रचकर राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय गौरव का अनुभव करते हैं। गौरवशाली इन लोक धरोहरों के प्रदर्शन का अवसर इन लोक कलाकारों को मिलता तो उन्हें दिया जाने वाला पारिश्रमिक उनकी बदहाल होती आर्थिक स्थिति को संवारता। लोक प्रस्तुतियों के माध्यम से बड़ी आबादी भारतीय ज्ञान परंपरा, मिथक और इतिहास बोध से परिचित होती। लेकिन यहां चिंताजनक है कि हमारे सत्ता संचालक देशज सांस्कृतिक मूल्यों से कट रहे हैं और संस्कृति के नाम पर सिनेमाई छद्म को महत्त्व देने लग गए हैं। यह स्थिति महानगरीय सार्वदेशिक संस्कृति का विस्तार है, जिसमें लोग अपनी जड़ों से कटते चले जाते हैं और संस्कृति को सामाजिक सरोकारों से काटकर,मनोरंजन के फूहड़ प्रदर्शन में बदल देते हैं। ठीक इसी तरह के भौड़े प्रदर्शन हमें टीवी के पर्दे पर हास्य और बिग शो जैसे कार्यक्रमों में दिखाई देते हैं।

हमारी लोक संस्कृतियां हैं, जो अवाम को भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम रूपों से परिचित कराती हैं। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराण कथाओं के लघु रूप लोक प्रस्तुतियों में अंतर्निहित हैं। वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, बौद्ध, मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, परनामी, कबीरपंथी आदि अनेक धर्म व विचार भिन्नता में आस्था रखने वाले लोगों में पारस्परिक सौहार्द का मंत्र लोक श्रुतियां ही रचती हैं। जो आध्यात्मिकता भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है,उसके जनमानस में आत्मसात हो जाने की प्रकृति, देशज लोक सांस्कृतिक मूल्यों से ही पनपती है। आंतरिक एकता जो शाश्वत और सनातन है,बाहरी वैविध्य जो अल्पजीवी और महत्त्वहीन है,जीवन दृष्टि के इस समावेशी मूल्य के प्रचार का कारक यही लोक धरोहरें हैं।

सिनेमाई नायिकाओं के नृत्य से कहीं ज्यादा प्रभावकारी व उपदेशी संपे्रषणीयता लोक नृत्यों और लोकनर्तकियों की भाव भंगिमाओं एवं उनके बोलों में निहित है। भगवान शिव के तांडव नृत्य से नृत्य लोक में आया। यही पहले लोक नृत्य के रूप में प्रचलित व प्रतिष्ठित हुआ और बाद में शास्त्रीय नृत्य के मूल का आधार बना। समारोहों की उत्सवधर्मिता के लिए लोक और शास्त्रीय नर्तकों को भी बुलाया जा सकता है। जीवन और प्रकृति के घनिष्ठ रूपों में तादात्म्य स्थापित करने के कारण, लोक नृत्य अलग-अलग वर्गों के व्यवसाय से प्रभावित होकर अनेक रूप धारण करते हैं। बदलते मौसम में कृषक समाज के सरोकार भी लोक नृत्य और गीतों से जुड़े होते है,जो कर्तव्य के प्रति चेतना के प्रतीक होते हैं। हमारे लोक में ऐसे अनेक प्रतीक है,जो अपनी विलक्षणता के कारण सार्वभौमिक हैं। उदाहरण स्वरूप 'सिंह' वीरता का 'श्वेत' रंग पवित्रता और शांति का 'सियार' कायरता का और 'लोमड़ी' चतुराई का प्रतीक पूरी दुनिया में माने जाते हैं। हरेक देश के लोक साहित्य में ये इन्हीं अर्थों के पर्याय हैं।

अफसोस है कि भूमंडलीय आर्थिक उदारवाद का सांस्कृतिक सत्य, स्थानीय लोक सांस्कृतिक विराटताओं के बीच एकरूपता का विद्रूप रचने लग गया है। हजारों साल से अर्जित जो ज्ञान परंपरा हमारे लोक में अद्वितीय वाचिक और लिखित संग्रहों के नाना रूपों में सुरक्षित है, उसे छद्म संस्कृति द्वारा विलोपित हो जाने के संकट में डाला जा रहा है। इस संकट को भी वे राज्य सरकारें आमंत्रण दे रही हैं,जो संस्कृति के संरक्षण का दावा करने से अघाती नहीं हैं। क्या यह सांस्कृतिक छद्म नहीं हैं?

अमर्त्‍य सेन की देवी और इच्‍छाओं का अश्‍व

अमर्त्‍य सेन की देवी और इच्‍छाओं का अश्‍व

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जयपुर साहित्य उत्सव में साहित्य कम और मेला-मनोरंजन अधिक है इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन अमर्त्य सेन, होमी भाभा, सुबोध गुप्ता और झुंपा लाहिड़ी जैसों को एक ही स्थान पर देखना-सुनना भी एक अनुभव है।



Amartya-Sen-Jaipur-Literature-Festivalअमर्त्य सेन ने अपनी बात दिलचस्प अंदाज में रखी कि कैसे उन्हें 'गॉड ऑफ मीडियम थिंग्स' या मध्यममार्ग की देवी मिली और उन्होंने उससे भारत के लिए सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग वरदान मांगा। अमर्त्य सेन की ये इच्छाएं जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े एक बुजुर्ग की नसीहत सरीखी हैं जिसकी अब एकमात्र इच्छा संभवत: यही है कि उसके परिवार के सदस्य मिलजुलकर खुशहाल जिंदगी जिएं। उसकी ये इच्छाएं यथार्थ से दूर हैं, आदर्शवादी हैं, असंभव जान पड़ती हैं लेकिन उसमें वर्तमान की सच्चाइयों और चुनौतियों को देखा जा सकता है।

पहले दिन उन्होंने देवी से कहा कि भारत में भाषा, साहित्य, संगीत और कला जैसी शास्त्रीय शिक्षाओं की घोर उपेक्षा क्यों की जाती है जबकि शिक्षा व्यवस्था और दैनिक जीवन में इनकी भूमिका का विस्तार होना चाहिए क्योंकि इन्हीं से संतुलन आएगा। इससे कौन सहमत नहीं होगा। इंजीनियरिंग,कंप्यूटर प्रौद्योगिकी,चिकित्सा, विज्ञान और प्रबंधन- कथित रूप से आसानी से नौकरी दिलानेवाले यही पेशेवर विषय हमारे देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में हावी हैं। मानविकी को गंभीरता से नहीं लिया जाता और समाज में इनके प्रति हेय और बेचारगी की दृष्टि है जो चिंताजनक है। मानविकी से जुड़े छात्रों और प्राध्यापकों, दोनों के ही स्तर औसत और अधिकांशत: दोयम दर्जे के हैं। कुछ समय पहले किए गए नैसकॉम और मैकिन्से के शोध के अनुसार मानविकी में डिग्री लेने वाले 10 में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने योग्य होता है। (पर्सपेक्टिव 2020) शिक्षा के निजीकरण के दौर में पिछले 16 सालों में 69 नये निजी विश्वविद्यालय खुले हैं लेकिन गिनती के ऐसे संस्थानों को छोड़कर निजी विश्वविद्यालयों में साहित्य, राजनीति शास्त्र या इतिहास की ही पढ़ाई नहीं होती है तो कला, साहित्य और संगीत तो दूर की कौड़ी है। जहां होती भी है वहां इन विषयों को पढऩेवाले छात्रों की संख्या काफी कम है। मानविकी और समाज विज्ञानों के प्रति भेदभाव की ये प्रवृत्ति सिर्फ उच्च शिक्षा में नहीं है इसकी नींव तभी रख दी जाती है जब 10वीं के बाद छात्रों को ऐच्छिक विषयों का चयन करने का अवसर मिलता है। प्राइवेट (जिन्हें बेहतर माना जाता है) स्कूलों में मानविकी और शास्त्रीय कलाओं के विभाग ही नहीं होते हैं और चाहकर भी छात्र इन विषयों को नहीं पढ़ पाते हैं। उनके सामने दो ही विकल्प होते हैं विज्ञान पढ़ें या फिर कॉमर्स।

अमर्त्य सेन की शास्त्रीय कलाओं और मानविकी को बढ़ावा देने की ये इच्छा अल्बर्ट आइंस्टीन के उस वक्तव्य की याद दिलाती है जो उन्होंने अपने मशहूर आलेख 'व्हाइ सोशलिज्म' में दिया था।

'पूंजीवाद की सबसे बड़ी बुराई यही है कि वह व्यक्ति को मानसिक दृष्टि से अक्षम और विकलांग बना देता है (क्रिपलिंग ऑफ इंडीविजुअल्स)। दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली छात्रों में अतिवादी प्रतियोगिता के बीज बोती है। उन्हें सिर्फ इसका प्रशिक्षण दिया जाता है कि सफलता अर्जित करके कैसे वे भावी कैरियर की तैयारी कर सकते हैं। '

'मुझे पूरा विश्वास है कि एक समाजवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना में ही इसका समाधान है। एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का गठन किया जाए जिसके सामाजिक मूल्य हों। एक व्यक्ति की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ उसकी क्षमताओं को ही बढ़ावा देना नहीं है बल्कि एक नागरिक के तौर पर उसमें अपने पड़ोस और समाज के प्रति दायित्वबोध विकसित करना है। '

'शिक्षण व्यवस्था को सफलता और ताकत के महिमामंडन की बजाय व्यक्ति में सामाजिक जवाबदेही की भावना भरनी चाहिए। '

आइंस्टीन का यह आलेख 1949 में मंथली रिव्यू के पहले अंक में छपने के बाद 1998 में, रिव्यू के 50 साल पूरा होने पर दोबारा प्रकाशित किया गया था।

अमर्त्य सेन ने देवी से दूसरा वरदान यह मांगा कि भारत में एक मजबूत दक्षिणपंथी पार्टी हो जो सांप्रदायिक न होकर धर्मनिरपेक्ष हो। क्या यह संभव है। अमर्त्य सेन का यह कहना एक कंफ्यूजन भी पैदा करता है। क्या एक दक्षिणपंथी धर्मनिरपेक्ष हो सकता है या एक धर्मनिरपेक्ष दल दक्षिणपंथी हो सकता है। ऐतिहासिक दृष्टि से दो परस्पर विरोधी धुरों को एक दूसरे का पूरक बनाने और उनकी कथित अच्छाइयों के विलय की बात एक तरह से ऐतिहासिक और राजनैतिक तथ्यों को भी अनदेखा करना है। जर्मनी हो या ब्रिटेन या फिर भारत- दक्षिणपंथी राजनैतिक दल जिस बहुसंख्यकवाद का पोषण करते हैं उसमें अल्पसंख्यक, धार्मिक हो या सामुदायिक वह हमेशा आशंका और हाशिये में रहता है। आखिर एक दक्षिणपंथी पार्टी की विचारधारा कैसे लोकप्रियता हासिल करती है। हॉवर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और महेंद्रा ह्यूमैनिटीज केंद्र के निदेशक होमी के भाभा कहते हैं कि, 'जनता दक्षिणपंथ की लोकलुभावन और प्रभावशाली दिखनेवाली असहिष्णुता से तब प्रभावित होती है जब लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु परंपराओं को पोषित करनेवाली ताकतों का ह्रास होता है और लोगों में इससे असंतोष पैदा होता है।'(इंटरव्यू, आउटलुक, जनवरी 2014)

But people turn to the effective populism of intolerant right-wing politics when there is a collapse of persuasive, progressive leadership from those who cherish democra­tic, secular traditions of tolerance that make India an inspiration to the world.

भारत में इस समय राजनैतिक दलों के अनुशासन, पहचान और तौर-तरीकों को लेकर एक संकट की सी स्थिति दिखती है। बीजेपी अपनी पूर्वाग्रही और कट्टर सांप्रदायिक छवि से मुक्ति पाने के लिए कॉस्मेटिक हथकंडे अपना रही है तो कांग्रेस एक राष्ट्रवादी नायक की तलाश में है और इस कोशिश में कभी वह बीजेपी की नकल करती प्रतीत होती है तो कभी आप से सबक लेते हुए 'ओपन मैनिफेस्टो' की बात करती है। अमर्त्य सेन की यह इच्छा भी संभवत: इसी प्रक्रिया से प्रेरित है। क्या बीजेपी को उनकी यह सलाह है कि अपनी फासीवादी छवि तोड़कर 'इंक्लूसिव' चोला पहन लेने से काम बन जाएगा। क्या ऐसे नरेंद्र मोदी उन्हें स्वीकार्य होंगे या फिर यह कि नरेंद्र मोदी के एक कांग्रेसी संस्करण की जरूरत है।

उनकी तीसरी इच्छा है कि भारत में लेफ्ट पार्टियां ज्यादा मजबूत हों लेकिन एकदम साफ हों कि उनकी रीति-नीति क्या हो। वह प्रतिबद्धता से साम्राज्यवाद का विरोध करें और इसका प्रयास करें कि गरीब और वंचितों की समस्याएं कैसे दूर हों। वामपंथ के तमाम असमंजस और अंतर्विरोध के बावजूद अमर्त्य सेन के ऐसा कहने से यह ध्वनि आती है कि सत्ता में कथित मजबूत धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ आए और वामपंथ सिर्फ विपक्ष और विचार के स्तर पर और दबाव समूह के तौर पर ही सीमित रहे।

ndtv-vedanta-our-girls-compaignदेवी से चौथा वरदान उन्होंने मीडिया के बारे में मांगा कि मीडिया और जिम्मेदार हो। मनोरंजन, बिजनेस, अवसरवाद, सब्सिडी के अलावा गरीबों की बात करे। मध्यममार्ग का उपदेश देनेवाली अमर्त्य सेन की देवी इस बात से अवगत होगी कि कॉरपोरेट मीडिया और सत्ता राजनीति के गठजोड़ के इस दौर में यह सच्चाई से मुंह मोडऩेवाली एक विरोधाभासी इच्छा है। सैकड़ों चैनलों और हजारों अखबारों से 'संपन्न' इस देश में मीडिया के मालिकों के छोटे-बड़े स्वार्थों से अब कोई भी अपरिचित नहीं रहा है। समाचार और विचार लगातार मैनिपुलेट किए जा रहे हैं और पक्ष-विपक्ष में एक छद्म वातावरण बनाया जा रहा है। एक उदाहरण के लिए, इस समय एनडीटीवी सहित सभी नामी चैनलों पर करोड़ों रुपए देकर उत्तराखंड सरकार की डॉक्युमेंट्री चलवाई जा रही है जिसमें आपदा के बाद सरकार के राहत और बचाव का प्रोपेगंडा है। स्क्रीन पर एक कोने में विज्ञापन लिखा हुआ जरूर आता है लेकिन सिर्फ एक सजग दर्शक ही इसकी पहचान कर पाएगा कि यह प्रचार है या रिपोर्ट है। यही एनडीटीवी कभी वेदांता के साथ मिलकर कन्या बचाओ अभियान चलाता है तो कभी बाघ बचाने का उपक्रम रचता है और उधर सरकारों की मनमानी और वेदांता और पॉस्को जैसी कंपनियों का खेल जारी रहता है।

इसी तरह से जयपुर शहर के चौराहों पर इन दिनों 'ईटीवी' का विशाल बोर्ड लगा है जिसमें वसुंधरा हाथ जोड़े दिखती हैं और लिखा है 'वेलकम बैक'। क्या यह समाचार चैनल है या सरकार का प्रचार निदेशालय। सभी प्रमुख अखबारों के पहले पृष्ठ वाहन, अपार्टमेंट, कोका-कोला, टूथ पेस्ट और साबुन तेल के विज्ञापनों के सुपुर्द हो चुके हैं। द हिंदू अब तक अपवाद था लेकिन उसका संयम भी जवाब दे गया लगता है। ऐसे विज्ञापनों के बाद मीडिया से किस प्रतिबद्धता की उम्मीद रह जाती है। किसी भी अन्य पूंजीवादी उपक्रम की तरह मीडिया भी अब हर तरह से कम से कम लागत में अधिक से अधिक पैसा कमाने का उपक्रम और होड़ का मैदान बन चुका है। इसलिए जब अमर्त्य सेन ये कहते हैं कि, 'बुद्धिजीवी लोग मीडिया को चलाते हैं और मीडिया अपनी ताकत को कम आंकता है' या जब वह ये अपील करते हैं कि, 'मीडिया को बलात्कार और सेक्स ट्रैफिकिंग जैसे विषयों पर संवेदनशील होना चाहिए तो यह नतीजे और सलाहें नकली प्रतीत होती हैं। '

अमर्त्य सेन की पांचवी इच्छा है कि हर बच्चा अच्छे स्कूल में जाए, सबको चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो। महिलाओं की जिंदगी दुरूह न हो। उनका कहना है कि यह बहुत आसान है अगर देश अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करे। दरअसल भारत के आर्थिक विकास का सामाजिक चेहरा इतना विडंबनापूर्ण है कि एक ओर अरबों रुपए की वेलनेस इंडस्ट्री तेजी से पांव फैला रही है तो दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।

bharat-nirman-ke-praman-educationएक नजर डालते हैं 2013 के मानव विकास सूचकांक (खुद अमर्त्य सेन और पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक द्वारा विकसित) में 186 देशों के आकलन में भारत की स्थिति पर। भारत शर्मनाक रूप से 136वें स्थान पर है। इन दिनों मीडिया में छाए 'भारत निर्माण के प्रमाण' के सरकारी अभियान के आंकड़ों में यह दावा किया जा रहा है कि इस समय 6-14 साल की उम्र के 19.7 करोड़ बच्चे मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का लाभ उठा रहे हैं। 2003-04 की तुलना में एनरॉलमेंट रेशियो में प्राइमरी में 17.7′ और मिडिल लेवल में 23′ बढ़ोत्तरी हुई है। सात लाख शिक्षकों के पद स्वीकृत हुए हैं और 30,888 प्राइमरी और 10,644 अपर प्राइमरी स्कूल के भवन बनाए गए हैं। दूसरी ओर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के 2011 के अंतरिम आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा यानी 1-5 साल की उम्र में 27 प्रतिशत बच्चे ड्रॉपआउट यानी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं, 1-8 साल की उम्र में 40 प्रतिशत तो 1-10 साल की उम्र के बीच के 49.3 प्रतिशत बच्चे दाखिला लेने के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं जिसकी एक बड़ी वजह है काम करने का दबाव। सबके लिए समान प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मिलेनियम विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अब दो साल से भी कम का समय रह गया है और ये आंकड़े बयान करते हैं कि कैसे अभी भी हम बुनियादी शिक्षा के सवाल पर ही जूझ रहे हैं और ड्रॉपआउट रेट समान शिक्षा और सामाजिक न्याय के आड़े आ रहा है।

सबके लिए समान और सुविधाजनक स्वास्थ्य सेवाओं की आदर्शवादी इच्छा का यथार्थ यह है कि एक सर्वेक्षण के अनुसार 28′ आबादी 66′ स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठा रही है और बाकी के 72′ की पंहुच सिर्फ एक तिहाई सुविधाओं तक है। औसतन 65 प्रतिशत लोग निजी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं जहां इलाज का खर्च 9 से 10 गुना ज्यादा होता है। (स्त्रोत: आईएमएस इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थकेयर इंफॉर्मेटिक्स)

अदालतों के कथित ढीले और रूढि़वादी नजरिये पर सवाल उठाते हुए अमर्त्य सेन ने अपनी छठी इच्छा जाहिर की: ' समलैंगिकता को अवैध माननेवाली धारा 377 को हाईकोर्ट ने पलट दिया फिर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। क्या आप( देवी को संबोधित) रिवर्सल ऑफ रिवर्स को रिवर्स कर सकती हैं यानी क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलट सकती हैं। ' भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के साथ-साथ और भी अनेक कानूनी विषय हैं जिन पर विमर्श होना ही चाहिए। अदालतों के कामकाज में पारदर्शिता लाने और उनकी भी जवाबदेही तय करने में जितनी देर होगी इस तरह के फैसलों के घाव बढ़ते जाएंगे।

अमर्त्य सेन की सातवीं और आखिरी इच्छा का संबंध उनके शब्दों में भारतीयों के डिफीटिज्म, उनके हताशावादी होने से है। उन्होंने देवी से अनुरोध किया कि वह भारतीयों को थोड़ा आशावादी होने में मदद करें। उन्होंने इस ओर ध्यान दिलाया कि आजादी के बाद भारत में कोई बड़ा दुर्भिक्ष नहीं आया जिसका श्रेय भारत की प्रगति और क्षमता को जाता है। लेकिन उन्होंने भारत में स्त्रियों की स्थिति, बलात्कार की बढ़ती घटनाओं और विशेष तौर पर स्त्री पुरुष के अनुपात के असंतुलन पर चिंता जाहिर की।

2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हैं। बाल लिंग अनुपात में स्थिति और भी खराब है। 0-6 साल की उम्र के बच्चों के बीच प्रति हजार लड़कों में सिर्फ 914 लड़कियां हैं। सवाल यह है कि वे कौन सी घटनाएं हैं, कौन से बिंदु हैं जो भारतीयों को आशावादी बना सकते हैं। किस चीज में उम्मीद खोजें आम जन।

अंत में अमर्त्य सेन ने आम आदमी की एक नई और वंचितों के पक्ष में परिभाषा गढऩे की कोशिश की। यही बिंदु मानो उनकी पूरी कवायद का सबसे सार्थक बिंदु था। उन्होंने कहा कि, 'सस्ती बिजली और सस्ता पानी मांगनेवाला आम आदमी नहीं है। आम आदमी वह है जिसके पास बिजली नहीं है, पानी नहीं है, जो वंचित है और जो अभावों में जी रहा है। ' ऐसा कहकर उन्होंने आप की राजनीति को भी आईना दिखाया। उनकी इच्छाओं की सदाशयता पर कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए लेकिन इस अत्यंत कठिन राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं के वक्त में कुछ इधर से और कुछ उधर से ठीक करो वाला फलसफा कितना न्यायसंगत और व्यावहारिक होगा- यह विचारणीय है। फिर सेन के इस वरदान अभियान में भ्रष्ट नौकरशाही के बारे में कुछ भी नहीं है। अफसरशाही क्या वैसी निरंकुश और यथास्थितिवादी बनी रहे जैसी वह है।

आइंस्टीन ने अपने आलेख में कहा था कि, 'राजनैतिक और आर्थिक ताकत के इस धुर केंद्रीकरण में इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि कैसे नौकरशाही की अकूत ताकत पर अंकुश लगाया जाए और उसके समानांतर व्यक्ति विशेष के अधिकारों की रक्षा की जाए और अफसरशाही की शक्ति का लोकतांत्रिक तोड़ सुनिश्चित किया जाए। ' क्या ऐसा हो पा रहा है। क्या ऐसा होगा।

बहरहाल, अमर्त्य सेन के सपनों का यह भारत, उनका यह मध्यममार्गी आग्रह गौतम बुद्ध की वीणा के तारों और भीतर ही कहीं महात्मा गांधी के संयम और सादगी की भी याद दिलाता है जो हमारे जीवन के हर पक्ष से गायब हो चुका है। लेकिन सत्ता-प्रतिष्ठान और अभिजात समाज के बंद दरवाजों तक न तो कोई गुहार पहुंचती है और न ही कोई सलाह। आंदोलन जो हैं सो हैं। जेनुइन प्रतिरोधों की क्या जगह और क्या अहमियत हो सकती है इस पर भी अमर्त्य सेन कुछ नहीं बोले। क्या मध्यममार्ग की उनकी देवी संघर्ष की हिमायती नहीं हैं।

दंगों की राजनीति : आतंकवाद का तड़का

दंगों की राजनीति : आतंकवाद का तड़का

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मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत और मेरठ के दंगे जो आमतौर पर मुजफ्फरनगर दंगे के नाम से मशहूर हैं, के बाद हुए विस्थापन और दंगा पीडि़त कैंपों की स्थिति की चर्चा तथा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर अभी चल ही रहा था कि अचानक अक्टूबर महीने में राजस्थान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने आईएसआई के दंगा पीडि़तों के संपर्क में होने की बात कह कर सबको चौंका दिया। राहुल गांधी का यह कहना था कि दंगा पीडि़त 10-12 युवकों से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई संपर्क साधने का प्रयास कर रही थी। इसकी जानकारी उन्हें खुफिया एजेंसी आईबी के एक अधिकारी से मिली थी। यह सवाल अपने आप में महत्त्वपूर्ण है कि आईबी अधिकारी ने यह जानकारी राहुल गांधी को क्यों और किस हैसियत से दी? उससे अहम बात यह है कि क्या यह जानकारी तथ्यों पर आधारित थी या फर्जी इनकाउंटरों, जाली गिरफ्तारियों और गढ़ी गई आतंकी वारदातों की कहानियों की तरह एक राजनीतिक खेल जैसा कि आतंकवाद के मामले में बार-बार देखा गया है और जिनकी कई अदालती फैसलों से भी पुष्टि हो चुकी है। राहुल गांधी के मुंह से यह बात कहलवाकर आईबी दंगा भड़काने के आरोपी उन सांप्रदायिक तत्त्वों को जिसमें कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेता भी शामिल थे, बचाना चाहती थी। राहुल गांधी ने इसके निहितार्थ को समझते हुए यह बात कही थी या खुफिया एजेंसी ने यह सब उनकी अनुभव की कमी का फायदा उठाते हुए दंगे की गंभीरता की पूर्व सूचना दे पाने में अपनी नाकामी से माथे पर लगे दाग को दर्पण की गंदगी बता कर बच निकलने के प्रयास के तौर पर किया था। क्या उस समय राहुल के आरोप को खारिज करने वाली उत्तर प्रदेश की सरकार ने बाद में खुफिया एजेंसी की इस मुहिम को अपना मूक समर्थन दिया था जिससे दंगा पीडि़तों, कैंप संचालकों और पीडि़तों की मदद करने वालों को भयभीत कर कैंपों को बंद करने की कार्रवाई की जाए ताकि इस नाम पर सरकार की बदनामी का सिलसिला बंद हो?

राहुल गांधी के बयान के बाद दंगा भड़काने वाली सांप्रदायिक ताकतों ने आईएसआई को इसका जिम्मेदार ठहराने के लिए जोर लगाना शुरू कर दिया था। इस आशय के समाचार भी मीडिया में छपे। दंगे के दौरान फुगाना गांव के 13 लोगों की सामूहिक हत्या कर उनकी लाशें भी गायब कर दी गई थीं। वह लाशें पहले मिमला के जंगल में देखी गईं परंतु बाद में उनमें से दो शव गंग नहर के पास से बरामद हुए। शव न मिल पाने के कारण उन मृतकों में से 11 को सरकारी तौर पर मरा हुआ नहीं माना गया था। समाचार पत्रों में उनके लापता होने की खबरें प्रकाशित हुईं जिसमें इस बात की आशंका जाहिर की गई थी कि जो लोग आईएसआई के संपर्क मे हैं उनमें यह 11 लोग भी शामिल हो सकते हैं। यह भी प्रचारित किया जाने लगा कि कुछ लोग दंगा पीडि़तों की मदद करने के लिए रात के अंधेरे में कैंपों में आए थे। उन्होंने वहां पांच सौ और हजार के नोट बांटे थे। इशारा यह था कि वह आईएसआई के ही लोग थे। आईएसआई और आतंकवाद से जोडऩे की इस उधेड़ बुन में ऊंट किसी करवट नहीं बैठ पा रहा था कि अचानक एक दिन खबर आई कि रोजुद्दीन नामक एक युवक आईएसआई के संपर्क में है। कैंप में रहने वाले एक मुश्ताक के हवाले से समाचारों में यह कहा गया कि वह पिछले दो महीने से लापता है। जब राजीव यादव के नेतृत्व में रिहाई मंच के जांच दल ने इसकी जांच की तो पता चला कि रोजुद्दीन जोगिया खेड़ा कैंप में मौजूद है और वह कभी भी कैंप छोड़ कर कहीं नहीं गया। तहकीकात के दौरान जांच दल को पता चला कि रोजुद्दीन और सीलमुद्दीन ग्राम फुगाना निवासी दो भाई हैं और दंगे के बाद जान बचा कर भागने में वह दोनों बिछड़ गए थे। रोजुद्दीन जोगिया खेड़ा कैंप आ गया और उसके भाई सलीमुद्दीन को लोई कैंप में पनाह मिल गई। जब मुश्ताक से दल ने संपर्क किया तो उसने बताया कि एक दिन एक पत्रकार कुछ लोगों के साथ उसके पास आया था और सलीमुद्दीन तथा रोजुद्दीन के बारे में पूछताछ की थी। उसने यह भी बताया कि सलीमुद्दीन के लोई कैंप में होने की बात उसने पत्रकार से बताई थी और यह भी कहा था कि उसका भाई किसी अन्य कैंप में है। पत्रकार के भेस में खुफिया एजेंसी के अहलकारों ने किसी और जांच पड़ताल की आवश्यक्ता नहीं महसूस की और रोजुद्दीन का नाम आईएसआई से संपर्ककर्ता के बतौर खबरों में आ गया। इस पूरी कसरत से तो यही साबित होता है कि खुफिया एजेंसी के लोग किसी ऐसे दंगा पीडि़त व्यक्ति की तलाश में थे जिसे वह अपनी सविधानुसार पहले से तैयार आईएसआई से संपर्क वाली पटकथा में खाली पड़ी नाम की जगहभर सकें और स्क्रिप्ट पूरी हो जाए। परंतु इस पर मचने वाले बवाल और आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के मामले को लेकर पहले से घिरी उत्तर प्रदेश सरकार व मुजफ्फनगर प्रशासन ने ऐसी कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया। केंद्र सरकार की तरफ से गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने भी कहा कि गृह मंत्रालय के पास ऐसी सूचना नहीं है। राहुल गांधी के बयान की पुष्टि करने की यह कोशिश तो नाकाम हो गई। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद आईबी की सबसे विश्वास पात्र दिल्ली स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने मुजफ्फरनगर दंगों का बदला लेने के लिए दिल्ली व आसपास के इलाकों में आतंकी हमला करने की योजना बना रहे एक युवक को मेवात, हरियाणा से गिरफ्तार कर लिया है और उसके एक अन्य सहयोगी की तलाश की जा रही है। यह दोनों मुजफ्फरनगर के दो अन्य युवकों के संपर्क में थे। हालांकि पूर्व सूचनाओं से उलट इस बार यह कहा गया कि जिन लोगों से इन कथित लश्कर-ए-तोयबा के संदिग्धों ने संपर्क किया था उनका संबंध न तो राहत शिविरों से है और न ही वह दंगा पीडि़त हैं।

मेवात के ग्राम बजीदपुर निवासी 28 वर्षीय मौलाना शाहिद जो अपने गांव से 20 किलोमीटर दूर ग्राम छोटी मेवली की एक मस्जिद का इमाम था, 7 दिसंबर 2014 को गिरफ्तार किया गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि अखबारों में यह खबर छपी कि पुलिस को उसके सहयोगी राशिद की तलाश है। राशिद के घर वालों को दिल्ली पुलिस की तरफ से एक नोटिस भी प्राप्त हुआ था जिसके बाद 16 दिसंबर को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नूहपुर (मेवात का मुख्यालय) की अदालत में राशिद ने समर्पण कर दिया। राशिद खान वाली मस्जिद घघास में इमाम था और वहां से 25 किलोमीटर दूर तैन गांव का रहने वाला था। इन दोनों पर आरोप है कि इनका संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तोयबा से है। इन दोनों ने मुजफ्फरनगर के लियाकत और जमीरुल इस्लाम से मुलाकात की थी। लियाकत सरकारी स्कूल में अध्यापक और जमीर छोटा-मोटा अपराधी है। मौलाना शाहिद और राशिद इन दोनों से मिले थे और मुलाकात में अपहरण की योजना बनाने और इस प्रकार प्राप्त होने वाले फिरौती के पैसे का इस्तेमाल मस्जिद बनवाने के लिए करने की बात उक्त दोनों ने की थी। बाद में उन्हें बताया गया कि फिरौती की रकम को मस्जिद बनाने के लिए नहीं बल्कि आतंकी वारदात को अंजाम देने लिए हथियार की खरीदारी पर खर्च किया जाएगा तो दोनों ने इनकार कर दिया। दिल्ली स्पेशल सेल का यह दावा समझ से परे है क्योंकि एक साधारण मुसलमान भी जानता है कि मस्जिद बनाने के लिए नाजायज तरीके से कमाए गए धन का इस्तेमाल इस्लाम में वर्जित है। ऐसी किसी मस्जिद में नमाज नही अदा की जा सकती। ऐसी सूरत में पहले प्रस्ताव पर ही इनकार हो जाना चाहिए था। यह समझ पाना भी आसान नही है कि एक दो मुलाकात में ही कोई किसी से अपहरण जैसे अपराध की बात कैसे कर सकता है।

दूसरी तरफ पटियाला हाउस कोर्ट में रिमांड प्रार्थना पत्र में स्पेशल सेल ने कहा है कि इमामों की गिरफ्तारी पिछले वर्ष नवंबर में प्राप्त खुफिया जानकारी के आधार पर की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शाहिद सीधे और सरल स्वभाव का है। वह मुजफ्फरनगर दंगों के बाद दंगा पीडि़तों के लिए फंड इकट्ठा कर रहा था और उसके वितरण के लिए किसी गैर सरकारी संगठन एवं मुजफ्फरनगर के स्थानीय लोगों से संपर्क किया था। तहलका के 25 जनवरी के अंक में छपी एक रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि लियाकत और जमीर दिल्ली व उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए मुखबिरी का काम करते थे। आतंकवाद के मामले में अबरार अहमद और मुहम्मद नकी जैसी कई मिसालें मौजूद हैं जब मुखबिरों को आतंकवादी घटनाओं से जोड़ कर मासूम युवकों को उनके बयान के आधार पर फंसाया जा चुका है। राहुल गांधी का आईबी अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दिया गया वक्तव्य, कैंपों में खुफिया एजेंसी के अहलकारों द्वारा पूछताछ, रोजुद्दीन के आईएसआई से संपर्क स्थापित करने का प्रयास और अंत में मौलाना शाहिद और राशिद की खुफिया सूचना के आधार पर गिरफ्तारी और लियाकत तथा जमीर की पृष्ठभूमि और भूमिका को मिलाकर देखा जाए तो चीजों को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। सांप्रदायिक शक्तियों ने खुफिया एवं जांच एजेंसियों में अपने सहयोगियों की सहायता से मुसलमानों को आतंकवाद और आतंकवादियों से जोडऩे का कोई मौका नहीं चूकते चाहे कोई बेगुनाह ही क्यों न हो। गुनहगार होने के बावजूद अगर वह मुसलमान नहीं है तो उसे बचाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। पांच बड़ी आतंकी वारदातों का अभियुक्त असीमानंद अंग्रेजी पत्रिका दि कारवां को जेल मे साक्षात्कार देता है और आतंकवादी वारदातों के संबंध में संघ के बड़े नेता इंद्रेश कुमार और संघ प्रमुख मोहन भागवत का नाम लेता है तो उसे न तो कोई कान सुनने को तैयार है और न कोई आंख देखने को। किसी एजेंसी ने उस साक्षात्कार के नौ घंटे की ऑडियो की सत्यता जानने का कोई प्रयास तक नहीं किया। चुनी गई सरकारों से लेकर खुफिया और सुरक्षा एवं जांच एजेंसियां सब मूक हैं। मीडिया में साक्षात्कार के झूठे होने की खबरें हिंदुत्वादियों की तरफ सें लगातार की जा रही हैं परंतु उसके संपादक ने इस तरह की बातों को खारिज किया है और कहा है कि उसके पास प्रमाण है। देश का एक आम नागरिक भी यह महसूस कर सकता है कि हमारे राजनीतिक नेतृत्व में न तो इच्छा है और न ही इतनी इच्छा शक्ति कि इस तरह की चुनौतियों का सामना कर सके। यही कारण है कि आतंक और सांप्रदायिक हिंसा का समूल नाश कभी हो पाएगा इसे लेकर हर नागरिक आशंकित है।

मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा को लेकर एक और सनसनीखेज खुलासा सीपीआई (माले) ने अपनी जांच रिपोर्ट में किया है। दंगे के मूल में किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ नही है यह तो पहले ही स्पष्ट हो चुका था। 27 अगस्त को शहनवाज कुरैशी और सचिन व गौरव की हत्याओं के मामले में दर्ज एफआईआर में झगड़े का कारण मोटर साइकिल और साइकिल टक्कर बताया गया था। परंतु सीपीआई (माले) द्वारा जारी रिपोर्ट से पता चलता है कि मोटर साइकिल टक्कर भी सचिन और गौरव की तरफ से शहनवाज की हत्या के लिए त्वरित कारण गढऩे की नीयत से की गई थी। इस पूरी घटना के तार एक बड़े सामूहिक अपराध से जुड़े हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार शहनवाज कुरैशी और सचिन की बहन के बीच प्रेम संबंध था। जब इसकी जानकारी घर और समाज के लोगों को हुई तो मामला पंचायत तक पहुंच गया और जिसने सचिन और गौरव को शहनवाज के कत्ल करने का फरमान जारी कर दिया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उक्त लड़की उसके बाद से ही गायब है और इस बात की प्रबल आशंका है कि उसकी भी हत्या हो चुकी है। इस तरह से यह आनर किलिंग का मामला है जो एक गंभीर सामाजिक और कानूनी अपराध है। एक घिनौने अपराध के दोषियों और उनके समर्थकों ने उसे छुपाने के लिए नफरत के सौदागरों के साथ मिलकर इतनी व्यापक तबाही की पृष्ठभूमि तैयार कर दी और हमारे तंत्र को उसकी भनक तक नहीं लगी। कुछ दिखाई दे भी तो कैसे जब आंखों पर सांप्रदायिकता की ऐनक लगी हो।

मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से ही जिस प्रकार से दंगा पीडि़तों का रिश्ता आईएसआई और आतंकवाद से जोडऩे का प्रयास किया गया उससे इस आशंका को बल मिलता है कि दंगा भड़काने के आरोपी हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तत्त्वों के कुकृत्यों की तरफ से ध्यान हटा कर उसका आरोप स्वयं दंगा पीडि़तों पर लगाने का षड्यंत्र रचा गया था। आतंकवादी वारदातों को अंजाम देने के बाद भगवा टोली ने खुफिया और सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों में अपने हिमायतियों की मदद से इसी तरह की साजिश को पहले कामयाबी के साथ अंजाम दिया था। देश में होने वाली कुछ बड़ी आतंकी वारदातों में मुंबई एटीएस प्रमुख स्व. हेमंत करकरे ने अपनी विवेचना में इस साजिश का खुलासा कर दिया था। गुजरात में वंजारा एंड कंपनी द्वारा आईबी अधिकारियों के सहयोग से आतंकवाद के नाम पर किए जाने वाले फर्जी इनकाउंटरों का भेद भी खुल चुका है। शायद यही वजह है कि बाद में होने वाले कथित फर्जी इनकाउंटरों में मारे गए युवकों और आतंकी वारदातों में फंसाए गए निर्दोषों के मामले में सांप्रदायिक ताकतों के दबाव के चलते जांच की मांग को खारिज किया जाता रहा है। मुजफ्फरनगर दंगों की सीबीआई जांच को लेकर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने भी ऐसी किसी जांच का विरोध किया है। सच्चाई यह है कि किसी निष्पक्ष जांच में जो खुलासे हो सकते हैं वह न तो दंगाइयों के हित में होंगे और न ही सरकार के और दोनों ने हितों की राजनीति का पाठ एक ही गुरू 'अमेरिका' से सीखा है। करे कोई और भुगते कोई की राजनीति यदि मुजफ्फरनगर दंगों के मामले में भी सफल हो जाती तो इसका सीधा अर्थ यह होता कि किसी भी राहत कैंप को चलाने की कोई हिम्मत नहीं कर पाता, दंगा पीडि़तों की मदद करने वाले हाथ रुक जाते या उन्हें आतंकवादियों के लिए धन देने के आरोप में आसानी से दबोच लिया जाता और पीडि़तों की कानूनी मदद करने का साहस कर पाना आसान नहीं होता। शायद सांप्रदायिक शक्तियां ऐसा ही लोकतंत्र चाहती हैं जहां पूरी व्यवस्था उनकी मर्जी की मोहताज हों। हमें तय करना होगा कि हम कैसा लोकतंत्र चाहते है और हर स्तर पर उसके लिए अपेक्षित प्रयास की करना होगा।

इस लाइलाज मरण कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए बोलने वाला कोई नहीं शायद इस महाशक्ति पारमाणविक देश में।

इस लाइलाज मरण कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए बोलने वाला कोई नहीं शायद इस महाशक्ति पारमाणविक देश में।


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



अब भी लोग मर रहे है बगैर इलाज के। जबकि बीमारियां अब पहले की तरह लाइलाज भी नहीं हैं,न यातायात के साधन कम हैं और न चिकित्सातंत्र पहुंच से दूर है। जनसंख्या तेजी से बढ़ी है जरुर,पर परिवार फिरभी नियोजित है।कम से कम परिवार नियोजन के बारे में लोग उत्तर आधुनिक हैं।सूचना महाविस्पोट और  विकास के इस दौर में जिस तरह से चेतना का प्रचार हो रहा है,वह देहात को शहरों में तब्दील करने लगा है। फिर भी लोग टोटके के उपर ज्यादा भरोसा करते हैं।फिरभी हम मध्ययुग में वसवास कर रहे हैं।


विज्ञान की प्रगति का हर लाभ लेने वाले हम चकाचौंधी मुक्त बाजार में उपभोक्तावाद के चरमोत्कर्ष पर है और हर आधुनिक सुख सुविधा साधन से अपनी क्रयशक्ति के मुताबिक खुद को लैस करते जाने के अभ्यस्त हैं।लेकिन अंध विश्वासी तौर तरीके आज भी हमारे रोजमर्रे की जिंदगी से चस्पां हैं और कर्मकांडी श्रद्धाभाव से हम ज्योतिष,झाड़ फूंक,तंत्रक्रिया,कवट ताबीच.मंत्रशुद्ध को अत्यधुनिक चिकित्सा का विकल्प मानते हैं।


जो लोग क्रयशक्ति मुताबिक चिकित्सा बाजार से दूर हैं,उनकी सीमा समझी जा सकती हैं। लेकिन अंधभक्ति क्रयशक्ति के साथ साथ घटती बढ़ती भी नहीं है।यह शाश्वत है।सत्य है और सुंदर है।शिव भले हो या न हो।टोटका और टोटम आजमाने में पीछे कोई नहीं है।अरबपति भी नारियल फोड़कर शुभ मुहूर्त रचते हैं और पीएचडी से लेकर वैज्ञानिक दृष्टिभंगी के स्वयंभू ठेकेदार व्यवस्था बदलने को प्रतिबद्ध कामरेड  भी दसों उंगलियों में रत्न धारण करने से शरमाते नहीं हैं।


पहले तो लोग आस पास बीसियों मील तक चिकित्सी का इंतजाम न होने,याता यात का साधन न होने की वजह से कठिन से कठिन अस्वास्थ्य के मामले में जडी बूटी के इलाज के साथ आत्मविश्वास और भरोसा के लिए प्रार्थना के साथ साथ तंत्र मंत्र का सहारा लेने को मजबूर थे।


लेकिन अब कैंसर तक का इलाज,एइड्स तक जब लाइलाज नहीं है,दिल का आपरेशन बिना हुज्जत जहां तहां संभव है,ब्रेन सर्जरी हो जाती है, अंग प्रत्यरोपण भी संभव है,तब बाकायदा उच्च शिक्षित ऊंची हैसियत और साधन संपन्न  लोग भी बात बेबात मंत्रसिद्ध जल,चमत्कारी माला,ताबीज,झाड़ फूंक,मंत्र तंत्र टोटका टोटम के मार्फत रोग मुक्ति का जुगाड़ लगाते हैं।ज्योतिष के कहे मुताबिक ग्रहदोषमुक्ति का जुगाड़ लगाते हैं।


ऐसा राजधानियों ,महानगरों की बहुमंजिली दुनिया में भी उतना ही सच है,जितना गांव देहात में।


उलट इसके जो बेहद गरीब हैं,ज अत्यंत दूर दराज के साधनहीन लोग हैं,उनमें वैज्ञानिक चेतना का तेज विकास हुआ है और चिकित्सा हो या शिक्षा वे आस्था पर सबकुछ टालते नहीं हैं।बड़ी से बड़ी परीक्षा में इस तबके के बच्चे हैरत अंगेज नतीजे निकालते हैं तो अस्पतालों में लंबी कतारें लगाकर ये लोग अपने परिजनों की चिकित्सा का वैज्ञानिक इंतजाम करने में लगे रहते हैं।


राजधानियों,महानगरों के अस्पतालों में ऐसे बेहाल लेकिन हार न मानने वाले लोगों का हुजूम ही साबित करता है कि हम अंधकार जी नहीं रहे हैं।


लेकिन दरअसल जो रोशनी के सौदागर हैं,वे ही पीलिया हो या कैंसर,अस्थिरोग हो या स्त्रीरोग,वे मंत्र तंत्र ज्योतिष के फेर में हैं।इसी मुटियाये चर्बीदार तबके की अकूत क्रयशक्ति के दम पर कामदेवी बाबाओं के दरबार में लाखों का मजमा बहु बेटियों को उनके हवाले करने के लिए लगा रहता है और उनके आशीर्वाद से हर दुःख हर तकलीफ से छूटकारा पाने का शार्टकाट अपनाकर भगवान को भी चकमा देने वाले गाड़ी बाड़ी कंप्यू तबका का ग्लिटरिंग इंडिया है।


टीवी पर समाचारों के बजाय ऐसे बाबाओं के प्रवचन समय अलग है और देश भर में ऐसे बाबाओं के शिविर जब देखो तब।


क्या क्या नहीं बेचते ये लोग?


क्या क्या नहीं खरीदते लोग?


आटा,दंत मंजन से लेकर काला को गोरा कर देने तक का इंतजाम है और गली गली गांव गांव उसका सुव्यवस्थित बाजार।


टेली शापिंग में बेलगाम अंध विश्वास कारोबार है।


चमत्कारी मंत्र यंत्र रत्न सबकुछ क्रेडिट कार्ड पर उपलब्ध हम डेलीवरी।


पैंतीस साल वाम शासन में रहे बंगाल में हर टीवी चैनल पर ज्योतिष दरबार है जिनके पास हर रोग का इलाज है और हर समस्या का समाधान है।


मुख्यमंत्री बेमतलब केंद्र सरकार से पैकेज मांगती है।किसी बाबा से पैकेज लेकर आजमा सकती हैं।नहीं संभव है तो रोक क्यों नहीं लगाती इस आत्मघाती गोरखधंधे पर?


फिर देश का सिंहासन का हिसाब तय करने वाले क्रांति वीरों का कारोबार भी वही बाबा और ज्योतिष है।


इस लाइलाज मरण कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए बोलने वाला कोई नहीं शायद इस महाशक्ति पारमाणविक देश में।


Thursday, April 3, 2014

Banking license proved reforms have not be stayed at any cost.Adhaar to be scrapped as subsidy would not exist.

Banking license proved reforms have not be stayed at any cost.Adhaar to be scrapped as subsidy would not exist.

Palash Biswas


http://economictimes.indiatimes.com/



Banking license proved reforms have not be stayed at any cost.Nandan Nilekani has left for his political flight having ensured the monopolistic profit for ADHAAR to be scrapped as soon as BJP Hindutva government takes over. It does not mean that subsidies have to be sustained. Rather it means no link is needed further as subsidies have to go. The corporate server has set the second generation programme with surgical precision and banking license heralded the trend.Mind you,it is election time and a time to woo the voters who are deprived of citizen sovereignty all the way. Since corporate corruption is a major issue, licence to well known companies are delayed to avoid controversy.They will get sooner or later what they want.


Just read Economics Times which published a full page on Adhhaar to be wasted.It had nothing to do national security or internal security.It is blatant violation of Indian constitution and naked wastege of taxpayers money for the best interst of Mr Nandan Nilekani.The project has to be endorsed by the parliament while governmenyts in differenet states illegally linked Adhaar to basic services which may not be withdrawn for unconstitutional Adhaar as the Suprme Court of India has ruled.But states have intensified the Adhaar campaign violating civic and human rights and making it a case of contempt of court.


Prime Minister in waiting Narendra Modi enjoys full support of global economic order,corporate India and MNCs.He has showcased Gujarat model of development skipping aggressive Ram Mandir priority on the one hand, and on the other hand, he has assured global free market economy to open up Indian economy. Whole set up of taxation patterns and labour laws have to be changed to load taxation load against poverty line having an open agenda to finish agrarian India with its working classes and producer communities. Indo US nuclear treaty has to be made a reality and retail FDI should not  be waited at all. It is rather eye washing that  Bharatiya Janata Party is likely to express its opposition to genetically modified (GM) crops in its party manifesto and suggest that an integrated commission be formed to look into all aspects of farming including minimum support price for grains, crop insurance, adequate and timely compensation to affected farmers and irrigation.


India's Hindu nationalist Bharatiya Janata Party said Monday that if it wins national elections set to begin next week, its first priority would be to revive investment in the country's slowing economy.

"We'll have to reestablish confidence of both Indian and international investors in the Indian economy," said Arun Jaitley, a senior BJP leader. But, he added, "our policy will also have a social conscience," a signal that welfare programs for the country's poor would also be a priority.

The BJP hasn't offered details of its economic plans, even though the start of balloting is just days away. Opinion polls indicate that the party is more popular than its main rival, Congress, which has been in power for the past decade and is facing a wave of anti-incumbent sentiment.

The BJP's prime ministerial candidate, Narendra Modi, has campaigned on pledges to spur development, create jobs and boost manufacturing.

His tone has been starkly different from the left-leaning Congress, which promised to expand health care, housing and other benefits for the poor in its election manifesto last week, while also pledging to revive growth and invest more in infrastructure.




http://economictimes.indiatimes.com/


The Reserve Bank of India (RBI) on Wednesday granted two preliminary licenses to set up new banks in a country where only one household in two has access to formal banking services.

The approval of licences for IDFC Ltd (IDFC.NS) and Bandhan Financial Services marks the start of a cautious experiment for a sector dominated by lethargic state lenders, many of which are reluctant to expand into rural areas or towns where banking penetration is low. No new Indian bank has been formed since Yes Bank (YESB.NS) in 2004.

Proponents of more licences hope deep-pocketed corporate-backed banks will do more to serve these markets, but critics worry about whether companies can strictly separate their retail banking operations from their main businesses.

Despite these concerns, and the uncertainties raised by general elections due to conclude by May, the RBI has said it plans to issue more licences.

RBI Governor Raghuram Rajan said in a television interview earlier on Wednesday that banking licences will be an on-tap facility, meaning the central bank will keep issuing new licences to applicants it deems fit as and when required.

The Bharatiya Janata Party, which is overwhelmingly leading in polls, has not clarified its stance on the expansion of the banking sector.

"RBI's approach in this round of bank licences could well be categorised as conservative," the central bank said in a statement.

"At a time when there is public concern about governance, and when it comes to licences for entities that are intimately trusted by the Indian public, this may well be the most appropriate stance."

The RBI said the approval would be valid for 18 months during which IDFC and Bandhan Financial will have to comply with requirements laid down by the central bank.

IDFC, a Mumbai-based non-bank financial company, specialises in infrastructure lending, while Bandhan Financial is a microfinance organisation based in Kolkata.

The central bank said it will also consider an application from India Post, but under a separate process to be carried out in consultation with the government.

The central bank said 25 applicants had been considered and judged under criteria including analysis of their financial statements, their track record over the past 10 years and their potential to run a bank.

However, big companies that applied did not receive a license in this stage.

Applicants had included billionaire Anil Ambani's Reliance Capital (RLCP.NS); the financial arm of Larsen & Toubro (LART.NS), India's biggest engineering group; and Shriram Capital, the holding company for Shriram Transport Finance Company (SRTR.NS).

Opinion polls suggest Mr. Modi's message has resonated with Indians frustrated with sluggish economic growth, alleged corruption and a government widely viewed as inefficient.

In a televised interview Monday, Mr. Modi spoke about removing bureaucratic hurdles, bringing predictability to tax policies and creating jobs by encouraging new industries like agro-based ventures, ship building and defense manufacturing.

"Today, vote-bank-oriented programs that are bankrupting our treasury are being called economic reforms," Mr. Modi said. "Economic reforms are those that breathe new life into a system and create opportunities for people."

As chief minister of the western state of Gujarat, Mr. Modi built a reputation as a strong leader who helped businesses by building infrastructure and reducing red tape—and India's stock market and the rupee have been rallying on the belief that a BJP government would turn the economy around.

Mr. Jaitley said Monday that in the last decade, Congress had halted the liberal approach it had adopted in 1991, and he said his party would work to make sure "India once again is a great place for doing business."

At the same time, Mr. Jaitley said, his party wouldn't rely on the benefits of growth to trickle down to the poor. "India will always need, at least for the foreseeable future, a state intervention for poverty alleviation," he said, a message aimed at India's millions of poor.

A new survey by the Pew Research Center shows there is overwhelming support for rural-jobs and subsidized-food programs that were centerpieces of Congress's policy agenda.

Congress has criticized Mr. Modi for being too close to big business. "His brand of liberalism is crony capitalism," India's finance minister P. Chidambaram said Monday


BJP Manifesto Committee Chief Murli Manohar Joshi met around 55 people, including farmers, scientists and NGOs representatives  to discuss various issues related to farmers.

The representatives also emphasised that the BJP-led National Democratic Alliance should set up an integrated commission if it comes to power to deal with all issues related to farmers. "The commission would ensure that farmers are given the right MSP (minimum support price) for their crops, decide the bonus, ensure that proper and timely compensation is given for damaged crops, and crop insurance," Joshi said.

The AIADMK Government would never allow genetically modified seeds to be tested in Tamil Nadu as the field trials would affect the people and the agricultural fields, the Chief Minister J. Jayalalithaa has said.

She also accused the Central Government headed by the Congress of piling misery upon misery on the people with its wrong economic policies.

She said the Environment Ministry at the Centre had approved field trials of genetically modified crops of more than 200 varieties including rice, wheat, maize and cotton, among others, by private companies. This would affect human beings and farm lands. It would only benefit MNC seed companies, and bring misery to the farming community.

She said farmers could not get seeds from genetically modified crops and they would have to approach the private companies for seeds for replanting, making food grain production the preserve of a handful of private companies. She assured the gathering that her Government would never allow testing of genetically modified seeds in the State. She went on to say that when the new Central Government, of which AIADMK would be a part, takes office, permission granted at the national level for testing of genetically modified crops would be scrapped.

ACCESS TO BANKING

India has 27 state-run banks and 22 private sector banks, according to RBI data, but its ratio of branches to adults is only about one-fourth of Brazil's, leaving about half of households in India - a country of 1.2 billion people - outside the banking system.

Over the last few years, RBI has been pushing banks to make more genuine efforts to penetrate into India's hinterland and increase lending to farmers, small traders and businesses.

But banks, struggling under huge piles of non-performing assets that are eroding their capital, have been reluctant.

The RBI formed a four-member external panel to start evaluating the applications for new bank licenses from November but has made clear that it will go slow.

It said on Wednesday it will consider giving out partial licenses that would allow companies to provide only few banking services, and consider bank applications on more regular basis as it learns lessons from the initial licenses.

"One can't expect these two licences to be a game changer. Scaling up, reaching out has its own cost," said Robin Roy, associate director of financial services at PriceWaterhouseCoopers India. "It won't be a cake walk to convert (that) into a banking model."

IDFC Chairman Rajiv Lall welcomed the grant of a license but anticipated an arduous process. "We will start working on this tomorrow. The whole structure has to be compliant in 18 months, so that has a number of legal steps," he told CNBC-TV 18 in an interview.


Should India junk Aadhar?

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