Tuesday, July 6, 2021

शहीदेआजम भगत सिंह की मां जिन पेड़ों के नीचे बैठी थी,हमारे वे पेड़ अब नहीं हैं।पलाश विश्वास

 पेड़ों की छांव में शरण 

मधुमती की तरह बहती थी मेरी दादी

वे दोनों आम के पेड़ नहीं रहे,जिनके नीचे बैठी थी शहीदेआजम भगत सिंह की मां और न जाने कितने खास लोग

पलाश विश्वास


करीब चार दशक के बाद आम के पेड़ों की छांव में शरण ली है। ये पेड़ मेरी ताई ने लगाए थे। ताईजी का निधन मेरे कोलकाता में जाने के सालभर के अंदर 1992 में हो गया था। चालीस साल के प्रवासी पत्रकार जीवन ने मुझे पेड़ों की छांव से बाहर कर दिया। बिना बिजली के जंगल के आदिम गन्ध और खेतों के कीचड़ पानी, हिमालय की गोद से बेदखल हो गया मैँ।जैसे हमारे लोग भारत विभाजन की त्रासदी में अपनी नदियों,खेतों,बगीचों और गांव से बेदखल हो गए थे।


बेदखली का सिलसिला कभी रुकता नहीं है। विस्थापन ही सफरनामा है ज़िन्दगी का।


मेरी दादी शांतिदेवी जैशोर जिले के नडाल के कुमोर डांगा गांव से तीन बेटों अनिल,पुलिन,सुधीर,बेटी सरला और मेरी ताई हेमलता,मां के साथ बसंतीपुर आयी थी। चाचा सुधीर की शादी नेताजीनगर की उषा के साथ हुई थी।


कुमोर डांगा पूर्वी बंगाल की बड़ी नदी मधुमती के किनारे बसा था।इस पार नडाल था तो नदी के उस पार् फरीदपुर का गोपालगंज का ओडाकांदी। हरिचंद गुरुचंद ठाकुर का घर।ताईजी इसी परिवार की बेटी थी। सविता जी का मायका भी ओडाकांदी में ही था।


हमारी दादी ने बहुत संघर्ष किये।दादाजी उमेश जी का निधन तब हुआ,जब वे कक्षा दो में पढ़ते थे। शरीको ने जमीन जायदाद हड़प ली।वे विभाजन के बाद बंगाल में ही बस गए। हमारे दादा चार भी थे जो जमींदारों के खिलाफ किसानों की लड़ाई के योद्धा थे।इस लड़ाई में घर की औरतें भी शामिल थीं।हरिचाँद गुरुचन्द की विरासत के साथ यह परिवार न जाने कहाँ कहाँ से गुजरकर ट्रैन में आकर जंगल को आबाद करके बस गया और दूसरों को भी बसाया।


पिताजी खाली हाथ,नंगे बदन नैनीताल की कड़ाके की सर्दी में विस्थापन और बेदखली के खिलाफ लड़ते रहे जीवनभर और हम वतानुकूलित महत्वाकांक्षाओं की बर्फीली दृवरों में कैद होते चले गए। मौसम और जलवायु के मामूली हेर फेर में हमारी जान निकल जाती है जबकि रीढ़ में कैंसर होने के बावजूद पिताजी की रीढ़ कभी झुकी नहीं।अपने मोर्चे पर आखिरी सांस तक लामबंद थे वे। हम तो भगोड़ा ही निकले।


पिताजी विभाजन से पहले बारासात के दत्त पुकुर में एक सिनेमाहाल में काम करते थे। ताउजी और चाचाजी पुलिस में थे। विभाजन के बाद दत्तपुकुर में परिवार एक जुट हुआ।फिर रानाघाट और कटक के चरबेटिया कैम्प होकर वे नैनिताल आ गए। बंगाल में शरणार्थी आंदोलन की वजह से वे ओडिशा के चरबेटिया कैम्प भेजे गए।वहां भी उनका आंदोलन नहीं थमा तो 1952 में तराई के जंगल में फेंक दिया।उन्होंने अपने जांबाज साथियों की मदद से इस जंगल को आबाद किया। 1954 और 1956 में शरणार्थी आंदोलनों का नेतृत्व किया। 1958 में ढिमरी ब्लॉक किसान विद्रोह के भी नेता थे।पुलिस ने पीटकर हाथ तोड़ दिया। घर की कुर्की जब्ती हुई। जेल गए। दस साल तक उनपर मुकदमा चला।


पूर्वी पाकिसयं जाकर भी वे भाषा आंदोलन में जेल गए,जहां से उन्हें छुड़ाकर लाये अमृत बाजार पत्रिका के सम्पादक तुषार कांति घोष।


देशभर के विस्थापितों पीड़ितों के लिए इन्हीं पेड़ों की छांव से ऊर्जा लेकर निकलते थे पुलिन बाबू।हमारी मां बसंती देवी,दादी शांति देवी और बुआ सरला देवी ने इन्हीं पेड़ों से एक दुर्जेय किले का निर्माण किया था। हमारी ताई हेमलता घर के मामले में सारे फैसले करती थीं।


हमारी दादी अनपढ़ थीं।लेकिन उन्होंने घर में सैकड़ो फलदार और औषधियों के पेड़ लगाए। उन्होंने नल पर कभी नहीं नहाया। बगल में एक। छोटी सी नदी थी,जो उनके लिए मधुमती थी।इसी नदी से एकात्म होकर 1970 तक वे जीती रहीं। मधुमती की तरह निर्बाध बहती रही। 


हमारे घर की पहचान घर के केंद्र में दो आम के पेड़ थे। जहां चौपाल लगती थी।जिसके चबूतरे  पर हम पढ़ते थे।पढ़ते पढ़ते सो जाते थे।पिताजी बाहर से आकर घर के अंदर ले जाते थे।


उन सैकड़ों पेड़ों में अब बीस भी नहीं बचे।

वे दोनों आम के पेड़ भी नहीं बचे,जिसके नीचे आकर बैठी थी शहीदे आजम भगत सिंह की मां 1969 में।


 कितने ही लोग एनडी तिवारी,श्याम लाल वर्मा,कैसी पन्त, क्रान्तिकारी मन्मथ गुप्त, बंगाल के कामरेड अशोक सेन और पिताजी के आंदोलनों के तमाम साथी,इस गांव और तराई को बसाने वाले लोगों की स्मृति से जुड़े दोनों पेड़ पक्के मकान की भेंट हो गए।बचपन की दुपहरी और शाम की सारी यादें फिर दफन हो गईं।


आज बिजली न आने की वजह से घर में तजिक न पाने की वजह से इन पेड़ों की छांव में लगता है कि बचपन लौट आया है। पड़ोस के दो बच्चे साथ हैं जिनके जरिये फिर बचपन की यात्रा में वापसी हो गयी। रोहित और दिशा इनके नाम हैं।

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