Thursday, July 22, 2021

पुलिनबाबू,कुर्बानी और बांस।पलाश विश्वास

 हमारे घर से अंत्येष्टि के लिए बांस देते रहने को कहा था पुलिनबाबू ने

पलाश विश्वास

आज बकरीद है।कुर्बानी का त्योहार।गरीबों मुफ़लिसों भूखों की मदद के लिए कुर्बानी। 


मेरे पिता ने ज़िन्दगी भर इन्ही लोगों के लिए कुर्बानी दी। पहनने को धोती और पीने के लिए चाय के अलावा उन्हें कुछ नहीं चाहिए था। जनता के हक हकूक की लड़ाई के लिए जमीन बेच दी।देश के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं,राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों,मुख्यमंत्रियों, केंद्र राज्य सरकारों के प्रशासनिक अधिकारियों से निरन्तर सम्वाद में कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा। जायदाद नहीं जोड़ी।


मृत्यु के बाद किसीकी अंत्येष्टि में बांस की गांव देहात में जरूरत होती है।इसलिए पिताजी ने बांस की झड़ी लगाई घर में और कह दिया कि किसी की भी मृत्यु हो तो हमारे घर से बांस दे दिया जाए।


 यह झाड़ी हमारे तालाब से सटा है जो महज छह साल की उम्र में दिवंगत हमारे भतीजे विप्लव की याद ।इन खोदा गया।


ओडिशा से नैनिताल पहुंचने के बाद 1951 से 1954 तक तराई के गहन अरण्य में अपने साथियों के साथ बाघ का चारा बनने से बचते हुए तराई को आबाद किया।


 1954,1956 और 1958 में किसानों और विस्थापित विभाजनपीडितों के आंदोलनों का नेतृत्व किया।


उसके बाद बसंतीपुर गांव बस जाने के बाद गांव प्रधान मंदार बाबू,सेक्रेटरी अतुल शील और कैशियर शिशुवर मण्डल और गांव के अपने साथियों के हवाले गांव कर दिया और तब से शुरू हो गई उनकी यायावरी।


सरहद के आरपार गरीबों,मुफ़लिसों,विस्थापितों की लड़ाई,पूर्वी बंगाल में भाषा आंदोलन, असम के दंगों से लेकर 2001 में  मृत्यु से पहले तक देशभर में हुए तमाम

 दंगों में पीड़ितों को मदद और राहत देने का सिलसिला आखिरी सांस तक जारी रहा। 


हिन्दू मुस्लिम,जाति, धर्म, भाषा,नस्ल का भेद नहीं किया कभी।सबके साथ थे।सबके लिए लड़े।


वे शरणार्थियों के ऐसे नेता थे,जो दंगों के लिए या भारत विभाजन के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार नहीं मानते थे। वे हरिचाँद गुरुचांद, जोगेन मण्डल, बाबा साहब अम्बेदकर, ज्योतिबा फुले और महात्मा गौतम बुद्ध के अनुयायी थे। हालांकि भारत विभाजन पर लिखा गया सारा साहित्य, गुरुदत्त के उपन्यासों और संघ परिवार के दस्तावेजों का उन्होंने न सिर्फ खुद अध्धयन किया,बल्कि मुझे भी पढ़ने को दिया। 


सच उन्होंने भोगा, जिया। इसलिए उनके दिल में नफरत नहीं थी। जबकि हमारे लोग अपनी दुर्दशा के लिए आज भी कांग्रेस, मुस्लिम लीग , जोगेन मण्डल और मुसलमानों को जिम्मेदार मानते हैं और हमारे सारे सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से लेकर दो सौ साल की विरासत वाले मतुआ आंदोलन का राजनीतिकरण हो गया है।सबके सब नफरत की सियासत में शरीक हैं।


पुलिनबाबू के वंशजों की आस्था सत्य, प्रेम , अहिंसा, समता और न्याय में है। हम उन्हीं के मूल्यों को लेकर चलते हैं। नफरत के लहलहाते माहौल में इसकी कीमत अदा करनी होती है।इसका अफसोस नहीं है। कोई हमसे रिश्ता जोड़ना नहीं चाहता। लोग रिश्ता तोड़ देते हैं।हमें इसका भी अफसोस नहीं है।


गम्भीर कुपोषण के के कारण 70 के दशक में टीबी के मरीज बन गए।इलाज चलता रहा। यायावरी नहीं रुकी। फिर 2001 में पता चला कि टीबी से रीढ़ की हड्डी में कैंसर हो गया। हमने भरसक कोशिश की लेकिन हमें पता भी नहीं होता था कि वे कब कहाँ देश विदेश के किस हिस्से में किनकी लड़ाई लड़ रहे हैं।


 डॉक्टरों ने भी हर मान ली। 12 जून को उन्होंने अंतिम सांस ली 2001 में।


उनकी जैसी कुर्बानी हम नहीं कर सकते।

वे दिनेशपुर में एक बड़ा अस्पताल चाहते थे। यह उनकी आखिरी इच्छा थी। हमें जनता का समर्थन नही है क्योंकि हम राजनीति नहीं करते।


उनकी कुर्बानी बेकार होते देखते रहने के अलावा हम क्या कर सकते हैं?


उन्हीं की जमीन पर आखिरी सांस लें,इसके सिवाय हमारी दूसरी ख्वाहिश क्या हो सकती है?


कम से कम यह बांस की झाड़ी है ,जिसके जरिये वे हर मरने वाले के साथ नए सिरे से जीते हैं।

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