Sunday, April 9, 2017

Twelfth Night!शुद्धतावादियों के प्रतिरोध में शेक्सपीअर ने भी अभिव्यक्ति का जोखिम उठाया था! पलाश विश्वास



Twelfth Night!शुद्धतावादियों के प्रतिरोध में शेक्सपीअर ने भी अभिव्यक्ति का जोखिम उठाया था!

पलाश विश्वास

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विलियम शेक्सपीअर का अद्भुत नाटक टुवेल्थ नाइट हमारे मौजूदा समय के सत्ता के निरंकुश रंगभेदी शुद्धतावादी सत्ता विमर्श और तदनुसार उत्पन्न परिस्थितियों के मद्देनजर बेहद प्रासंगिक हैं।


इसके शुद्धतावादी पात्र हमारे राष्ट्रवादी चरित्रों के जैसे हैं।उनके भी तौर तरीके वहीं हैं।हमें इस नाटक में अपने आसपास के तमाम चेहरे नजर आ सकते हैं।


शुद्धतावादियों के प्रतिरोध में शेक्सपीअर ने भी अभिव्यक्ति का जोखिम उठाया था। उनके इस नाटक का प्रदर्शन रोक दिया गया था।


महारानी एलिजाबेथ के स्वर्णकाल में शुद्धतावादियों के रणहुंकार से लंदन के सारे थिएटर बंद कर दिये गये थे।उसी परिदृश्य में पिउरिटन आंदोलन पर करारा व्यंग्य किया शेक्सपीअर ने।

In September 1642 the Long Parliament ordered a closure of the London theatres. The order cited the current "times of humiliation" and their incompatibility with "public stage-plays", representative of "lascivious Mirth and Levity".[1] The ban, which was not completely effective, was reinforced by an Act of 11 February 1648. It provided for the treatment of actors as rogues, the demolition of theatre seating, and fines for spectators

In 1660, after the English Restoration brought King Charles II to effective power in England, the theatrical ban was lifted. Under a new licensing system, two London theatres with royal patents were opened


शेक्सपीअर के कथापात्र अब भारत में निर्णायक भूमिका में हैं,जिन्हें समझने के लिए यह नाटक मददगार हो सकता है।


कट्टर विशुद्धतावाद (Puritanism) का आन्दोलन उन दिनों शेक्सपियर के आक्रमण का विषय बना है। मालवोलियो एक विशुद्धतावादी पात्र है, जिसमें ढोंग और अहंकार को दिखाया गया है। विशुद्धतावादी आन्दोलन नाटक-घरों और आन्दोलन के साधनों पर सीधा प्रहार कर रहा था। शेक्सपियर के युग का अन्त इन्हीं कट्टरपन्थी ईसाइयों के विकास में हुआ था, जिन्होंने नाटक को काफी क्षति पहुँचाई थी। किन्तु इस नाटक के अतिरिक्त शेक्सपियर में अन्यत्र इन लोगों पर ऐसे प्रहार नहीं मिलते, वैसे शेक्सपियर में इनके प्रति कोई बुरी कट्टर भावना नहीं है। वह केवल दिल्लगी करता है, सहिष्णुता से काम लेता है। किन्तु वैसे यह भी निश्चय से नहीं कहा जा सकता। शेक्सपियर तो जैसा पात्र होता है, उसके अनुरूप ही उससे बात कराता है और इसीलिए उसकी कला इतनी गहरी उतर गई है क्योंकि वह तो मानव-स्वभाव का पारखी है। सर ऐण्ड्रू भी अनेक बातें कहता है, पर वह सब उसी का चरित्र है, शेक्सपियर का अपना कोई मत वहाँ नहीं है। 


बारहवीं रात एक सुखान्त नाटक है। इसका लेखन-काल अन्तस्साक्ष्य और बहिस्साक्ष्य की परीक्षा के उपरान्त 1601 ई. माना जाता है। इस नाटक में दो कथाएँ हैं—एक प्रेम की कथा, दूसरी है हास्य कथा। प्रथम का स्त्रोत इन ग्रन्थों से माना जाता है-एपोलोनियस और सिल्ला; ग्लि' इन्गन्नति तथा इन्गन्नि। बैण्डेलो के उपन्यासों के संग्रह में इसका प्रारम्भिक रूप माना जाता है। बैण्डेलो की इतालवी भाषा की रचना से यह कुछ परिवर्तन के साथ बैलेफोरेस्ट द्वारा फ्रेंच में उतर आई। किन्तु इसकी हास्य कथा शेक्सपियर की अपनी ही है। वह मौलिक है। इन हास्य पात्रों का सृजन कवि की अपनी प्रतिभा का परिणाम है। -रांगेय राघव

 बड़े दिन यानी क्रिसमस के बारह दिन बाद, अर्थात 6 जनवरी को इंग्लैण्ड में एक उत्सव हुआ करता था, जो क्रिसमस के बाद काफ़ी महत्त्व रखता था। उस दिन कई खेल भी होते थे। सब मित्र और परिवार के लोग इकट्ठे होते थे और केक काटा जाता था। उसे बाँटने पर जिस पुरुष और स्त्री के केक के टुकड़ों में मटर और सेम पाए जाते थे, उन्हें उस दिन राजा और रानी मान लिया जाता था। इस नाटक में भी तीन पति और पत्नियाँ बनती हैं। शायद इसीलिए इसका नाम 'बारहवीं रात' रखा गया है। दूसरा नाम 'जैसा तुम चाहो' से बहुत मिलता है या इसका अर्थ है कि न यह पूरी तरह सुखान्त नाटक है, न रोमान्स ही है। न दुःखान्त ही है, न है मास्क। वही मान लो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो। 1607 ई. में 'जैसी तुम्हारी इच्छा हो' नाम से मार्स्टन की भी एक कॉमेडी छपी थी। नाटक का स्थान इलिरिया है, जो एक काल्पनिक स्थान है। वैसे ही जैसे शेक्सपियर के एक अन्य नाटक 'द विन्टर्ज़ टेल' का स्थान 'बोहीमिया' है।

बारहवीं रात का दूसरा नाम और है—'जैसी तुम्हारी इच्छा हो'। उन दिनों के हल्की चीज़ों को देखने के शौकी़न दर्शकों के लिए यह नाम काफी दिलचस्प था। बड़े दिन यानी क्रिसमस के बारह दिन बाद, अर्थात् 6 जनवरी को इंग्लैण्ड में एक उत्सव हुआ करता था, जो क्रिसमस के बाद काफी महत्त्व रखता था। उस दिन कई खेल भी होते थे। सब मित्र और परिवार के लोग इकट्ठे होते थे और केक काटा जाता था। उसे बाँटने पर जिस पुरुष और स्त्री के केक के टुकड़ों में मटर और सेम पाए जाते थे उन्हें उस दिन राजा और रानी मान लिया जाता था। इस नाटक में भी तीन पति और पत्नियाँ बनती हैं। शायद इसीलिए इसका नाम बारहवीं रात रखा गया है। दूसरा नाम 'जैसा तुम चाहो' से बहुत मिलता है या इसका अर्थ है कि न यह पूरी तरह सुखान्त नाटक है, न रोमान्स ही है, न दुःखान्त ही है, न है मास्क। वही मान लो—जैसी तुम्हारी इच्छा हो। 

1607 ई. में 'जैसी तुम्हारी इच्छा हो' नाम से मार्स्टन की भी एक कॉमेडी छपी थी। 

नाटक का स्थान इलिरिया है। जो एक काल्पनिक स्थान है। वैसे ही जैसे शेक्सपियर के एक अन्य नाटक—'द विन्टर्ज़ टेल' का स्थान 'बोहीमिया' है। 

चरित्र-चित्रण के दृष्टिकोण में इसमें वायोला, मालवोलियो और सर टोबी—तीन पात्र ऐसे हैं, जिनकी याद रह जाती है। विदूषक का पार्ट कोई विशेष नहीं है। किन्तु सम्पूर्ण दृष्टि से, व्यक्तिगत रूप से मुझे यह नाटक गहरा नहीं लगा, क्योंकि वायोला का अन्तर्द्वन्द्व जो इस कथा का प्राण है, मुखर नहीं हो सका है। 


I have not to focus on incidents and examples.We do enjoy the comedy as well as the tragedy with blind faith and keep mum,Those who speak,the lot of fools visit and revisit the most vocal scenario of exclusion and execution as well.We already know the names involved.


Malvolio is Countess Olivia's steward, and it is said about him that he is "sometimes he is a kind of puritan" (2.3. 131). She also mentions that he is "sick of self-love" (1.5. 90-91). According to the textbook, his name is Italian for "ill will". He seems to despise all manner of fun and games. Malvolio is constantly the butt of everyone's jokes and teasing.


At one point, Maria (Olivia's gentlewoman), Feste (Olivia's clown/jester), Sir Toby (Olivia's Uncle), and Sir Andrew (Sir Toby's companion), decide to play a trick on Malvolio. Maria writes a letter in Olivia's handwriting and leaves it for Malvolio to find it. The letter convinces Malvolio that Olivia is in love with him, and leads him to think that Olivia wants him to do things such as smile, wear yellow stockings and cross garters. However, the fact is that Olivia is morning her brother's death, and finds smiling offensive, and yellow is:

"a colour she abhors and cross garters a fashion she detests" (2.5. 189-190).


Malvoio is then imprisoned for being a supposed lunatic until the end of the play.


It is very important to understand the idea of Puritans when Twelfth Night was written to be able to analyze Malvolio.


During the reign of Elizabeth I, and around the time that Twelfth Night was written and performed, Puritans appeared as a reform movement. They were very anti-Catholic, and felt that the Church of England was still too close to Catholicism and needed to reform further. Many of the rituals in the Church of England were not only considered to be objectionable, but were believed by some non-conformists to put one's immortal soul in peril. (Puritan Wikipedia Page)


The Puratin movement was hostile toward theatre, feeling that "entertainment" was sinful. They eliminated the use of musical instruments in their religious services. Due to this, and the fact that the Puritans were constantly attempting to close the theaters (and eventually succeeded in doing so), it's not surprising that there were parodies of the Puritan mentality onstage.


Malvolio is most certainly one of these parodies, which is why he is constantly being mocked and tricked by the other characters of the play. It also explains why he so strongly seems to despise fun, games, and the entertainment of Feste, Olivia's jester. About Feste, Marvolio states:

"I marvel your ladyship takes delight in such a

barren rascal. I saw him put down the other day with an

ordinary fool that has no more brain than a stone. Look

you now, he's out of his guard already. Unless you laugh

and minister occasion to him, he is gagged. I protest I

take these wise men that crow so at these set kind of

fools no better than the fools zanies." (1.5. 78-84).


Also, one of the most famous "Puritan moments" is when Malvolio interprets the letter he reads. At one point in the letter, he reads:

"I may command where I adore

But silence like a Lucrece knife

With bloodless stroke my heart doth gore.

M.O.A.I. Doth sway my life." (2.5. 101-104).


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