Thursday, May 2, 2013

जंग मगरिब में हो या मशरिक में, उसका विरोध होना ही चाहिये

जंग मगरिब में हो या मशरिक में, उसका विरोध होना ही चाहिये


शेष नारायण सिंह

  लद्दाख क्षेत्र में चीनी सेना भारत के इलाक में घुस गयी है और करीब बीस किलोमीटर अन्दर आकर अपने टेन्ट लगा दिये हैं। गाफिल पड़े भारतीय मिलिटरी इन्टेलिजेन्स वालों की तरफ से तरह-तरह की व्याख्याएं सुनने को मिल रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय सीमा में चीनी सैनिक जम गये हैं और ताज़ा जानकारी के मुताबिक वे वहाँ से हटने को तैयार नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में घुसे चीनी सैनिकों ने यहाँ अपना एक और तम्बू गाड़ कर अस्थायी चौकी बना ली है। चीन के टेन्ट को हटाने की कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं लेकिन चीनी सेना फिलहाल पीछे हटने को तैयार नहीं है। दोनों पक्षों के बीच तीन बार फ्लैग मीटिंग होने के बावजूद चीन अपने रुख पर अड़ा हुआ है। इस मसले को बातचीत से सुलझाने की बजाय चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में और भीतर तक बढ़ने की कोशिश में हैं। सूत्र बताते हैं कि घुसपैठ कर रहे चीनी सैनिकों के पास आधुनिक हथियार  हैं और वे वापस जाने के लिये नहीं आये हैं।

यूपीए के मुख्य सहयोगी समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लोक सभा में लद्दाख क्षेत्र में  चीनी घुसपैठ के मुद्दे को बहुत जोर शोर से उठाया। उन्होंने कहा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने आज़ादी के बाद ही जवाहर लाल नेहरू को चेतावनी दे दी थी कि चीन के इरादों से चौकन्ना रहें लेकिन नेहरू ने उनकी बात को तवज्जो नहीं दी और चीन से दोस्ती का राग जारी रखा। जब तत्कालीन चीनी प्रधानमन्त्री चाउ एन लाइ भारत आये थे तब भी डॉ. लोहिया ने उनकी मंशा पर नज़र रखने को कहा था लेकिन जवाहरलाल नेहरू उन दिनों पंचशील की बात पर अड़े हुये थे। जब 1962 में चीन ने हमला कर दिया तब नेहरू की आँखें खुलीं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और चीन ने भारत को पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। मौजूदा चीनी कार्रवाई के बारे में मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सरकार इस मामले में हाथ में हाथ धरे बैठी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार घुसपैठ की समस्या से निपटने में कायरों की तरह काम कर रही है। उन्होंने चीन को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन बताया और कहा कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है। उन्होंने कहा कि हम कई वर्षों से चेतावनी दे रहे हैं कि चीन ने हमारे क्षेत्र पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। लेकिन सरकार है कि सुनने को तैयार नहीं है।"

मुलायम सिंह यादव ने कहा सेना चीन को खदेड़ने के लिये तैयार है लेकिन सरकार की तरफ से इस मामले में भी ढिलाई बरती जा रही है। मुलायम सिंह ने दावा किया कि "ये सरकार कायरअक्षम और बेकार है।" साथ ही उन्होंने खुर्शीद के चीन की यात्रा पर जाने के मामले में भी सवाल उठाये। चीन के प्रधानमन्त्री की अगले महीने होने वाली भारत यात्रा की तैयारियों के सिलसिले में खुर्शीद नौ मई को चीन जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब चीन हमारे क्षेत्र में घुस रहा है क्या विदेश मन्त्री चीन के दौरे पर भीख माँगने जा रहे हैं।

मुलायम सिंह यादव ने सरकार से यह भी कहा कि जब सेना प्रमुख कह रहे हैं कि वे चीनियों को वापस खदेड़ने के लिये तैयार हैं तो सरकार क्यों नहीं क़दम उठाती। मुलायम सिंह को यह पता होना चाहिये कि अगर सरकार फौज के ज़रिये सीमा की समस्या का हल निकालने की कोशिश करेगी तो युद्ध होगा और डॉ. राम मनोहर लोहिया कभी भी युद्ध के पक्ष में नहीं थे। वे हमेशा शान्ति पूर्ण तरीके से ही समस्या का हल निकालने के पक्षधर रहे क्योंकि जंग मगरिब में या कि मशरिक में, खून गरीब इंसान का ही बहता है। सत्ताधीश तो खून बहाने के बाद शान्ति समझौते करते नज़र आते हैं।

1962 की लड़ाई के बाद भारत और चीन के सम्बन्ध बहुत बिगड़ गये थे। दोनों देशों के बीच में कूटनीतिक सम्बन्ध भी खत्म हो गये थे लेकिन जब अमरीका ने हेनरी कीसिंजर के दौर में चीन से दोस्ती बढ़ानी शुरू की तो बाकी दुनिया में भी माहौल बदला और भारत ने चीन के साथ दोबारा 1976 में कूटनीतिक सम्बन्ध कायम कर लिया लेकिन दोनों देशों के बीच जो चार हज़ार किलोमीटर की सीमा है उसमें जगह जगह पर विवाद के मौके पैदा होते रहते हैं। चीन के 1962 के हमले के पचास साल बाद भी आज दोनों देशों के बीच सीमा का विवाद कहीं से भी हल होता नज़र नहीं आता। सीमा के इलाकों में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ दोनों ही देश अपनी दावेदारी की बात करते हैं। लद्दाख में बहुत बड़े भारतीय भूभाग पर चीन का कब्जा है। वह उसको अपना बताता है और उसका दावा है कि बाकी लद्दाख भी उसी के पास होना चाहिये। अरुणाचल प्रदेश को भी चीन अपना बताता है और सारी दुनिया में कहता फिरता है कि भारत ने उसके इलाके पर कब्जा कर रखा है। अरुणाचल के विवाद की जड़ में पूर्वी भाग की करीब नौ सौ किलोमीटर की सीमा पर झगड़ा है। करीब सौ साल पहले 1914 में सर हेनरी मैकमोहन ने तिब्बत और ब्रिटेन के बीच इस विवाद को सुलझा देने का दावा किया था। तिब्बत तब एक स्वतन्त्र देश हुआ करता था। आजकल तो चीन का कब्जे में है। जो सीमा रेखा तय हुयी थी उसको ही आज मैकमोहन लाइनकहते हैं। जब ब्रिटेन और तिब्बत के बीच सीमा की बातचीत चल रही थी तो भारत तो पूरी तरह से ब्रिटेन के अधीन था। ज़ाहिर है कि उसका हित ब्रिटेन ही देख रहा था और ब्रिटेन एक ताक़तवर साम्राज्य था इसलिये उस विवाद को सुलझाने में सर हेनरी मैकमोहन ने चीन को भी केवल आब्ज़र्वर की हैसियत ही दी थी, उसको विचार विमर्श में शामिल नहीं किया था। मैकमोहन लाइन की एक खास बात यह भी है कि वह बहुत मोटी निब वाले कलम से मार्क की गयी थी जिसकी वजह से गलती का मार्जिन दस किलोमीटर तक का है। 890 किलोमीटर की सीमा में अगर दस किलोमीटर का गलती का

शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार है। इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट। सामाजिक मुद्दों के साथ राजनीति को जनोन्मुखी बनाने का प्रयास करते हैं। उन्हें पढ़ते हुये नये पत्रकार बहुत कुछ सीख सकते हैं।

मार्जिन है तो वह करीब 8900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को विवाद की ज़द में तुरन्त ही स्थापित कर देता है। उत्तराखण्ड के इलाके में भी भारत और चीन का सीमा विवाद होता ही रहता है क्योंकि बहुत सारे इलाके ऐसे हैं जहाँ भारतीय और चीनी सैनिक पहुँच ही नहीं सकते। नतीजा यह होता है कि सेना के साथ काम करने वाले कुत्तों का इस्तेमाल ही अपनी सीमाओं को रेखांकित करने के लिये किया जाता है।

भारत और चीन के बीच में कई बार ऐसे माहौल को देखा गया है जैसा कि आजकल बना हुआ है। एक बार तो 1986 में ऐसा लगने लगा था कि उत्तरी तवांग जिले में फौजें भिड़ जायेंगी। भारत ने भी अपने करीब दो लाख सैनिक वहाँ भेज दिये थे लेकिन बात संभल गयी। सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच में 1962 की लड़ाई के बाद बहुत ही तल्ख़ रिश्ते बन गये थे और 1967 तक कभी कभार सीमा पर तैनात दोनों देशों के सैनिकों के बीच गोली भी चल जाया करती थी लेकिन 1967 के बाद दोनों देशों के बीच एक भी गोली नहीं चली है। 1962 की अपमानजनक हार के बाद भारत में चीन को लेकर बहुत चिन्तायें हैं। चीन के साथ किसी तरह की दोस्ती की बात को आगे बढ़ा पाना भारतीय राजनेताओं के लिये लगभग असंभव होता है। लेकिन दोनों देशों के बीच के झगड़े को खत्म करने का एक ही तरीका है कि भारत और चीन यह बात स्वीकार कर लें कि जो जहाँ है, वहीं ठीक है। भारत के बहुत बड़े भूभाग पर चीन का कब्जा है। कश्मीर और लद्दाख में कई जगहों पर चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर भारतीय ज़मीन पर कब्जा कर रखा है। चीन दावा करता है कि अरुणाचल प्रदेश समेत एक बड़ा हिस्सा उसका है जिस पर भारत का कब्जा है। ज़ाहिर है कि दोनों ही देश सैनिक ताक़त में बहुत मज़बूत हैं। दोनों ही परमाणु हथियार सम्पन्न देश हैं और आर्थिक ताक़त भी बन रहे हैं। न चीन भारत को हड़का सकता है और न ही चीन भारत से डरने वाला है। ज़ाहिर है दोनों देशों के विवाद को हल करने में सेना का कोई योगदान नहीं होगा। जो भी हल निकलेगा वह बातचीत से ही निकलेगा। और बातचीत में सहमति का सबसे मज़बूत आधार स्टेट्स को यानी यथास्थिति को बनाये रख कर समझौता करना ही हो सकता है। इस तरह का प्रस्ताव अस्सी के दशक में चीन के प्रधानमन्त्री डेंग शाओपिंग दे भी चुके हैं लेकिन भारत में यथास्थिति को बरकरार रख कर कोई समझौता करने वाली पार्टी और उसका नेता राजनीतिक रूप से समाप्त हो जायेगा। इन खतरों के बावजूद 2003 में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने पहल की और वाजपेयी सरकार ने यथास्थिति के सिद्धान्त का पालन करते हुये शान्ति स्थापित करने की कोशिश शुरू की। चीन ने भी जो ज़मीन भारत के पास  है उसको भारत का मानने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया। दोनों देशों ने इस काम के लिये विशेष दूतों की तैनाती की और बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। अब तक इस सन्दर्भ में दो दर्ज़न से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं। 2005 में एक समझौता भी हुआ जिसमें सम्भावित अन्तिम समझौते के दिशा निर्देश और राजनीतिक आयाम को शामिल किया गया है। इस समझौते में यह भी लिखा है कि आबादी का विस्थापन  नहीं होगा। इसका मतलब यह हुआ कि चीन तवांग जिले पर अपनी दावेदारी को भूलने को तैयार था। लेकिन बाद में सब कुछ बिगड गया। चीन ने मीडिया और अपने नेताओं के ज़रिये अजीबोगरीब बातें करना शुरू कर दिया और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों के लिये अलग तरह का वीजा देना शुरू कर दिया। जिसके कारण रिश्ते खराब होते गये। चीन ने सीमा के पास बहुत ही अच्छी सड़कें बना ली हैं और भारत ने भी असम के आसपास अपनी सैनिक मौजूदगी को और पुख्ता किया है। दोनों देशों के बीच जो अविश्वास का माहौल बना है उसके चलते सब कुछ गड़बड़ होने की दिशा में पिछले कई वर्षों से चल रहा है और लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेकटर में चीनी सैनिकों का आगे बढ़ कर अपने टेन्ट लगा देना उन्हीं  बिगड़ते रिश्तों का एक नमूना है। लेकिन बिगड़ते रिश्तों को ठीक करने की कोशिश की जानी चाहिये, उसके लिये हर तरह के प्रयास किये जाने चाहिये क्योंकि दोनों देशों के बीच अगर युद्ध की स्थिति बनी तो खून तो गरीब आदमी का ही बहेगा।

संघ के समाजवादी घोड़े नीतीश

संघ के समाजवादी घोड़े नीतीश

अमलेन्दु उपाध्याय

 

धर्मनिरपेक्षता का प्रमाणपत्र बाँटने के एक और सिंगल विंडो डीलर मैदान में आ गये हैं। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रान्ति के वेस्टेज से निकले बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार पिछले 17 सालों से भारतीय जनता पार्टी के साथ गलबहियाँ कर रहे हैं और फारबिसगंज में गोली चलवाने के बाद भी न केवल वह सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष हैं बल्कि लाल कृष्ण अडवाणी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक को धर्मनिरपेक्ष होने का प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं और नरेन्द्र मोदी का प्रमाणपत्र उन्होंने सिर्फ इस लिये रोक लिया है कि उन्होंने अभी टोपी नहीं पहनी है वरना प्रमाणपत्र तो मोदी का भी तैयार है इधर मोदी ने टोपी पहनी उधर नीतीश ने प्रमाणपत्र जारी किया।

आजादी के बाद से ही राजनीतिज्ञों और खास तौर पर समाजवादियों ने धर्मनिरपेक्षता का जमकर मखौल उड़ाया है। डॉ. राममनोहर लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण तक और जॉर्ज फर्नांडीज़ से लेकर शरद, नीतीश तक इन फासिस्ट, साम्प्रदायिक ताकतों को खाद पानी मुहैया कराते रहे हैं। और अब जहाँ नीतीश अडवाणी और अटल को धर्मनिरपेक्ष और उदार होने का प्रमाणपत्र बाँट रहे हैं तो मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि अडवाणी जी झूठ नहीं बोलते। दरअसल सारी दुनिया में ही समाजवादियों का रोल बहुत खराब रहा है और वे फासिस्ट ताकतों के साथ हमेशा गलबहियाँ करते रहे हैं।

नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल (यूनाइटेड) ने जो नया दाँव मारा है उसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। सही अर्थों में कहा जाये तो जद(यू) ने संघ के एजेण्डे को ही बहुत सलीके से आगे बढ़ाया है। उसने आजीवन संघ के निष्ठावान रहे स्वयंसेवक रहे उन अटल बिहारी वाजपेयी को धर्मनिरपेक्षता और उदार होने का प्रमाणपत्र जारी कर दिया है जिन वाजपेयी ने सत्तर के दशक में कहा था कि अगर हिन्दुस्तान में मुसलमान न होते तो हम उन्हें पैदा करते। यानी घृणा फैलाने कि लिये एक काल्पनिक शत्रु का निर्माण करते।

जद(यू) ने उस संघ और भाजपा को कभी साम्प्रदायिक नहीं कहा जिसने बाबरी मस्जिद को शहीद किया। यानी जद(यू) की नज़र में भाजपा धर्मनिरपेक्ष दल है बस मोदी से एक गलती हो गयी कि वह 2002 के दंगे रोक नहीं पाये! ज़रा इसका सही अर्थ निकालिये। मतलब साफ है कि नीतीश जी कह रहे हैं कि गुजरात दंगों के लिये भाजपा और मोदी कतई जिम्मेदार नहीं हैं और न यह दंगे राज्य प्रायोजित थे बस मोदी दंगे रोकने में ढंग से एक्शन नहीं ले सके। अब यदि इस वक्तव्य का पोस्टमार्टम किया जाये तो गुजरात दंगों के लिये नीतीश कुमार ही जिम्मेदार हैं मोदी नहीं। ऐसा अर्थ भाजपा और जद(यू) दोनों के तर्कों के आधार पर निकाला जा सकता है।

अमलेन्दु उपाध्याय: लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं। http://hastakshep.com के संपादक हैं. संपर्क-amalendu.upadhyay@gmail.com

जद(यू) का कहना है कि मोदी दंगे रोक नहीं पाये और भाजपा व मोदी कहते रहे हैं कि दंगे गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया थे। अब तथ्य यह है कि गोधरा ट्रेन हादसे के वक्त नीतीश कुमार रेल मन्त्री थे और रेल मन्त्रालय के पास यह जानकारी थी कि अयोध्या से जो गुण्डे कारसेवक चढ़े हैं वह रास्ते भर लूटपाट करते हुये और महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हुये जा रहे हैं। उसके बाद भी नीतीश जी ने साबरमती एक्सप्रेस के यात्रियों की सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया।

जदयू नेताओं ने यह कह कर कि मोदी ने दंगे रोकने के लिये मुस्तैदी से काम नहीं किया, 2002 में मोदी के नेतृत्व में हुये मुसलमानों के राज्य-प्रायोजित नरसंहार और उसे छिपाने के लिये किये गये अनेक षड़यंत्रों से मोदी को बरी कर दिया है। जबकि भाजपा लगातार कहती रही है कि यह दंगे गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया थे। तो क्या यह समझा जाये कि गुजरात दंगों के लिये नीतीश दोषी थे ? और ऐसा समझने में कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि नीतीश जी ने रेल मन्त्री रहते हुये इतनी बड़ी घटना की कोई सही जाँच भी नहीं करवाई। और हमें तो याद नहीं कि नीतीश जी उस समय गोधरा गये भी हों, उन्हें याद हो तो जरूर बतायें कि वे कब गये? ऐसा तो नहीं गोधरा घटना और गुजरात के दंगे नीतीश-मोदी की जुगलबन्दी का नतीजा थे?

गौर करने वाली बात यह है कि नीतीश जी ने इस घटना के बाद रेल मन्त्री के पद से त्यागपत्र नहीं दिया और जब सारा देश चिल्ला रहा था कि मोदी की सरकार को बर्खास्त करो तब नीतीश और शरद न केवल मोदी का बचाव कर रहे थे बल्कि जॉर्ज तो बहुत ही बेहूदा बयान महिलाओं को लेकर दे रहे थे। कमाल है 2002 में नीतीश जी के लिये मोदी सेक्युलर थे आज साम्प्रदायिक हो गये और जो आडवाणी तब साम्प्रदायिक थे आज सेक्युलर हो गये। यह वही नीतीश एण्ड मण्डली है जिसने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होते वक्त कहा था कि अगर भाजपा कट्टर अडवाणी को प्रधानमन्त्री बनायेगी तो वे गठबंधन सरकार में शामिल नहीं होंगे। और आज वे कह रहे हैं कि उन्हें मोदी की जगह लालकृष्ण अडवाणी को प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने पर आपत्ति नहीं होगी।

अब समझने वाले समझ सकते हैं कि नीतीश बहुत चालाकी के साथ संघ के एजेण्डे को ही आगे बढ़ा रहे हैं। क्योंकि अडवाणी जी को अपने रक्तरंजित इतिहास और मानवताविरोधी कुकृत्यों पर आज भी कोई अफसोस नहीं है बल्कि उन्हें अपनी इन हिंसक और राष्ट्रविरोधी हरकतों के लिये गर्व ही है और नीतीश जी को न तो अडवाणी जी से आज परेशानी है और न 2009 में थी।

वैसे प्रश्न तो यह भी किया जा सकता है कि नीतीश जी भाजपा से पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने की माँग क्यों कर रहे हैं ? क्या संविधान में कोई ऐसी व्यवस्था है जिसमें पीएम पद का चुनाव होता हो। यह शुद्ध रूप से गैर संवैधानिक माँग है और ताज्जुब की बात यह है कि संघ कबीला ही संविधान को दफन कर देने का जयघोष करता रहा है। तो क्या नीतीश संघ के एजेण्डे को ही समाजवादी घोड़े पर सवार कराकर आगे बढ़ा रहे हैं।

फिर सवाल तो यह भी है कि मान लीजिये भाजपा ने अडवाणी जी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया और ऐसी स्थिति बनी कि चुनाव बाद बिना नीतीश के भाजपा सरकार बना ले जाये और तब भाजपाई मोदी को पीएम बना दें तब नातीश क्या करेंगे?

या मान लीजिये भाजपा अडवाणी जी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दे तो भाजपा धर्मनिरपेक्ष हो जायेगी? अडवाणी जी के सिर से राम जानकीरथ यात्रा के दौरान पूरे देश में दंगे कराने और जनसंहार कराने व बाबरी मस्जिद शहीद करने के दाग धुल जायेंगे?

… और सारी बातें छोड़िये। ज़रा नीतीश जी यह तो बतायें कि जिन अटलजी को वह उदारवाद का महान आदर्श घोषित कर रहे हैं जब वही अटल जी मोदी को राजधर्म का पालन करने की सीख दे रहे थे तब नीतीश जी स्वयं क्या कर रहे थे?

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सज्जन को बरी करने का फैसला अजीब और समझ से परे – सो.पा.

सज्जन को बरी करने का फैसला अजीब और समझ से परे – सो.पा.


सरकार फैसले के खिलाफ तत्काल अपील करे।

सोशलिस्ट पाटी, Socialist party (INDIA)नई दिल्ली। सोशलिस्ट पार्टी को 1984 के सिख विरोधी दंगों के एक बहुचर्चित केस में सज्जन कुमार को बरी करने के निचली अदालत के फैसले पर गहरी निराशा हुयी है। पार्टी प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रेम सिंह ने कहा कि यह अजीब और समझ से परे लगने वाली बात है कि जो साक्ष्य सह-अभियुक्त को हत्या का गुनाहगार ठहराते हैं वे ही साक्ष्य सज्जन कुमार को किसी भी गुनाह का भागीदार ही नहीं साबित करते।

डॉ. सिंह ने कहा, इस फैसले पर दंगों में मारे गये नागरिकों के सम्बंधियों और दोस्तों की गहरी हताशा को हम समझते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि काँग्रेस पार्टी के नेताओं ने न दंगों के वक्त और न बाद में आज तक पीडि़तों के प्रति कोई सरोकार दिखाया है।

सोशलिस्ट पार्टी ने माँग की है कि सरकार इस पीड़ादायी फैसले के खिलाफ तत्काल उच्च न्यायालय में अपील करे। पार्टी की यह भी माँग है कि पीड़ितों के रिश्तेदारों के साथ सलाह करके सरकार इस केस में एक स्वतन्त्र पब्लिक प्रोसीक्यूटर नियुक्त करे। पार्टी पीड़ितों के साथ पूरी सहानुभति रखते हुये केस की आगे की कार्रवाई में पूरी मदद का प्रयास करेगी।

भारत सरकार की कूटनीतिक हार है सरबजीत की मौत

भारत सरकार की कूटनीतिक हार है सरबजीत की मौत


मोहन श्रोत्रिय

 

सरबजीत के मामले में भारत सरकार कोई विश्वसनीय 'नैतिक स्टैण्ड' तो ले नहीं सकती।

सरबजीत के साथ पाकिस्तान की जेल में, जो कुछ भी हुआ, वह निस्सन्देह बहुत बुरा है। चश्मदीद गवाहों के बयानों की रौशनी में तो यह और भी बुरा है। एक निर्दोष व्यक्ति को इतने लम्बे अरसे तक जेल में डाले रखना, उसे यातनाएं देना, उसकी रिहाई की घोषणा करना और फिर मुकर जाना, जेल में उस पर प्राणान्तक हमला करवाना आदि ये सब कृत्य किसी भी देश की सरकार के लिये शर्मनाक हैं। पाकिस्तान की सरकार अपना कोई विश्वसनीय बचाव नहीं कर सकती, इस मामले में। इस सब पर जो बात भारी पड़ती है वह यह कि यह भारत सरकार की बहुत बड़ी राजनयिक पराजय है। विदेश मन्त्रालय जैसे राम-भरोसे चल रहा हो। अपने सभी पड़ोसियों को दुश्मन बना चुकी सरकार किस बूते पर पारस्परिक

मोहन श्रोत्रिय, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। आपने 70 के दशक में चर्चित त्रैमासिक 'क्‍यों' का संपादन किया और राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में आपकी अग्रणी भूमिका रही। आप 1980-84 के बीच राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव तथा अखिल भारतीय विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक महासंघ के राष्‍ट्रीय सचिव रहे

सहयोग सुनिश्चित कर सकती है।

अब सवाल खड़ा हो रहा है सरबजीत की 'मिट्टी' इस देश को सौंपे जाने का। इस माँग में नाजायज़ कुछ भी नहीं है। सरबजीत ज़िन्दा लौटकर अपने परिवार और समाज का हिस्सा नहीं बन पाया हो तो भी वह यहाँ की सामूहिक स्मृति का हिस्सा तो है ही। उसकी 'मिट्टी', उसके परिवार के हाथों इस देश की मिट्टी में मिले, यह गैर-मुनासिब कैसे कहा-माना जा सकता है? पर इस मामले का सिलटना भी उतना आसान नहीं दिखता। पाकिस्तान विदेशी दबाव में उदारता दिखा जाये तो बात अलग है। वैसे भारत सरकार तो अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाने का कोई राजनयिक प्रयत्न करते दिख ही नहीं रही है। एक पेंच खड़ा हो सकता है कि अफ़ज़ल, जो कि एक भारतीय नागरिक था, की मिट्टी ही जब उसके परिवार को नहीं सौंपी गयी, कश्मीर में उठी ज़बरदस्त माँग के बावजूद, तो सरबजीत के मामले में भारत सरकार कोई विश्वसनीय 'नैतिक स्टैण्ड' तो ले नहीं सकती।

देखते ही चल सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है !

http://hastakshep.com/intervention-hastakshep/views/2013/05/02/sarabjeets-death-government-indias-diplomatic-defeat#.UYIQVKITInU

Wednesday, May 1, 2013

मुनाफे में कम्पनियाँ और मुसीबत में मजदूर

मुनाफे में कम्पनियाँ और मुसीबत में मजदूर


 मजदूर दिवस पर विशेष आलेख

अभिषेक रंजन सिंह

मई दिवस से ठीक तीन रोज पहले नोएडा की एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी में कार्यरत मजदूरों ने  अपने बकाया पैसे की माँग की, लेकिन उन श्रमिकों को रुपये देने की बजाय कम्पनी के ठेकेदारों ने गोली मारकर जख्मी कर दिया। पिछले साल मानेसर स्थित मारुति-सुजूकी के कारखाने में भी मजदूरों और प्रबन्धन के बीच हिंसा हुयी थी। सरकार और कम्पनी के अधिकारियों को इसमें भी मजदूरों का दोष ही नजर आया। इतना ही नहीं उन मजदूरों पर अराजक और नक्सली होने का आरोप भी मढ़ दिया गया, ताकि मीडिया भी उन्हें नक्सली घोषित कर दे। यदि कोई मजदूर घण्टों पसीना बहाकर किसी कम्पनी को फायदा पहुँचाता है, तो उस वक्त मालिकों को अपने मजदूरों से कोई शिकायत नहीं होती, लेकिन जब वही मजदूर अपने वाजिब अधिकारों की बात करता हैं, तब उसे गैर सामाजिक तबका करार दिया जाता है। किसी भी मजदूर के लिये फैक्ट्री एक घर की तरह है, जिसमें वह काम करता है। वह इस बात को बखूबी समझता है कि इसी से उसके परिवार का भरण-पोषण होता है। हर कामगार सदैव यही चाहता है कि फैक्ट्री आगे बढ़े और उसके मालिक को फायदा हो, ताकि उसे भी इसका लाभ मिले। हालाँकि, कारखानों के मालिकान ऐसी सोच नहीं रखते हैं। सच्चाई यह है कि दुनिया में कोई भी कम्पनी अपने कर्मचारियों की वजह से घाटे में नहीं जाती और न ही बन्द होती है। जब मुनाफा होता है, तो मजदूरों के योगदान को भुला दिया जाता है और जब नुकसान होने लगता है, तब छंटनी और वेतन रोकने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस परम्परा को बदलना होगा, क्योंकि गैर बराबरी की शुरूआत यहीं से होती है, जो बाद में गहरे असंतोष को जन्म देती है।

श्रमिक हितों की अनदेखी और केन्द्र सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के खिलाफ ट्रेड यूनियनों ने इस साल 20-21 फरवरी को जिस तरह देशव्यापी हड़ताल की, उसे मजदूर आन्दोलन की एक नई और अच्छी पहल मानी जा सकती है। ट्रेड यूनियनों की यह हड़ताल न सिर्फ पूरी तरह कामयाब रही, बल्कि इस हड़ताल ने सप्रंग सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों को भी उजागर कर दिया। इस हड़ताल की सबसे खास बात यह थी कि आजादी के बाद पहली मर्तबा देश की सभी छोटी-बड़ी ट्रेड यूनियनें एक मंच पर दिखीं। न केवल वामपंथी, बल्कि दक्षिणपंथी श्रमिक संगठन भी इस हड़ताल में शामिल हुये। इस हड़ताल से केन्द्र सरकार कितनी डरी और सहमी हुयी थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हड़ताल शुरू होने से दो दिन पूर्व ट्रेड यूनियनों से हड़ताल वापस लेने की अपील की थी। प्रधानमन्त्री की इस अपील को ट्रेड यूनियनों ने न सिर्फ खारिज किया, बल्कि सरकार को चेताया कि अगर उनकी माँगे पूरी नहीं की गयीं, तो भविष्य में बेमियादी हड़ताल किया जायेगा। अगर देखा जाये, तो इस मामले में गलती केन्द्र सरकार की है, क्योंकि पिछले दो वर्षों से ट्रेड यूनियनें श्रमिक हितों के सवाल पर आन्दोलनरत हैं। बावजूद इसके सरकार ने इस पर संजीदगी नहीं दिखायी। यहाँ तक कि हड़ताल शुरू होने से पहले प्रधानमन्त्री और वित्तमन्त्री ने भी यूनियन के नेताओं से बात करना मुनासिब नहीं समझा। मजदूर संगठनों में यूपीए सरकार के प्रति गुस्सा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जन्तर-मन्तर पर 21 फरवरी को एटक महासचिव और सीपीआई सांसद गुरुदास दास गुप्ता ने यह पूछे जाने पर कि अब ट्रेड यूनियनों की आगे की रणनीति क्या होगी ? उनका जवाब था, कल संसद की कार्रवाई देखना। दासगुप्ता ने मजदूरों की जो बातें सड़क पर कही, वही बातें उन्होंने संसद में भी रखीं। अपने 10 मिनट के सम्बोधन में उन्होंने प्रधानमन्त्री, वित्त मन्त्री और श्रम मन्त्री की बखिया उधेड़कर रख दी और सदन में बैठे सप्रंग सरकार में मन्त्री लज्जित भाव से कॉमरेड गुप्ता की बातें सुनते रहे।

अभिषेक रंजन सिंह,लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व छात्र हैं।

वहीं दूसरी ओर इस हड़ताल पर एसोचैम ने विलाप करते हुये कहा था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। वैसे ऐसोचैमफिक्की और सीआईआई जैसे कॉरपोरेट संगठनों से इसी तरह के बयान की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि  उनसे श्रमिक हितों की बात करना पूरी तरह बेमानी है। आश्चर्य की बात तो यह है कि एफडीआई के मुद्दे पर भी ये तीनों संगठन न सिर्फ संप्रग सरकार की नीतियों को सही ठहरा रहे हैं, बल्कि वॉलमार्ट जैसी कम्पनियों के लिये पलक पाँवड़े बिछाये बैठी है।

असल में केन्द्र और राज्य सरकारें टाटा, बिड़ला, मित्तल, जिन्दल, अंबानी, गोयनका, डालमिया और सिंघानिया जैसे चन्द मुट्ठीभर पूँजीपतियों को फायदा पहुँचाने के लिये दिन-रात परेशान रहती है, लेकिन अफसोस ये देश के उन करोड़ों खेतिहर मजदूरों और कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों को लेकर तनिक भी चिन्तित नहीं हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नब्बे के दशक से लागू नई आर्थिक नीतियों ने पूँजीपतियों को भरपूर फायदा पहुँचाया है। वहीं दूसरी ओर यह भी एक सच है कि मुल्क के करोड़ों किसानों और कामगारों को इस व्यवस्था ने सिवाय शोषण के और कुछ भी नहीं दिया है। दरअसल, नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद न सिर्फ किसानों से उनकी पुश्तैनी जमीनें हड़पी गईं, बल्कि उनके परम्परागत कृषि कार्य में भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दखल लगातार बढ़ता ही चला गया। उन दिनों वित्त मन्त्री रहे हमारे मौजूदा प्रधानमन्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने नई आर्थिक नीतियों की खूब तरफदारी की थी और इसीलिये उन्होंने संसद में यह बयान भी दिया था कि इससे देश की करोड़ों जनता को लाभ होगा, लेकिन अफसोस! मेहनतकशों की जिंदगी पर इसका कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ा, बल्कि उल्टा मजदूरों की जिंदगी में तमाम दुश्वारियाँ पैदा हो गईं हैं। असल में, यह देश केन्द्र व राज्य सरकारों की गलत आर्थिक नीतियों के दुष्चक्र में बुरी तरह फंस चुका है और इसी का परिणाम है कि भारत सरकार की आर्थिक नीतियाँ अब बड़े कॉरपोरेट घरानों और अमेरिका समेत अन्य विकसित देशों के अनुकूल बनाई जा रही हैं। हकीकत में, सरकार को इस बात से कोई सरोकार नहीं रह गया है कि विषम परिस्थितियों में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले श्रमिकों और चिथड़ों में लिपटे किसानों पर इसका क्या विपरीत प्रभाव पड़ेगा ? पूरी दुनिया के मजदूरों के लिये मई दिवस बेहद अहम है, क्योंकि शोषण, दमन और गैर बराबरी के खिलाफ एक बड़ी कुर्बानी देने के बाद मजदूरों ने अपने लिये एक जगह बनाई। दुनिया का कोई भी ऐसा देश नहीं है, जहां मजदूरों को अपने हितों की लड़ाईयाँ न लड़नी पड़ी हो। काम के घंटे निर्धारित करने, बंधुआ मजदूरी की प्रथा को समाप्त करने और वेतन विसंगतियों को दूर करने की माँग को लेकर 127 साल पहले शुरू हुआ मजदूर आन्दोलन आहिस्ता-आहिस्ता पूरी दुनिया में फैल गया। हालाँकि उसके बाद मजदूरों की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन उनकी समस्याएं पूरी तरह खत्म हो गईं, ऐसा नहीं है।

उदारीकरण के बाद औद्योगिक घरानों और राजनेताओं ने मजदूरों की हालत और भी दयनीय बना दी। नई आर्थिक नीतियों का असर सभी देशों पर पड़ा, लेकिन विकासशील देशों, खासकर भारत समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों के श्रमिकों की स्थिति दिन ब दिन खराब होती चली गयी। हालाँकि यदि भारत की बात करें, तो यहाँ मजदूरों के हितों से जुड़ा पहला सवाल है न्यूनतम मजदूरी का। दूसरा सवाल ठेकेदारी प्रथा को बन्द करने का है और तीसरा सवाल है उनकी बुनियादी सुविधाओं को लेकर। इन्हीं मुद्दों पर ट्रेड यूनियनें सरकारों को घेरती है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार भी चतुर-सुजान और मौकापरस्त है, इसीलिये मजदूरों को उनका वाजिब हक देना तो दूर, उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जा रही है। हैरानी की बात तो यह है कि श्रमिकों से ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार भी छीना जा रहा है। भारत में मजदूरों और ट्रेड यूनियनों की मांगों को सरकार अनसुनी कर देती है, जबकि पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। इसके लिये कुछ हद तक ट्रेड यूनियनें भी जिम्मेदार हैं। देश में विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़ी करीब 15  ट्रेड यूनियनें हैं। ये वैचारिक और क्षेत्रीय स्तरों पर भी बंटे हुये हैं, जबकि इनके बीच एक शीर्ष निकाय का होना बेहद जरूरी है। ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका, जापान, न्यूजीलैंड और यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी ट्रेड यूनियनों का एक केंद्रीय मंच है, जो श्रमिकों से जुड़े मुद्दों पर सरकार से सीधी बात करता है।

भारत में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या करीब 93 प्रतिशत है, जिसे पेंशन, भविष्य निधि, अवकाश और चिकित्सीय सुविधाएं भी हासिल नहीं है। हालाँकि संगठित क्षेत्रों के मजदूरों जिनकी संख्या महज पौने तीन करोड़ है, उनकी हालत में बेशक सुधार हुआ है, लेकिन यहाँ नई नियुक्तियों की बजाय अनुबन्ध पर कार्य कराने का चलन बढ़ गया है। एक आंकड़े के मुताबिक़, भारत में कुल श्रम शक्ति करीब 48 करोड़ है। इनमें से 7 फीसदी ही संगठित क्षेत्र में काम करते हैं और ट्रेड यूनियनों की 70 फीसदी सदस्यता भी इसी से जुड़ी हुयी है। मौजूदा दौर में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों की हालत काफी दयनीय है। चाहे वे बीड़ी मजदूर हों या दैनिक मजदूर, फुटपाथों पर फलों की रेहड़ी लगाने वाला हो या फिर रिक्शा, ठेला और तांगा चलाने वाले मजदूर। सिर्फ दिल्ली में ही उनकी संख्या करीब 5 लाख है, जबकि पूरे देश में इनकी संख्या करोड़ों में है। वैसे तो, मजदूरों के कल्याण के लिये अर्जुन सेन गुप्ता आयोग के अलावा, कई दूसरी समितियाँ भी बनीं। दरअसल, उन आयोगों ने अपनी रिपोर्ट भी सरकार के समक्ष पेश की, लेकिन दुख तो इस बात का है कि आज तक उस पर कोई अमल नहीं हो पाया है। उल्लेखनीय है कि जब किसी उद्योगपति का कारोबार मंदा पड़ता है, तब सरकार आर्थिक पैकेज देकर उसे संकटों से उबार लेती है, लेकिन जब मजदूर अपने उचित अधिकारों की माँग करता है, तो उसे सिर्फ झूठा आश्वासन ही मिलता है।

 http://hastakshep.com/bol-ki-lab-azad-hain-tere/2013/05/01/companies-profit-workers-trouble#.UYFpPaITInU

Re: BJP justified the 1984 Massacre and supported Indra Gandhi for Blue Star Operation

ताज़ा आलेख/ समाचार



On 1 May 2013 13:51, Palash Biswas <palashbiswaskl@gmail.com> wrote:

BJP justified the 1984 Massacre and supported Indra Gandhi for Blue Star Operation

Shamsul Islam on NDTV
Shamsul Islam on NDTV

he perpetrators of 1984 carnage of Sikhs in India still remain unidentified and unpunished; almost 30 years after the massacre.

Most shockingly, on April 30, 2013 a Delhi court absolved a major organizer of this carnage, Sajjan Kumar, of the crime. A debate on NDTV is on that issue. The participants areProfessor Uma Chakarvarty, a historian and activist, one representative each from BJP & Congress.

S. Islam's intervention aimed at highlighting the fact that both Congress & BJP indulge in a pseudo debate on the incidents of carnage of minorities and Dalits.  Whenever, massacre of these sections takes place a commission is set-up which continues for decades, holds nobody responsible and its recommendations are never enforced.

We can see the same thing happening in case of Nellie Massacre (1983), Hashimpura Massacre (1987), Bhagalpur Massacre (1989), 1984 Massacre (1984), Gujarat 2002 Massacre, and incidents of Dalit massacre at Lakshmipet AP (2012), Laxmanpur, Bihar (1997), Khairlanji, Maharashtra (2006), Bathani Tola, Bihar (1996) and many-many more. However, if any violence is committed by minorities and Dalits it is immediately punished with severest sentences including death penalty.

Well known social scientist  Prof. Shamsul Islam says, "BJP claims to be a supporter of Sikhs but there are documents proving that they justified the 1984 Massacre and supported Indra Gandhi for Blue Star Operation."

You may watch the debate at the following link.
http://www.ndtv.com/video/player/the-social-network/complicity-vs-credibility-1984-anti-sikh-riots-sajjan-kumar-walks-free/272990?video-justadded




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सोनी सोरी बरी

सोनी सोरी बरी


सोनी सोरी

जगदलपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेता अवधेश गौतम की हत्या के मामले में सोनी सोरी को बरी कर दिया गया है. गौतम की हत्या के मामले में स्थानी अदालत ने सोनी सोरी समेत सभी 17 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है. सोनी सोरी के बरी होने से पुलिस को गहरा झटका लगा है. इस मामले में सोनी सोरी समेत सभी लोगों पर नक्सली होने का आरोप था और कहा गया था कि इन सबने एक मत हो कर अवधेश गौतम की हत्या की है. बुधवार को अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी को बरी करने के आदेश दिये.

7 अगस्त 2010 को अवधेश सिंह गौतम के नकुलनार स्थित आवास पर आधी रात नक्सलियों ने हमला बोल कर उनकी हत्या कर दी गई थी. इस मामले में सोनी सोरी के साथ साथ उनके पति अनिल सोरी और भतीजे लिंगाराम कोडोपी को भी पुलिस ने आरोपी बनाया था. अदालत ने पुलिस के इन आरोपों को सही नहीं पाते हुये मामले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

गौरतलब है कि इस मामले में पुलिस ने दावा किया था कि अवधेश गौतम की हत्या की लिंगाराम कोडोपी ने बनाई थी और हमले के समय सोनी सोरी नक्सलियों के साथ थी. पुलिस के अनुसार अनिल सोरी अपनी जीप में बैठ कर नक्सलियों की मदद कर रहा थे. इस मामले में पुलिस की विज्ञप्ति में मेधा पाटकर, अरुंधति राय, नंदिनी सुंदर और हिमांशु कुमार को भी उकसाने का आरोप लगाते हुये मामले की जांच की बात कही गई थी.

पिछले 3 सालों में सोनी सोरी के खिलाफ पुलिस ने 8 मामले दर्ज किये हैं. जिनमें से 5 मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया है. महाकाय कंपनी एस्सार से नक्सलियों के लिये पैसे लेने के आरोप में सोनी सोरी की गिरफ्तारी चर्चा में रही है. इस मामले में नक्सलियों को पैसा देने वाले एस्सार के अधिकारी समेत तमाम आरोपी जेल से बाहर हैं. अकेली सोनी सोरी इस मामले में जेल में हैं.


यह देश सोनी सोरी से क्यों डरता है


इस बार तीन जनवरी को सोनी सोरी के मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में हुई थी .मैं सर्वोच्च न्यायालय में उपस्थित था . मेरे साथ एक बड़े अखबार की महिला पत्रकार भी थी .

सोनी के वकील कालीन गोंसाल्वेस ने कहा कि सोनी सोरी को दिल्ली से पकड़ कर छत्तीसगढ़ ले जाया गया . रात को पुलिस अधिकारी ने उसे थाने में निवस्त्र किया और उसे नीचे गिरा दिया . उसके बाद सोनी के पैरों में बिजली का करेंट लगाया गया . इसके बाद सोनी सोरी के शरीर में कुछ आब्जेक्ट डाले गये .सोनी ने अपने शरीर में भारी पन महसूस किया .फिर वह दर्द से बेहोश हो गई . बाद में जब कलकत्ता के मेडिकल कालेज में सोनी सोरी को जांच के लिये ले जाया गया . तो डाक्टरों ने सोनी की योनी से दो पत्थर के टुकड़े और गुदा से एक पत्थर का टुकड़ा निकाला .

इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश माननीय श्री अल्तमश कबीर ने कहा कि हाँ हमें याद है कि वह पत्थर के टुकड़े सर्वोच्च न्यायालय को भेजे गये थे और हमने उन्हें सील कर सुरक्षित रखने का आदेश दिया था . 

इसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय ने कहा कि ठीक है अब अगली सुनवाई फरवरी में रख लेते हैं . छत्तीसगढ़ सरकार के वकील ने देरी करवाने की नियत से कहा नहीं फरवरी में मुझे कुछ काम है . मुख्य न्यायाधीश महोदय ने अगले ही क्षण कहा अच्छा तो फिर मार्च में कर लेते हैं .

और सोनी सोरी के मामले की सुनवाई मार्च तक बढ़ा दी गई .

दिल्ली बलात्कार मामले के कारण उबलती हुई जन भावनाओं से प्रभावित होकर आजकल हमारे मुख्य न्यायाधीश महोदय सभी न्यायाधीशों को पत्र लिख रहे हैं कि महिलाओं पर यौन प्रतारणा के मामलों में शीघ्र न्याय दिया जाए. 

हमें समझना पड़ेगा कि सोनी सोरी के मामले में मुख्य न्यायाधिपति इतनी सुस्ती क्यों दिखा रहे हैं ?

पूरा देश यह तो समझ रहा है कि अगर सोनी के साथ ऐसी प्रतारणा करने वाला कोई सामान्य सा बस ड्राइवर या कोई आवारा लड़का होता तो उसे अब तक  सज़ा मिल गई होती . हम सब यह भी जानते हैं कि सोनी सोरी को न्याय देने में देश की सर्वोच्च न्यायालय इसलिये हिचकिचा रही है क्यों कि सोनी सोरी का अपराधी एक बड़ा पुलिस अपराधी है जिसे इस कांड को अंजाम देने के बाद इस राष्ट्र के राष्ट्रपति ने वीरता का पुरूस्कार दिया था .

सोनी सोरी को न्याय देते ही यह सिद्ध हो जायेगा कि सरकार कैसे जन विरोधी हो चुकी है ? सोनी सोरी को न्याय देते ही सिद्ध हो जायेगा कि यह सरकारी तन्त्र किन लोगों के लिये काम कर रहा है ? सोनी को न्याय देते ही यह भी साफ़ हो जायेगा कि ज़मीने हड़पने के लिये आदिवासियों का जनसंहार किया जा रहा है .

सोनी सोरी को न्याय देने में इस तन्त्र को इसीलिये बहुत डर लग रहा है . कि सोनी सोरी को न्याय देते ही  वो बड़ा पुलिस अधिकारी जेल चला जायेगा . 

उस पुलिस अधिकारी के जेल जाते ही दूसरे पुलिस अधिकारी डर जायेंगे . और आदिवासियों की ज़मीनों को पुलिस के दम पर छीनने का जो खेल देश भर में चल रहा है उसमे उसमे बाधा पड़ सकती है .

इसलिये गरीबों की ज़मीने हड़पने में लगा हुआ यह पूरा सरकारी तन्त्र अपने उस बदमाश पुलिस अधिकारी को बचाने में लगा हुआ है . राष्ट्रपति से लेकर थानेदार तक सब सोनी सोरी से डरे हुए हैं . 

सोनी सोरी को न्याय मिलते ही भारतीय सत्ता तन्त्र का वो पर्दा उठ जायेगा जिसके पीछे इस तन्त्र ने अपना असली क्रूर खूनी पंजा छिपाया हुआ है . 

इसलिये सोनी को न्याय देने में पूरे तन्त्र को घबराहट हो रही है . 

और सच तो यह भी है कि हम सब जो सोनी को न्याय दिलवाना चाहते हैं हम भी सिर्फ एक लड़की को न्याय दिलवाने के लिये नहीं लड़ रहे बल्कि हमे पता है कि सोनी को न्याय मिलते ही इस क्रूर सत्ता तन्त्र को दो कदम पीछे  हटना पड़ेगा . और असके साथ ही तुरंत इस क्रूरता के खिलाफ लड़ने वाले लोग दो कदम आगे बढ़ जायेंगे . 

सोनी सोरी का मामला इसी कारण अब बहुत महत्वपूर्ण हो गया है .क्योंकि सोनी को अगर न्याय नहीं मिलता है तो फिर इस तन्त्र को किसी से भी डरने की कोई ज़रूरत ही नहीं बचेगी . फिर जन का कोई भी डर तन्त्र को नहीं रहेगा .तन्त्र जो चाहेगा वो करेगा .

डर यह है कि तन्त्र के पास लाखों बंदूकें टैंक, बम वर्षक जहाज और परमाणु बम हैं .

खतरनाक बात यह है कि तन्त्र को टाटा, अम्बानी जैसे लोग अपनी जेब में डाल सकते है .

इतना शक्तिशाली तन्त्र अगर कुछ लोगों के फायदे के लिये हमारी ही महिलाओं की योनी में पत्थर भरेगा तो भी हम उस तन्त्र का साथ दे सकते हैं क्या .

हाँ हम इसी तन्त्र का साथ देने के लिये मजबूर हैं .

हमारी मुसीबत यह है कि इस तन्त्र को टैक्स देने , इसे ही वोट देने और इस तन्त्र को ही अपना तन्त्र कहने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है . 

और चूंकि हमारे पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है और हमे पता है कि हमारे द्वारा पोषित तन्त्र हमारी बेटियों पर हमला करेगा तो हमारे पास बचने का कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है . 

हमारे पास कोई विकल्प नहीं है .

इसलिये हम सोनी सोरी की तरफ से मूंह फेर लेते हैं . 

हम उधर देखने में डरते हैं . 

कब तक डरोगे ?



1- मुझे नंगा कर के ज़मीन पर बिठाया जाता है।

2- भूख से पीड़ित किया जा रहा है।

3- मेरे अंगों को छूकर तलाशी किया जाता है।

इतना ही नहीं, सोनी सोरी आगे लिखती हैं कि जज साहब छतीसगढ़ सरकार, पुलिस प्रशासन मेरे कपडे कब तक उतरवाते रहेंगे ? मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं। मुझे में भी शर्म है, मुझे शर्म लगती है। मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं ! शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं ! जज साहब मुझ पर अत्याचार, ज़ुल्म में आज भी कमी नहीं है। आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया जो ज़ुल्म पर ज़ुल्म कर रहे हैं। . जज साहब मैंने आप तक अपनी सच्चाई को बयान किया तो क्या गलत किया आज जो इतनी बड़ी बड़ी मानसिक रूप से प्रतारणा दिया जा रहा है? क्या अपने ऊपर हुए ज़ुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ना अपराध है ? क्या मुझे जीने का हक़ नहीं है ? क्या जिन बच्चों को मैंने जन्म दिया उन्हें प्यार देने का अधिकार नहीं है ? इस तरह के ज़ुल्म अत्याचार नक्सली समस्या उत्पन्न होने का स्रोत हैं।

हिमांशु कहते हैं कि सोनी का यह पत्र हम सब के लिये एक चेतावनी है कि कैसे एक सरकार अपने खिलाफ कोर्ट के किसी फैसले का बदला जेल में बंद किसी पर ज़ुल्म कर के ले सकती है ! सरकार साफ़ धमकी दे रही है कि जाओ तुम कोर्ट ! ले आओ आदेश हमारे खिलाफ ! कितनी बार जाओगे कोर्ट ? सोनी पर यह ज़ुल्म सोनी के अपने किसी अपराध के लिये नहीं किये जा रहे। सोनी पर ये ज़ुल्म सामजिक कार्यकर्ताओं से उसके संबंधों के कारण किये जा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार के अपराधिक कारनामों को उजागर करने की सजा के रूप में सोनी पर ये अत्याचार किये जा रहे हैं ! सोनी सामाजिक कार्यकर्ताओं के किये की सजा भुगत रही है ! हम बाहर जितना बोलेंगे जेल में सोनी पर उतने ही ज़ुल्म बढते जायेंगे।



सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमे वो यह लिखे कि अरुंधती राय , स्वामी अग्निवेश , कविता श्रीवास्तव , नंदिनी सुंदर , हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं ! ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके। सरकार मानती है कि ये सामजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे हैं ! इसलिये एक बार अगर इन सामजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा ! फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की ज़मीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे।

हिमांशु संसद, मीडिया, कोर्ट से अपील करते हुए कहते हैं कि कोई तो बचाओ इस लड़की को। संसद, सुप्रीम कोर्ट, टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं। हमें चिढा चिढा कर मारा जा रहा है। और सारा देश लोकतन्त्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है।

शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है !एक सभ्य समाज ऐसे थोड़े ही होते हैं। मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं ? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा। नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पन्द्रह अगस्त को हमें लोकतन्त्र का उपदेश देंगे।

सोनी सोरी की कहानी सुनो, सोनी सोरी की ज़ुबानी सुनो ...एक कविता

सोनी सोरी की कहानी सुनो 
सोनी सोरी की ज़ुबानी सुनो 
पढ़ी है लिखी है पढ़ाती भी है 
एक माँ है, पत्नी है, साथी भी है 
भारत की नारी है, वासी भी है 
अधिकार से आदिवासी भी है 
तिरंगे का इतना उसे मान है 
लड़कर के लहराया पहचान है 
भले ही अभी लोग अनजान हैं 
मगर ये भारत की असल शान है 
लिंगा कोडोपी की हैं ये बुआ 
सुनो के इक दिन कुछ ऐसा हुआ 
गाँव में तीन सौ घर जल उठा 
हुए बालात्कार और सबकुछ लुटा 
हत्यारा पुलिस बल था पता जो चला 
लिंगा ने जाकर के सब सच लिखा 
सबूतों से लिंगा के रमण सिंह हिला 
यहीं से शुरू हुआ नया सिलसिला 
पहले तो लिंगा को दोषी कहा 
नहीं बस चला तो उसे अगवा किया 
प्रताड़ित किया और भूखा रखा 
फिर सोनी सोरी पर इलज़ाम गढ़ा
पैसों के लालच से बिक न सकी 
तो सोनी भी बलि की बकरी बनी 
उठा लाए दिल्ली से सोनी को वो 
फिर सुन न सकोगे आगे है जो 
अंकित गर्ग नामक एस पी है एक 
वहशी दरिंदा है इन्सां के भेस 
अकेली नारी को बंदी बना कर 
अपने कमीनो की टोली बुला कर 
सोनी सोरी को नंगा किया 
माता को गाली देता गया 
जब बिजली के झटकों से दिल न भरा 
तो सोनी की इज्ज़त पर वो टूट पड़ा 
पीड़ा से सोनी बेहोश हो गई
अत्याचार इसपर भी न रुक सका 
सोनी की कोख में पत्थर भरा 
सुबह को सोनी थी आधी मरी 
दर्द से कराहती वो चल न सकी 
चक्कर जो आया तो फिर गिर पड़ी 
शरीर से निर्बल थी, मगर वाह रे वाह 
टूटा न मर्दानी का हौसला 
उच्चतम न्यायलय में अर्ज़ी लिखी 
रमण सिंह की सरकार हिलने लगी 
सीबीआई तक बातें पहुँचने लगी 
हर एक अत्याचार सबूत बन गए 
आईपीएस के अफसर कपूत बन गए 
वीरता पदक देकर अंकित गर्ग को 
कलंकित किया है हर एक मर्द को 
धिक्कार है ऐसी सरकार पर 
फिटकार है ऐसी सरकार पर 
जिस कोख से जन्मे हैं सब के सब 
उस कोख के लाज की बात है 
लड़ेंगे, क़सम से हम मर जायेंगे 
इन्साफ़ माता को दिलवाएंगे

रिज़वी

http://cgnetswara.org/index.php?id=9071


 आदियोग 

सोनी सोरी का मामला एक बार फिर सतह पर है। देश के प्रमुख महिला संगठनों ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भेजी गयी अपनी साझा चिट्ठी में इस बात पर गहरी नाराज़गी ज़ाहिर की है कि राज्य सरकार यह जांच करवा रही है कि सोनी सोरी कहीं दिमाग़ी तौर पर बीमार तो नहीं। यह चिट्ठी गुज़री 11 अप्रैल को जारी हुई जिस दिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सूबे में मानवाधिकार हनन से जुड़े कोई दो दर्ज़न चुनिंदा मामलों की रायपुर में सुनवाई कर रहा था। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय की राय थी कि मानवाधिकार आयोग को इस तरह के जोखिम से बचना चाहिए और सुनवाई की अपनी योजना रद्द कर देनी चाहिए लेकिन मानवाधिकार आयोग ने अपने पैर पीछे नहीं किये। इस निर्भीक पहल से राज्य सरकार पहले से सकपकायी हुई थी, उसे अपनी पोल खुल जाने का भय सता रहा था। महिला संगठनों की चिट्ठी ने उसे और अधिक सांसत में डाल दिया। 

कौन हैं सोनी सोरी? वे स्कूल शिक्षिका हैं, बस्तर से हैं और डेढ़ साल से भी अधिक समय से जेल में हैं। उन पर माओवादियों की मदद करने का आरोप है। पुलिस के मुताबिक़ 9 सितंबर 2011 को औद्यौगिक समूह इस्सार का ठेकेदार लालाराम 15 लाख रूपये लिंगाराम कोडोपी को देते हुए पकड़ा गया था जिसे माओवादियों तक पहुंचाया जाना था, और कि इस दबिश में तीसरी अभियुक्त सोनी सोरी फ़रार हो गयी। अब इस मामले को खंगालने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि आख़िर कौन है लिंगाराम? इससे कोई डेढ़ साल पहले उनका नाम तब सामने आया था जब सूबे के पूर्व पुलिस प्रमुख विश्वरंजन ने उसे फ़रार अपराधी बताया था। हालांकि तब लिंगाराम नयी दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था। उसके पक्ष में स्वामी अग्निवेश, प्रशांत भूषण और हिमांशु कुमार जैसे लोग खड़े हो गये और उन्होंने विश्वरंजन को अपने आरोप साबित करने की चुनौती भी दी। लगा कि मामला ठंडा पड़ गया। लिंगाराम में भी हिम्मत जागी और उसने शुभचिंतकों की राय को दरकिनार करते हुए दंतेवाड़ा लौटने का मन बना लिया। यह बड़ी भूल थी। घर वापसी ने उसे और भी घने जाल में फंसा दिया। यह भरोसा तोड़ दिया कि सांच को आंच नहीं। 

लिंगाराम पर यह सरकारी खुन्नस क्यों उतरी? दरअसल, लिंगाराम पर दबाव था कि वह सलवा जुडुम में शामिल हो जबकि वह पत्रकार बनने की धुन में था। लिंगाराम ने अपना चुना हुआ रास्ता नहीं छोड़ने का फ़ैसला किया और वह स्थानीय पुलिस-प्रशासन की आंख की किरकिरी बन गया। इतना ही नहीं, उसने बलात्कार की शिकार कुछेक आदिवासी महिलाओं को नयी दिल्ली में पत्रकारों के सामने पेश करने की भी ज़ुर्रत कर डाली। यह राज्य सरकार को चुनौती देना था। इसके जवाब में उसे फ़रार अपराधी करार दिया गया। आप जानते हैं कि सलवा जुडुम की पैदाइश माओवादियों के नाम पर आदिवासियों को आदिवासियों के ख़िलाफ़ खड़ा किये जाने की सरकारी योजना के तहत हुई थी और जिसने बर्बरता की तमाम घिनौनी मिसालें क़ायम कीं- बस्तर के सैकड़ों गांव वीरान हुए, बेगुनाह आदिवासी फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गये, औरतों के साथ बलात्कार हुए, घर और फ़सलें आग के हवाले हुईं, और इस तरह पूरी दुनिया में हिंदुस्तान की थूथू हुई। यह सिलसिला तभी रूका जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए सलवा जुडुम को फ़ौरन बंद किये जाने का निर्देश दिया। 

ख़ैर, लिंगाराम आख़िरकार 'क़ानून' की पकड़ में आ गया। उधर, सोनी सोरी ने यह ख़बर लगने पर कि उसे फ़रार बताया जा रहा है, किसी बुरी आफ़त से बचने के लिए छत्तीसगढ़ छोड़ देने में अपनी भलाई समझी। इंसाफ़ की गोहार लगाने उड़ीसा के रास्ते किसी तरह देश की राजधानी पहुंचने में क़ामयाब हो गयी। लेकिन 4 अक्टूबर 2011 को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार कर उसे छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया और वह दंतेवाड़ा ले जायी गयी। यहीं से उसके बुरे दिनों की शुरूआत हो गयी। 'सच' उगलवाने के लिए पुलिस ने उसके साथ ज़्यादतियों की इंतिहा कर दी- उसे नंगा किया गया, बिजली के झटके दिये गये, बेरहम पिटाई की गयी, उसकी गुदा और यौनि में पत्थर ठूंसे गये। अंकित गर्ग नाम के जिस पुलिस अधीक्षक के आदेश और निगरानी में इंसानियत को तार-तार कर देनेवाला यह धतकरम हुआ, उसे पिछले बरस गणतंत्र दिवस के मौक़े पर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के हाथों शौर्य पदक का ईनाम मिला। यह जम्हूरी निजाम की शर्मनाक़ उलटबांसी की बानगी है। 

सोनी सोरी के साथ किये गये ग़ैर इनसानी सुलूक़ के आरोप को राज्य सरकार सिरे से नकारती रही। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कोलकोता के सरकारी अस्पताल में हुई मेडिकल जांच की रिपोर्ट ने इस वीभत्स सच से परदा उठा दिया। यह आदेश मानवाधिकारों के पैरोकारों की इस दलील की रोशनी में था कि सोनी सोरी की छत्तीसगढ़ में होनेवाली मेडिकल जांच पर भरोसा नहीं किया जा सकता इसलिए जांच का काम सूबे से बाहर हो। हैरत की बात है कि वास्तविकता सामने आने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को ठुकरा दिया कि सोनी सोरी को वापस छत्तीसगढ़ न भेजा जाये, कि वहां उसकी जान को ख़तरा है।  

लिंगाराम के साथ सोनी सोरी का नाम क्यों आया? दोनों ने मिल कर उस इलाक़े में ठेकेदारों के शोषण के ख़िलाफ़ आदिवासियों को एकजुट किया था जो माओवादियों का गढ़ माने जाते हैं। उनके अथक संघर्ष का नतीज़ा रहा कि आदिवासियों की मज़दूरी दोगुनी हुई। यह ख़तरे का बड़ा सिग्नल था। ज़ाहिर है कि आदिवासियों की एकता माओवादियों के सफ़ाया अभियान के नाम पर चल रहे पुलिसिया दमन के लिए चुनौती बनने की दिशा पकड़ रही थी। इसके अलावा ठेकेदारों से होनेवाली अवैध कमाई में भी घटत होने लगी थी। बांस ही नहीं रहेगा तो बांसुरी भला कैसे बजेगी? इसलिए दोनों को माओवादियों का मददगार साबित करने की साज़िश रच दी गयी। बताते चलें कि सोनी सोरी का भतीजा है लिंगाराम। 

सोनी सोरी के साथ हुई बदसुलूक़ियों पर शोर मचने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग ने गुज़रे साल नवंबर और दिसंबर में इसकी छानबीन की थी और उसे सही पाया था। महिला आयोग के जांच दल की एक सदस्य ने तब कहा था कि हिरासत के दौरान हुए भीषण अत्याचारों के सदमे से उबरने के लिए सोनी सोरी को मनोवैज्ञानिक सलाह की ज़रूरत है। हालांकि इसी दल की दूसरी सदस्य एनी राजा ने इस राय से असहमति दर्ज़ करते हुए कहा था कि सोनी सोरी बहुत बहादुर महिला हैं, कि जांच दल के सामने पूरे होशोहवास में उन्होंने अपनी मार्मिक आपबीती बयां की, कि उन्हें मनोवैज्ञानिक सलाह से कहीं ज़्यादा इंसाफ़ की ज़रूरत है। लेकिन राज सरकार ने पहली टिप्पणी को अपने मुफ़ीद माना और सोनी सोरी के दिमाग़ी हाल की पड़ताल किये जाने का काम शुरू कर दिया। इस फ़ुर्ती के पीछे मंशा यह साबित किये जाने की है कि उनकी दिमाग़ी सेहत सचमुच ठीक नहीं। दिमाग़ी सेहत गड़बड़ है तो उनके कहे पर कैसे यक़ीन किया जा सकता है। इस पूरे मामले से समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में क़ानून का शासन किस क़दर लंगड़ा कर चलता है, कि सरकारी गुनाह किस तरह इंसाफ़ का लबादा ओढ़ने की जुगत करता है?