Thursday, August 1, 2013

মানচিত্র বদলে যায়

তৈরি হয়ে আসছেন মুখ্যমন্ত্রী,মুম্বই তৈরি ত

[LARGE][LINK=/edhar-udhar/13449-2013-08-01-07-04-20.html]जनसत्ता से अंबरीश कुमार और गंगा प्रसाद रिटायर, आत्मदीप अगले महीने होंगे रिटायर[/LINK] [/LARGE] [*] [LINK=/edhar-udhar/13449-2013-08-01-07-04-20.html?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/gk_twn2/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK] [/*] [*][/*]

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Details Category: [LINK=/edhar-udhar.html]आवाजाही, कानाफूसी...[/LINK] Created on Thursday, 01 August 2013 12:34 Written by B4M
जनसत्ता अखबार से पुराने लोग रिटायर होते जा रहे हैं और नयों की नियुक्ति के लिए मैनेजमेंट ने अभी अनुमति नहीं दी है. लखनऊ के ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार बीत जुलाई महीने के लास्ट में रिटायर हो गए. इसी तरह दो महीने पहले पटना ब्यूरो चीफ गंगा प्रसाद रिटायर हो गए.

भोपाल ब्यूरो चीफ आत्मदीप के बारे में जानकारी मिली है कि वे अगले महीने रिटायर होंगे. उत्तर भारत के तीन बड़े राज्यों में ब्यूरो चीफ रिटायर हो गए या होने वाले हैं पर जनसत्ता मैनेजमेंट ने अभी तक यहां किसी को रखने की अनुमति नहीं दी है. सूत्रों के मुताबिक इस बारे में जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी ने प्रबंधन को पत्र लिखकर स्टाफ रखे जाने की अनुमति देने की मांग की है ताकि अखबार सुचारु रूप से निकाला जा सके.

[B]भड़ास4मीडिया तक सूचनाएं जानकारियां   के जरिए भेजें.[/B]

Uday Prakash कल जे.एन.यू. के स्कूल आफ़ लैंग्वेजेज़ में हुए एक छात्रा और छात्र की दर्दनाक घटना को जान कर लगा कि क्या ये वही जे.एन.यू. अब रह गया है. उस समय जे.एन.यू. के वाइस चांसलर के.आर.नारायणन थे और मेरी नियुक्ति में उनकी प्रमुख भूमिका थी. फ़्रेंच भाषा के विभागाध्यक्ष डा. महाले, जो बाद में मणिपुर विश्वविद्यालय के वी.सी. बने, वे भी मुझे बहुत पसंद करते थे. कल अपने इंफाल के दोस्त और साथी कमल मित्र चिनाय को जे.एन.यू. की घटना पर टी.वी. पर बोलते हुए देखा तो पुराना समय याद आया. काश मैं 'हिंदी विभाग' में न रहा होता ..यह विचार बार-बार आता रहा।

Uday Prakash added a photo from August 1, 2013 to his timeline.
पोस्ट ग्रेजुएट स्टडीज़ सेंटर, इंफाल, मणिपुर, १९८०. मैं दाहिनी ओर से दूसरा. २६-२७ की उम्र में 'हिंदी-विभागाध्यक्ष'. 
कल जे.एन.यू. के स्कूल आफ़ लैंग्वेजेज़ में हुए एक छात्रा और छात्र की दर्दनाक घटना को जान कर लगा कि क्या ये वही जे.एन.यू. अब रह गया है. उस समय जे.एन.यू. के वाइस चांसलर के.आर.नारायणन थे और मेरी नियुक्ति में उनकी प्रमुख भूमिका थी. फ़्रेंच भाषा के विभागाध्यक्ष डा. महाले, जो बाद में मणिपुर विश्वविद्यालय के वी.सी. बने, वे भी मुझे बहुत पसंद करते थे. कल अपने इंफाल के दोस्त और साथी कमल मित्र चिनाय को जे.एन.यू. की घटना पर टी.वी. पर बोलते हुए देखा तो पुराना समय याद आया. काश मैं 'हिंदी विभाग' में न रहा होता ..यह विचार बार-बार आता रहा।
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अन्नाभाऊ साठे यांच्या जयन्ती निमित्य हार्दिक शुभेच्छा



'पृथ्वी ही शेषनागाच्या माथ्यावर नाही तर, कष्टकऱ्यांच्या तळहातावर तरलेली आहे…'
'जग बदल घालूनी घाव सांगून गेले मज भीमराव"
ये आज़ादी झूठी है देश की जनता भूकी है ...
छत्रपती शिवाजी महाराज यांच्यावर साता समुद्रापार जाऊन पोवाडा गाणारे…
शिवशाहीर अण्णाभाऊ साठे यांची ९३ वी जयंती निमित्त विनम्र अभिवादन…
अन्नाभाऊ साठे यांच्या जयन्ती निमित्य हार्दिक शुभेच्छा

मुस्लिम राजनेताओं को मुसलमानों की समस्याओं के बारे में कुछ भी पता नहीं

  • मुस्लिम राजनेताओं को मुसलमानों की समस्याओं के बारे में कुछ भी पता नहीं

    Posted: 31 Jul 2013 09:43 PM PDT

    चुनाव नज़दीक आते दिख रहे हैं और मुसलमानों को लेकर हलचल भी तेज हो गई है. उर्दू के सबसे बड़े टेलीविजन चैनल ईटीवी ने जयपुर में दस घंटे का अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर एक सेमिनार किया, जिसमें अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधियों के नाम पर मुसलमान थे और गैर अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीतिक दलों के नेता थे, जिनमें बड़े नेता भारतीय जनता पार्टी के थे. कांगे्रस की तरफ़ से दो केंद्रीय मंत्रियों ने इसमें हिस्सा लिया. कुछ धार्मिक नेता थे और कुछ ऐसे लोग भी थे, जो न राजनेता हैं और न धार्मिक नेता. यह अपनी तरह का चौथा सेमिनार था, जिसमें अल्पसंख्यकों की समस्याओं को रेखांकित करने की कोशिश की गई. सेमिनार में कई चीजें देश के लोगों के सामने उजागर हुईं. पहली, मुस्लिम राजनेताओं को मुसलमानों की समस्याओं के बारे में कुछ भी पता नहीं था. इस सेमिनार में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान खान, दोनों ने भाषण दिया. सबसे पहला भाषण सलमान खुर्शीद का था. सलमान खुर्शीद न केवल समझदार हैं, बल्कि एक अच्छे वकील भी हैं, लेकिन जब मुसलमानों की समस्याओं की बात हो और सेमिनार में ज़्यादातर मुस्लिम नेता हों, तो कम से कम यह अपेक्षा थी कि सलमान खुर्शीद अपना राजनीतिक चेहरा एक तरफ़ रखेंगे, बड़े वकील का चेहरा दूसरी तरफ़ रखेंगे और अपना असली चेहरा, अपनी असली समझ सामने लाकर पहली बार मुसलमानों को यह बताएंगे कि वह उनके सच्चे हमदर्द हैं और उनकी समस्याओं को जानते हैं. लेकिन सलमान खुर्शीद ने, जिन नकाबों को उतार देना चाहिए था, उन्हें और कसकर अपने चेहरे पर लगा लिया. सारे देश को उन्होंने यह बताया कि वह मुसलमानों की समस्याओं को कोई तरजीह नहीं देते और उनकी समस्याएं दूर करने में मुस्लिम कौम के एक प्रतिनिधि होने के नाते भी कोई तवज्जो नहीं देते. शब्दों की बाजीगरी दिखाकर उन्होंने यह फिर साबित किया कि जैसे उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनावों में मुसलमानों को नौ प्रतिशत आरक्षण देने का वादा कांगे्रस की तरफ से कराया था, वैसे भ्रम वाले बयान ही उनके असली बयान हैं. उस समय यह बात उठी थी कि सलमान खुर्शीद क्यों नहीं उन राज्यों में मुसलमानों को नौ प्रतिशत आरक्षण केंद्र सरकार की तरफ़ से मुख्यमंत्रियों से कहकर दिला देते, जहां कांगे्रस का शासन है. लेकिन उस समय भी सलमान खुर्शीद चुप रहे और अब भी वह मुसलमानों को आरक्षण देने के नाम पर बिल्कुल खामोश हैं. दरअसल, यह सलमान खुर्शीद की धर्मनिरपेक्षता है, जो चुनाव के समय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है और उनकी कौम, यानी मुसलमानों को डर के साथ कोने में खड़ा रखने में रोल प्ले करती है. वैसे तो, हिंदुस्तान के मुसलमान सलमान खुर्शीद को अपना प्रतिनिधि नहीं मानते और सेमिनार में मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने यह कहा भी कि उन्हें सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं से ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है, बनिस्बत उन नेताओं के, जो मुसलमानों का खुला विरोध करते हैं. के रहमान खान अपने विभाग द्वारा किए गए कामों का ढिंढोरा पीटते नज़र आए. उन्होंने यह भी बता दिया कि इस देश का मुसलमान अंधा है, जाहिल है, बेवकूफ है, जो अपने आसपास होने वाले विकास को देख नहीं पा रहा है. के रहमान खान का कहना है कि सच्चर कमेटी की 69 सिफारिशों में से 66 सिफारिशें पूरी कर ली गई हैं. अब यह हिंदुस्तान का मुसलमान है, जो अक्ल से अंधा है और के रहमान खान के दिखाए हुए सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल को देख नहीं पा रहा है. सवाल यह उठता है कि के रहमान खान सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को क्या समझते हैं, सच्चर कमेटी को क्या समझते हैं और रंगनाथ मिश्र आयोग को क्या समझते हैं? बहुत सारे लोगों का मानना है, जिसे शायद के रहमान खान नहीं मानते कि सच्चर कमेटी बीमारी की डायग्नोसिस है, बीमारी की पहचान है, लेकिन बीमारी का इलाज रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट में ही है. रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट कितनी लागू की गई, इस पर के रहमान खान खामोश हैं, क्योंकि वह और उनकी सरकार रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट लागू ही नहीं करना चाहते थे. चौथी दुनिया में वह रिपोर्ट इस ख़तरे के साथ छापी गई कि संभव है, झूठी धाराएं लगाकर परेशान किया जाए. हमने वह रिपोर्ट चौथी दुनिया में छापी. उस समय के रहमान खान राज्यसभा में उप सभापति थे और उन्होंने वह रिपोर्ट राज्यसभा में लाने से भरसक रोका. यह तो भला हो लोकसभा का, जहां 25 से ज़्यादा सांसद चौथी दुनिया की प्रतियां लेकर खड़े हो गए, तो प्रधानमंत्री को ऐलान करना पड़ा कि वह रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट टेबिल करेंगे. रिपोर्ट सदन में रखना एक चीज है और रिपोर्ट पर अमल करना दूसरी चीज. आज के रहमान खान रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर खामोश हैं और ऐसा लग रहा है कि वह भी मुसलमानों को धोखा देने में वही रोल प्ले कर रहे हैं, जैसा आज तक कांग्रेस अदा करती आई है. दरअसल, कांगे्रस मुसलमानों के लिए हमेशा वादे करती है, लेकिन उन्हें पूरा नहीं करती. उसे मालूम है कि मुसलमान उसके सिवाय आख़िर कहां जाएंगे? वे भारतीय जनता पार्टी के पास जा नहीं सकते. समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी की पहचान पूरे देश में नहीं है और जदयू भी अपने प्रदेश में सिमटा हुआ है. इसलिए सारे देश में मुसलमान कांगे्रस के साथ जाएंगे ही जाएंगे, ऐसा कांगे्रसी नेताओं का विश्वालस है और उसी विश्वाास ने मुसलमानों को कांगे्रस के यहां बंधुआ बना रखा है. जितने भी बड़े मुसलमान नेता हैं, चाहे वे मजहबों के हों, इदारों के हों, स्कूलों में पढ़ाने वाले हों, या जो भी यह दावा करे कि मुसलमान उसके कहने पर चलते हैं, उन सबके लिए कांगे्रस की दुकान में सामान रखा हुआ है. वे चुनाव के समय जाते हैं और अपने हिस्से का सामान उठा लेते हैं. मुझे यह कहते हुए बहुत संकोच हो रहा है, लेकिन अब इस सत्य को मुस्लिम समाज भी बुरी तरह तकलीफ के साथ समझने लगा है. यह समझदारी ही मुसलमानों के इंडिपेंडेंट पॉलिटिकल स्टेटस के लिए एक आशा है. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी सेमिनार में उपस्थित थे. उन्होंने मुसलमानों से भावनात्मक अपील की कि वे उनके साथ आएं और उन्हें अछूत न समझें. वह मुसलमानों को देश का हिस्सा मानते हैं. लेकिन शायद राजनाथ सिंह जब बोल रहे थे, तो टीवी कैमरे पर देश के लोग आवाज़ तो उनकी सुन रहे थे, लेकिन चेहरा नरेंद्र मोदी का देख रहे थे. यह एक अजीब मनोवैज्ञानिक स्थिति देश में पैदा हो गई है कि नरेंद्र मोदी का सौम्य चेहरा लोगों के सामने आ ही नहीं रहा है. जब नरेंद्र मोदी कहते हैं, सर्वे भवंतु सुखिन: तो वह स़िर्फ हिंदू भवंतु सुखिन: की बात नहीं करते, बल्कि वह सबके भले की कामना करते हैं. फिर भी लोगों को यही लगता है कि नरेंद्र मोदी स़िर्फ और स़िर्फ हिंदू राष्ट्र की बात कहते हैं. नरेंद्र मोदी की मुस्कुराहट के पीछे लोगों को मोहन भागवत की मुस्कुराहट नज़र आती है. ऐसा सच है या नहीं, मैं नहीं कह सकता, लेकिन देश में जो भी लोग टेलीविजन पर राजनाथ सिंह को बोलते हुए देखते हैं, उन्हें नरेंद्र मोदी का चेहरा नज़र आता है और जब नरेंद्र मोदी बोलते हैं, तो उनके पीछे उन्हें मोहन भागवत एवं प्रवीण तोगड़िया का चेहरा नज़र आता है. यही भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनौती है कि वह जो बोल रही है, वैसा ही चेहरा लोगों को नज़र आए. इसके लिए भाषा बोलते हुए किस तरह की शारीरिक लोच या चेहरे पर सौम्यता नज़र आनी चाहिए, उस पर वह ध्यान नहीं देती. मुसलमानों के धार्मिक गुरु, जिन्होंने इस सेमिनार में भाषण दिए, उन्होंने समझदारी से अपनी बातें रखीं, लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इन मुस्लिम धर्मगुरुओं की पार्टियों को भी आम मुसलमान वोट नहीं देता. हालांकि जिस शख्स के भाषण की सबसे ज़्यादा तारीफ़ हुई, वह स्वामी अधोक्षानंद थे, जिन्हें पुरी के शंकराचार्य का पट्ट शिष्य माना जाता है. उन्होंने जिस तरह सफाई से अपनी बातें रखीं, उसे सारे देश के लोगों ने स्वीकार किया, पर स्वामी अधोक्षानंद साधुओं की जमात में अल्पमत में है. साधुओं का बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं नरेंद्र मोदी के साथ है. नरेंद्र मोदी के धनवान शिष्यों ने उन साधुओं को सारे देश में घुमाने और उनके जरिए देश में हिंदू राज्य का ध्वजवाहक होने का संदेश मोदी के लिए फैलाना शुरू कर दिया है. आज यह संदेश धार्मिक बंटवारे की सबसे निचली सीढ़ी पर है, लेकिन कल हो सकता है कि यह सबसे ऊंची सीढ़ी पर पहुंच जाए और उस समय यह देश दंगों की एक नई आग में घिर जाएगा. मुसलमानों के सामने कई मुसीबतें हैं. पहली मुसीबत, हर राजनीतिक नेता मुसलमानों को इस पार्टी या उस पार्टी में देखना चाहता है. वह मुसलमानों को रोजी-रोटी, शिरकत और नेतृत्व के सवाल पर साफ़ बात बताता ही नहीं है. दूसरी, धार्मिक नेता एक साथ बैठकर यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें मुसलमानों से क्या कहना चाहिए. सच तो यह है कि कोई भी धार्मिक नेता दूसरे धार्मिक नेता के साथ मिलकर, जब तक यह तय न हो जाए कि वह खुद सर्वोच्च है, मुसलमानों को सही बात बताना ही नहीं चाहता. इसका नतीजा यह कि पूरी मुस्लिम कौम एक तरफ़ अपने नेताओं की चालाकी और दूसरी तरफ़ धार्मिक नेताओं की आपसी जलन से परेशान है. हो सकता है, वह इन चुनावों में अपने दर्द एवं तकलीफ को महसूस करके कुछ और फैसला करे, लेकिन वह फैसला भी राजनीतिक तौर पर किसी तरफ़ असर करता नहीं दिखाई देता, क्योंकि आज मुसलमान खुद को राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित नहीं कर पा रहा है. मुसलमानों को यह समझ में नहीं आता कि जब तक वे अपने प्रतिनिधि दूसरी कौमों के साथ मिलकर नहीं भेजेंगे और उन्हें यह भरोसा नहीं दिलाएंगे कि उनके प्रतिनिधि भेजने में उनका भी हिस्सा होगा, तब तक इस देश में मुसलमानों की न तो कोई राजनीतिक हैसियत बनेगी, न उनकी ज़िंदगी में कोई बदलाव आ पाएगा और न ही राजनीति में वे दबाव डाल पाएंगे. सबसे ग़रीब तबका होने के नाते मुसलमानों को दलितों एवं पिछड़ों के साथ एकता की कोशिश करनी चाहिए. दूसरी तरफ़ दलित एवं पिछड़े हैं, जो राजनीतिक तौर पर बंटे हुए हैं और जिन्हें मुसलमानों के साथ यह समझना चाहिए कि जब तक वे किसी राजनीतिक पार्टी के कब्जे में रहेंगे, तब तक उनके हितों के लिए कुछ नहीं होगा. यह बहुत बड़ा सवाल है कि दलितों की पार्टी ने दलितों के लिए और पिछड़ों की पार्टियों ने पिछड़ों के लिए आज तक क्या किया? मुसलमान अगर पार्टी बना लेंगे, तो वे ऩुकसान में रहेंगे. वे अगर किसी दूसरी पार्टी में जाएंगे, तो वहां बंधुआ कौम के रूप में जाने जाएंगे. इसका मतलब यह कि देश के ग़रीब तबकों, जिनमें दलित, पिछड़े एवं मुसलमान बड़ी संख्या में हैं, को राजनीतिक दलों की गुलामी से बाहर निकलना होगा और एक दबे-कुचले वर्ग के रूप में अपनी ताकत बनानी पड़ेगी. यह ताकत वोट की ताकत है. यह वर्ग अपने प्रतिनिधि लोकसभा एवं विधानसभा में भेजे, न कि राजनीतिक पार्टियों के दलालों के रूप में अपने प्रतिनिधि वहां भेजे. कोई भी राजनीतिक पार्टी जिस वर्ग का समर्थन लेती है, उसके पक्ष में आज तक एक भी फैसला नहीं कर सकी, क्योंकि हमारे देश का संविधान राजनीतिक पार्टियों को मान्यता ही नहीं देता. संविधान में राजनीतिक पार्टियों का कोई रोल नहीं है, लेकिन राजनीतिक दलों ने हमारे संविधान पर कब्जा कर लिया है और उसी तरह गुलाम बना लिया है, जिस तरह अंगे्रजों ने हिंदुस्तान को गुलाम बनाया था. मुसलमानों, दलितों एवं पिछड़ों को हिंदुस्तान का संविधान पढ़ने की ज़रूरत है. हमारा संविधान लोगों को लोकसभा एवं विधानसभाओं में भेजने की बात करता है, राजनीतिक दलों को नहीं. मुस्लिम नौजवान, आलिम एवं मुस्लिम पत्रकार अगर इस कैच, इस मसले को नहीं समझेंगे, तो वे एक बार फिर अपनी कौम को राजनीतिक दलों के हाथों गिरवी रख देंगे और किसी भी राजनीतिक दल, चाहे वह कांगे्रस हो, भारतीय जनता पार्टी हो, समाजवादी पार्टी हो, बहुजन समाज पार्टी हो, जदयू हो या कोई और, में उनके प्रतिनिधि मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के लिए काम करते नज़र आएंगे. नाम वे मुसलमानों का लेंगे, लेकिन काम मुसलमानों के ख़िलाफ़ करेगे.

63 सालों के दौरान मुसलमानों को जायज़ अधिकारों से वंचित रखा गया


Status Update
By Jaspal Singh Negi

63 सालों के दौरान मुसलमानों को जायज़ अधिकारों से वंचित 

रखा गया

Posted: 31 Jul 2013 09:39 PM PDT

जमीअत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव एवं सांसद महमूद मदनी एक सुलझे हुए नेता हैं. वह स़िर्फ मुस्लिमों की बात नहीं करते, बल्कि पूरे देश के विकास और ख़ुशहाली की बात करते हैं.

उर्दू की संपादक वसीम राशिद ने विभिन्न मुद्दों पर उनसे एक लंबी बातचीत की. पेश हैं प्रमुख अंश: आपकी नज़र में इस समय भारतीय मुसलमानों की क्या स्थिति है? मुसलमान इस समय दोहरे हालात में हैं. भारतीय मुसलमानों की अगर देश के अन्य समुदायों से तुलना करें तो देखेंगे कि वे उनसे पीछे हैं. आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक सभी तरह से. तीनों हालात में वे भारत की उन जातियों से भी पीछे हैं, जो अल्पसंख्यक कहलाती हैं. जब भारत आज़ाद हुआ तो उस समय मुसलमानों की क्रीमी लेयर पाकिस्तान चली गई और लेबर क्लास के लोग रह गए या फिर छोटे किसान-मज़दूर. जब मुसलमानों को यह विकल्प मिला कि जो पाकिस्तान जाना चाहे, जा सकता है और जो भारत में रहना चाहे, वह रह सकता है तो उस समय भी सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की संख्या 6 प्रतिशत थी. सवाल यह है कि आज़ादी हासिल होने और क्रीमी लेयर के पाकिस्तान जाने के बाद भी जब हम 6 प्रतिशत थे तो अब 1.6 प्रतिशत कैसे हो गए? इन 63 सालों के दौरान एक विशेष लक्ष्य के तहत लोगों को उनके जायज़ अधिकारों से वंचित रखा गया. नतीजा यह हुआ कि वह क़ौम जो पहले से पिछड़ी हुई थी, वह इस स्थायी व्यवहार के नतीजे में इस दर्जे तक पहुंच गई, जहां बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि वह अनुसूचित जनजाति से भी नीचे चली गई है और हालत यह हो गई है कि भारत का मुसलमान यह मांग करने पर मजबूर हो गया है कि उसे आरक्षण मिलना चाहिए. हालांकि मैं भी मानता हूं कि आरक्षण समस्या का हल नहीं है और जो लोग यह कहते हैं, वे सही कहते हैं. वजह, नौकरियों के अवसर प्राइवेट सेक्टर में हैं और अगर योग्यता नहीं होगी तो प्राइवेट सेक्टर में जॉब नहीं मिलेगी. मेरा कहना है कि भले ही आरक्षण के बाद नौकरियों में बहुत ज़्यादा फ़ायदा न हो, लेकिन एक मानसिकता को ज़रूर फ़ायदा होगा, क्योंकि लोग शिक्षा हासिल नहीं कर रहे हैं. मुसलमान का बच्चा होटल में बर्तन साफ़ करने लग जाता है, रिक्शा चलाता है, ठेले पर मूंगफली बेचता है या फिर मज़दूरी करता है. यह इस वजह से हुआ कि एक मानसिकता सी बन गई है कि नौकरी तो मिलेगी नहीं. यहां तो जान के लाले पड़े हुए हैं. एक लंबे समय तक लोग दंगों का शिकार होते रहे. क्या मुसलमान अपनी तकलीफें अन्य वर्गों के साथ नहीं बांट सकते? जब हम मुस्लिम की हैसियत से बात करते हैं तो हमें यह देखना होगा कि क्या समस्याएं स़िर्फ हमारे साथ हैं, दूसरों के साथ नहीं हैं. मैं हमेशा कहता हूं कि यह तस्वीर का स़िर्फ एक रुख़ है, जो मैंने बयान किया और जो बिल्कुल उचित है. तस्वीर का दूसरा रुख़ यह है कि भारत के मुसलमान ही स़िर्फ वंचित नहीं हैं, ऐसे दूसरे वर्ग भी हैं, जो मौलिक अधिकारों से वंचित हैं. ऐसे में अपनी लड़ाई मुसलमान की हैसियत से नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक बनकर लड़ी जानी चाहिए और इसमें दूसरे भारतीयों को भी शामिल करना चाहिए. हम अपनी लड़ाई में उन्हें दावत दें और उनकी लड़ाई में हिस्सा लें. भारत-पाकिस्तान के राजनीतिक संबंध कैसे बेहतर हो सकते हैं, क्या दोनों की आपसी नाराज़गी का असर मुसलमानों पर पड़ता है? भारतीय मुसलमानों पर भारत-पाकिस्तान के संबंधों का न कोई असर पड़ता है और न पड़ना चाहिए. अगर रिश्तेदारों की बात की जाए, तब भी मुश्किल से एक करोड़ लोगों के रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं, बाक़ी मुसलमानों पर इसका असर नहीं पड़ता. मैं इसे मुसलमानों के मुद्दे के नहीं, बल्कि दो पड़ोसियों के नज़रिए से देखता हूं. पड़ोसी को बदला नहीं जा सकता. इसलिए दोनों देशों की ज़िम्मेदारी है कि वे शरीफ़, समझदार और ज़िम्मेदार पड़ोसियों की तरह रहें. यह दोनों को मिलकर फैसला करना है और अगर यह ़फैसला दोनों ठीक तरह से कर लेंगे तो दोनों के फौजी बजट के ख़र्चे कम होकर शिक्षा और स्वास्थ्य में लगाए जा सकेंगे. इसलिए दोनों को जल्द से जल्द अपने गंभीर और विवादित मुद्दे हल करने चाहिए. भारत जब भी पाकिस्तान से आतंकवाद या किसी दूसरे मुद्दे पर बात करता है तो वह कश्मीर का मसला सीधे-सीधे उठा देता है और हमारे संबंध अधिक ख़राब हो जाते हैं… ऐसा भी कहना ठीक नहीं है कि सीधे-सीधे उठा देता है, लेकिन यह ठीक है कि यह मसला ऐसा है, जो बीच में फंसा हुआ है. इस मसले को भी हल होना चाहिए, आपसी बातचीत से ही यह मसला हल किया जाना चाहिए. मुसलमानों में हमेशा से एक अच्छे लीडर की कमी रही है और लीडरशिप की भी, आख़िर क्यों? भारतीय मुसलमानों का स्वभाव दुर्भाग्य से भावनात्मक है. हमारा शोषण राजनीतिक पार्टियों ने एक लंबे समय तक किया है. हमें असुरक्षित होने के एहसास का शिकार भी सियासी पार्टियों ने ही बनाया. इसीलिए हमें भावनात्मक बनाया गया. सियासी लीडरशिप, हमारे संगठन, हमारा मीडिया किसी न किसी तरह इस षड्‌यंत्र के शिकार रहे. हम विकास के बजाय भावनात्मक मुद्दों को वरीयता देते हैं. मुसलमान अगर भावना से ऊपर उठकर 20 सालों के लिए अपना एक एजेंडा शिक्षा को बना लें और इसके अलावा कोई बात न करें और वह भी किसी लिंगीय भेदभाव के बग़ैर, क्योंकि जब मां अनपढ़ होगी तो फिर एक नस्ल कैसे शिक्षित हो पाएगी. इसलिए पूरी क़ौम को एक लक्ष्य बनाना होगा. आधी खाएंगे, रुखी-सूखी खाएंगे, बच्चों-बच्चियों को पढ़ाएंगे. इस पर कोई समझौता नहीं करेंगे, इसके लिए हर क़ुर्बानी देंगे. तब मुसलमानों का शोषण बंद हो जाएगा. क्या मुसलमानों का कोई ऐसा लीडर है, जिस पर ग़ैर मुस्लिम भी भरोसा कर सकें? दुर्भाग्य से पूरी मुस्लिम क़ौम ग़ैर मुस्लिमों की नज़र में ऐसी बना दी गई है कि उसे शक की निगाह से देखा जाने लगा है. इसलिए मैं कहूंगा कि यह तो एक ख्वाब है. ख्वाब देखना खराब नहीं है और अगर देख रहे हैं तो ख़ुदा करे, पूरा भी हो जाए. जमीअत उलेमा मुसलमानों की सबसे बड़ी जमाअत है, लेकिन वह दो हिस्सों में बंट गई. क्या इससे नकारात्मक संदेश नहीं जाएगा? देखिए दो बातें हैं. पहली यह कि एकता होनी चाहिए, लेकिन किस क़ीमत पर, यह एक मुद्दा है. अगर क़ीमत है सिद्धांतों की तो आप अपने सिद्धांतों को क़ुर्बान करके संगठित हो जाइए तो यक़ीनन यह एकता हर हाल में होनी चाहिए, लेकिन स़िर्फ दो जमाअतों के बीच नहीं, बल्कि सारे मुसलमानों के बीच. अब सवाल पैदा होता है कि जब हम सिद्धांतों के ऊपर बात करते हैं तो क्या हम किसी के साथ एकता कर सकते हैं. अगर सिद्धांत बचाकर कोई संगठित हो सकता है तो वह संगठित हो जाए और उसके लिए जो भी व्यक्तिगत बलिदान दिया जाना चाहिए, वह दे दिया जाए, लेकिन जब कोई व्यक्तिगत मुद्दा न हो तो फिर दो ही रास्ते रहते हैं, सिद्धांतों को क़ुर्बान किया जाए या फिर आदमी को. मौलाना अरशद मदनी साहब मेरे चाचा हैं. मेरी बेटी का निकाह उन्होंने ही पढ़ाया. हमारी जमीअत उलेमा के अध्यक्ष की माता का देहांत हुआ तो जनाज़ा मौलाना अरशद मदनी साहब से ही पढ़वाया गया. यह हमारे बीच के आपसी रिश्ते हैं और मौजूदा अध्यक्ष कारी उस्मान साहब मौलाना अरशद साहब के सगे बहनोई हैं. हमारा मतभेद इस बात पर है कि मौलाना कहते हैं कि कमेटी मुझे हटा नहीं सकती और न मुझसे जवाब-तलब कर सकती है. जमीअत उलेमा कहती है कि कमेटी को अधिकार है कि वह उनसे जवाब-तलब कर सकती है और उनके ख़िला़फ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है. यह जमाअत एक लोकतांत्रिक जमाअत है, जिस तरह हमारा देश लोकतांत्रिक है. देश का प्रधानमंत्री सबसे ताक़तवर व्यक्ति होता है. क्या प्रधानमंत्री यह कह सकते हैं कि संसद मुझे नहीं हटा सकती. यही हालत अरशद मदनी साहब की है, वह कहते हैं कि मुझे कार्यकारिणी समिति हटा नहीं सकती. लोग कहते हैं कि चाचा-भतीजे का झगड़ा है. मैं उस वक़्त भी महासचिव था, जब वह कुछ भी नहीं थे. जब जमाअत ने क़ारी उस्मान साहब को अध्यक्ष बनाया तो अरशद मदनी साहब हट गए, मैंने भी इस्तीफ़ा दे दिया. अब से कुछ दिनों पहले तक मैं जमीअत उलेमा में स़िर्फ कार्यकारिणी समिति का सदस्य था. अभी फिर ज़िद करके मुझे महासचिव बना दिया गया. हमारी लड़ाई यह है कि कार्यप्रणाली ऊपर रहेगी या व्यक्ति. आज वह यह मान लें कि जमाअत की कार्यप्रणाली को मानेंगे और जो भी फैसला जमाअत करेगी, उसे स्वीकार करेंगे तो हम उन्हें आज भी सिर-आंखों पर बैठाने के लिए तैयार हैं. जहां तक जमाअत के कमज़ोर होने और बिखरने का सवाल है तो ऐसा नहीं है. जमाअत ने उनके ख़िलाफ़ फैसला करने के ठीक 42 दिनों बाद दिल्ली के रामलीला मैदान में सभा की. इसके ठीक 32 दिनों के बाद पैलेस ग्राउंड में, जहां जमीअत ने इससे पहले कभी सभा नहीं की. फिर मुंबई के आज़ाद मैदान में, पालमपुर में, देवबंद में और अभी कश्मीर जैसे संवेदनशील विषय पर फिर दिल्ली के रामलीला मैदान में. अगर जमाअत विभाजित हुई होती तो हमने 42 आयोजन किए हैं, वह दो तो किए होते. यह बात ज़रूर है कि काग़ज़ यानी अख़बार में वह हमसे ज़्यादा आगे हैं. उनकी सारी मेहनत इस एक मैदान पर लगी हुई है. क्या आप कांफ्रेंस आदि के अलावा भी कोई ऐसा काम करते हैं, जिससे क़ौम को फ़ायदा हो? हम गुजरात में अनाथ बच्चों के लिए होम चिल्ड्रेन विलेज चलाते हैं. गुजरात में ही जमीअत ने 5 हज़ार मकान बनाए उन दंगा प्रभावितों के लिए, जो मुसलमान हैं. जमीअत गुजरात में लड़कियों के लिए टीचर्स ट्रेनिंग चला रही है. हमने लड़कियों की मेडिकल यूनिवर्सिटी के लिए मुरादाबाद हाइवे पर 30 एकड़ ज़मीन ख़रीदी है. क्या कारण है कि जमीअत के काम सामने नहीं आ पा रहे हैं? हम प्रचार पर मेहनत नहीं करते हैं, हमारा उद्देश्य काम होता है. यह हमारी कमज़ोरी है. आप पर भारत के मुसलमान बहुत भरोसा करते हैं. अगर आप अपना मीडिया हाउस शुरू करें तो बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं… अपना मीडिया हाउस होना चाहिए, यह एक ज़रूरत है. यह काम एक प्रो़फेशनल कर सकता है और वह क्षमता हमारे पास नहीं है, इसीलिए अभी तक नहीं कर पाए, लेकिन तमन्ना है. अभी आपने सोनिया गांधी से मुलाक़ात की थी, वह किस सिलसिले में थी? मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है. इस सिलसिले में हम उनसे पहले भी मिले थे कि मुसलमानों को आरक्षण मिले. एक बार फिर हमने उनसे सांप्रदायिक दंगा निरोधक क़ानून लाने और मुसलमानों के आरक्षण के लिए कुछ करने की मांग की है. उन्होंने वादा किया है कि वह अगले सत्र में सांप्रदायिक दंगा निरोधक क़ानून ले आएंगी और आरक्षण के मामले पर भी कार्यवाही करेंगी. हम लोगों ने उनसे साफ़ तौर पर कहा कि इस पर आपको कोई फैसला जल्द से जल्द करना चाहिए. रंगनाथ मिश्र आयोग और सच्चर कमेटी की अनुशंसाओं के हवाले से भी कोई बात हुई? वह अपनी बात पर पूरी तरह अटल हैं. उन्होंने कहा कि यह अधिकार है और यह होना चाहिए. यह किस तरह होगा, इसके लिए उन्होंने एक कोर ग्रुप बनाया है और शायद उसकी रिपोर्ट भी जल्दी आ जाएगी. हो सकता है कि कोर ग्रुप के साथ हमारी मीटिंग भी हो.