Tuesday, August 25, 2015

या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल! ज्वालामुखियों के हर मुहाने पर धर दिया कंडोम! आग है भी,और आग नहीं भी है! मुहब्बत है भी,और नहीं भी है मुहब्बत! इस कायनात में सबकुछ है दोस्तों, बस किसी के सीने में कोई आग नहीं है! या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल! Rather we should understand the phenomenon of blind religious nationalism! पलाश विश्वास


या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल!


ज्वालामुखियों के हर मुहाने पर धर दिया कंडोम!

आग है भी,और आग नहीं भी है!

मुहब्बत है भी,और नहीं भी है मुहब्बत!


इस कायनात में सबकुछ है दोस्तों,

बस किसी के सीने में कोई आग नहीं है!

या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल!

Rather we should understand the phenomenon of blind religious nationalism!


पलाश विश्वास

Rather we should understand the phenomenon of blind religious nationalism!

http://www.hastakshep.com/english/opinion/2015/08/22/phenomenon-of-blind-religious-nationalism

या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल!


हर पौध जो तोप का शक्ल अख्तियार करने लगी थी कभी

या बंदूक का कद हासिल करने लगी थी कभी,

जड़ों से कटी हुई है सिरे से,अंकुर तो है

और सींचा भी जिगर के खून से!


हाय,हर पौध सूखने लगी है!


ज्वालामुखियों के हर मुहाने पर धर दिया कंडोम!

आग है भी,और आग नहीं भी है!

मुहब्बत है भी,और नहीं भी है मुहब्बत!


जड़ें न हों तो जिंदगी भी क्या!

जड़ें हों और खींचे भी ना अपनी तरफ तो भी जिंदगी क्या!


जड़ें हों और खींचे भी जड़ें,फिर उन जड़ों को अपने कलेजे के पानी से सींचे ना तो आखेर वह जिंदगी दो कौड़ी का क्या!


अपने पुरखों के हज्जारों सालों का अधूरा हिसाब पूरा करने का जिगर न हो,जोखिम न हो,सबकुछ दांव पर लगाकर सबकुछ गवां देने का जैसा वजूद न हुआ,दिलोदिमाग न हुआ तो भी जिंदगी क्या!


कद से इतने बौने हो गये कि कभी हिम्मत न हुई

कि किसी से सरेआम कह दें कि मुहब्बत है!


फिर भी ग्लेशियर पिघलते हैं!

फिरभी अनबंधी नदियां बाढ़ में उमड़ती हैं!

फिरभी मेरा मुल्क डूब में तब्दील है!


आसमान धुआं धुआं है!

धुआं धुआं जमीन है!

समुंदर भी धुँआ धुआं है!


आग क्या खाक है,हम चिनगारियों के मोहताज!


घुप्प अंधियारा है कटकटेला

कारोबार तेज बत्तीवाला!


चिराग हाथ में लिये भटकता रहा बाजार

कि कहीं किसी भूमिगत आग से हो जाये वास्ता!


जिंदगी हाथों से फिसलती रही रेत सी!

जिसे छू लिया,छुईमुई निकला!


इस कायनात में सबकुछ है दोस्तों,

बस किसी के सीने में कोई आग नहीं है!

या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल!


कल रात थोड़ा आरामतलब हो गये।जल्दी सो गये दफ्तर से घर पहुंचते न पहुंचते,लौटती गाड़ी में नींद बहुत आ गयी थी।ज्यादा अब सोने की आदत है नहीं कि नींद भर सोने वाली जवानी हाथ से खिसक चुकी है और हम भी तनिको खिसके खिसके से हैं।


सुबह नींद खुली तो फिर पीसी के हवाले।सविता बाबू फिर एंटी एलर्जी पर है।नींद में ही है।नींद में ही मुखातिब हो गयी।

बोली, नाश्ते के लिए कुछ ले आओ।


मुंह उठाकर बाजार उठाकर बाजार चला गया और रोटियां उठा लाया।बुरा भी उतना नहीं है कि मजबूरी हो तो बाजार के हवाले रोटी की खोज भी करनी चाहिए।

बाजार के हवाले बाकी जिंदगी तो खरीदी नहीं जा सकती वापस।


गरम गरम जलेबी तल रही थी और ललचा ही गयी जीभ जितनी,उससे कहीं ज्यादा अपनी जान।


कि गरम जलेबियों के साथ बचपन भी दिख रहा था तला हुआ। तमाम मेले ठेले हाट खोये हुए दोस्त तमाम यकबयक सामने खड़े हो गये।मुंह फेरना आसां भी न था।जलेबी न थी,मुहब्बतें थीं।


बल्क गर मुमकिन हो तो सुबह नाश्ता जलेबी से ही होना चाहिए।नामुमकिन है चूंकि दुश्मन डायबिटीज का पहरा है।


सत्ता भी कोई मधुमेह से कम नहीं है।

जम्हूरियत की कवायद कम हो गयी तो समझें मौत।


बहरहाल बजरिये जलिबियां बचपन में दाखिला भी अजब गजब है जैसे फिल्म पिकू का किस्सा है कि मौत सबसे हसीं बचपन में वापसी का वहीं किस्सा है।बचपन दरअसल अमन चैन है। बाकी किस्सा हाजमे का है,निजात पाने की जुगात जद्दोजहद है।


कल मैंने सविता बाबू से सच ही कहा था- तुम अभी उतनी ही खूबसूरत हो जितनी की शादी से पहले हुआ करती थी!


उन्हें यकीन न हुआ।समझी, नियत खराब है।


कल मैंने सविता बाबू से सच ही कहा था- तुम अभी उतनी ही जवान हो जितनी की शादी से पहले हुआ करती थी!

उन्हें यकीन न हुआ।समझी, नियत खराब है।


यकीन मानो दोस्तों,मुहब्बत की बूढ़ी होती नहीं है।

न मुहब्बत की खूबसूरती किन्हीं बहारों की मोहताज होती है।


यकीन मानो दोस्तों,पतझड़ में सबसे ज्यादा खिलखिलाती है जो,

यकीन मानो दोस्तों,तन्हाई में संग संग परछाई की तरह जो, हमसफर है हमेशा हमेशा के लिए,वह हर सूरत में सर से पांव तक मुहब्बत मुकम्मल है।


हम चिराग लेकर खोज रहे होते हैं मुहब्बत और सर्पदंश बनकर हमारे साथ,हमबिस्तर मुहब्बत और हमें अता पता भी नहीं होता कि

कितने बेअदब,बदतमीज हैं हम कि मुहब्बत से कभी दुआ सलाम करने की जहमत भी नहीं उठाते हम।


हमारी नस्ल इतनी नपुंसक होने लगी है इन दिनों कि मुहब्बत के लिए जंग तो क्या खाक लड़ लें कोई,मामूली सी मामूली जोखिम उठाने के लिए भी तैयार नहीं है कोई।नफरतों के हवाले हैं हम।


मसलन कि लब आजाद है इस कायनात में हर कहीं।

मसलन कि मुहब्बत लबालब है इस कायनात में हर कहीं।


किसी पहरे में होती नहीं कैद आग।

न खाक बनकर जीती है कोई आग।

दोस्तों,आग कहीं भी नहीं है,नहीं है आग।


न हमारे लब कहीं हरकत में हैं।

न हरकत में है दिलो दिमाग।

या रब,खेत हुआ वीराना,मुल्क बेदखल!


ज्वालामुखियों के हर मुहाने पर धर दिया कंडोम!

आग है भी,और आग नहीं भी है!

मुहब्बत है भी,और नहीं भी है मुहब्बत!


इस कायनात में सबकुछ है दोस्तों,

बस किसी के सीने में कोई आग नहीं है!


कल बीबीसी पर किसी काली लड़की से कोई इंटरव्यू चल रहा था।

मैने सविता से कहा,देखो कितनी खूबसूरती है।

मैंने कहा,काला से खूबसूरत कोई नहीं है।


मैंने कहा कि बहुत बुरा हुआ कि मैं किसी काली लड़की से कह नहीं सका कि हमें आपसे मुहब्बत है,मुहब्बत है।


नस्ली दहशतगर्दी में दफन हो गयी हमारी मुहब्बत।


सविता ने कहा,रोका किसने था।जिंदगीभर आदिवासियों के बीच रहे हो।जिंदगीभर आदिवासी की तरह जी रहे हो।


सच यही है कि में काला भी हूं।

सच यही है कि मैं दरअसल आदिवासी हूं।

इस सच का सामना किया नहीं हमने कभी।

हम आदिवासी हैं,यह साबित होने में जिंदगी खप गयी।


बंगाल में हूं,उस बंगाल में हूं चोथाई सदी से,जहां से उखाड़ दिये गये हमारे लोग।हमारे पुरखे तमाम।जिस बंगाल से,बंगाल के इतिहास भूगोल से बेदखल हुए हमारे लोग,हमारे पुरखे,सात दशक पूरे।


हमने प्रभाष जोशी से शायद सच नहीं कहा था कि मैंने कहा था कि मैं कोलकाता आना इसलिए चाहता हूं कि हिसाब बराबर करने हैं।


हिसाब बराबर करने के लिए कलेजा चाहिए।वह कलेजा न हुआ।

हिसाब बराबर करने के लिए जोखिम उठाने की हिम्मत जरुरी बा।


हिसाब बराबर करने के लिए जोड़,घटाव,गुणा भाग,अंकगणित,बीज गणित,त्रिकोणमिति,रेखा गणित, सांख्यिकी से लेकर अणु परमाणु और क्वांटम,गति,त्वरा सबकुछ बाराबर होना चाहिए।किसी गलती की गुंजाइश कहीं नहीं है।न गणित में और न जिंदगी में।


अपना मिशन समझे बिना जिंदगी कमीशन हो गयी।


सियासत में नहीं हूं दोस्तों और न मुझे आपका कोई वोट चाहिए कोई चुनाव जीतने के लिए।सियासती तौर पर हम दुरुस्त हो न हो,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।


काला रंग में वह ताकत है तो सारे रंगों को आत्मसात कर लेता है।उस काले रंग की बेमिसाल ताकत में हमें यकीन न हुआ।


हम आदिवासियों से हमेशा कहते रहे कि हम आदिवासी हैं कि हम कभी जान ही नहीं रहे थे कि सचमुचो ,हम आदिवासी ही हैं।


ससुरा गिराबल्लभ गिर्दा की पुण्यतिथि भी गुजर गयी।

उस की तो ऐसी की तैसी!

प्यारे गिराबल्लभ तेरी तो ऐसी की तैसी!


जो वजूद हो मुकम्मल अपना ,उसे क्या भूलें और क्या याद करें!

ढाका में इब्ने गुलाम समाद का भला हो।

ढाका के इब्ने गुलाम समाद की शुक्रिया।


हम जो अपनी जड़ों को खोज रहे थे।कटकटेला अंधियारे में टटोल रहे थे अपनी माटी की महक बहक दहक,लालटेन बनकर बारिश की तरह हिमपात बन गये वे यकबयक।


वह आलेख पढ़ने के बाद,उनके पुरातात्विक नृतात्विक सबूतों को देखने के बाद हमें अपने पर आहिस्ते आहिस्ते यकीन भी होने लगा है कि हम जो अबतक बक रहे थे,लिख रहे थे हम,वह सच है सरहदों के आर पार।


हमने यह आलेख हस्तक्षेप पर अंग्रेजी टिप्पणी के साथ छाप भी दिया है और तमाम ब्लागों पर टांग भी दिया है,गौर फरमायेंः



Rather we should understand the phenomenon of blind religious nationalism!

http://www.hastakshep.com/english/opinion/2015/08/22/phenomenon-of-blind-religious-nationalism




आनंद तेलतुंबड़े बहुत सही फरमाते हैं कि पहचान की सियासत सत्ता का सबसे बड़ा हथियार है गुलामों के सफाये की खातिर।

किसी की पहचान मिटाकर उसकी हैसियत मिटाना ही सियासत है।


आरक्षण पर लिखे आनंद के ताजा आलेख पढ़ने के लिए इतिहास भूगोल अर्थशास्त्र और विज्ञान को भी पढ़ना जरुरी है कि हम कहां थे,जड़ें हमारी कहां थीं और हम कहां चले आये।


आनंद का यह ताजा आलेख साझा करने में देरी होगी क्योंकि हम पहले इसे प्रिंट में छपा देखना चाहते हैं ताकि लोग पहले पढ़लें,समझ लें और फिर हम  बहस करें।


हमें या आनंद को समझने के लिए ढाका के इब्ने गुलाम समाद को पढ़ना भी जरुरी होता है।


डिदजिटल इंडिया में अब पढ़ने लिखने सीखने का दस्तूर नहीं है।

गुगल सर्च करो तोरेडीमेड ज्ञान मिल जाता है जो कि गोपनीयता की शर्त में जकड़ी सूचना और सत्ता वर्ग का सच है।


जनता का सच किसी सर्च इंजन के बूते नहीं है।

न जनता का सच बोलने वाला कोई मीडिया है।


संपादक इन दिनों या मैनेजर है या कैडर है और इनसे भी बुरा वो है जो खालिस क्राइम रिपोर्टर है।


वारदातों का आंखों देखा हाल है मीडिया।

या मीडिया दहशतगर्दों का बयां है।


नाबालिग बच्चों को पेशे में धकेल दिया जाता है,जिनके अब ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट बनने की कोई दरकार नहीं है।


न कुर्सी से बड़ा होता है इंसान।

न प्रतिष्ठा और पुरस्कार कोई चाबी है कि हद दर्जे के बेईमान का कद घूमा घूमाकर बड़ा कर दिया जाता।


इंसानित की तवारीख में किसी मजहब में कोई हत्यारा खुदा नहीं हुआ है और हम वे काफिर हैं मुकम्मल जो मजहब की दुहाई पर हत्यारे को रब का दर्जा दे रहे हैं।


दोजख इसी का नाम है,जो हम जी रहे हैं और जिसे हम मजहब समझ रहे हैं जो फिर बाजार है।खुल्ला बाजार।


इंसानी जज्बात की कोई जुबां मगर होती नहीं है।

इंसानी जज्बात का कोई सरहद होता नहीं है।

न इंसानियत के मुल्क का बंटवारा कहीं होता है।


मजहब भी बांटने का काम नहीं करता है।

न मजहब तलवार है और न मजहब सियासत है।

मजहब अरबिया वसंत भी नहीं है।


मजहब न अल कायदा है और न मजहब तालिबान है।

न मजहब में दहशतगर्दी की गुंजाइश है और न मजहब कोई इस्लामिक स्टेट है।


मजहब रोम की रियासत भी नहीं है तो मजहब कोई भव्य राममंदिर भी नहीं है।न नागपुर मजहब है और बनारस मजहब।


न मजहब किसी सियासी दहशतगर्द गिरोह का चाकचौबंद डिजिटल नेटवर्क और मुख्यालय है।


रब हर किसी का अपना अपना।

यकीन भी हर किसी का अपना अपना।

इबादत के तौर तरीके भी अपने अपने।

सजदा के तरीके बी अलग अलग।


या रब,फिरभी भेड़ धंसान के मुखातिब होकर कौन कहे कि तेरी बरकतें नियामतें किसी पहचान का मोहताज नहीं यकीनन।


मानें या न मानें,कायनात सब पर मेहरबान है।

रोशनियों और बारिशों,हवाओं और पानियों पर मजहबी दस्तखत नहीं होते।


न जनमजात किसी पीके पर किसी मजहब का ठप्पा लगा होता है।


दरअसल परिंदों कीउड़ान में कोई थकान नहीं होती लेकिन कदम दरकदम इंसान के पांव थम जाते हैं क्योंकि मजहबी सियासत ने दीवारें बहुत बना दी है।सरहद भी तमाम हैं।


मसलन नई दिल्ली में बंगाली कोई कम नहीं बसते हैं और न वे हिंदी या बांग्ला कम जानते हैं।फिर भी दिल्ली वालों का रोना है कि बांग्ला पढ़ नहीं सकते।कोई दिल्लीवाला हुआ नहीं जो अनुवाद कर दें।


अरबी भी जानने वाले बहुतेरे हैं।

अरब दुनिया का हाल हकीकत बताने वाला कोई नहीं।


दक्षिण से उत्तर में आने वाले कम नहीं हैं और उत्तर से दक्षिण जाने वाले कम भी नहीं हैं।फिर भी दक्षिण की भाषाएं अबूझ हैं।


दिल्ली के दिलवालों में पंजाबी सबसे ज्यादा हैं लेकिन एको नहीं है जो बाकी लोगों को बता सकें कि गुरमुखी में लिखा क्या जा रहा है।


नोबेल वोबेल को गोली मारिये।

कालजयी कम लिखा नहीं गया है।

कालजयी लिखने वाले बहुतेरे हैं।


हमें अनुवादक बहुत इफरात चाहिए।

जो इंसानी जज्बात की जुबां को इंसानियत का मुल्क बना सकै हैं।



बहरहाल समाद साहेब को पढ़कर यह पहेली अब दरअसल कोई पहेली नहीं है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी पश्चिम बंगाल के लोगों को पूर्वी बंगाल से इतनी नफरत क्यों है!


क्यों इतनी नफरत है उस बंगाल के शरणार्तियों से और क्यों पूर्वी बंगाल के लोग बंगाली नहीं है,सिर्फ बांगाल है पश्चिम बंगाल की नजर से!


कुमांयूनी बंगाली हूं।बंगाली नहीं बांगाल हूं।

कुमांयू,उत्तराखंड औय यूपी में हमें किसी ने कभी न बांगाल कहा है और न रिफ्यूजी।

जनमजात चंडाल हूं लेकिन अछूत भी नहीं कहा है किसी ने।


दंडकारण्य में भी ऐसा नहीं है और न अंडमान में।

न भारत के किसी और हिस्से में।


बाकी देश में बिना रिजर्वेशन हमारे लोग सभी क्षेत्रों में आला दर्जा तक पहुंचे हुए है।हम भी बंगाल से बाहर होते, मसलन दिल्ली में भी होते तो यकीन सबएडीटर की हैसियत से चार दशक की पत्रकारिता को अलविदा कह नहीं रहे होते यकीनन।आपकी कसम।


हम पूर्वी बंगाल के लोग आजादी के सात दशक बाद भी बंगाल में बांगाल हैं।


बंगाल में अंबेडकर की राजनीति में आने से पहले अस्पृश्यता निषेध लागू है और आजादी के सात दशक बाद भी हम पश्चिम बंगाल में अछूत हैं।


भारत विभाजन के सात दशक बाद भी विभाजन पीड़ित बंगाली हिंदू

आज भी बंगाल में रिफ्यूजी है।


पंजाब में कोई रिफ्यूजी नहीं है और न कोई पंजाबी रिफ्यूजी है।

गौरतलब है कि पंजाब में जो खून खराबा हुआ,नोआखाली और कोलकाता के अलावा वैसा खूनखराबा बंगाल में कहं हुआ ही नहीं।


कोई पंजाबी किसी को पाकिस्तानी पंजाबी नहीं कहता जैसे बंगाली हर बांगाल को बांग्लादेशी दाग देता है।बांगाल कहकर फतवा दे देता है कि अगला जैसे बंगाली हुआ ही नहीं।


हमें अछूत बनाये रखने के लिए ही बंगाल के जमीदारों ने हिंदू मुसलिम राजनीति को हवा दी,पानी दिया और देश का बंटवारा करके माने और अछूतों को अछूत बनाये रखने के लिए ही बंगाल को हिंदुत्व का बंगाल बनाये रखने के लिए ही पूर्वी बंगाल से निजात पाने की गरज से बंगाल विबाजन के सथा साथ पंजाब,कश्मीर और भारत के विभाजन को अंजाम दिया गया।


फासीवाद के मसीहा भी यहीं से हैं।

दरअसल पश्चिम बंगाल दरअसल बंगाल रहा ही नहीं है कभी और न बंग के बांगाल से उसे कभी कोई मुहब्बत हो सकती है।


पश्चिम बंगाल तो फिर वहीं राढ़ है ताराशंकर के जलसाघर खा विस्तार।या फिर सत्यजीत राय का कुलीननत्व का उत्सव है या फिर उसके साथ नत्थी उत्तर बंगाल है।


बंग और बांगाल तो पद्मापार है जो अब बांग्लादेश है और मातृभाषी जिसकी अब भी बांग्ला है।जिनकी राष्ट्रीयता भी बांग्ला है।


हिंदुत्व नहीं।हरगिज नहीं।इसके ऐतिहासिक,पुरातात्विक और नृतात्विक सबूत हैं।आगे हम इस पर सिलसिलेवार बाद करेंगे।


इस बंगाल के जमींदारो ने सिर्फ उस पर राज किया है और बाकी उस बांगाल के बांगाल उनकी अछूत प्रजा हैं चाहे हिंदू हो या मुसलमान। पश्चिम बंगाल में भी वे अछूत हैं चाहे हिंदू हों या मुसलमान।


इस बंगाल में दुर्गोत्सव में महिषासुर का सार्वजनिक वध करने वाले असुर वंशज बंगाली हरगिज नहीं है।ये सारे के सारे सुर है।सुर में हैं।हम सारे लोग असुर हैं,हिंदू या मुसलमान।जैसे सारे आदिवासी।


दरअसल हमलोग आदिवासी हैं।जिन्हें लोग अब सियासत के मुताबिक मूलनिवासी बहुजन भी कहने लगे हैं।


वह बंग दरअसल नदियों का देश रहा है।

वह बंग दरअसल जंगलात का देश रहा है।

वह बंगाल दरअसल दलदल देश रहा है।


दरअसल सुंदरवन का विस्तार सियालदह तक रहा है।

और यूं समजो कि पूर्वी बंगाल मुकम्मल सुंदरवन है।


इस फर्जी बंगाल के मकाबले तो कहीं बड़े बंगाल उत्तराखंड में बसे दिनेशपुर और शक्तिफार्म असली मुकम्मल बंगाल हैं या दंडकारण्य का बंगाल या अंडमान का बंगाल या देश भर में बिखेर दिया गया टुकड़ा टुकड़ा बंगाल।


हम कभी समझा ही नहीं सके किसी आदिवासी को या कि किसी बांगाल को शरणार्थी बांगाल भी आदिवासी हैं।


ढाका के इब्ने गुलाम समाद का यह आलेख बहुत जरुरी है बंगाल और हिंदुस्तान का सच जानने के लिए।


Rather we should understand the phenomenon of blind religious nationalism!

http://www.hastakshep.com/english/opinion/2015/08/22/phenomenon-of-blind-religious-nationalism


नोटः यह बहस की शुरुआत है और सारे ताश हमने अभी खोले नहीं हैं।बाकी लोग पहले अपनी जुबां का ताला पहले खोल तो लें।


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