| Saturday, 22 June 2013 11:47 |
गिरिराज किशोर राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय के पूर्व निदेशक वाइपी आनंद साहब मेरे बोलने के बाद राधा बहन और तारा जी के आग्रह पर बोले थे। उन्होंने बड़े-बड़े पदों पर रहने के बावजूद कार नहीं खरीदी। क्योंकि उन दिनों विदेश से निर्यात किया गया पेट्रोल इस्तेमाल होता था। आज भी वे मेट्रो या स्कूटर से चलते हैं। उन्होंने बताया कि जब भी गांधीजी से संबंधित स्मृति-चिह्नों की नीलामी का सवाल आता है तो सरकार तारा जी के साथ उन्हें भी मीटिंग में आमंत्रित करती है। वे यही सलाह देते हैं कि सामग्री को भारत में लाया जाए। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। नियमानुसार सरकार नीलामी में स्वयं बोली नहीं लगा सकती। उनका यह सुझाव था कि गांधी से संबंधित जितनी संस्थाएं हैं उन्हें मिल कर इस सवाल पर विचार करना चाहिए और सरकार से बात करके कोई रास्ता निकालना चाहिए। यही मैं भी कहता रहा हूं। सबसे पहले तो जो सामान बाहर जाता है उस पर नजर रखी जाए, उसकी एक संचालन समिति हो। दूसरे, सरकार उन संस्थाओं के संकुल को धनराशि उपलब्ध कराए और वह संकुल ही नीलामी में सामान खरीदे। एक गांधी केंद्र्रीय संग्रहालय बना कर सब चीजें उसमें रखी जाएं। या तो वर्तमान गांधी संग्रहालय को केंद्र्रीय संग्रहालय का दर्जा दिया जाए। संस्कृति मंत्रालय आखिर किस आधार पर नियम या कानून बना रहा है। उन्होंने गांधी-संस्थाओं से या व्यक्तियों से सुझाव मांगे हैं या नौकरशाहों के सुझावों पर ही निर्भर हैं, यह सब देश के सामने आना चाहिए। तारा जी और कुछ अन्य गांधीजनों की राय है कि बापू से जुड़ी वस्तुओं की नीलामी रोकना संभव नहीं। एक गांधीजन ने एक टीवी चैनल पर हुई चर्चा में कहा था कि ये चीजें नीलाम हों या न हों, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। गांधी हिंदुस्तान के ही नहीं, सारे विश्व के हैं इसलिए उनसे जुड़ी चीजें सब जगह रहें तो कोई हर्ज नहीं; गांधीजनों को यह सोचने का अधिकार है। शायद इसी कारण सरकार को भी फर्क नहीं पड़ता। लेकिन देश के लोग क्या सोचते हैं इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बात तब संभव होती जब देश से ले जाकर सामग्री विदेशों में नीलाम न की जा रही होती। अब तो उस सामग्री को माल की तरह हानि-लाभ के समीकरण के अनुरूप बेचा-खरीदा जाता है। गांधी के लिखे पत्र तो संसार में बिखरे पड़े हैं इसलिए यह माना जा सकता है कि उनके पत्र बहुतायत में उपलब्ध हैं। लेकिन उनके व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं तो सीमित होंगी। चाहे चप्पल हों, कपड़े हों, चादरें हों। तारा जी ने 27 मई की बैठक में बताया था कि बापू और बा तीन-तीन जोड़ी कपड़े रखते थे। बापू असंग्रही थे, हर चीज का उन्होंने त्याग किया। जो व्यक्ति त्याग करता है उसका नाता त्याग की गई वस्तु से नहीं रहता। हम भले ही चीजों से उस व्यक्ति का रिश्ता जोड़ लें। उससे वह उसकी नहीं हो जाती। अस्पताल में अगर किसी चादर पर कोई व्यक्ति दो-चार दिन लेट जाए तो वह उसकी नहीं हो जाती। हो भी जाए तो उसकी तस्दीक कौन करेगा। गांधी जी सत्य को ईश्वर मानते थे, उनकी वस्तुओं से जुड़े सत्य को भी जानने का देश को अधिकार है। यह सही है संसार विश्वास पर चलता है। पर विश्वास ऐसे ही नहीं हो जाता। एक स्थायी दुकान की साख तो उसकी ईमानदारी के आधार पर बनती है, पर नीलामी संस्थाओं का किस हद तक विश्वास किया जा सकता है यह तो वही लोग जानें जो खरीदते-बेचते हैं। कहा जाता है कि नीलामी एजेंसियां दलाली यानी कमीशन पर काम करती हैं। जिस चीज का जो इतिहास लिख कर दे दिया जाता है वे उसके आधार पर उसकी घोषणा करती हैं। खैर, इस बहस में जाने का हमारा कोई इरादा नहीं। पर जब किसी राष्ट्र के गांधी जैसे अग्रज की बात आती है तो हम यह कह कर नहीं छोड़ सकते कि वह व्यक्ति तो सार्वभौमिक है, सब स्वतंत्र हैं कि उसके बारे में चाहे जैसा करें। जिस देश या नगर से उसका नाता है उसका भी दायित्व कि वह इस बार में जाग्रत रहे कि सच्चाई की रक्षा हो रही है या नहीं। कहा जाता है उद््गम अपने जल को प्रदूषित नहीं होने देता। |
Saturday, June 22, 2013
देश अपना गांधी बेगाना
देश अपना गांधी बेगाना
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