Thursday, March 1, 2012

तेलंगाना मुद्दे पर अदालती लड़ाई के लिए तैयार हैं सुब्रमण्यम स्वामी

तेलंगाना मुद्दे पर अदालती लड़ाई के लिए तैयार हैं सुब्रमण्यम स्वामी

Thursday, 01 March 2012 20:00

हैदराबाद, एक मार्च (एजेंसी) पृथक तेलंगाना राज्य की मांग का समर्थन करते हुए जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने आज कहा कि वह इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। 
स्वामी ने कहा कि वह उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में इस मांग को लेकर याचिका दायर करने को तैयार है और उन्होंने तेलंगाना समर्थक वकीलों से उन्हें इस मुद्दे पर विवरण उपलब्ध कराने को कहा।
रामसेतु मुद्दे और टू जी घोटाला मामले में अपनी कानूनी जीत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तेलंगाना मुद्दे पर भी ऐसी ही जीत हासिल की जा सकती है क्योंकि सरकार पृथक राज्य बनाने के अपने वादे से कथित रूप से मुकर गयी।

इस बात पर बल देते हुए छोटे राज्य तेजी से विकास करते हैं, उन्होंने और छोटे राज्योंं के गठन के विचार का समर्थन किया।
उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ परीक्षण कराए हैं और वह दावा करते हैं कि सभी भारतीयों के डीएनए समान हैं, चाहे उनके धर्म क्यों न अलग अलग हों या फिर वे भिन्न भिन्न क्षेत्र के क्यों न हों।

शिक्षा में विचार का विस्थापन

शिक्षा में विचार का विस्थापन


Thursday, 01 March 2012 10:38

शंकर शरण 
जनसत्ता 1 मार्च, 2012: वह मौसम आरंभ हो गया है, जब अनगिनत नए विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों के विज्ञापन अखबारों में आते हैं। उनमें असंख्य प्रकार के पाठ्यक्रमों की सूचना है जिनमें छात्र दाखिला ले सकते हैं। दर्जनों की संख्या में डिप्लोमा, डिग्रियां विज्ञापित हो रही हैं। लेकिन उस लंबी सूची में 'बीए,' 'एमए' लगभग नदारद हैं। यानी कहीं साहित्य, दर्शन, इतिहास, राजनीति, मनोविज्ञान आदि पढ़ाने की व्यवस्था नहीं है। सबमें केवल विविध इंजीनियरिंग, उद्योग, व्यापार, प्रबंधन आदि से जुडेÞ विषय मात्र हैं। ये सब के सब निजी विश्वविद्यालय ही नहीं, उनमें कई राज्य सरकारों द्वारा खोले गए नए विश्वविद्यालय भी हैं। 
इस प्रकार, जिसे समाज अध्ययन (विज्ञान) और मानविकी कहा जाता है, वह नई पीढ़ी के लिए निरर्थक मान लिया गया है। हालांकि पुराने सरकारी विश्वविद्यालयों में ये विषय पाठ्यक्रम में हैं। लेकिन वहां भी इनमें नामांकन बहुत घट गया है। प्राय: पिछडेÞ किस्म के छात्र ही उनमें प्रवेश लेते हैं। पुराने सरकारी विश्वविद्यालयों में जो नामांकन हो भी रहे हैं, उनमें बहुतेरे विद्यार्थियों के लिए कारण दूसरा है। मुख्यत: वह छात्रावास-सुविधा लेकर नौकरी की खातिर होने वाली परीक्षाओं की तैयारी करना भर होता है। वास्तव में दर्शन, साहित्य और सामाजिक अध्ययन के विषय हमारी शिक्षा से लुप्त हो रहे हैं। 
इसका एक कारण स्वयं इन विषयों के कर्ता-धर्ताओं, बडेÞ प्रोफेसरों की दुर्बलता है। कई कारणों से वे अपने विषय की गंभीरता और रोचकता बनाए रखने में विफल रहे। नौकरी में स्थायित्व (चाहे वे निकम्मे ही क्यों न हो जाएं) और नियुक्तियों में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने समाज विज्ञान और मानविकी के प्रोफेसर वर्ग की गुणवत्ता को चौपट करके रख दिया। फलस्वरूप आज अधिकतर प्रोफेसर अपने विषयों में स्कूली शिक्षकों से बेहतर नहीं रह गए हैं। रही-सही कसर इन विषयों पर राजनीतिक विचारधारा के ग्रह ने पूरी कर दी। 
रेडिकल विचारधाराओं ने इन विषयों को अपने राजनीतिक प्रचार का औजार बना लिया। इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र और साहित्य के कई बडेÞ-बडेÞ प्रोफेसर मात्र वामपंथी लफ्फाजों में बदल कर रह गए। इन सब ने समाज अध्ययन विषयों की गरिमा को धूमिल कर डाला। आज कहने को देश में हजारों की संख्या में समाज विज्ञान और साहित्य के प्रोफेसर हैं। पर इनमें सच्चे विद्वान दीपक लेकर खोजने पर मिलेंगे। ऐसे नाकारा प्रोफेसर युवाओं को कैसे आकर्षित कर सकते हैं? समाज अध्ययन विषयों के पराभव का एक अन्य कारण भी है। वह है शिक्षा के प्रति समझ में आई विकृति। 'शिक्षा को रोजगार से जोड़ो' के नारे ने समय के साथ शिक्षा को मात्र रोजगार ट्रेनिंग में बदल दिया। इसीलिए नए विश्वविद्यालयों ने विश्वविद्यालय शब्द का अर्थ ही खो दिया है। 
चारों तरफ विश्वविद्यालय या संस्थान के नाम पर केवल उसी तरह के केंद्र हैं, जहां सिर्फ रोजगार और व्यवसाय के प्रशिक्षण का कार्य चल रहा है। भले वह उपयोगी है, पर शिक्षा का सारा अर्थ और लक्ष्य उसी में सिमट जाना एक ऐतिहासिक दुर्घटना है। क्योंकि वस्तुत: शिक्षा का मूल कथ्य वह रहा है जिसे अब सामाजिक और मानविकी कहा जाता है। विश्वविद्यालय हमेशा बडेÞ ज्ञानियों, बौद्धिकों का केंद्र मात्र होता था। वहां डॉक्टरी, इंजीनियरिंग आदि विषय तो पहले होते भी नहीं थे। इन विषयों का शिक्षण-प्रशिक्षण अन्य स्थानों पर होता था। विश्वविद्यालय का अर्थ था, सर्वोच्च चिंतन केंद्र। वहां समाज के चिंतक, मार्गदर्शक, नीतिकार निखरते थे। यूरोप में भी 'शिक्षित' का अर्थ माना जाता था, जिसने भाषा, साहित्य, विशेषकर शास्त्रीय साहित्य का अध्ययन किया हो। 
केवल लिखने-पढ़ने, हिसाब-किताब करने की योग्यता रखने वाले बडेÞ व्यवसायियों, मैनेजरों या इंजीनियरों, चिकित्सकों आदि को 'शिक्षित' वाला विशेषण कहीं नहीं दिया जाता था। यह भाव वहां अब भी है। शेक्सपियर, दांते, सोल्झेनित्सिन आदि को पढ़ा हुआ व्यक्ति ही उत्तम अर्थ में शिक्षित (वेल-एजुकेटेड) माना जाता है। कोई और नहीं।
इसलिए शिक्षा सदैव विवेक और चिंतन को संस्कारित करने वाली चीज रही है। रोजगार का प्रशिक्षण दूसरी चीज थी, जिसका हर समाज में अलग स्थान था। न केवल भारत, चीन और प्राचीन रोम, बल्कि आॅक्सफर्ड, कैंब्रिज और हार्वर्ड जैसे अपेक्षया नए विश्वविद्यालयों में भी सर्वोच्च ज्ञान, यानी तत्त्व-चिंतन और साहित्य का ही अध्ययन किया जाता था। तक्षशिला, नालंदा, उदंतपुरी, द्रेपुंग से लेकर प्लेटो की अकेडमी और बलोना, काहिरा, बगदाद तक के महान शिक्षा केंद्रों में यही होता था। 
आधुनिक यूरोप के विश्वविद्यालयों में भी तकनीकी विषय शिक्षा के पाठ्यक्रम में बहुत बाद में शामिल हुए। इन्हीं विश्वविद्यालयों की नकल पर आधुनिक युग में हमारे देश में भी विश्वविद्यालय बने। पर उन देशों में आज भी समाज अध्ययन यथावत प्रतिष्ठित हैं। यहां तक कि अमेरिका के विश्व-प्रसिद्ध मेसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में भी दर्शन, साहित्य और भाषा के उत्कृष्ट विभाग हैं, जहां अनेक विद्वान स्थापित हैं। लेकिन हमारे देश में तमाम जमे-जमाए विश्वविद्यालयों में भी इन विभागों की अंतिम सांसें चल रही हैं। यह एक गंभीर चिंता की बात है। 
क्योंकि किसी भी देश का अस्तित्व बने रहने के लिए वहां के लोगों में तीन मानसिक क्षमताएं होना सदैव आवश्यक है। ये हैं- विवेकपूर्ण विचार करने की क्षमता; तुलना और विभेद करने की क्षमता; और अभिव्यक्ति की क्षमता। श्रीअरविंद ने कहा था: 'किसी भी महान देश का बौद्धिक पतन हमेशा   इन्हीं तीन गुणों के क्षरण से आरंभ होता है।' 

इससे समझा जा सकता है कि युवा पीढ़ी में इन क्षमताओं के सतत विकास की कितनी आवश्यकता है। इनका क्षरण तभी होता है जब लोगों का ध्यान मुख्यत: केवल सूचनाएं याद करने और तकनीकी, व्यावसायिक हुनर प्राप्त करने पर चला जाता है। सामाजिक और मानविकी की उपेक्षा करने वालों को श्रीअरविंद की यह चेतावनी याद रखनी चाहिए। 
मनुष्य और समाज के बारे में ज्ञान को ही सामान्यत: मानविकी और समाज विज्ञान कहा जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में इसका अध्ययन सबके लिए आवश्यक है। यह उन बौद्धिक गुणों के विकास में सहायक है, जिन पर लोकतंत्र निर्भर है। ये गुण हैं- सार्वजनिक महत्त्व के मामलों में रुचि लेना,  उन पर युक्तिपूर्वक सोचने की आदत डालना, विश्व का जरूरी ज्ञान देना, और अपने विषय-क्षेत्र से बाहर के विषयों में अपने पूर्वग्रहों को जानना और उन्हें नियंत्रित करना। अगर इन बातों से कोई निर्विकार हो, तो अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। 
लॉर्ड ब्राइस ने कहा था: 'विज्ञान और तकनीक में कुशलता से कोई मनुष्य राजनीति में भी बुद्धिमान नहीं हो जाता। इस मामले में कई बडेÞ वैज्ञानिक भी स्कूली छात्रों से अधिक बुद्धिमान नहीं रहे हैं।' अत: केवल प्रायोगिक विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई वाले वातावरण में अधिकतर युवाओं में उपर्युक्त चारों गुण सूख जाते हैं। तब अच्छे इंजीनियर, डॉक्टर भी सामाजिक मामलों में घातक नारों का समर्थन करने वाले बन जा सकते हैं।
इसलिए मानविकी और सामाजिकी, यानी वास्तविक ज्ञान की उपेक्षा खतरनाक है। भारत के लिए तो श्रीअरविंद की चेतावनी विशेषकर स्मरणीय है, क्योंकि पिछले हजार वर्ष से बाहरी दस्यु, बर्बर और धूर्त आकर यहां बेहतर सभ्यता-संस्कृति वाले लोगों पर अधिकार जमाते रहे हैं। यही कार्ल मार्क्स ने भी लिखा है। ऐसी समस्याओं की विवेचना और जरूरी उपायों का अध्ययन किस प्रयोगशाला में किया जाएगा? अगर न किया गया, जैसा ये नए-नए तकनीकी 'विश्वविद्यालय' दिखा रहे हैं, तो पुन: भारत का पराभव नहीं होगा, इसकी गारंटी कौन करेगा?
याद रहे, सोने की चिड़िया ही लूटी गई थी! यानी, उद्योग, तकनीक, धन-वैभव से परिपूर्ण भारत ही पराधीन हुआ था। किनके हाथों, कैसे, किन स्थितियों में? यही वे प्रश्न हैं, जिन्हें केवल उत्कृष्ट चिंतन, दर्शन और साहित्य ही समझता और हल करता है। इसी ज्ञान पर कोई भी सभ्यता टिकती, सुरक्षित रहती है।
इस पृष्ठभूमि में उस घातक प्रवृत्ति को समझें, जो केवल धन कमाने के प्रशिक्षण को 'शिक्षा' का पर्याय बना रही है। इससे भारत के युवा केवल तकनीकी, मशीनी और कार्यालय चलाने वाले मजदूर, प्रबंधक आदि भर बन सकेंगे। चाहे उन्हें कितनी ही अच्छी आय होती हो, वे देश और समाज के बारे में, यहां तक कि अपने बारे में भी सोचने-विचारने में असमर्थ होंगे। अपने अस्तित्व, जीवन और भूमिका के बारे में वे कुछ ढंग का सोच-विचार नहीं कर सकेंगे। जिन्हें शास्त्रों में ठीक संज्ञा दी गई है- 'मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति'। 
वैसे भी, अगर मशीन, दफ्तर, कारोबार चलाने के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण जरूरी है, तो मानव जीवन और समाज चलाने के लिए कई गुना जटिल शिक्षण की आवश्यकता होती है, जिसमें दर्शन, इतिहास, राजनीति, मनोविज्ञान का ज्ञान अपरिहार्य है। तभी सुयोग्य लोगों में चिंतन-मनन की वह क्षमता विकसित होती है, जिसके बिना स्व-रक्षा तक के लिए नीति-निर्माण असंभव है। इसलिए श्रेष्ठ साहित्य और इतिहास सबके लिए थोड़ा-बहुत पढ़ना आवश्यक है, अलग सामाजिक और मानविकी धारा के रूप में ही नहीं।
महान पुस्तकों के नित्य पाठ से मनुष्य की चेतना, बुद्धि और संस्कार परिष्कृत होते हैं। किसी न किसी उत्कृष्ट साहित्य का दो-चार पृष्ठ भी नित्य पढ़ने की आदत एक ऐसी अनमोल निधि देती है जो अनगिनत रूपों में व्यक्ति के लिए लाभप्रद है। यह ऐसा सत्संग है जिससे सदैव लाभ मिलता है। उससे व्यक्ति में कल्पनाशक्ति, अभिव्यक्ति के लिए सही शब्दों की समझ और भाषा-ज्ञान बढ़ाने के प्रति रुचि सहज बढ़ती जाती है। ये सब व्यक्तित्व के विकास के लिए अनमोल वस्तुएं हैं। मानव जीवन और समाज संबंधी किसी समस्या, परिघटना की व्यवस्थित समझ के लिए ऐसा अध्ययन अत्यंत सहायक होता है। 
पर अभी भारत में शिक्षा के नाम पर जो चलन बढ़ा है, उससे हमारा देश पूरी दुनिया को 'मानव संसाधन' निर्यात करने वाला कारखाना बनता जा रहा है। चाहे उन्हें इंजीनियर, मैनेजर, आइटी प्रोफेशनल, आदि ही क्यों न कहा जाए; वे उच्च वेतन-भोगी श्रमिक मात्र हैं जो अमेरिका, यूरोप, अरब, आॅस्ट्रेलिया जा रहे हैं। केवल वैसे लोग अधिक मात्रा में बनाने के लिए ये सारे रोजगारोन्मुख 'विश्वविद्यालय' खोले जा रहे हैं। मात्र अधिकाधिक धन बनाने की लालसा ने शुद्ध ज्ञान के क्षेत्र को नितांत उपेक्षित कर दिया है। इससे व्यक्ति और समाज, दोनों को जो दूरगामी हानियां हैं, उन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

आपत्तिजनक सामग्री हटाई: गूगल ने कोर्ट को बताया

आपत्तिजनक सामग्री हटाई: गूगल ने कोर्ट को बताया

hursday, 01 March 2012 17:07

नयी दिल्ली एक मार्च (एजेंसी) अमेरिकी सर्च इंजन फर्म गूगल ने आज दिल्ली की एक अदालत को बताया कि वह अपनी वेबसाइट से पहले ही कथित आपत्तिजनक सामग्री को हटा चुकी है क्योंकि एक सेवा प्रदाता के तौर पर वह अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ है।


गूगल ने प्रशासनिक सिविल जज प्रवीण सिंह के समक्ष दाखिल हलफनामे में इस आरोप से इनकार किया कि उसने भारतीय संस्कृति को बुरे नजरिये से पेश किया।

कंपनी ने बयान में कहा कि गूगल सेवा प्रदाता के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी संबंधित पक्षों के ''अधिकार व हितों'' की रक्षा हो, कंपनी के पास एक प्रणाली है।
गूगल ने कहा कि उसकी भारतीय अनुषंगी गूगल इंडिया द्वारा इस मामले को मूल कंपनी के संज्ञान में लाए जाने के बाद कथित आपत्तिजनक सामग्री वेबसाइट से हटा दी गई।

ट्रैफिक नियम तोड़ने पर अब लगेगा पांच गुना जुर्माना

ट्रैफिक नियम तोड़ने पर अब लगेगा पांच गुना जुर्माना

Thursday, 01 March 2012 17:04

नयी दिल्ली, एक मार्च (एजेंसी) ट्रैफिक नियमों को तोड़ने पर अब लगेगा पांच गुना जुर्माना लगेगा।

सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दे दी है। यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को अब इस संशोधन के बाद पांच गुना जुर्माना अदा करना होगा।

इसके अलावा सड़क हादसों से प्रभावितों के लिये मुआवजा बढ़ाने के प्रस्ताव को भी मंजूर किया गया है। 
एक प्रस्तावित संशोधन के तहत दुर्घटना में किसी की मृत्यु होने पर उसके परिजनों को दी जाने वाली मुआवजा राशि को चार गुना बढ़ाकर एक लाख रुपये किया गया है। वहीं 'हिट एंड रन' के मामले में गंभीर रूप से घायलों को 50,000 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। 
इस बदलावों को मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन के जरिये लागू किया जाएगा। संसद के आगामी सत्र में इसे पेश किया जा सकता है। 
एक अधिकारी ने बताया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की आज हुई बैठक में अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी। इसके तहत शराब पीकर गाड़ी चलाने और यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर अधिक कड़ी सजा का प्रावधान है। 
एक सूत्र ने कहा, ''इन संशोधनों का मतलब यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों से कड़ाई से निपटना है। बार-बार उल्लंघन पर न केवल ऊंचा जुर्माना अदा करना होगा, बल्कि उस व्यक्ति को जेल भी भेजा जा सकेगा।'' 
शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों पर 2,000 से 10,000 रुपये का जुर्माना और छह माह से चार साल की सजा का प्रावधान होगा। अधिकारी ने बताया कि यदि 100 एमएल रक्त में अल्कोहल की मात्रा 30 एमजी होगी, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा। 

अधिकारी ने कहा कि यदि 100 एमएल रक्त में अल्कोहल की मात्रा 30 से 60 एमजी होगी, तो ऐसे मामलों में 2,000 रुपये जुर्माने या छह माह की सजा का प्रावधान है। वहीं यदि 100 एमएल रक्त में शराब की मात्रा 60 से 150 एमजी होगी, तो एक साल की सजा या 4,000 रुपये का जुर्माना लगेगा। यदि तीन साल में इसी तरह का उल्लंघन दोहराया जाता है, तो जुर्माना राशि बढ़कर 8,000 रुपये या सजा तीन साल की हो जाएगी। 
इसके अलावा ऐसे लोग जिनके 100 एमएल रक्त में शराब की मात्रा 150 एमजी से अधिक होगी उन पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगेगा या फिर उन्हें दो साल की जेल होगी। तीन साल में इसी तरह के उल्लंघन को दोहराने पर जुर्माना राशि 10,000 रुपये या सजा चार साल की हो जाएगी। इसके लिए उसका लाइसेंस भी रद्द कर दिया जाएगा। 

यदि कोई व्यक्ति नशीली दवा का सेवन कर वाहन चलाने का दोषी पाया जाता है, तो उसे छह माह की सजा होगी या फिर 5,000 रुपये का जुर्माना। बार-बार के इस तरह के उल्लंघन पर 10,000 रुपये के जुर्माने के साथ छह माह की सजा के अलावा लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। 
हालांकि, सरकार ने नशीली पदार्थ के सेवन के साथ ड्राइविंग के लिए जुर्माना राशि बढ़ा दी है, लेकिन इसके लिए सजा को दो साल से घटाकर छह माह कर दिया गया है।  
इसी तरह लालबत्ती पार करने पर जुर्माना राशि को 100 रुपये से बढ़ाकर 100 से 500 रुपये करने का प्रस्ताव है। बाद में इसके लिए जुर्माना राशि को 300 से बढ़ाकर 300 से 1,500 रुपये करने का प्रस्ताव है। इसी तरह निर्धारित सीमा से अधिक की गति पर वाहन चलाने के लिए जुर्माना राशि को पहली गलती पर 400 से बढ़ाकर 400 से 1,000 रुपये और गलती दोहराने पर 1,000 से 2,000-5,000 रुपये करने का प्रस्ताव है।  
दूसरी बार खतरनाक तरीके से गाड़ी दौड़ाने पर जुर्माना राशि 2,000 से 5,000 रुपये होगी या फिर दो साल की जेल की सजा होगी। हालांकि पहली गलती पर छह माह की सजा या 1,000 रुपये के जुर्माने के प्रावधान में बदलाव नहीं किया गया है। 
ड्राइविंग करते वक्त मोबाइल फोन पर बात करने पर पहली बार 500 रुपया का जुर्माना लगेगा। बाद में इसी तरह के उल्लंघन पर जुर्माना राशि 2,000 से 5,000 रुपये तक होगी। 
इसमें कहा गया है कि मोबाइल फोन से सिर्फ बात करने ही नहीं संदेश या पिक्चर भेजने पर भी जुर्माना लगेगा। इसका मतलब है कि मोबाइल से बात करने ही नहीं बल्कि संदेश भेजने या हैंड फ्री उपकरण का इस्तेमाल भी यातायात नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। 
इसमें कहा गया है कि विभिन्न न्यायाधिकरणों और अदालतों में थर्ड पार्टी बीमा दावों के 14 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। ऐसे में थर्ड पार्टी बीमा मामलों में सड़क दुर्घटनाआें के लिए मुआवजे की गणना को भी तर्कसंगत बनाए जाने का प्रस्ताव है।

पुलिसकर्मी हमला मामलाः ममता बनर्जी का भतीजा न्यायिक हिरासत में

पुलिसकर्मी हमला मामलाः ममता बनर्जी का भतीजा न्यायिक हिरासत में

Thursday, 01 March 2012 19:13

कोलकाता, एक मार्च :भाषा: कोलकाता की एक अदालत ने पुलिसकर्मी पर हमला करने के आरोप में आज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे आकाश बनर्जी और उसके तीन सहयोगियों को एक दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।


अलीपुर अदालत की द्वितीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुपर्णा ने आकाश और उसके सहयोगियों- मोहम्मद सरमुद्दीन तथा अमित मिश्रा के जमानत अनुरोध को खारिज कर दिया और उन्हें हिरासत में भेज दिया।
अभियोजन पक्ष ने आरोपियों के जमानत के अनुरोध का विरोध किया   और उन्हें हिरासत में भेजने का आग्रह किया। मामले की अगली सुनवाई कल होगी।

दक्षिण कोलकाता के किदरपुर में एक पुलिसकर्मी पर हमले के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर चारों गिरफ्तार किए गए थे।
इसी बीच राज्यपाल एम के नारायणन ने कहा, ह्यह्यड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हमले की ऐसी घटनाएं नयी नहीं है। मैं सोचता हूं कि पुलिस के लिए यह समस्या है। लेकिन आकाश को पुलिसकर्मी पर हमला नहीं करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं को सनसनीखेज बनाने से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी।

 

पांच लाख चाहिए तो सपा को सत्ता में लाओः मुलायम

पांच लाख चाहिए तो सपा को सत्ता में लाओः मुलायम

Thursday, 01 March 2012 19:03

शाहजहांपुर, एक मार्च (एजेंसी) यूपी में सपा अगर सत्ता में आती है तो हादस से मौत पर पर 5 लाख की सहायता तुरन्त दी जायेगी। 
यादव ने आज यहां एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी सरकार कैंसर, लीवर ट्रांसप्लांट, किडनी और दिल की बीमारियों में गरीबों को मुफ्त इलाज उपलब्ध करायेगी।
सपा मुखिया ने पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में किये गये वादों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों को तीन सुनिश्चित प्रोन्नति दी जायेगी। किसानों का 50 हजार तक का कृषि कर्ज माफ किया जायेगा और सहकारी समितियों से उन्हें चार प्रतिशत ब्याज दर पर कृषि कर्ज उपलब्ध कराया जायेगा।


उन्होंने कहा कि पिछड़े वर्ग की 20 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कर दिया जायेगा और मुसलमानों को आरक्षण दिया जायेगा।
प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सबसे बड़ा 'भू माफिया' करार देते हुए यादव ने आरोप लगाया कि उन्होंने गरीब किसानों की अरबों रुपये की जमीन पर कब्जा किया और सरकारी जमीनों पर कब्जा करके हजारों करोड़ के सरकारी खर्च से पार्क, स्मारक बनवाये और यहां तक कि अपनी मूर्तियां लगवाई। 
सपा मुखिया ने आरोप लगाया कि मायावती राज में सपा कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फंसाया गया है और वादा किया कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर सारे फर्जी मुकदमें वापस ले लिये जायेंगे।

क्या सहवाग ने खुद की थी आराम देने की मांग ?

क्या सहवाग ने खुद की थी आराम देने की मांग ?

Thursday, 01 March 2012 19:14

मुंबई, एक मार्च (एजेंसी) एक मीडिया रिपोर्ट ने दावा किया कि सहवाग ने बीसीसीआई से एशिया कप में शामिल ना करने का अनुरोध किया था। 
मिडडे अखबार ने सहवाग के हवाले से कहा,'' मेरी पीठ में दर्द है । मुझे आराम की जरूरत है । मैने फिटनेस के मामले में कभी अपने टीम प्रबंधन को अंधेरे में नहीं रखा । मेरी चोट सबके सामने है ।''
मुख्य चयनकर्ता कृष्णामाचारी श्रीकांत ने कल कहा था कि सहवाग को फिटनेस कारणों से बाहर रखा गया है । जब एक रिपोर्टर ने इस बारे में कुछ सवाल पूछे तो श्रीकांत का जवाब था ' चुप रहो ।'
यदि सहवाग ने आराम मांगा था तो श्रीकांत मीडिया को इसके बारे में

बता सकते थे । उन्होंने कल रात को एक टीवी चैनल से कहा कि सहवाग के कंधे में चोट है जबकि अखबार ने सहवाग के हवाले से कहा कि उसकी पीठ में दर्द है ।
सहवाग ने कहा ,'' मैने कभी अपनी चोट या फिटनेस समस्या नहीं छिपाई है । मेरे कंधे का आपरेशन भी तत्कालीन कोच गैरी कर्स्टन और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से मशविरे के बाद ही तय किया गया।''
अखबार ने दावा किया कि धोनी और कोच डंकन फ्लेचर ने चयनकर्ताओं को बताया कि आस्ट्रेलिया दौर के बाद सहवाग आराम चाहते हैं । बाद में श्रीकांत ने सहवाग को फोन किया तो सहवाग ने कहा कि उन्हें आराम चाहिये लेकिन चयनकर्ता चाहेंगे तो वह बांग्लादेश खेलने जा सकते हैं ।