| Saturday, 14 January 2012 12:55 |
अपूर्वानंद पहली कार्रवाई इस तरह प्रेस विधेयक के विरोध और प्रेमचंद रंगशाला से सीआरपीएफ को हटाने की मांगों को साथ-साथ रख कर की गई। पहली बार युवा महोत्सव के पारितोषिक वितरण के बहिष्कार की इस कार्रवाई में तरुणों की गिरफ्तारी हुई और उन्हें रिहा करने के लिए पटना के मुख्य अशोक राजपथ को देर रात तक जाम भी किया गया। आज तीस साल बाद यह सोच कर जरा हैरानी होती है कि कैसे बिना किसी सैद्धांतिक और राजनीतिक प्रशिक्षण के एक राजनीतिक रूप से परिपक्व आंदोलनात्मक रणनीति कुछ तरुण बना पा रहे थे। प्रेस विधेयक तो वापस ले लिया गया। इस तरह प्रेमचंद रंगशाला का मुद्दा, जो कलाकारों के आंदोलन में दूसरे नंबर पर था, पहले नंबर पर आप-ही आप आ गया। 1982 से यह संघर्ष काफी लंबा चलने वाला था। शहर में सभा-गृहों का न होना या रंगशाला का बंद रहना क्यों महत्त्व का मुद्दा होना चाहिए, यह समझाना बड़ा कठिन था। राजनीतिक दलों की इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। प्रेस निहायत ही उदासीन था। उस समय बिहार में आर्यावर्त, प्रदीप, सर्चलाइट और इंडियन नेशन का राज था; आंदोलनकारी खबर लिए डोलते रहते थे और कृपापूर्वक भीतर के पृष्ठों पर कभी तीन तो कभी चार पंक्तियों की जरा सी जगह दे दी जाती थी। यह तो हिंदुस्तान टाइम्स था जिसने पहली बार इसे पहले पेज पर प्रकाशित किया। वर्ष 1982 से प्रेमचंद रंगशाला को सीआरपीएफ के कब्जे से मुक्त कराने का यह कलाकारों का आंदोलन कई मायनों में दिलचस्प था। एक तो इसी कारण कि इसके नेतृत्व की औसत उम्र कोई बीस-इक्कीस साल की थी। दूसरे कि अलग-अलग काम करने वाले रंग-समूहों का किसी एक मसले पर भी साथ काम करना इतना आसान नहीं था। इसके नेतृत्व में इप्टा के लोग थे, लेकिन उनमें इतनी समझदारी थी कि वे खुद को ही आगे न रखें। उस समय पटना में सक्रिय संस्थाओं में सर्जना, नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, जनवादी कला-विचार मंच आदि ने इस आंदोलन की शुरुआत की और जल्दी ही पैंतीस से ऊपर रंगकर्मियों और लेखकों-कलाकारों की संस्थाएं इस मंच पर इकट््ठा हो गर्इं। इसके साथ छात्र संगठन भी शरीक हो गए। आंदोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे। ऐसा लगा कि इसका चलना ही मुश्किल है, क्योंकि कोई अंत नजर नहीं आता था। 1985 में राज्य द्वारा आयोजित युवा महोत्सव के बहिष्कार और उसके समांतर प्रेमचंद युवा महोत्सव के आयोजन का आह्वान भी अनेक लोगों को दुस्साहस लगा। लेकिन इसे अपूर्व सफलता मिली। इसके बावजूद प्रेमचंद रंगशाला एक प्रादेशिक और क्षेत्रीय मुद्दा ही था। आंदोलनकारी भी पहले से अधिक वयस्क हो गए थे। उससे भी ज्यादा बड़ी बात यह थी कि उनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर पर आदर के साथ देखे जाने लगे थे, अपनी रंग-प्रतिभा के कारण। इसने बिहार तक सीमित इस मसले को राष्ट्रीय फलक प्रदान करने में मदद की। 1985 में गुवाहाटी के संगीत नाटक अकादेमी के नाट्य-उत्सव के मंच पर इसे उठाया गया और ब. व. कारंत ने खुल कर इस कब्जे की भर्त्सना की। वर्ष 1987 में संगीत नाटक अकादेमी ने पटना में पूर्व-क्षेत्रीय नाट्योत्सव आयोजित किया। इसमें नेमिचंद्र जैन, ब. व. कारंत, रतन थियम, कुमार राय, देवाशीष मजुमदार जैसी शख्सियतें एकत्र हुर्इं। आंदोलनकारियों ने उद््घाटन के मंच पर कब्जा करके संपूर्ण भारतीय रंग-संसार से प्रेमचंद रंगशाला के उद्धार में हाथ बढ़ाने की अपील की। अगले दिन नेमिजी, कारंत, कुमार राय, देवाशीष मजुमदार के नेतृत्व में बड़ा प्रदर्शन हुआ और फिर ये सब तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे से मिलने गए। महोत्सव खत्म होने के दिन ही मुख्यमंत्री ने रंगशाला से सीआरपीएफ को हटा लेने की घोषणा की। इस घोषणा के कोई चौथाई सदी गुजर जाने के बाद अब जाकर इस रंगशाला को फिर से इस लायक बनाया जा सका है कि इसमें नाटक हो सकें। इस मौके पर बिहार सरकार की विज्ञप्ति ने कलाकारों के संघर्ष को याद किया है। लेकिन रंगकर्मियों की आशंका कुछ और है। अभी पटना में कोई ऐसा प्रेक्षागृह नहीं जहां शौकिया रंग-समूह अपने सीमित साधनों में नाटक कर सकें। पचीस हजार से पचास हजार रुपए किराए पर हॉल लेकर नाटक करने की क्षमता किसी में नहीं। फिर बडेÞ भव्य ढंग से तैयार की गई इस प्रेमचंद रंगशाला को भी क्या इसी तरह रंग-कर्म के लिए इतना महंगा कर दिया जाएगा कि उसमें नाटक हो ही न सकें। या जो सलूक इस सरकर ने हिंदी भवन के साथ किया, क्या वही इसके साथ भी होगा। एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किए गए हिंदी भवन को प्रबंधन संस्थान के हवाले कर देने में सरकार को संकोच नहीं हुआ। लेखकों की गुहार को उसने बिल्कुल अनसुना कर दिया। क्या यह रंगशाला भी उसी राह जाएगी? फिर अभिव्यक्ति की जिस जगह के सिकुड़ने के खिलाफ यह रंगशाला एक प्रतीक बन गई थी, वह क्या दूसरे तरीके से उतनी ही संकुचित रह जाएगी? |
Saturday, January 14, 2012
अभिव्यक्ति की जगह
अभिव्यक्ति की जगह
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